भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 778 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 390

३८० भक्तिसुधा

सः'। 'फिर सखि! तुम कल्याणी हो, तुम्हारी जो पूजा करते हैं, उनका तुम कल्याण करती हो। हम भी पूजा करती हैं, कहो, 'मनमोहन' किधर गये हैं?' लौकिक दृष्टिसे भी उन सर्वमनोहर मोहनका मन हमपर कृपालु हो अथवा हमारा मन उनमें लग जाय यह चाहते ही हैं, बात एक ही है। परंतु स्थिति यह है कि चाहनेपर भी नहीं लगता। श्रीविष्णुके द्वारा जालन्धररूप लेकर वृन्दाका पातिव्रत भंग करनेकी शंका बहिर्भूतोंकी है। वैसे जालन्धर श्रीविष्णुका अंश था और वृन्दा श्रीराधाका अंश। केवल अपूर्ण स्वरूपमें आसक्त अपने भक्तको छलसे, बलसे जैसे बने भगवान् अपने पूर्णरूपमें ग्रहण करते हैं। सब सती चाहेंगी कि वृन्दाका महत्त्व प्राप्त हो, हमारे मनको भगवान् स्वीकार करें। वस्तुतः सब धर्मोंका तात्पर्य ही यह कि श्रीश्यामसुन्दर बलात् हमें चाहें। नहीं तो कौन चाहता है कलत्र, पुत्र, वित्तसे चित्त हटाना? स्त्री यदि जारमें मन ले जाय तो कभी उसका उद्धार नहीं। पतिप्रेम तो शालग्रामबुद्ध्या सेव्यमान परमपुरुषको प्राप्त करना है। परमपतिको प्राप्त करनेके लिये ही पतिकी पूजा है। इसी स्वधर्मबुद्ध्या क्रियमाण कर्मसे प्रभु प्रसन्न होकर स्वात्मसमर्पण करते हैं। तभी वे अमूर्त मनोरथोंको मूर्त मिलिन्द बनाकर वृन्दाके तुलसीके मकरन्दका पान करते हैं। इन दृष्टियोंसे तुलसि! तुम्हारा बहुत महत्त्व है, श्रीश्याम तुम्हारे वशमें हैं। अतः इधर आये हों तो बतलाओ, सखि! जरा हम भी उन चतुर चोरका दर्शन तो करें। व्रजांगनाओंन्द्वारा तुलसीमें दोषानुसन्धान जब व्रजांगनाओंने देखा, 'हम इतनी देरसे इसको मना रही हैं, मिन्नतें कर रही हैं, पर यह जरा भी नहीं पिघलती, देखतीतक नहीं।' तब वे निराश हो गयीं। उनमें असूया उत्पन्न हो गयी—वे अब तुलसीके उन्हीं गुणोंमें दोष देखने लगीं—'सखि! यह बड़ी गर्वीली है, इसे अपने श्यामके अतिप्रियत्वका बड़ा अभिमान है। क्यों नहीं, इसका नाम ही आखिर 'तुलसी' ठहरा— 'तुल्याः ('न अस्मान्') स्यति (खण्डयति) इति तुलसी।' जिन श्यामसुन्दरमें यह रत है, हम भी उनमें अनुरक्त हैं। अतः हमें सौतें समझकर हमारा खण्डन कर रही है। सखि! यह तो दासी थी—चरणाधिकारिणी है, पर देखो उन साँवरे मोहनका अन्याय कि उन्होंने सेविकाको प्रेयसीका स्थान दिया है। अस्तु, दासीको प्रेयसी बनाया सो तो बनाया, पर यह भी नहीं सोचा कि 'यह नायकोंसे घिरी है।' इस रूपमें तो यह हमारे हृदयोंको टूक-टूक कर रही है। हाय, जिसपर हमारा अधिकार है, उसीको इसने अपने वशमें कर लिया। यह तुलसी कल्याणी अर्थात् भद्रा है। 'विचरति भद्रा त्रिभुवनमध्ये।' नाममात्र ही भद्रा है, वस्तुतः है यह भी अभद्रा ही। भरणी, भद्रासे लोग बचते हैं। हाँ, सम्प्रयोगमें यह भद्रा कल्याणी अवश्य है।' कुछ व्रजांगना कहती हैं—'सखि! जाने दो; यह तो भगवदीया है। उनकी रुचिके बिना यह हमें उनका पता न देगी; क्योंकि यह अतिप्रिया है। अतः चलो, इसकी सौतोंसे पूछें—वे इससे दुःखी होंगी, अवश्य बता देंगी।' ('मालत्यदर्शि नः कच्चित्') यहाँ एक साथ मालती आदि कईके नाम हैं। वस्तुतः अनन्तनामवाली दास्यभाववती ये सखी हैं। 'प्रिय सखि! मालति! तुम जानती हो इधरसे कहीं श्यामसुन्दर निकले हैं, तुमने देखा है?' मालतीको प्रफुल्लित देखकर, उससे मकरन्द गिरता देखकर व्रजांगना कल्पना करती हैं और उससे कहती हैं—'सखि! मालति! तुम्हें श्रीश्यामके दर्शन अवश्य हुए हैं, तभी तो तुम्हारे विकसित सुमनोंसे सौमनस्य झलक रहा है। सखि! तुमने उन्हें देखा ही नहीं, अपितु उनका स्पर्श तो तुम्हें अवश्य प्राप्त हुआ है, तभी तो यह तुम्हें मुकुलित भावके बहाने रोमांच हो रहा है; क्योंकि श्रीश्यामके अंगसंगके बिना रोमांच हो नहीं सकता। अगर हो सकता है तो उनके स्पर्शसे ही। यह अन्वयव्यतिरेकसे ही दीख रहा है। इसके अतिरिक्त ये मकरन्दबिन्दु भी गिर रहे हैं। अरे, ये मकरन्दबिन्दु नहीं, ये तो स्पष्ट ही आनन्दाश्रु हैं। सखि! बस, अब हमसे मत छिपाओ, यह सब चमत्कार तो उन श्रीश्यामबिहारीके दर्शन आदिके बिना नहीं हो सकता।' इससे व्रजांगनाओंको श्रीकृष्णका स्मरण आ गया, वे बीचमें उन्हें ही उपालम्भ देने लगीं—