भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 389

श्रीरासपंचाध्यायी ३७९ साथ—सपत्नीके साथ भी श्रीभगवान्के चरणरजको ही चाहती हैं। अतएव तुलसी, दीर्घदर्शिनी तुलसी पहलेसे ही उस महामहिमपदाम्बुजको ग्रहण किये रहती है; क्योंकि लक्ष्मीको सदा यह भय रहता है कि कोई श्रीमद्भगवच्चरणरज-उपासक महातपस्वी मुझे अपने वशमें न कर ले। इसलिये श्रीमद्भगवद्विप्रयोगसे बचे रहनेके लिये वह निरन्तर उनके पादाम्बुजरजमें संलग्न रहती है। तुलसी इस बातको समझती है, अतः वह पहलेहीसे उन चरणोंमें लिपटी रहती है। तभी श्रीश्यामसुन्दर उसके लिये अच्युत हैं। इस प्रकार जो चरणप्रिया है, वही प्रियतमके वक्षःस्थलपर स्थान पाती है। इसी प्रसंगपर एक दूसरी दृष्टिसे व्रजांगनोक्ति है—सखि तुलसि! ये मधुव्रत जो गुंजारव कर रहे हैं, यह वस्तुतः आपका यशोगान कर रहे हैं। सखि! आपको तो क्या, आपके कारण आपके अनुरागी भौंरोंतकको भगवान् श्यामसुन्दर नहीं हटाते अथवा ये भ्रमर क्या हैं? ये उनकी मूर्तिमती अभिलाषा हैं; क्योंकि वे श्यामल हैं, अतः ये भी श्यामल हैं। हे तुलसि ! आपने उन्हें ऐसा वशमें किया है कि वे अपने मनोरथोंको मूर्तिमान् बनाकर उनके द्वारा आपका यशोगान किया करते हैं और आपका मकरन्द पान किया करते हैं। आप धन्य-धन्य हो। सखि! हमें भी उनसे मिला दो—गोविन्दचरणप्रिये! हम तो श्रीमुखचन्द्रकी अधरसुधाकी पिपासु हुईं, मानिनी हुईं, अतः भटक रही हैं। सखि! आप चतुर हो। अथवा— कच्चित्तुलसि कल्याणि गोविन्दचरणप्रिये। सह त्वालिकुलैर्बिभ्रद् दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।७) हे तुलसि ! हमलोग तो ऐसी हतभागिनी हैं कि हमपर श्रीश्यामसुन्दर सदा 'अच्युत' रहते हैं—कभी भी कृपासे—प्रेमसे—द्रवीभूत नहीं होते। आप बड़ी सौभाग्यशालिनी हो। अनुकम्पा करके हमें बतलाओ, आपने उन प्राणजीवनको इधर कहीं देखा है? अथवा 'गोविन्दचरण' में 'चरण' पद आदरार्थक है, जैसे— गुरुचरण, पितृचरण; इसके अनुसार—परम आदरणीय गोविन्द गोकुलेन्द्र जिसे प्रिय हैं, वह तुलसी उनकी अतिप्रिया है। अतः कभी भी उनसे उसका वियोग नहीं है। अथवा—'गोभिः श्रुतिभिः विन्द्यते— प्राप्यते यः स गोविन्दः' अर्थात् जो वेदके द्वारा प्राप्त किया जा सके, वह हुआ गोविन्द, कहा भी है— 'वेदान्तवेद्यचरणेन मयैव गीतम्' अर्थात् वेदशास्त्रके महातात्पर्यका विषय ही अत्यन्त प्रिय है जिसे, ऐसी हे तुलसि ! आपने यहाँ कहीं उन मनमोहनको देखा हो, बताओ। आपको उनसे बड़ा प्रेम है। देखो, अभी-अभी उन्होंने अपनी वनमालामें आपको नोंचकर लगाया है। अभी इधर गये हों, बता दो। यहाँ जिससे वे पूछ रही हैं, वह तो तुलसीका क्षुप है और यह यहाँ लगा है। इससे इस समय श्रीकृष्णका कोई सम्बन्ध नहीं। व्रजांगना भी इस बातको जान रही हैं, तब उनकी यह सब प्रश्न-परम्परा श्रीचरणधृत तुलसीसे होगी। परंतु वह तो उन्हें दीखती ही नहीं; तब प्रश्न वे किससे कर रही थीं? ऐसे संशयपर यह समाधान समझना चाहिये कि जंगलमें खड़ी तुलसीकी सजातीय श्रीचरणधृत तुलसीसे गोपांगनाओँने प्रश्न किया। श्रीकृष्ण इधरसे निकले तो उनके साथ वर्तमान तुलसी इस तुलसीसे मिलती गयी, इससे इस वनस्थ तुलसीको यह भी मालूम हो गया कि श्रीश्याम इधर पधारे हैं। अब वह गोपांगनाओंको उत्तर दे, न दे, यह बात दूसरी है। परंतु इन दृष्टियोंसे प्रष्टव्यता उसमें अवश्य है। अब तुलसीसे मानिनी गोपांगना पूछती हैं— 'हे सखि! उन अतिप्रिय श्यामको तुमने इधर कहीं देखा हो तो बतलाओ। हाँ, वे अतिप्रिय हैं, हमारे- जैसी परप्रेयसियोंका अतिक्रमण करके आ गये हैं। वे तुमपर मुग्ध हैं, विभोर हैं। ऐसे मुग्ध कि संसारकी समस्त वस्तुओंका, प्रिय वस्तुओंका अतिलंघन उन्होंने कर डाला और मधुर मधुपमूर्ति बनकर तुम्हारे पास चले आये। सखि! तुमने उनके चित्तको खूब आकृष्ट किया।' इस प्रकार यहाँ मानिनी उक्तिप्रसंगमें 'अतिप्रिय' पदमें एक ही समासको भिन्नार्थक करके दो चमत्कारिक अर्थोंकी सृष्टि है—'अतिक्रान्ताः प्रियाः अस्मादृशोऽपि येन सः तथा अतिक्रान्तं प्रियं जगद्वस्तुमात्रं येन