भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७८ भक्तिसुधा तो आर्यधर्मादिको त्यागकर उन्हें चाहती हैं, तब वे मिलते नहीं, पर आप नहीं चाहती थीं, तब भी जालन्धर-वेशसे उन्होंने आपको ग्रहण किया। अन्तमें वर भी दिया—'कभी विप्रयोग न होगा।' भोग लगनेके समय और सब हट जायें, भोग-रागमें कमी हो जाये, पर आप नहीं हट सकतीं, आपकी कमी नहीं हो सकती। आपके बिना भोग ही नहीं लग सकता। देखो सखि तुलसि ! आपको मकरन्दलोभी भ्रमरोंसे संकुलित होनेपर भी भ्रमरोंकी गुनगुनाहट और लक्ष्मीकी नाराजगीकी परवाह न करके भी उन्होंने धारण किया है। एतावता यह भी बतलाया कि 'आप बहुवल्लभा हैं— 'बहवो वल्लभा यस्याः', तब भी वे आपको धारण किये हैं। पहले 'वृन्दा' रूपमें जालन्धर तुम्हारा वल्लभ था। अब ये मधुलम्पट मिलिन्दवृन्द मकरन्दपानके लिये आपको घेरे हैं, फिर भी सखि, आपको श्रीश्यामसुन्दर धारण किये हैं। हम तो हे तुलसि ! एक वल्लभा हैं, लोकधर्म, कुलधर्म—सब कुछ त्यागकर अपना सर्वस्व उनपर न्योछावर करके उन्हें, केवल उन्हें ही स्वीकार कर चुकी हैं, पर फिर भी वे हमें दर्शनतक नहीं देते। इससे तो उनका सब आचरण आपके अनुकूल पाया जाता है। अतः आप अच्युतकी परमप्रेयसी हो। अतएव वे आपसे सदा अच्युत (अविश्लिष्ट) रहते हैं। अतएव जाना जाता है, आपका बहुत शुद्ध और गाढ़ प्रेम है।' अथवा 'गोविन्दचरणप्रिये' श्रीगोविन्दका चरण ही प्रिय है जिन्हें, ऐसी आप हो। हे तुलसि ! आपने प्रथमसे ही दैन्यभावका आश्रय लिया—श्रीश्यामसुन्दरके श्रीचरणको अंगीकृत किया—दास्यभावसे, दासी होकर, मानिनी या कान्ता बनकर नहीं। आपमें किसी भावका गर्व नहीं, औद्धत्य नहीं, अतएव 'तेऽतिप्रियोऽच्युतः।' कभी उनसे आपका विश्लेष नहीं। हममें तो सखि तुलसि ! 'मान' है और यह बड़ा दोष है। यह इसीका फल है, जो हमें आज असह्य विप्रयोग हो रहा है। आप गोविन्दचरणप्रिया हो। जिन्हें श्रीचरण प्रिय होते हैं, उन्हें कभी वियोग नहीं होता। यही विशेषता है। यही दास्यभावकी महिमा है। श्रीमद्वल्लभाचार्यजीका कथन है—श्रीचरणरजसे ही भक्त बनते हैं। अतः उनका श्रीभगवान्से विश्लेष नहीं होता। यह उस रजमें खास बात है। अतएव कहा भी है— श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्या लब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम्। यस्याः स्ववीक्षणकृतेऽन्यसुरप्रयास- स्तद्वद् वयं च तव पादरजः प्रपन्नाः॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३७) कृपा करके श्रीभगवान्ने लक्ष्मीको अपने वक्षःस्थलपर स्थान दिया। यह नायिकाका परम सौभाग्य है, पर लक्ष्मी डरती रही। वह जानती थी— श्रीचरणाम्बुजरजके बिना वियोग हो जाता है। अतः इतना ऊँचा स्थान पाकर भी उसने चरणरज ही चाहा, इसके लिये उसने तपस्या की—'यद्वाञ्छया श्रीर्ललनाचरत्तपः...।' (श्रीमद्भा० १०।१६।३६) पहले भी श्रीलक्ष्मीका ऊँचा ही स्थान था, ब्रह्मादि- स्तम्बपर्यन्त उसके अपांगमोक्षकी—जरा-सा देख देनेभरकी कामना किया करते थे। इसपर भी उसे सन्तोष नहीं था। अपने कमलोंके कोमल भवनको छोड़कर श्रीभगवान्के पाद-पंकजरजको ही उसने उत्तम आश्रय समझा— ब्रह्मादयो बहुतिथं यदपाङ्गमोक्ष- कामास्तपः समचरन् भगवत्प्रपन्नाः। सा श्रीः स्ववासमरविन्दवनं विहाय यत्पादसौभगमलं भजतेऽनुरक्ता॥ इस प्रकार श्रीमन्नारायणके विशाल वक्षको— निःसपत्न स्थानको पाकर भी श्रीलक्ष्मी उनके सपत्न स्थान श्रीचरणोंको ही चाहती रहीं। श्रीभगवान्के चरणारविन्दकी महिमा ही ऐसी है। उनके चरणोंमें विराजमान वनमालाके गुच्छ आदिसे उत्थित, मकरन्दसे मिश्रित वायुका झोंका सनकादिके नासाविवरमें जाते ही उनके चित्त और तनु दोनोंमें क्षोभ उत्पन्न कर देता है। बरबस ब्रह्मचिन्तनसे उनका मन चंचल हो जाता है— तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ (श्रीमद्भा० ३।१५।४३) उसी महत्त्वको समझकर श्रीमहालक्ष्मी तुलसीके