भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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श्रीरासपंचाध्यायी ३७७ चरणारविन्द हमारे पापोंको नष्ट करे। वनमाला पतिदेवके दर्शनकी लालसा अथवा व्रजवासियोंकी वन्यपुष्पस्तवकोंकी बनी है, उसमें तुलसी मिश्रित है— सेवाके निमित्त व्रजमें सदा रहती हैं। यहाँ 'श्रयते' तुलसीकुन्दमन्दारपारिजातसरोरुहैः। यह आत्मनेपद है। इसका अभिप्राय यह कि यहाँ पञ्चभिर्ग्रथिता माला वनमाला प्रकीर्तिता ॥* श्रयणका फल कर्तृगामी, आत्मगामी है अर्थात् श्रीरमा वह इस समय बासी हो चुकी, कुरकुराती है, अपनेको सौभाग्यशालिनी बनानेके लिये व्रजमें नित्य चुभती भी है, परंतु वह भक्तकी पहनायी हुई है, उसे ही निवास करती हैं। वैकुण्ठमें श्रीनारायणके समीप जबतक भक्त नहीं उतार दे, प्रभु नहीं उतारते। लक्ष्मी तो वह 'श्रयते' सेव्या है। यहाँ सेविका है। इन उससे प्रतिस्पर्द्धा करती है—'संस्पर्धिनी भगवती भावोंसे यह स्पष्ट है कि श्रीराधा तथा उनके प्रतिपत्निवच्छ्रीः।' भगवान् लक्ष्मीकी नाराजगीकी लोमकूपोंसे उत्पन्न नित्यसिद्धा आदि सखी लक्ष्मीसे परवाह न करके उसे धारण किये हैं। 'पर्युष्टया'— कहीं अधिक बढ़कर हैं, पर वे इस समय अपनेको पर्युषितया (इडभावश्छान्दसः) 'वशकान्तौ' से बना भूलकर वैसा कह रही हैं। हाँ तो व्रजांगना तुलसीसे है। यह तुलसीमाला सर्वांगमें कान्तिमती बनकर कहती हैं—आप लक्ष्मीसे भी बढ़कर हो, आपको विराजती है। व्रजांगना कहती हैं—अतः तुम अतिप्रिया श्यामसुन्दरने अपना समस्त वक्षःस्थल समर्पित कर हो तुलसि! वैसे सर्वाधिकसौभाग्य श्रीरासेश्वरीज्यू दिया। 'गोविन्दचरणप्रिये' पदमें चरणका अर्थ आदिका ही है, पर इस समय अपने सौभाग्यको आचरण—चेष्टा या लीला है 'गोविन्दस्य चरणम्- भूलकर साधारणके प्रेमको सिहाती है। पीछे भी आचरणम्, चेष्टा, लीला वा प्रिया यस्या सा कहा—'पूर्णाः पुलिन्द्य उरुगायपदाब्जरागश्रीकुङ्कुमेन तत्सम्बुद्धौ' जिसका आशय यह हुआ कि हे तुलसि! दयितास्तनमण्डितेन।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१७) आपको श्रीगोविन्दकी लीला अत्यन्त प्रिय है। आपको सखि, हम तो अपूर्ण हैं, 'पुलिन्द्यः पूर्णाः' सापत्न्यभाव भी है। श्रीश्यामसुन्दरके कम्बुकण्ठमें दयितास्तनमण्डितकुंकुमसंलग्न पादसे प्राणधन दूर्वामें विराजमान मुक्तावैजयन्ती आदि किसी (माला)-से घूमे, इससे वह कुंकुम दूर्वामें लग गया, उसे सुन्दर आपको द्वेष भी नहीं है। आप कल्याणी हैं। आप पाकर पुलिन्दियोंने अपने शरीरमें लपेट लिया। वे श्यामप्रिया हैं। हमें बताओ, आपने उन्हें कहीं इधर कृतकृत्य हो गयीं। परंतु इससे उनके मनमें स्मरका देखा है? ('स्मरणं स्मरः') उद्रेक हुआ। पुनः उसी कुंकुमको हे तुलसि! आप स्वयं मंगलमयी हो, अपने लगाकर उन्होंने उसे दूर किया। अतः वे धन्य हैं। हम आराधकको—भक्तको भी मांगल्य प्रदान करती हो। तो अनन्त कालसे उसका सेवन कर रही हैं, फिर भी जो भक्त आपको श्रीकृष्णभगवान्के श्रीकण्ठमें, श्रीचरणमें कृतकृत्य न हुईं।' इस प्रकार ये सब गोपांगना समर्पित करते हैं, उन्हें आप उनसे मिला देती हो, आप अपनेको भूलकर प्रेमविभोर बनी ऐसा कह रही हैं। कल्याणी हो। हमें भी बतलाओ, श्रीश्यामसुन्दर किस इसपर एक प्रसंग और भी है— तरफ निकल गये हैं? हे सखि! आपको श्रीगोविन्दके 'जयति तेऽधिकं जन्मना व्रजः चरण और आचरण, लीलादि भी अति प्रिय हैं। हम श्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि।' सबको भी वे श्रीगोकुलेन्द्र गोविन्दचरण तो अवश्य (श्रीमद्भा० १०।३१।१) प्रिय हैं, परंतु यह उनका आचरण प्रिय नहीं है—जो आपके जन्मसे व्रजका सौभाग्य खूब बढ़ा, वह हमें वियोगिनी बनाकर छिप गये हैं। सखि! आपको सर्वदेशशिरोमणि माना गया। श्रीलक्ष्मी यहाँ श्रीश्यामरूपमें उनके वियोगका कभी अवसर ही नहीं आया। कारण अवतीर्ण श्रीविष्णुदर्शनार्थ ही केवल नहीं आयीं, कि आप सौभाग्यवश अनुकूल आचरणमें ही रहीं। जब अपितु वे शाश्वत नित्य यहाँ रहती हैं। वे अपने आप वृन्दा थीं, तब भी अनुकूल आचरणमें रहीं। हम * तुलसी, कुन्द, मन्दार, पारिजात तथा कमल—इन पाँच पुष्पोंसे गूँथी हुई माला वनमाला कहलाती है।