भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७६ भक्तिसुधा कर देनेकी सलाह दी। इस दान लेनेके अधिकारीकी खोज होनेपर स्वयं नारद दानपात्र बने। श्रीसत्यभामाने श्रीकृष्णसे कहा—'नाथ, जन्मजन्मान्तरमें मैं आपकी ही दासी बनूँ, आप ही मुझे मिलें, एतदर्थ मैं आपको दान कर देना चाहती हूँ।' दान हो गया। अब श्रीकृष्णसे नारदजीने कहा—चलिये, आप मेरा कमण्डलु उठाइये। मुझे आप महादानमें मिले हैं। श्रीकृष्ण नारदके साथ चल पड़े। अब तो बड़ी आफत मची। श्रीसत्यभामाने स्वप्नमें भी यह नहीं विचारा था कि इस दानसे उन्हें श्रीकृष्णसे वियुक्त होना पड़ेगा। अन्ततोगत्वा श्रीनारद किसी तरह मनाये गये। श्रीकृष्णके बदलेमें उनके बराबर हीरे, माणिक्य, जवाहरात सब तराजूमें चढ़ाये गये, पर श्रीकृष्णका पलड़ा हिलातक नहीं। श्रीसत्यभामा परेशान थीं, किंकर्तव्यविमूढ़ थीं। उधर श्रीरुक्मिणीको इस काण्डका पता लगा, वे आयीं। उन्होंने एक प्रकार निकाला, कहा—बहन, यह सब हीरेकी हारें उतार दो, इनकी जगह एक तुलसीदल, केवल एक तुलसीदल रखो। ऐसा ही हुआ। श्रीकृष्णका पलड़ा ऊपर उठ गया। यह है तुलसीका महत्त्व। अतएव तुलसीदलपर श्रीकृष्ण अपनेको बेचते हैं, जिसकी इच्छा हो, खरीद ले—'तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलुकेन च। विक्रीणीते स्वमात्मानं........' इन दृष्टियोंसे गोपांगनाओंने कहा—गोविन्दचरणप्रिये— हे तुलसि! आप परम सौभाग्यवती हो, कल्याणी हो। हम तो श्रीश्यामविप्रयोगसे अति तप्त हैं, पर आपका उनसे कभी विच्छेद होता ही नहीं। आपको श्रीगोविन्दके चरण अतिप्रिय हैं। वैसे वैजयन्तीमालाके साथ भगवान्के वक्षःस्थलमें भी तुलसी विराजमान है, पर उसे उनके श्रीचरणोंसे ही अनुराग है। जैसे तुलसीको भगवान् प्रिय हैं, तुलसी भी भगवान्को वैसे ही प्रिय हैं। कहा है— 'तेऽतिप्रियोऽच्युतः.....' इस अच्युतसे यह बतलाया गया है कि तुलसीका भगवत्पादारविन्दसे कभी विश्लेषण होता ही नहीं, उसका अविघटित सम्बन्ध है। यहाँ 'गोविन्दचरणप्रिये।' (श्रीमद्भा० १०।३०।७) इस पदमें 'चरण' से पूज्यता ली गयी है; क्योंकि आगे गोपियोंने कहा—श्रीतुलसीकी माला मोहनके वक्षःस्थलपर विराजमान है, उसके मकरन्दरसामृतके लोभी भ्रमर भी उसे घेरे हैं। यदि चरण ही प्रिय होता तो 'सह त्वालिकुलैर्बिभ्रद् दृष्टस्तेऽतिप्रियोऽच्युतः॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।७) आदि कैसे कहा जाता? अस्तु। यहाँ व्रजांगना तुलसीका भाग्य सराह रही हैं—सखि तुलसि, देखो! एक हमारा भाग्य है और एक आपका। हमें वे श्यामविहारी दर्शन देनेसे भी जी लुका रहे हैं, हम कोई भार नहीं, हम चरणस्पर्शमात्र चाहती हैं। आप तो उनके विशाल वक्षःस्थलपर विराजमान हो। हमें तो वह अति दुर्लभ है, रंककी साम्राज्य-कामना है। हमने सब कुछ छोड़ा; गुरुजनलज्जा आदि सबको तिलांजलि दी। तब जन्म-जन्मकी तपस्यासे वह प्राणाधार आज प्राप्त हुए थे, परंतु हम प्राप्त न कर सकीं। देखो सखि! तुलसि! हमारे साथ कोई उपद्रव नहीं और आपके साथ ये भौंरेके झुण्ड मँडरा रहे हैं, इतनेपर भी यह आपका ही सौभाग्य है, जो इन सबके साथ वे देवकीसुत आपको धारण किये रहते हैं। हम तो अलिकुल-मालासे व्याप्त नहीं हैं—अलिकुलसंकुल नहीं हैं, फिर भी दर्शनतक नहीं देते, छिपते फिरते हैं। आप अति प्रिय हो। प्रिय लक्ष्मी भी है। उनके वामवक्षपर वामावर्त सुवर्णरोमराजी भी लक्ष्मी ही है। 'हारहास उरसि स्थिरविद्युत्।' (श्रीमद्भा० १०।३५। ४) वह वहाँ लताकी तरह विराजमान है। परंतु सखि, आप उनसे भी बढ़कर हो, आप सर्वांगव्यापिनी हो— दोनों वक्षःस्थलोंपर विराजती हो, वह भी भौरोंके साथ। इससे लक्ष्मी अवश्य नाराज होती होंगी—'मेरी छातीपर सौत बिठा दी।' सो यहाँ तो साक्षात् ही तुम्हें धारण करके सौत बैठा दी। देवकृत भगवत्स्तुतिसे भी प्रसंग पुष्ट होता है— पर्युष्टया तव विभो वनमालयेयं संस्पर्धिनी भगवती प्रतिपत्नीवच्छ्रीः। यः सुप्रीतममुयार्हणमाददन्नो भूयात् सदाङ्घ्रिशुभाशयधूमकेतुः॥ (श्रीमद्भा० ११।६।१२) श्रीलक्ष्मीके लिये सापत्न्यभावके विषयवाली उस सूखी वनमालासे सम्पादित भक्तके पूजनको सुसम्पादित बहुत उत्तम माननेवाले हे प्रभो! आपका