भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासपञ्चाध्यायी ३९३ इसीलिये ब्रह्मादि देवगण व्रजवासियोंके हृषीकचषकमात्र भी बनकर अपनेको कृतार्थ समझते हैं—'एतावत्तैव हि वयं बत भूरिभागाः।' विरहव्याकुल गोपांगनाओंका मन एक क्षणके लिये भी श्रीश्यामसुन्दर प्राणधनके चिन्तनसे मुक्त नहीं होता। वे कभी श्रीश्यामसुन्दर नवलबिहारीके अलौकिक रसका, उसकी परम्परामें भी अनुभूतिका तो कभी उनके अंगके संगी आभूषण आदिका चिन्तन, मनन, उनमें गुण-दोषका आरोप, अधिकार-अनधिकारकी चर्चा आदि करती हुईं प्राणप्यारेके अन्वेषणमें व्यग्र हैं। श्रीव्रजराजकिशोरकी मालाका स्मरणकर व्रजदेवियोंको भावना हुई—सखियो, देखो, हमसे अधिक सयानी तो वे सुमन (पुष्प), मुक्ता, हीरक आदिकी मालाएँ हैं, जो कभी उनका संग नहीं छोड़तीं। वे जड़ होकर भी कितनी विवेकसम्पन्न हैं और हम कामपरवश स्त्री अतएव मुग्धता या मूढ़तावश उनका साथ छोड़ बैठी हैं। हाय, कामपरवशात् स्त्री जगत्में मुक्ता, हीरक आदिसे भी—कंकड़-पत्थर आदिसे भी अधिक विचारशून्य है। दूसरा भाव यह भी है कि जब सुमन, मुक्ता, हीरक आदि भी उन श्रीश्यामसुन्दरको नहीं छोड़ सकते, तब हम कामके वशमें पड़ी हुई स्त्रियाँ कैसे छोड़ दें? कैसे उन्हें भुला दें— अहो सुमनसो मुक्ता वज्राण्यपि हरेरुरः । न त्यजन्ति वयन्तत्र का वा स्मरवशः स्त्रियः ॥ श्रीश्यामसुन्दरके कण्ठमें, वक्षःस्थलपर मुक्तामालाएँ हैं, मानो इन्द्रनीलमणिके शिखरपर गंगाकी दो धारा, किंवा नवनीलनीरदपर हंसोंकी पंक्ति, काली घटापर हंसोंकी दो पंक्तिके समान विराज रही हैं। मालामें विविध मणि, रत्न जड़े हैं, कोई सूर्यके सदृश देदीप्यमान, कोई चन्द्रके समान समुज्ज्वल और कोई नक्षत्रोंकी तरह प्रकाशमान है। ऐसी वनमाला, मुक्तामाला, वैजयन्तीमाला आदि अनेक मालाएँ श्रीप्रभुने धारण की हैं। गोपांगनाओंकी इसपर एक और ऊँची सूझ है। वे कहती हैं—ये सुमनस केवल सुमनस—पुष्प नहीं, किंतु शोभन-तत्त्वचिन्तानुकूल मनवाले तत्त्वज्ञ ही सुमनस—पुष्पके रूपमें अनन्त तपस्या करके श्रीहरिके विशाल वक्षःस्थलपर विराजमान हुए हैं और ये मुक्त हुए मुक्त—वामदेव, वसिष्ठ, शुक, सनकादि हैं, जो मुक्त होकर—मोती बनकर हमारे प्यारेके अंगमें आ विराजते हैं। ये भी हमारे श्यामके उरको नहीं छोड़ना चाहते। ये क्यों रागी हो गये, जो विरक्त हैं? वहाँ तो हमें ही रहना चाहिये। सखि, हम तो स्त्री हैं, अशेषशेखरमें हमारा तो राग युक्त है, पर इन जड़ मुक्ता, वज्र आदिका वहाँ क्या काम ? जब ये नहीं छोड़ते, तब हम स्त्रियाँ कैसे छोड़ें ? श्रीश्यामसुन्दरके कर्णाभरणादिके प्रति व्रजांग- नाओंकी ईर्ष्या देखते ही बनती है। श्रीत्रिभुवनमोहनने कानोंमें मकराकृति कुण्डल पहने हैं, जब उनका सिर हिलता है, तब वे कुण्डल या उनकी आभा स्वच्छ, स्निग्ध कपोलोंसे टकराती है, उस समय मालूम होता है कि मीन भगवान्‌के कपोलोंका चुम्बन कर रहे हैं। इसे देखकर व्रजांगना रसोद्रेकमें विह्वल हो जाती हैं, उन्हें ईर्ष्या होती है, वे कह उठती हैं—'हा मीन, आज मधुर कपोलोंका, जो हमारे ही हैं, तुम चुम्बन कर रहे हो।' इसी सम्पर्कमें उन्हें अन्य श्यामांगसंगियोंके प्रति भी सापत्न्य उदय हो आता है। वे वंशीसे कहती हैं—हे मुरलिके ! अधिकारिणी तो हम हैं और तुम इस अधरसुधाका लम्पटता, अकृपणतासे पान कर रही हो। हे माले ! हमसे बिना ही पूछे—हमारी अनुमतिके बिना ही हमारे प्रियतमके श्रीअंगका निरन्तर परिरम्भण कर रही हो अथवा ठीक है, तुम सब जगज्जालसे परे—विधि-निषेधसे दूर हो गयी हो, तुम्हारी तपस्याके सूखे वृक्षमें आज फल लग गये हैं, सौभाग्यका उदय हुआ है। हम तो विधि-निषेधमें बँधी हैं, जंगलोंमें भटक रही हैं। इस तरह कृष्णप्रेममें प्रमत्त व्रजदेवियाँ अचेतनोंको चेतन ही जानकर उलाहना दे रही हैं। इसी प्रकार वृक्षोंके प्रति धारणा करती हैं और कहती हैं—जिन कदम्ब, आम्र, प्रियाल आदिका आश्रय लेकर श्यामसुन्दर विराजते हैं, वे अवश्य हमें उनसे मिलायेंगे और कहती हैं, हे प्रियके आलय प्रियाल ! तुम हमें श्यामसे मिला दो, हम तुम्हारा बड़ा उपकार मानेंगी। इस प्रकार गोपदेवियाँ श्रीकृष्ण परमात्माके