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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 778 में से

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कृतार्थ हो जाते हैं। ब्रह्मादि इतनेहीसे अपनेको धन्य मानते हैं। वंशीको श्यामसुन्दरकी अधरसुधाका सम्बन्ध होनेपर रसास्वाद भी अवश्य हुआ ही, अतएव गोपांगनाजनकी ही परस्पर उक्ति है—'गोप्यः किमाचरदयं कुशलं स्म वेणुः' (श्रीमद्भा० १०।२१।९) अर्थात् इस वेणुने कौन पुण्य किया है, जो श्रीश्यामसुन्दर इसको अपने हस्तारविन्दोंमें लेते, अधरपर पधराते, अपने सुकोमल अंगुलीदलसे इसका पादसंवाहन करते, अधरामृतका भोग लगाते और मुकुटका छत्र लगाकर कुण्डलोंसे इसकी आरती उतारते हैं, कैसी अनोखी पूजा करते हैं? यह तो जो ताल-तलाइयोंमें कुमुदिनीका विकास—प्रफुल्लता देख पड़ रही है, यह इन्हें वंश (बाँस)—के सौभाग्योदयपर हर्षातिरेकसे मानो रोमांच हुआ है। ये समझते हैं कि हमारे ही जलसे पालित, पुष्ट होकर वंशीकी यह इतनी उन्नति हुई है, वह श्रीमन्मोहनके अधरपर शोभित हुई है। इस अवसरपर इनको कैसी प्रसन्नता हुई, जैसी पाल-पोसकर बड़े किये गये बालकको साम्राज्य मिलनेपर उसके माता-पिता, कुटुम्बियोंको होती है। वृक्षोंको भी अपने सजातीय वेणुके इस उत्कर्षपर बड़ी प्रसन्नता हुई। उनके नेत्रोंसे मधुधाराके व्याजसे आनन्दाश्रु बह चले—'तरवोऽश्रु मुमुचुः।' (श्रीमद्भा० १०।२१।९) अपने वंशमें किसीके भक्तप्रवर होनेसे जैसे कुलवृद्ध प्रसन्न होते हैं, अपनेको धन्य-धन्य मानते हैं, वैसे ही वेणुसजातीय वृक्ष अपनेको मानते हैं—अहो! हमारी वृक्षजातिमें भला एक तो ऐसा उत्पन्न हुआ, जो कूक-कूककर (निर्भीकता और आनन्दके साथ) श्यामसुन्दरके अधरामृतरसका पान कर रहा है। यदि वंशीको कुछ भी रसका आस्वाद न होता तो ऐसी बातें कैसे कही जा सकती थीं! यहाँ तर्क हो सकता है कि यदि उस वंशीको रसास्वाद हुआ है तो यह अबतक सग्रन्थि कैसे? सच्छिद्र कैसे? छिद्रोंके रहनेपर तो अनर्थ ही होते हैं—'छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति' रसका आस्वाद आनेपर, तत्त्वकी स्फूर्ति होनेपर तो ग्रन्थि खुल जाती है, छिद्र (दोष) नहीं रह जाते—जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥ (रा०च०मा० ७।११७। ४) परंतु चरणरजसे सब दोष दूर हो जाते हैं। व्रजांगनाओंका प्रेमोन्माद व्रजदेवियोंको वेणुके कर्मपर बहुत आश्चर्य है। वे सोचती हैं—'अहो, इसका वह कौन-सा कुशल कर्म है, जो मोहनाधरसुधाका पान करता है और सच्छिद्र रहकर भी उसे छिपाकर रखता है। किसीको पता ही नहीं लगता कि इसने अधरसुधा-रस पान किया है। स्थिर और जंगम अपनी प्रकृतिसे च्युत हो गये, सुध-बुध भूल गये, पर इसने तो अधरसुधाको खूब अघाकर पान करके भी ऐसा गुप्त रखा है, जैसे कृपणका धन। बड़ी चतुराई है, बड़ी धीरता है। हाँ, इसने सोचा है यदि मैं हरी-भरी हो गयी, हमारी सुस्वाद-मर्मज्ञता प्रकट हो गयी तो फिर बजनेलायक न रहूँगी, फेंक दी जाऊँगी। वह आनन्द किस कामका, जो फिर फेंक दी जाऊँ? गोपांगनाएँ सोचती हैं कि इस तरह मोहनके विप्रयोगभयसे वह वंशी अपने आनन्दको छिपाती है, परंतु हम तो बावरी, पागल हो जाती हैं।' इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि गोपांगनाएँ प्रेमको छिपा रखनेमें महत्त्व समझती हैं, पर वह अवांछनीय विक्षिप्तता बरबस प्रकट हो जाती है। 'वृन्दावनचम्पू' में गोपांगनाओंके प्रेमको साठीके धानकी उपमा दी गयी है। उनका सिद्धान्त है—'गुप्त प्रेम सखि सदा दुरइये।' प्रेममें 'टोना' लग जाता है। उसे अवश्य छिपाना चाहिये। फिर वह बहुत बेश- कीमत है, मूल्यवान् वस्तु सात तालेके भीतर धरी जाती है। जब 'चिन्तामणि' पत्थर-जैसी वस्तु भी छिपाकर रखी जाती है, तब प्रेमका तो उससे कहीं अधिक महत्त्व है। पर आज तो प्रेमका ढिंढोरा पीटा जाता है। श्रीश्यामसुन्दरकी अधरसुधाका पान करके अन्य जड़-चेतनोंकी तरह मुरलीको भी आनन्द आता है, पर वह चतुर है, विप्रयोग-भयसे, 'टोना' के भयसे उसे छिपाती है। इस प्रकार तात्पर्य यही कि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनादि-समुत्थ यह रस ही ऐसा अलौकिक है कि इसकी परम्परामें भी आस्वाद है,

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