भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासपञ्चाध्यायी ३९१

हैं, अतएव बेचारे नेत्रादिरूपसे परम्परासम्बन्ध स्थापित करते हैं। उनकी दृष्टिमें धन्य हैं वे व्रजवासी, जो अपने नेत्रादिसे साक्षात् श्रीश्यामसुन्दरके चरणामृत, सौगन्ध्याद्यमृतका पान करते हैं। नेत्रका अधिष्ठातृदेव सूर्य है। वह इतनेमें ही कृतकृत्य है कि किसी भी व्रजवासीने श्यामसुन्दरको मदधिष्ठातृक नेत्रसे देखा। नासिकाके देवता अश्विनीकुमार हैं। वे व्रजवासीके घ्राणसे अपना सम्बन्ध स्थापित करके आनन्दमग्न हैं। श्रोत्रों (कानों)-की अधिष्ठात्री दिग्देवता हैं। व्रजवासी श्रीनन्दनन्दनके वचन और वेणुगीतको सुनते हैं, इसीमें वह फूली नहीं समाती। वह सोचती है—धन्य हूँ मैं, जो मदधिष्ठातृक श्रोत्रोंसे व्रजवासी श्रीश्यामके वेणुगीतको सुनते हैं। चित्तके अधिष्ठाता ब्रह्मा हैं। इसी प्रकार विभिन्न इन्द्रियोंके विभिन्न अधिष्ठाता हैं। सब इसी प्रकार अपनेको कृतकृत्य मानते हैं। स्वयं ब्रह्माजीने भगवान्‌की स्तुति करते समय कहा है—हे अच्युत, इन व्रजवासियोंके भाग्यकी महिमाका कोई भी वर्णन नहीं कर सकता। जो कि हमलोग रुद्र, चन्द्र आदि इसलिये प्रशस्त भाग्यशाली हैं कि इनके इन्द्रियरूप पात्रोंसे आपके चरणकमल-मकरन्दका, जो अमृतके समान अतिमिष्ट और आसवके जैसा मदकारी है, बार-बार पान करते हैं। जब एक-एक इन्द्रियके अभिमानी हमलोग आपकी कीर्ति, सौन्दर्य, सौगन्ध आदि एक देशके सेवन करनेवाले भी कृतार्थ हैं, तब समस्त इन्द्रियोंसे सर्वसेवी इन व्रजवासियोंके भाग्यकी सराहना किन शब्दोंमें की जाय? एषां तु भाग्यमहिमाच्युत तावदास्ता- मेकादशैव हि वयं बत भूरिभागाः। एतद्धृषीकचषकैरसकृत् पिबामः शर्वादयोऽङ्घ्र्युदजमध्वमृतासवं ते॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३३) इन्द्रियादिके ये अधिष्ठाता हैं—अहंकारके शिव, बुद्धिके ब्रह्मा, मनके चन्द्रमा, श्रोत्रोंकी दिशाएँ, त्वक् (त्वचा)-के वायु, नेत्रोंके सूर्य, जिह्वाके वरुण, नासिकाके अश्विनीकुमार, वाणीके अग्नि, हस्तके इन्द्र, चरणके उपेन्द्र, पायुके मित्र, उपस्थके प्रजापति और चित्तके अधिष्ठाता स्वयं भगवान् माने गये हैं। पान-पात्रका नाम 'चषक' है। व्रजांगनादिका वह पात्र इन्द्रियाँ हैं, उसीसे वे श्रीश्यामसुन्दरके पादारविन्द- सौन्दर्यामृतका पान करती हैं। उस मादक सुधासवके पानसे व्रजांगनाजनको देह, गेह, लोकलाज सब एक बार ही विस्मृत हो गये। इसपर श्रीनन्दनन्दनकी उस मोहक मुसकानसे तो वह और भी अधिक पुष्ट हो गयीं। इसका पूरा आस्वादन तो व्रजदेवियोंको ही प्राप्त हुआ। इसपर थोड़ा विचार करें—पात्रको रसका आस्वाद नहीं आता। दर्वीको, जिससे भक्ष्यवस्तु परोसी जाती है, वस्तुका स्वाद नहीं आता। इसी प्रकार इन्द्रियाँ पात्रमात्र हैं, उन्हें रसास्वाद नहीं हो सकता। परंतु यह लौकिक रसकी बात है, भगवद्विषयक रस अलौकिक, विलक्षण होता है, उसके तो सम्पर्कसे भी रसास्वादकी अनुभूति सिद्ध है। ऐसी स्थितिमें पात्र—दर्वी आदिको रसका आस्वाद असम्भव नहीं। इस प्रसंगमें व्रजदेवियोंकी वंशीके प्रति ऐसी भावना है कि श्रीश्यामसुन्दरसे शतशः सम्पृक्त होते रहनेपर भी उसे रसका आस्वाद नहीं मिला। उनकी इस विषयमें उपपत्ति इस प्रकार है— वंशीको वस्तुतः अधरामृत नहीं दिया गया। यदि ऐसा होता तो यह सूखी ही कैसे रह जाती? उस वेणुगीतपीयूषसे यमुना भी जमकर इन्द्रनीलमणिकी शिलाके समान हो गयी और पाषाण भी यमुना-प्रवाहकी तरह बह चले, पर बाँसकी वंशीमें एक पल्लवतक नहीं जमा, यह पोली, शुष्क, सग्रन्थि और सच्छिद्र ही रह गयी। जहाँ 'अस्पन्दनं गतिमतां पुलकस्तरूणाम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९)-के अनुसार स्थिर पदार्थ जंगम बन गये और जंगम स्थिर हो गये, सूखे हरे हो गये, वहाँ वंशीके पल्ले कुछ नहीं लगा। यह तो केवल विप्रयोगलीलामें वंशीछिद्रोंसे हमारे (व्रजदेवियोंके) कर्णकुहरोंमें प्रविष्ट होनेका, हमारी जीवनरक्षाका उपायमात्र किया गया है। इस सिद्धान्तसे वंशीकी तरह दर्वी सूखी ही है, रसासम्पृक्त ही है। परंतु दूसरे कहते हैं—नहीं, आखिर सम्बन्ध तो हुआ न, किसी भी तरह सही। इसीसे कृतकृत्यता हो जाती है। अतः पात्र—'चषक'—भी परम्परासे कृतार्थ हुए। ऐसे पात्रका तो स्पर्श करनेवाले भी