भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 778 में से

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पृष्ठ 400

३९० भक्तिसुधा पूर्वोक्त 'चूतप्रियालपनसासन' (श्रीमद्भा० १०।३०।९) इस पद्यमें आमके 'चूत' और 'आम्र' ये दो नाम आये हैं। इस द्विरुक्तिके टीकाकारोंने विभिन्न अर्थ किये हैं। अम्ल (खट्टे) रसवाले आमको 'चूत' और मधुर रसवाले आमको 'आम्र' कहते हैं। इस तरह रसभेदसे दो नाम, दो भेद हैं। अथवा 'करुणया च्यवते इति चूतः' करुणासे जो दीनोंपर द्रुत हो, उसे 'चूत' कहते हैं। अन्यत्रके आमोंमें चाहे यह बात न हो, पर श्रीवृन्दावनधामके आमोंमें तो यह विशेषता है ही। ये श्रीश्यामसुन्दरके यहाँ अन्तरंग हैं अथवा परिकरोंमें कोई हैं। मुनिजन भी यहाँकी वृक्षता चाहते हैं। श्रीव्रजांगनाएँ कहती हैं—'वैसे हे आम्रवृक्षो! आपलोग दुःखियोंका दुःख देखकर द्रुत होते हैं। दूसरोंमें दया नहीं, अतः वे द्रुत नहीं होते। हमसे बढ़कर दूसरा दुखिया और कौन होगा? हमपर दया करो। आमका भव—जन्म परोपकारके लिये हैं। फल, पुष्प, पत्र और काष्ठ आदि आपकी सभी वस्तुएँ केवल परोपकारके लिये हैं। आपका निवास साक्षात् प्रेमद्रववती श्रीयमुनाके तटपर है। श्रीयमुनाजलकी तरह ही मानसरोवर, कृष्णसरोवर आदि भी व्रजके तीर्थ अनुरागद्रव हैं। इन श्रीयमुनाजल आदिके दर्शन, स्पर्श, पान आदिसे दूसरोंको भी श्रीकृष्णविषयक ज्ञान देनेके कारण आपका नाम 'चिति संज्ञाने' से चेतति 'अन्यांश्चेतयतीति वा चूतः' हुआ है। इतनी ऊँची आपलोगोंकी योग्यता है। आप हम दुःखियोंको भी श्रीश्यामसुन्दरका पता देकर कृतार्थ करो।' जब इतनी स्तुति करनेपर भी आम्रवृक्षोंने कुछ उत्तर नहीं दिया, तब गोपांगनाएँ बड़ी खिन्न हुईं। असूयासे अब उनके प्रति दोषोंका अनुसन्धान हुआ— ('च्योतति, प्रच्युतयति इति चूतः') 'सखि! ये तो थे परोपकारी, पवित्र तीर्थवासी ही, परंतु अब स्वरूपसे प्रच्युत हो जानेके कारण निष्ठुर हो गये हैं। 'यमुनोपकूलाः' ये यमुनाके किनारे रहते हैं। यमुना यमराजकी बहन हैं, यम सर्व दुःखदायी हैं। 'संसर्गजा दोषगुणा भवन्ति' उसी यमसम्पर्कसे ये अब निर्दय हो गये हैं। हमारे तीव्रतापसे इन्हें प्रसन्नता हो रही है।' 'प्रियाल' पीले सालवृक्षका नाम है ('प्रियाः इति आलापो यस्य सः' ) सखीगण जिसे प्रिय हों, यह नामार्थ 'प्रियाल' का गोपांगनाओंने निकाला। 'सखि, वह हम सखियोंपर अवश्य अनुकम्पा करेगा, यह अवश्य हमारा हित सोचेगा। हित तो श्रीश्यामसुन्दरके मिलनमें है, सो यह उनका पता बतलायेगा। अजी! यह 'प्रियं लाति इति प्रियालः' है, प्रिय श्रीकृष्णको देनेवाला है।' 'प्रियं लाति' अर्थात् जो प्रिय पदार्थको दे, वह 'प्रियाल' है। वृन्दावनका 'प्रियाल' श्रीकृष्णको देनेवाला है। 'वृन्दावनशतक' में वृन्दावनस्थ तरुओंकी बड़ी महिमा कही गयी है। कहा है—'यदि तुमसे और कुछ भजन-भावना नहीं बन सकती तो इन वृक्षोंका ही दर्शन करो, ये तुम्हें प्रियको देंगे, स्वयं प्रियका अन्वेषण करके तुम्हें समर्पित करेंगे।' इस अंशमें वृन्दावनके सभी वृक्ष 'प्रियाल' हैं, फिर साक्षात् प्रियालकी तो बात ही क्या? इसी आशासे गोपीजन प्रियालकी प्रशंसा करती हैं। अद्भुत प्रेमोन्मादमें उन्हें जड़ और चेतनका ज्ञान नहीं रह गया, उन्हें अभी यही भावना बनी है कि ये हमें अभी प्रियका पता देंगे। प्रेमीकी आशाका कुछ ठिकाना नहीं, वह जड़में भी चेतनकी कल्पना करता है। प्रेमकी प्रतिमूर्ति व्रजदेवियाँ श्यामसुन्दरके आभूषणोंकी, मालाकी प्रशंसा करती हैं। इतना ही नहीं, वे तो उस वायुकी भी स्तुति करनेको उद्यत हैं, यदि वह मोहन प्यारेकी ओरसे आ रहा हो। वे चन्द्रमासे कहती हैं—'हे हिमकर, अपनी किरणों (करों)—का हमसे स्पर्श न होने दो, परंतु यदि वे (आपकी किरणें) प्यारे श्यामसुन्दरका स्पर्श करके आयी हों तो उनसे हमें अवश्य स्पर्श करो, हम तुम्हारा उपकार मानेंगी।' इससे अधिक परम्परा- सम्बन्धकी महिमा क्या होगी? परंतु ब्रह्मादि देवता इस परम्परामें और भी आगे बढ़े हैं। वे इसीमें कृतार्थ हैं कि अस्मदधिष्ठातृक तत्तदिन्द्रियोंसे व्रजवासी उस आनन्दसिन्धु ब्रह्मतत्त्वका दर्शन, स्पर्श, श्रवण आदि कर रहे हैं; क्योंकि देवतालोग देवत्वके कारण साक्षात् रूपसे उस ग्वारिये गोपालकी रसमाधुरीका आस्वाद लेनेमें सर्वथा असमर्थ