भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरामपञ्चाध्यायी ३८९ धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्। आकर्ण्य वेणुरणितं सहकृष्णसाराः पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।११) परंतु 'वयं अधन्याः'। कथंचित् दर्शनार्थ जायँ भी, पर यह जन्म जो एक कुलीन वंशमें हुआ है— 'जनुः परमिदं कुलीनान्वये।' खानदानमें बट्टा लग जानेका भय है। अहह! कितनी विवशता है तथापि क्या यह मैं अबतक जी रही हूँ? हा! मुझे भला मौत कहाँ?—'न जीवति तथापि किं परमदुर्मरोऽयं जनः?' मरना बड़ा कठिन है, मर जाऊँ तो अच्छा। मृत्युसे भी कहीं अधिक ये प्राणधनके वियोगके कष्ट तो न होंगे। इस प्रकारके चिन्ता-सन्तापमें मग्न श्रीराधिकारानी किसी समय अपने लीलाशुकको अपने हस्तारविन्दके अंगुष्ठप्रान्तपर बिठाकर उसे दाडिमी बीज चुगाती हुई स्नेहसे उसके चंचुपुट का चुम्बन करती हुई पढ़ा रही थीं—'कृष्ण कहु, कृष्ण कहु, राधा कहु मति रे।' शुक बहुत विशेषज्ञ था, अपनी पालिकापर उसे प्रेम और दया थी, उसके वियोगदुःखको देखकर वह दुःखी था। वह तुरन्त पद्यसन्देश लेकर उड़ा और श्रीनन्दरायके प्रांगणमें जा पहुँचा, जहाँ श्रीश्यामसुन्दर क्रीडामें आसक्त थे। एक ऊँची-सी जगह निर्भीक भावसे बैठकर वह पद्य उसने उन्हें सुनाया। अपनी परमान्तरंगा आह्लादिनी प्रियाका वह भावगम्भीर पद्य सुनकर श्रीश्यामसुन्दर मुग्ध हो गये। बड़े आग्रह एवं अनुनयसे श्रीकृष्णने उस शुकको अपने पास बुलाया, अपने सुकोमल हस्तारविन्दपर उसे बिठलाकर कई बार उस पद्यको सुना और समीक्षा करने लगे—'यह किसी महानुरागवतीका पद्य है। इतनेहीमें वहाँ मधुरिका और कुसुमासव सखा भी आ गये। परस्पर प्रश्न हुए। मधुरिकाने कहा—'मैं इस शुकको ढूँढ़ने आयी हूँ।' कुसुमासव बीचमें ही बोल उठे—'सखि! यह तो हमारे श्रीश्यामसुन्दरका शुक है। यदि यह तुम्हारी प्रियाजूका है तो इसे अपने पास बुलाओ।' मधुरिकाने कहा—'सखे! क्या कोई भी इन श्रीलालजूके हाथसे छूटकर जा सकता है?' यह तो भला एक प्रेमी जीव है। इनके हाथमें आते ही जड़ चेतन हो जाते हैं और चेतन जड़ हो जाते हैं। इनके हाथमें आते ही जड़ वेणु सजीव हो जाती है। उनका यह रसमय प्रसंग चल ही रहा था कि इतनेमें ही श्रीयशोदाजी वहाँ आ गयीं और बोलीं—'सखि! लालाको अभी खेल लेने दे, फिर मैं इसे तुम्हारे ही घरतक पहुँचा दूँगी।' इस तरह लोकापवादादि भयसे भीत श्रीश्यामाजू प्रच्छन्नकामुकता आदिके लोकोत्तर साधन शुकप्रेषणादिका रसवर्धनार्थ आश्रय लेती हैं, अस्तु, ऐसे विलक्षण गूढ़ संचारवती श्रीमती राधा तथा तत्प्रिय सखियोंको प्रसन्न करनेका भगवान्को कोई उपाय नहीं सूझता। अतः वे श्रीललिताजीसे पूछती हैं— लोकापवाददलितां मम लम्भनेऽपि एतां कथं कथमहो परिसान्त्वयामि॥ हृदयसे हृदयका कभी विप्रयोग नहीं होता, पर फिर भी भ्रमसे ऐसा होता ही है; क्योंकि श्रीमद्भागवतादिमें विप्रयुक्तोंकी अवस्थाका दिग्दर्शन हुआ है। अन्यत्र भी 'दावानलज्वालिवनी सहक्षाम' आदिसे विप्रयुक्तोंकी लोकसिद्ध किसी भी सद्वस्तुमें वस्त्वन्तरकी प्रतीति होनेके उदाहरण मिलते हैं। अस्तु, किसीको संयोगसे, किसीको वियोगसे सान्त्वना दी जाती है। परंतु इन्हें कैसे प्रसन्न करें, जो प्रत्येक दशामें दुःखका ही अनुभव करती हैं? सखी श्रीललिता कहती हैं—'महाराज! श्रीप्रियाजूको तो अंक (गोद)-में विराजमान करके ही प्रसन्न करो; क्योंकि वे आपके अन्यान्य गुणगणोंसे सिवा मूर्च्छित होनेके सुखी नहीं होतीं'— न मूढधीरस्मि न वा दुराग्रहा शरीरभोगेषु न चापि लालसा। किन्तु व्रजाधीशसुतस्य ते गुणा बलादपस्मारदशां नयन्ति माम्॥ गोप-सुन्दरियोंके भी ऐसे ही मिलते-जुलते भाव हैं। इसने उच्च गम्भीर भाववती, फिर आत्मरहित भी उन गोपबालाओंको प्रसन्न करनेका उनके अनुकूल होनेके सिवा भगवान्के पास कोई भी अन्य साधन नहीं है।