भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
DevanagariHindipublished778 पृष्ठ
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३९४ भक्तिसुधा विप्रयोगमें सन्तप्त प्रेममुग्ध हुईं उन्हें ढूँढ़ती, वृक्षोंसे पूछती फिरती हैं— चूतप्रियालपनसासनकोविदार- जम्ब्वर्कबिल्ववकुलाम्रकदम्बनीपाः । येऽन्ये परार्थभवका यमुनोपकूलाः शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां नः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।९) यह बात कही जा चुकी है कि व्रजांगनाओंको जबतक उत्तरकी आशा रहती है, तबतक खूब स्तुति, गुणगान करती हैं और उस आशाके निराशामें बदलते ही दोषोंका गान करने लगती हैं। पहले प्रियालकी बड़ी स्तुति हुई। जब देखा कि यह जरा भी नहीं पसीजता, तब कहने लगीं—'प्रियं न लातीति प्रियालः (प्रिय-अ) नञ् (लः) प्रियप्राप्तौ प्रतिबन्धकः।' जो प्रियका पता न दे, उसके सम्मिलनमें व्यवधान उपस्थित करे, वह पापी प्रायश्च