भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरंतु तुम इन सबको मात करते हो; क्योंकि तुम सर्वात्मा, सर्वान्तर्यामी प्राणेश्वरका दान करते हो, तुम महादानी हो।' रात्रि भी दानी है—(‘स्त्री-राति, त्राति इति रात्री') परंतु किसका दान, किसका पालन, यह भी तो विचारणीय है। देव और पात्रके महत्त्वसे दानकी महिमा है। दस रुपयेका दान और गायका दान समान नहीं है। माघमें दस रुपयेका दान और तिलका दान समान नहीं है। कंकड़-पत्थरका दान और सर्वात्माका दान समान नहीं है। फिर किसको देना, पात्रका भारी महत्त्व है। एक तो दानका द्रव्य पाकर उसका आटा लेकर मछली पकड़ेगा और दूसरा उससे श्रीसदाशिव विश्वनाथके मन्दिरमें, श्रीहरिमन्दिरमें दीपक जलायेगा। कितना अन्तर है—गृहीताके उपयोगका ? इसीके अनुसार दाताको जो फलकी प्राप्ति होगी, उसमें भी महान् अन्तर है। वायसरायका कुत्ता भी धनी है, जो सुख महाधनीको नहीं, वह उस कुत्तेको है। हीन देश, काल, पात्रके दानकी महिमासे वह उस दानके फलको कुत्ता बनकर भोग रहा है। ज्ञान या भगवद्विद्याके दान आदिका फल कुत्ता बनकर नहीं भोगा जाता। वह वैकुण्ठादिमें जाकर या मनुष्य, उत्तम ब्राह्मण आदि बनकर ही मिलेगा। अतएव ऐसे विद्यालय आदि खोलने चाहिये, जिनसे अपने माता-पिता आदिकी, अपनी सद्गति हो। 'व्रजांगनाओंके कात्यायनीव्रत, अर्चनसे प्रसन्न होकर भगवान् कृष्णने उन्हें रात्रियोंका दान दिया—'मयेमा रंस्यथ क्षपाः।' (श्रीमद्भा० १०।२२।२७) उन रात्रियोंमें रमणका भगवान्ने स्मरण भी किया है— 'तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता मयैव वृन्दावनगोचरेण।' (श्रीमद्भा० ११।१२।११) ‘...ता रात्री:...’ रात्री:—दान देनेवाली—ये बड़ी दानी हैं। गोपियोंको दान दिया—‘इमाः क्षपाः' उस समय मूर्तिमती रात्रि आयी। खजांची देय वस्तु सामने लाकर रखता है। योगमायाने रात्रियोंको सामने लाकर रखा। भगवान्ने कहा—'इन रात्रियोंमें मेरे साथ रमण करें।' योगमायासे अनन्त करोड़ ब्राह्मी रात्रियोंमें चार घड़ीकी रात्रि प्रविष्ट हुई। श्रीकृष्णके बालसखा मधुमंगलकी माता पूर्णमासी योगमाया ही थी, उसकी महिमासे एक रात्रिमें उन रात्रियोंका प्रवेश हुआ। दुःखमें एक-एक क्षण वर्षोंके बराबर बीतते हैं— 'क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवत् ॥' (श्रीमद्भा० १०।१९।१६) और सुखमें वर्ष-के-वर्ष एक क्षणके समान बीतते हैं। वृन्दावनका प्रमाण बहुत प्रशस्त माना गया है, इतना प्रशस्त कि उसका मध्यभाग 'गोवर्द्धन' है—'मध्ये गोवर्द्धनं तत्र।' परंतु व्रजांगनाओंकी कोटि-कोटि संख्या थी। इतनी अधिक उस विशाल वृन्दावनमें भी न आ सकीं। इनके अतिरिक्त कितनी ही श्रीराधाजीके रोम-रोमसे उत्पन्न हुई थीं और श्रुतिरूपा, मुनिरूपा अलग थीं, फिर इन सबके केलिधाम अलग तैयार थे। विहारके उपयुक्त कुंज आदि भी उसी प्रकार बने थे। यह सब पूर्ववर्णित रात्रियोंकी तरह यहाँ नित्य वृन्दावनधाम भी प्रकट हुआ था, जिसमें सब सविकास समा गये। हाँ, तो इन रात्रियोंका महादानीपना क्या हुआ? इन्होंने कौन महादान दिया? इन्होंने ब्रह्मविद्याका—पुरुषोत्तमविद्याका दान किया। 'जीवाभयप्रदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्।' इतना ही नहीं, इन्होंने साक्षात् श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दका ही दान किया। वह भी किनको? उन व्रजदेवियोंको, जिनके पादरजके लिये ब्रह्मादि तरसते हैं, जो प्रेमपथिकोंकी परम आचार्य हैं। वह दान वृथा नहीं है। 'वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्' की तरह नहीं है। ये तो उस दानकी परम अधिकारिणी हैं, उसके लिये लालायित रहती हैं। उनके दर्शनमें पलक पड़नेको विघ्न मानती हैं, ब्रह्माको कोसती हैं—'सखि, जड है विधाता।' ऐसे पात्रोंको इन रात्रियोंने दान दिया श्रीश्यामसुन्दरका और इसीसे उनका रक्षण भी किया। अन्यथा उनका रक्षण होना ही दुःशक था। फिर यह दान पवित्र देश वृन्दावन और तदनुकूल कालमें हुआ। यह श्रीशुकदेवकृत वर्णन है। योगीन्द्रवन्द्यपादारविन्द गोपांगना कोविदारकी स्तुति करती हैं। देश, काल, पात्र, देशकी महत्ता बतलाती हैं, उन रात्रियोंने उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररूप रसिकशेखरका दान किया, यमुनाके किनारे, साक्षात् प्रेमद्रवके पास और परमवियोगिनियोंको। भूखेको दान