भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 406, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेनेका बड़ा महत्त्व है। 'कोविदार'! ऐसा देश, काल, पात्र न मिलेगा। बतलाओ, हमारे प्राणधन श्यामसुन्दर कहाँ हैं? किस ओर गये हैं?' कोविदार एक तो वृक्ष, वैसे ही जड़ और उनकी प्रेमदशा, उनकी बातोंसे और भी वह स्तब्ध-सा हो गया, कुछ कहता ही नहीं। उसके इस व्यवहारसे गोपांगनाओंमें असूयाका उदय हो आया। वे कहने लगीं- 'सखियो! यह 'कोविदेभ्यो न रातीति कोविदारः' है। यह केवल 'कुं भूमिं विदारयतीति कोविदारः' है। यह तो 'मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारः' है।' 'चलो, आगे उस जामुनसे पूछें, उसका वर्ण श्यामसरीखा है।' तारीफमें उसे 'जी जये' से उणादि निष्पन्न करती हैं और असूयामें वही 'जी अभिभवे' से बननेका अधिकारी हो जाता है। आगे मार्गमें 'अर्क' (आक) पड़ा, उससे भी व्रजांगनाओंने अपने प्राणप्रियका पता पूछा। व्रजांगनाओंसे किसीने कहा- 'बड़े-बड़े महाफली वृक्षोंसे पूछकर अब इस क्षुद्रसे क्या पूछोगी?' तब कहने लगीं- 'नहीं, यह गोपीश्वर (वृन्दावनस्थ महादेव)-का प्रेमी है, उनके मस्तकपर विराजता है, वे इसको पाकर भक्तोंके अभीष्ट पूर्ण कर देते हैं। यह अवश्य प्रष्टव्य है। दूसरे, चन्द्रावली (प्रतिनायिका) आदिसे इसका कोई सम्बन्ध नहीं। यह सूर्यकी तरह हमारे प्रिय-विश्लेषजन्य दुःखरूप तमको दूर कर सकता है। यह 'ऋणादि प्रियं गमयति इति अर्कः' है। हे अर्क! हे शिवप्रिय! हमें श्यामसे मिला दो।' जब वह भी नहीं बोलता, तब असूयासे कहती हैं- 'यह बौड़मके पास रहनेसे बौड़म हो गया है, विषवृक्ष है, इसे किसीके सुख- दुःखका क्या पता? हम यह कुछ असूयासे नहीं कहतीं। देखो, इसके स्वामी जैसे अस्सी हजार वर्षकी अखण्ड समाधिमें बैठते हैं, वैसे ही यह भी समाधिमें बैठा है।' परंतु भोलेबाबाकी यहाँ (वृन्दावन)-की समाधि और है। कैलासकी समाधिमें वे अग्राह्य स्वात्मस्वरूपमें लीन होते हैं, यहाँकी समाधिमें वे श्रीश्यामसुन्दरकी पदनखमणि-चन्द्रिकामें विलीन होते हैं।' मधुसूदन सरस्वतीने कहा है- पादनखनिविष्टमूर्तिक एकादशतामिवावहन्नित्यम्। यं समुपासते गिरिशस्तं वन्दे नन्दमन्दिरे कञ्चित्॥ भक्तिकी दस अवस्थाओंमें शिव सन्तुष्ट न हुए, उन्होंने ग्यारहवीं निष्ठाको स्वीकार किया। वैसे 'शिवस्य हृदयं विष्णुः' तो है ही। नन्दप्रांगणमें जाकर एक बार 'श्रीसदाशिवने श्रीश्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दनको प्रणाम किया। श्यामल, महोमयरूप श्रीकृष्णकी नीलकमलके समान अँगुलीयाँ हैं, उनपर दस नख मणिके जैसे हैं, जो अनन्त ब्रह्माण्डको जगमगा देते हैं- 'ज्योत्स्नाभिराहतमहद्दृढद्या- न्धकारम्॥' (श्रीमद्भा० ३।२८।२१) (महताम् - सनकादिशुकादीनां हृदयान्धकारम् आहतं भवति। 'ज्योत्स्नाभिराहतमिव हृदयान्धकारम्।' उससे सब अज्ञानान्धकार मिट जाता है। भगवान् शिव जब नन्दबाबाके प्रांगणमें आये और वहाँ क्रीड़ामग्न श्रीश्यामसुन्दरको प्रणाम करनेके लिये झुके, तब प्रभुके नखोंमें उनकी मूर्ति प्रतिबिम्बित हुई। जिस भगवत्प्रसादको श्रीः - जाया, संकर्षण - बन्धु और आत्मा स्वयं भी न ले सके, उसे श्रीसदाशिवने प्राप्त किया। कुन्द और इन्दु की तरह स्वच्छ धवलिमा, मनोहर दीप्तिवाली देह और दुग्धधवल धाराके समान प्रवहणशील गंगाको सिरपर धारण किये तथा कोटि- कोटि कामोंको लजानेवाला श्रीशिवका मुख जिन नखोंमें प्रतिबिम्बित हुआ, वह पादारविन्द कितना स्वच्छ होगा? श्रीप्रभुके पादारविन्दके ऊपरका भाग श्यामल-महोमयं-दीप्ति-सम्पन्न, नीचेका भाग सुकोमल लाल और उसपर स्वच्छ नख हैं, उनमें शिवका प्रतिबिम्ब चमकृत है।' प्रभुका पादारविन्द कल्पवृक्ष आदि विविध चित्रोंसे अलंकृत था, केवल नखमें कोई चित्र नहीं था, श्रीसदाशिवके प्रतिबिम्बने उसे स्वकायचित्रसे अलंकृत कर दिया। श्रीशिव वहीं उपासनाकी अलौकिक समाधिमें लीन हो गये। तात्पर्य यह कि श्रीभोलेबाबाकी यहाँकी-व्रजकी समाधि तो यह है। गोपियाँ कहती हैं- 'सखि ! यह श्रीशिवका साथी अर्क भी, मालूम होता है, ऐसी ही किसी समाधिमें लीन है। चलो और किसीसे पूछेंगी।' इस प्रकार प्रेमविह्वल गोपांगनाएँ प्रिय मोहनको