भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंढूँढ़ती हैं, वृक्षोंसे पूछती फिरती हैं, कोई भी उन्हें बतलाता नहीं, परंतु उनके उत्साहमें कमी, अश्रद्धा न आयी। अर्कको छोड़कर वे बिल्व के समीप पहुँचीं। रूप देखकर उन्हें उसका नाम याद आ गया। कहने लगीं—'इसका नाम बड़ा अच्छा है—बिल्व। 'विरुद्धं लुनातीति बिल्वः' ये वृन्दावनके बिल्व ही श्यामप्राप्ति प्रतिबन्धका लवन—छेदन करते हैं। हे बिल्व ! हमें एक बार प्यारे मनमोहनके दर्शन करा दो, हम तुम्हारा बड़ा उपकार मानेंगी। तुम हमारी सखी लक्ष्मीके वृक्ष हो, श्रीवृक्ष हो। लक्ष्मी हमारे श्यामसुन्दरकी प्रेयसी हैं। हमारा पक्षपात करो, श्रीश्याम-प्रतिबन्ध-संयोगको मिटाकर शीघ्र प्राणधनसे मिला दो।' इस तरह गोपांगनाओंने प्रार्थना की, थोड़ी देर खड़ी रहीं, परंतु बिल्वकी ओरसे भी उन्हें कोई आश्वासन न मिला। निराशाकी साँस छोड़कर वे बोलीं—'गोपीश्वरके सम्बन्धसे यह भी समाधिष्ठ प्रतीत हो रहा है, नहीं तो कुछ बोलता न?' कोई कहती है—'सखि, इसका तो नाम हमारे लिये उलटा पड़ गया, यह तो 'अस्मन्मनोरथान् विशेषेण लुनातीति बिल्वः' हो गया। इससे अब आशा रखनी व्यर्थ है।' 'चलो, वह सामने बकुल दिख रहा है, उससे पूछेंगी। हे बकुल ! आप शिव और विष्णु दोनोंके भक्त हैं और अपने भक्तिभावसे दोनोंको भूमिपर ले आनेवाले हैं—'उश्च अश्च अनयोः समाहारो वः तौ कौ लाति (ला आदाने) आनयतीति वकुलः' हे हरिहरपरायण ! अपने प्रेमयोगसे हरिहरको यहाँ ले आनेवाले हे बकुल ! हम तुम्हें नमन करती हैं, हमारे प्राणधन मोहन प्यारेको यहाँ ला दो, उनसे हमें भी मिला दो अथवा पता ही बतला दो, वे किधर गये हैं?' कुछ प्रतीक्षाके बाद कहती हैं—'सखियो ! यह नहीं बतलायेगा; क्योंकि यह शिव और विष्णुका भक्त है, ये दोनों उन निष्ठुर श्यामसुन्दरके ही पक्षपाती हैं, उनका यह भक्त हमें कैसे बतलायेगा ? यह तो महापक्षपाती है।' व्रजांगनाओंकी यह निन्दा, निन्दा नहीं, ये तो प्रेमकी बातें हैं—'ब्रजकी गारी'। ऐसी असूया तो इन्हें श्रीकृष्णचन्द्र परमात्मासे भी होती है। ये तो उनके चरितसे भी असूया करती हैं। यह इनकी प्रेममयी असूया है। प्रसन्न रहती हैं, तब स्तुति करती हैं— तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्। श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३१।९) कहती हैं—'ईर्ष्या देवताओंमें भी लगी रहती है, पर आपकी कथामें यह नहीं है। आपके गुणोंका गान सनकादि क्रान्तदर्शियोंने किया है। वे देवोंका गुणगान नहीं करते। देवता अमृतकलश लेकर श्रीशुकादिके समीप आये और उन्होंने बदलेमें अमृत देकर आपकी कथा चाही। आपके भक्त कथाप्रेमी श्रीशुकादिने उसका तिरस्कार कर दिया। कहाँ कथा और कहाँ अमृत ? मणिका काँचसे कौन मनीषी परिवर्तन करेगा?— 'क्व सुधा क्व कथा लोके क्व काचः क्व मणिर्महान्।' (श्रीमद्भागवत, माहात्म्य १।१६) आसन्नमृत्यु राजा परीक्षित्ने भी देवोंका इसपर उपहास किया। योगीन्द्र-मुनीन्द्र भी आपकी कथाकी स्तुति करते हैं। आपकी कथा; शोभा और लक्ष्मी दोनोंसे सम्पन्न है, लोकमें व्याप्त है। देवोंका अमृत एक जगह रखा है, महानाग उसकी रक्षा करते हैं। आपकी कथासुधाका दान होता है। इसके दाता महान् हो जाते हैं।' परंतु जब व्रजांगनाओंके प्रेमपाथोधिमें ईर्ष्याकी तरंग उठती है, तब वे उसकी भरपेट निन्दा भी करती हैं, कहती हैं—'आपकी कथा क्या है, मनुष्यकी साक्षात् मृत्यु है। कोई विरहिणी आपकी कथा सुनकर दुःख मोल लेती है, कथाके सुननेसे उनका विप्रयोगसन्निपात तीव्र हो जाता है। आपकी विस्मृतिमें वह सुखसे रहती है। उसको होशमें लानेकी दवा आपकी कथाका त्याग है।' यही कहा है— सन्त्यज सखि तदुदन्तं यदि सुखलवमपि समीहसे सख्याः । स्मारय किमपि तदितरद् विस्मारय हन्त मोहनं मनसः ॥ अर्थात् उनकी कथा मत छेड़ो, यदि इस सखीको थोड़ा भी सुख-शान्ति देना चाहती हो। जैसे भी बने, इसके मनसे मोहनको भुलवा दो, उसकी कथा मत चलाओ। उसके आवेशमें इसकी व्रीडा विलुप्त हो जाती है, धैर्यका बाँध टूट जाता है—'व्रीडां विलोपयति मुञ्चति धैर्यम्।' बस, उस विरहिणीके लिये आपकी कथा ही मरण है, जलेमें नमक छिड़कना है। जैसे