भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 408, कुल 778 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ पृष्ठ ३१८ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रस्तुत है:
३१८ भक्तिसुधा तैलपूर्ण महाकटाह भट्ठेपर चढ़ा हो, नीचे खूब आग की—'सखि! जब हमारे रोने-धोनेसे वे निष्ठुर श्यामसुन्दर धधक रही हो, तैल खूब परितप्त हो चुका हो और भी प्रसन्न होते हैं, तब इसकी तो बात ही क्या?' २-३ सेर महाविष भी मिला हो, उसमें पड़ा एक कीट अच्छा सखियो, देखो, वह सामने आम्र दिख कितना जीयेगा ('तप्ते कटाह यथा जीवनम्')। रहा है, उसके पत्ते हिल रहे हैं, मालूम पड़ता है, वह हम विरहिणी व्रजांगनाओंके जीवनके लिये आपकी अपनी पल्लवांगुलियोंसे हमें बुला रहा है, चलो, कथा वही सुतप्त तैलपूर्ण कटाह-पातके जैसी है। फिर उससे पूछें। कितना सुन्दर नाम है—'आम्रः अमयति कथा सुननेसे एक गहरी वेदना, सन्ताप यह होता है श्रीकृष्णं अथवा अम्यते प्राप्यते सेव्यते कि जो हमारे अन्तःकरणमें बसा है, हमारे अंग-अंगसे अर्थाभिलाषुकैयैः।' आम काटनेवालेको पछताना सम्मिलित रहता है हाय, हम आज उसकी कथामान्न पड़ता है, यह देववृक्ष है। यह वृन्दावनस्थ आम्र ही सुन रही हैं, क्या आज हमें उसका वियोग है, श्रीश्यामसुन्दरको मिलानेवाला है। यह 'रसाल' है, समालिंगन नहीं प्राप्त है? उस अवसरपर उसकी कथा, रसनिर्यांस श्रीश्यामसुन्दरको समर्पण करता है ('रस- केवल कथा, वही काम करती है, जो तप्ततैलपूर्ण मालातीति रसालः')। हे रसाल! यदि रस न दो तो महाकटाहमें जलकी बूँदें—'तप्ते कटाह जीवनम्- तुम फिर 'रसाल' ही कैसे? रस तो प्राणप्यारे जलमिव।' उस समय जैसे कटाहमें आग भभक नन्ददुलारे ही हैं—'रसो वै सः' वे ही हैं, अवश्य उठती है, हमारे हृदयमें वैसे ही प्रिय-विरह-वैश्वानरकी उन्हें बतलाओ। जब असूयापर उतरीं, तब कहती महाज्वाला प्रदीप्त हो उठती है। यदि कोई पूछे कि हैं—कुछ नहीं जी, यह रस-वस कुछ नहीं देता, यह इतनी दुःखद मरणप्रद यह कथा है तो इसको लोग तो रोग देता है—'अमयति रोगं यच्छतीत्याम्रः।' क्यों गाते हैं? इसपर कहती हैं—इसे गाते कौन हैं? रातको इसके नीचे सोनेपर बीमारी निश्चित है। जाने कवि न! कवि क्या नहीं कहते?—'कवयः किन्न दो सखि इसे। जल्पन्ति।' वे तो भैंसकी भी तारीफ करते हैं। फिर 'चलो अपने उस 'कदम्ब' के पास चलें। जैसे यह कथा 'श्रवणमात्रे मङ्गलम्' है, किंतु 'परिणामे श्रीरामका सिंहासन कल्पवृक्ष है, वैसे प्यारेका सिंहासन दुःखदम् अमङ्गलम्' है। जिसने इस कथाको सुना, यह कदम्ब है। सप्तावरण, अष्ट प्रकृतिके भीतर जो वह बाबा बनकर भीख माँगता है। 'राधेश्याम, वृन्दावन है, उसमें यह कदम्ब है। इसकी स्तुतिमें नारायण, हरि' कहकर गली-गली टुकड़ा माँगता भगवान् व्यासने क्या अच्छा कहा है— फिरता है। प्रश्न होगा—ऐसी चीजका दुनियामें विस्तार 'कदम्बकिञ्जल्कपिशङ्गवाससम्।' (श्रीमद्भा० कैसे हो गया? तो उत्तर यही है कि प्रमादी धनियोंने २।२।९) इसका सौगन्ध्य, इसके फल सब लोकोत्तर कष्ट देनेके लिये उसे दुनियामें फैला दिया है— हैं। आनन्दकन्द, वृन्दावनचन्द्र यशोदानन्दके भी 'श्रीमदाततम्।' किंच जो उस कथाको गाते फिरते मनोरथोंको यह पूर्ण करता है—'कं प्रेमात्मकं सुखं हैं, उनके लिये हम क्या कहें, वे तो सर्वस्वनाशक हैं। ददातीति कदः।' साधारण क्षुद्रानन्दको देनेवाले 'भुवि गृणन्ति ते, भूरिदा जनाः' ('भूरीणि द्यन्ति बहुत हैं। वे श्रीघनश्याम उदार हैं, घन पात्रका विचार दोऽवखण्डने') चित्रकेतु कर घरु उन घाला। नहीं करते। श्यामल घन भी जीवन-जलरूप- कनककसिपु कर पुनि अस हाला॥' (रा०च०मा० परमामृतका खूब वर्षण करते हैं। यह जल केवल १।७९।२) इन ऐसे लोगोंने राजा चित्रकेतुको लाखों जीवन है, पर श्रीश्याम तो साक्षात् जीवन हैं। रानियोंसे वियुक्त कराकर वन-वनमें भटकाया। प्रह्लादको यह घन-नवनीलनीरद-दामिनीसे आवेष्टित है और गर्भमें ही ऐसा पढ़ाया कि बेचारेका वंश ही मिट गया। वे घनश्याम कनकलतावेष्टित-श्रीवृषभानुनन्दिनीसे व्रजांगनाओंकी यह सब असूया प्रेमोन्मादकी विचित्र आवेष्टित हैं।' यहाँ दामिनीस्थानीया श्रीवृषभानुनन्दिनी दशा है। उसी दशामें ग्रस्त उन्होंने बकुलकी भी निन्दा हैं। दामिनीको देखकर श्रीजीको ईर्ष्या होती है—