भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 409

श्रीरासपञ्चाध्यायी ३९९ तडितः पुण्यशालिन्यो याः सदा घनजीविताः। तेन सार्द्धं व्यदृश्यन्त न व्यदृश्यन्त कर्हिचित्॥ अर्थात् ये सौदामिनी धन्य हैं, जिनका घन ही जीवन है। ये सदा अपने प्रियके अंगमें ही दीखती हैं। घनके बिना इनका दर्शन ही नहीं होता। व्रजांगना भी इसकी प्रशंसा करती हैं—'सखि, तुमने कौन देश, तीर्थमें कितने दिन पवित्र तपस्या की है, जो श्याम- मेघके उरमें, जो श्रीहरिके वक्षःस्थलके समान है, सदा रमण करती हो?—'अयि तडित् त्वमसौ क्व नु किन्तपः यदिदमम्बुधरं हरिवक्षसस्तुलितम्।' 'गोपालचम्पू' में एक भाव है—जब श्रीव्रजेन्द्रनन्दिनी मेघकी श्यामलताको देखतीं, तब उड़कर वहाँ पहुँचनेका यत्न करतीं। उन्हें प्रत्यक्ष ही भान होता कि यह मेरे प्राणप्यारेका उरःस्थल है, शीघ्र आलिंगन करूँ। चैतन्य महाप्रभुकी भी ऐसी ही स्थिति थी—वे भी जब मेघका दर्शन करते, तब समुद्रकी ओर दौड़ पड़ते। श्रीघनश्यामके आकर्षक सौन्दर्यकी स्तुति गौड़ब्रह्मानन्दीकारने अपनी वन्दनामें भी की है'— नमो नवघनश्यामकामकामितदेहिने। कमलाकामसौदामणकामुकगेहिने ॥ अर्थात् जिनका देहसौन्दर्य कामदेवके भी द्वारा वांछित हुआ, दूसरोंको महावैभवप्रदाता होकर भी जिन्होंने लक्ष्मीकी इच्छा रखनेवाले सुदामा ब्राह्मणके कणोंको चाहा और ग्रहण किया, उन नवीन घनके समान श्यामको मैं नमस्कार करता हूँ। लोकमें प्रायः देखा जाता है—कामद्वारा लोगोंकी कामना होती है, परंतु यहाँ तो उन व्रजेन्द्रचन्द्रकी अपूर्व छविमाधुरीपर काम भी मुग्ध हो गया। वह उन प्रभुपादारविन्दकी नखमणिचन्द्रिकाकी छटाको दूरसे ही देखकर इतना व्यामुग्ध हुआ कि अपनी सब सुध-बुध भूल गया, मूर्च्छित होकर कहीं आप गिरा और कहीं धनुष; कुछ होश आनेपर उसने विचार किया, अब खूब उग्र तपस्या करके कामिनी बनकर इस नखमणिचन्द्रिकाका सेवन करूँ, तब जन्म सफल हो। वह पुंस्त्वको मिटाकर स्त्रीत्व-प्राप्तिके लिये तपस्याका निश्चय करता है— 'कामैरपि कामितो देहो यस्य।' एक क्या, सैकड़ों और सहस्रों काम उस त्रिभंगललितके लावण्यपर न्यौछावर हो गये। अस्तु, प्राकृत मेघमें और इस मेघमें बहुत अन्तर है, वह पात्रापात्रका विवेक नहीं करता, यह लताओंको भी प्रेम-रस देता है— सन्त्ववतारा बहवः पुष्करनाभस्य सर्वतोभद्राः । कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति ? उस महोमयी मूर्ति मेघने सबमें प्रेमरस बरसाया। रसालको तो परिपूर्ण ही किया। कदम्बकी तो बात ही क्या, उसे तो आत्मसमर्पण ही कर दिया। उसीके प्रेमानन्दकी वर्षा करनेवाले हुए 'कदा' और उन्हें 'वातीति कदम्बः।' यह वह कदम्ब है। जिसने इसका सेवन किया, श्रीराधावेष्टित कृष्णका—घनश्यामका ध्यान किया, उसे यह श्रीश्यामसुन्दरको दे देता है। 'अतः हे कदम्ब ! हे सर्वानन्ददाता ! हमें प्राणप्यारेको बतला दो'—'शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां नः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।९) 'कदम्ब' और 'नीप' एक ही वस्तु है, भेद इतना ही है कि नीप रजःप्रधान एवं बड़े पुष्पवाला होता है और कदम्बके पुष्प छोटे होते हैं। 'नयति—प्रापयति मोहनमिति नीपः।' इसकी भी व्रजांगनाओंने खूब स्तुति की—'हे नीप! तुमपर मोहन बड़े मुग्ध रहते हैं, तुम्हारे बड़े-बड़े फूलोंकी माला उन्हें खूब पसन्द है। तुम्हारी सुगन्ध उनको खूब प्रिय है। तुम्हारी ठण्डी छायामें बैठकर वे वंशीकी मधुर ध्वनिसे वृन्दावनको गुंजार देते हैं। हे मोहनके प्रिय सखा, जरा अपने मित्रका पता देकर हमें भी सुखी करो।' सब तरह प्रयल करनेपर भी जब कदम्बकी ओरसे कोई आशा न मिली, तब निराश व्रजांगनाओंने उसकी निन्दापर कमर कसी। कहने लगीं—'यह कदम्ब है, कदम्बका अर्थ होता है— खोटी माँका बेटा—'कुत्सिता अम्बा यस्य असौ कदम्बः।' इसकी उत्पत्ति काकखातशेषसे होती है। 'नीप' भी ऐसा ही है—'नयति दूरङ्गमयति श्रेयस इति।' व्रजदेवियोंने वृन्दावनके सब वृक्षोंका दरवाजा प्रियकी प्राप्तिके लिये खटखटाया, सबकी स्तुति की, प्रार्थना की, परंतु किसीसे भी उनको आश्वासन नहीं मिला। निराश होकर सभी वृक्षोंको उन्होंने परोपकारकी परीक्षामें 'फेल' कर दिया। 'परार्थभवकाः' आदिका