भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 410

स्तुतिपक्षमें पहले अर्थ किया जा चुका है, असूयार्थ भी प्रायः उन-उन स्थलोंमें निर्दिष्ट हुआ है। अब उनके विषयमें व्रजांगनाओंने आखिरी फैसला किया— ‘ये परार्थाय भवकाः रुद्राः संहारकाः’ हैं। ‘दूसरोंका नाश करनेके लिये, उनके अर्थका संहार करनेके लिये इन सब वृक्षोंका जन्म है। ये ‘यमुनोपकूलाः’ तीर्थवासी पण्डे हैं, महाकठोर हैं। अच्छा, इनकी करनी ये जानें।’ कहीं ‘भविकम्’ पाठ है, जिसका अर्थ अभ्युदय है अर्थात् ‘दूसरेका माल हड़पनेमें ही ये तीर्थ-पुरोहित अपना अभ्युदय समझते हैं।’ इस प्रसंगमें वृक्षादिसे पूछना, अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना, यह मानिनी व्रजांगनाओंकी बात नहीं है। वृक्षोंसे प्रश्न मानिनियोंने भी किये हैं, पर उनमें भेद है। उनके प्रश्न इस तरहके हुए हैं—‘वृक्षो ! अपने सखा, उन चौरचक्रवर्तीको बतलाओ, वे हमारा ‘मन’ चुराकर ले भागे हैं, किस मार्गसे गये, जरा बतलाओ तो’—‘शंसन्तु कृष्णपदवीम्।’ यदि वृक्ष उपेक्षा करें कि ‘जाने दो व्रजांगनाओ, साधारण वस्तुकी चोरीपर क्यों झगड़ा करती हो’ तो कहती हैं—‘नहीं, उन्होंने हमारी सबसे बड़ी चोरी की है, सर्वस्व लूट लिया है, हमें उन्होंने आत्मासे रहित कर दिया है। कोई देह, गेह, आभूषण आदिसे रहित होता है, हम तो आत्मासे रहित हैं—‘रहितात्र्नाम्।’ आप सब सन्त हो, तीर्थवासी हो, कृपा करो, बतलाओ, हम उस चोरको धरेंगी। देखो, झूठ न बोलना। शपथ देती हैं—‘यमुनोपकूलाः’ यमुनाके किनारे आपलोग खड़े हो। दूसरा मार्ग मत बतला देना।’ जब वृक्ष कुछ उत्तर नहीं देते, तब कहती हैं—‘जाने दो, इनको ज्यादा न छेड़ो, ये प्रेमसमाधिमें मग्न हैं, अतः कैसे बतलायें ?’ गोपांगनाओंद्वारा पृथ्वीसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवेात्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि । अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) व्रजदेवियाँ अपने प्राणधन श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दनको वृन्दावनधाममें सब जगह ढूँढ़ चुकीं, लता, तरु, सबसे पूछ चुकीं, पर कहीं पता न मिला। अन्तमें एक सखी कहती है—‘आप सब यों ही पूछ रही हैं, पहले जिनसे आप पूछ रही हैं, वे उन्हें जानते भी हैं या नहीं, यह तो सोच लो। जो जानता है, वही न बतलायेगा ? अतः उनसे पूछो, जो उन्हें जानें। वृथा ही इन बेचारे तीर्थवासियोंकी निन्दा क्यों करती हो ?’ दूसरी सखी कहती है—‘अच्छा सखि, फिर तुम्हीं बतलाओ, किससे पूछें? कौन उन्हें जानता है ?’ इसपर पहली कहती है—‘पूछना ही है तो इस भूमिसे पूछो, यह उन्हें अवश्य जानती है; क्योंकि वे कहींपर छिपे होंगे तो आखिर पृथ्वीपर ही।’ यह सुनते ही सबकी दृष्टि पृथ्वीपर गयी और वे कहने लगीं—‘ये दूर्वा, तरु, लता इसके रोमांच हैं और यह रोमांच श्रीश्यामसुन्दरके चरण-संस्पर्शसे ही हुआ है। यह बड़ी सौभाग्यशालिनी है।’ पृथ्वीसे कहती हैं—‘हे क्षिते (‘क्षिति’ यह प्रयोग छान्दस है) ! तुमने कौन- सा तप किया है, जिससे यह संयोग तुम्हें प्राप्त हुआ ? यद्यपि हमलोगोंको, गोप, यशोदा आदिको भी उनका संयोग प्राप्त होता है, किंतु वियोग भी होता है। परंतु तुम्हें तो कभी उनका वियोग होता ही नहीं। वे श्यामसुन्दर जहाँ भी जाते हैं, तुम्हें कभी नहीं छोड़ते। देवि ! वह तप हमको भी बतलाओ, हम भी करें और इस तीव्र विरहतापसे सदाके लिये मुक्त हो जायें।’ कदाचित् क्षिति कहे कि इसमें क्या प्रमाण कि मैंने तपस्या की और मुझे श्रीकेशवके चरणका अविच्छिन्न संस्पर्श मिला है ? तो इसपर कहती हैं— ‘केशवके चरणका संस्पर्श बिना तपके नहीं मिलता, तुम्हें वह मिला है, इसका प्रमाण तुम्हारी यह


  • ‘भगवान्‌की प्रेयसी पृथ्वीदेवी ! तुमने ऐसी कौन-सी तपस्या की है कि श्रीकृष्णके चरणकमलोंका स्पर्श प्राप्त करके तुम आनन्दसे भर रही हो और तृण-लता आदिके रूपमें अपना रोमांच प्रकट कर रही हो ? तुम्हारा यह उल्लास-विलास श्रीकृष्णके चरणस्पर्शके कारण है अथवा वामनावतारमें विश्वरूप धारण करके उन्होंने तुम्हें जो नापा था, उसके कारण है ? कहीं उनसे भी पहले वराह- भगवान्‌के अंग-संगके कारण तो तुम्हारी यह दशा नहीं हो रही है ?’