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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

परंतु तुम इन सबको मात करते हो; क्योंकि तुम सर्वात्मा, सर्वान्तर्यामी प्राणेश्वरका दान करते हो, तुम महादानी हो।' रात्रि भी दानी है—(‘स्त्री-राति, त्राति इति रात्री') परंतु किसका दान, किसका पालन, यह भी तो विचारणीय है। देव और पात्रके महत्त्वसे दानकी महिमा है। दस रुपयेका दान और गायका दान समान नहीं है। माघमें दस रुपयेका दान और तिलका दान समान नहीं है। कंकड़-पत्थरका दान और सर्वात्माका दान समान नहीं है। फिर किसको देना, पात्रका भारी महत्त्व है। एक तो दानका द्रव्य पाकर उसका आटा लेकर मछली पकड़ेगा और दूसरा उससे श्रीसदाशिव विश्वनाथके मन्दिरमें, श्रीहरिमन्दिरमें दीपक जलायेगा। कितना अन्तर है—गृहीताके उपयोगका ? इसीके अनुसार दाताको जो फलकी प्राप्ति होगी, उसमें भी महान् अन्तर है। वायसरायका कुत्ता भी धनी है, जो सुख महाधनीको नहीं, वह उस कुत्तेको है। हीन देश, काल, पात्रके दानकी महिमासे वह उस दानके फलको कुत्ता बनकर भोग रहा है। ज्ञान या भगवद्विद्याके दान आदिका फल कुत्ता बनकर नहीं भोगा जाता। वह वैकुण्ठादिमें जाकर या मनुष्य, उत्तम ब्राह्मण आदि बनकर ही मिलेगा। अतएव ऐसे विद्यालय आदि खोलने चाहिये, जिनसे अपने माता-पिता आदिकी, अपनी सद्गति हो। 'व्रजांगनाओंके कात्यायनीव्रत, अर्चनसे प्रसन्न होकर भगवान् कृष्णने उन्हें रात्रियोंका दान दिया—'मयेमा रंस्यथ क्षपाः।' (श्रीमद्भा० १०।२२।२७) उन रात्रियोंमें रमणका भगवान्ने स्मरण भी किया है— 'तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता मयैव वृन्दावनगोचरेण।' (श्रीमद्भा० ११।१२।११) ‘...ता रात्री:...’ रात्री:—दान देनेवाली—ये बड़ी दानी हैं। गोपियोंको दान दिया—‘इमाः क्षपाः' उस समय मूर्तिमती रात्रि आयी। खजांची देय वस्तु सामने लाकर रखता है। योगमायाने रात्रियोंको सामने लाकर रखा। भगवान्ने कहा—'इन रात्रियोंमें मेरे साथ रमण करें।' योगमायासे अनन्त करोड़ ब्राह्मी रात्रियोंमें चार घड़ीकी रात्रि प्रविष्ट हुई। श्रीकृष्णके बालसखा मधुमंगलकी माता पूर्णमासी योगमाया ही थी, उसकी महिमासे एक रात्रिमें उन रात्रियोंका प्रवेश हुआ। दुःखमें एक-एक क्षण वर्षोंके बराबर बीतते हैं— 'क्षणं युगशतमिव यासां येन विनाभवत् ॥' (श्रीमद्भा० १०।१९।१६) और सुखमें वर्ष-के-वर्ष एक क्षणके समान बीतते हैं। वृन्दावनका प्रमाण बहुत प्रशस्त माना गया है, इतना प्रशस्त कि उसका मध्यभाग 'गोवर्द्धन' है—'मध्ये गोवर्द्धनं तत्र।' परंतु व्रजांगनाओंकी कोटि-कोटि संख्या थी। इतनी अधिक उस विशाल वृन्दावनमें भी न आ सकीं। इनके अतिरिक्त कितनी ही श्रीराधाजीके रोम-रोमसे उत्पन्न हुई थीं और श्रुतिरूपा, मुनिरूपा अलग थीं, फिर इन सबके केलिधाम अलग तैयार थे। विहारके उपयुक्त कुंज आदि भी उसी प्रकार बने थे। यह सब पूर्ववर्णित रात्रियोंकी तरह यहाँ नित्य वृन्दावनधाम भी प्रकट हुआ था, जिसमें सब सविकास समा गये। हाँ, तो इन रात्रियोंका महादानीपना क्या हुआ? इन्होंने कौन महादान दिया? इन्होंने ब्रह्मविद्याका—पुरुषोत्तमविद्याका दान किया। 'जीवाभयप्रदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्।' इतना ही नहीं, इन्होंने साक्षात् श्रीकृष्ण परमानन्दकन्दका ही दान किया। वह भी किनको? उन व्रजदेवियोंको, जिनके पादरजके लिये ब्रह्मादि तरसते हैं, जो प्रेमपथिकोंकी परम आचार्य हैं। वह दान वृथा नहीं है। 'वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तेषु भोजनम्' की तरह नहीं है। ये तो उस दानकी परम अधिकारिणी हैं, उसके लिये लालायित रहती हैं। उनके दर्शनमें पलक पड़नेको विघ्न मानती हैं, ब्रह्माको कोसती हैं—'सखि, जड है विधाता।' ऐसे पात्रोंको इन रात्रियोंने दान दिया श्रीश्यामसुन्दरका और इसीसे उनका रक्षण भी किया। अन्यथा उनका रक्षण होना ही दुःशक था। फिर यह दान पवित्र देश वृन्दावन और तदनुकूल कालमें हुआ। यह श्रीशुकदेवकृत वर्णन है। योगीन्द्रवन्द्यपादारविन्द गोपांगना कोविदारकी स्तुति करती हैं। देश, काल, पात्र, देशकी महत्ता बतलाती हैं, उन रात्रियोंने उद्बुद्ध उभयविध शृंगाररूप रसिकशेखरका दान किया, यमुनाके किनारे, साक्षात् प्रेमद्रवके पास और परमवियोगिनियोंको। भूखेको दान

३. तृतीय तरंग: शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य एवं मधुर रस दार्शनिक समन्वय

देनेका बड़ा महत्त्व है। 'कोविदार'! ऐसा देश, काल, पात्र न मिलेगा। बतलाओ, हमारे प्राणधन श्यामसुन्दर कहाँ हैं? किस ओर गये हैं?' कोविदार एक तो वृक्ष, वैसे ही जड़ और उनकी प्रेमदशा, उनकी बातोंसे और भी वह स्तब्ध-सा हो गया, कुछ कहता ही नहीं। उसके इस व्यवहारसे गोपांगनाओंमें असूयाका उदय हो आया। वे कहने लगीं- 'सखियो! यह 'कोविदेभ्यो न रातीति कोविदारः' है। यह केवल 'कुं भूमिं विदारयतीति कोविदारः' है। यह तो 'मातुः केवलमेव यौवनवनच्छेदे कुठारः' है।' 'चलो, आगे उस जामुनसे पूछें, उसका वर्ण श्यामसरीखा है।' तारीफमें उसे 'जी जये' से उणादि निष्पन्न करती हैं और असूयामें वही 'जी अभिभवे' से बननेका अधिकारी हो जाता है। आगे मार्गमें 'अर्क' (आक) पड़ा, उससे भी व्रजांगनाओंने अपने प्राणप्रियका पता पूछा। व्रजांगनाओंसे किसीने कहा- 'बड़े-बड़े महाफली वृक्षोंसे पूछकर अब इस क्षुद्रसे क्या पूछोगी?' तब कहने लगीं- 'नहीं, यह गोपीश्वर (वृन्दावनस्थ महादेव)-का प्रेमी है, उनके मस्तकपर विराजता है, वे इसको पाकर भक्तोंके अभीष्ट पूर्ण कर देते हैं। यह अवश्य प्रष्टव्य है। दूसरे, चन्द्रावली (प्रतिनायिका) आदिसे इसका कोई सम्बन्ध नहीं। यह सूर्यकी तरह हमारे प्रिय-विश्लेषजन्य दुःखरूप तमको दूर कर सकता है। यह 'ऋणादि प्रियं गमयति इति अर्कः' है। हे अर्क! हे शिवप्रिय! हमें श्यामसे मिला दो।' जब वह भी नहीं बोलता, तब असूयासे कहती हैं- 'यह बौड़मके पास रहनेसे बौड़म हो गया है, विषवृक्ष है, इसे किसीके सुख- दुःखका क्या पता? हम यह कुछ असूयासे नहीं कहतीं। देखो, इसके स्वामी जैसे अस्सी हजार वर्षकी अखण्ड समाधिमें बैठते हैं, वैसे ही यह भी समाधिमें बैठा है।' परंतु भोलेबाबाकी यहाँ (वृन्दावन)-की समाधि और है। कैलासकी समाधिमें वे अग्राह्य स्वात्मस्वरूपमें लीन होते हैं, यहाँकी समाधिमें वे श्रीश्यामसुन्दरकी पदनखमणि-चन्द्रिकामें विलीन होते हैं।' मधुसूदन सरस्वतीने कहा है- पादनखनिविष्टमूर्तिक एकादशतामिवावहन्नित्यम्। यं समुपासते गिरिशस्तं वन्दे नन्दमन्दिरे कञ्चित्॥ भक्तिकी दस अवस्थाओंमें शिव सन्तुष्ट न हुए, उन्होंने ग्यारहवीं निष्ठाको स्वीकार किया। वैसे 'शिवस्य हृदयं विष्णुः' तो है ही। नन्दप्रांगणमें जाकर एक बार 'श्रीसदाशिवने श्रीश्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दनको प्रणाम किया। श्यामल, महोमयरूप श्रीकृष्णकी नीलकमलके समान अँगुलीयाँ हैं, उनपर दस नख मणिके जैसे हैं, जो अनन्त ब्रह्माण्डको जगमगा देते हैं- 'ज्योत्स्नाभिराहतमहद्दृढद्या- न्धकारम्॥' (श्रीमद्भा० ३।२८।२१) (महताम् - सनकादिशुकादीनां हृदयान्धकारम् आहतं भवति। 'ज्योत्स्नाभिराहतमिव हृदयान्धकारम्।' उससे सब अज्ञानान्धकार मिट जाता है। भगवान् शिव जब नन्दबाबाके प्रांगणमें आये और वहाँ क्रीड़ामग्न श्रीश्यामसुन्दरको प्रणाम करनेके लिये झुके, तब प्रभुके नखोंमें उनकी मूर्ति प्रतिबिम्बित हुई। जिस भगवत्प्रसादको श्रीः - जाया, संकर्षण - बन्धु और आत्मा स्वयं भी न ले सके, उसे श्रीसदाशिवने प्राप्त किया। कुन्द और इन्दु की तरह स्वच्छ धवलिमा, मनोहर दीप्तिवाली देह और दुग्धधवल धाराके समान प्रवहणशील गंगाको सिरपर धारण किये तथा कोटि- कोटि कामोंको लजानेवाला श्रीशिवका मुख जिन नखोंमें प्रतिबिम्बित हुआ, वह पादारविन्द कितना स्वच्छ होगा? श्रीप्रभुके पादारविन्दके ऊपरका भाग श्यामल-महोमयं-दीप्ति-सम्पन्न, नीचेका भाग सुकोमल लाल और उसपर स्वच्छ नख हैं, उनमें शिवका प्रतिबिम्ब चमकृत है।' प्रभुका पादारविन्द कल्पवृक्ष आदि विविध चित्रोंसे अलंकृत था, केवल नखमें कोई चित्र नहीं था, श्रीसदाशिवके प्रतिबिम्बने उसे स्वकायचित्रसे अलंकृत कर दिया। श्रीशिव वहीं उपासनाकी अलौकिक समाधिमें लीन हो गये। तात्पर्य यह कि श्रीभोलेबाबाकी यहाँकी-व्रजकी समाधि तो यह है। गोपियाँ कहती हैं- 'सखि ! यह श्रीशिवका साथी अर्क भी, मालूम होता है, ऐसी ही किसी समाधिमें लीन है। चलो और किसीसे पूछेंगी।' इस प्रकार प्रेमविह्वल गोपांगनाएँ प्रिय मोहनको

ढूँढ़ती हैं, वृक्षोंसे पूछती फिरती हैं, कोई भी उन्हें बतलाता नहीं, परंतु उनके उत्साहमें कमी, अश्रद्धा न आयी। अर्कको छोड़कर वे बिल्व के समीप पहुँचीं। रूप देखकर उन्हें उसका नाम याद आ गया। कहने लगीं—'इसका नाम बड़ा अच्छा है—बिल्व। 'विरुद्धं लुनातीति बिल्वः' ये वृन्दावनके बिल्व ही श्यामप्राप्ति प्रतिबन्धका लवन—छेदन करते हैं। हे बिल्व ! हमें एक बार प्यारे मनमोहनके दर्शन करा दो, हम तुम्हारा बड़ा उपकार मानेंगी। तुम हमारी सखी लक्ष्मीके वृक्ष हो, श्रीवृक्ष हो। लक्ष्मी हमारे श्यामसुन्दरकी प्रेयसी हैं। हमारा पक्षपात करो, श्रीश्याम-प्रतिबन्ध-संयोगको मिटाकर शीघ्र प्राणधनसे मिला दो।' इस तरह गोपांगनाओंने प्रार्थना की, थोड़ी देर खड़ी रहीं, परंतु बिल्वकी ओरसे भी उन्हें कोई आश्वासन न मिला। निराशाकी साँस छोड़कर वे बोलीं—'गोपीश्वरके सम्बन्धसे यह भी समाधिष्ठ प्रतीत हो रहा है, नहीं तो कुछ बोलता न?' कोई कहती है—'सखि, इसका तो नाम हमारे लिये उलटा पड़ गया, यह तो 'अस्मन्मनोरथान् विशेषेण लुनातीति बिल्वः' हो गया। इससे अब आशा रखनी व्यर्थ है।' 'चलो, वह सामने बकुल दिख रहा है, उससे पूछेंगी। हे बकुल ! आप शिव और विष्णु दोनोंके भक्त हैं और अपने भक्तिभावसे दोनोंको भूमिपर ले आनेवाले हैं—'उश्च अश्च अनयोः समाहारो वः तौ कौ लाति (ला आदाने) आनयतीति वकुलः' हे हरिहरपरायण ! अपने प्रेमयोगसे हरिहरको यहाँ ले आनेवाले हे बकुल ! हम तुम्हें नमन करती हैं, हमारे प्राणधन मोहन प्यारेको यहाँ ला दो, उनसे हमें भी मिला दो अथवा पता ही बतला दो, वे किधर गये हैं?' कुछ प्रतीक्षाके बाद कहती हैं—'सखियो ! यह नहीं बतलायेगा; क्योंकि यह शिव और विष्णुका भक्त है, ये दोनों उन निष्ठुर श्यामसुन्दरके ही पक्षपाती हैं, उनका यह भक्त हमें कैसे बतलायेगा ? यह तो महापक्षपाती है।' व्रजांगनाओंकी यह निन्दा, निन्दा नहीं, ये तो प्रेमकी बातें हैं—'ब्रजकी गारी'। ऐसी असूया तो इन्हें श्रीकृष्णचन्द्र परमात्मासे भी होती है। ये तो उनके चरितसे भी असूया करती हैं। यह इनकी प्रेममयी असूया है। प्रसन्न रहती हैं, तब स्तुति करती हैं— तव कथामृतं तप्तजीवनं कविभिरीडितं कल्मषापहम्। श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३१।९) कहती हैं—'ईर्ष्या देवताओंमें भी लगी रहती है, पर आपकी कथामें यह नहीं है। आपके गुणोंका गान सनकादि क्रान्तदर्शियोंने किया है। वे देवोंका गुणगान नहीं करते। देवता अमृतकलश लेकर श्रीशुकादिके समीप आये और उन्होंने बदलेमें अमृत देकर आपकी कथा चाही। आपके भक्त कथाप्रेमी श्रीशुकादिने उसका तिरस्कार कर दिया। कहाँ कथा और कहाँ अमृत ? मणिका काँचसे कौन मनीषी परिवर्तन करेगा?— 'क्व सुधा क्व कथा लोके क्व काचः क्व मणिर्महान्।' (श्रीमद्भागवत, माहात्म्य १।१६) आसन्नमृत्यु राजा परीक्षित्ने भी देवोंका इसपर उपहास किया। योगीन्द्र-मुनीन्द्र भी आपकी कथाकी स्तुति करते हैं। आपकी कथा; शोभा और लक्ष्मी दोनोंसे सम्पन्न है, लोकमें व्याप्त है। देवोंका अमृत एक जगह रखा है, महानाग उसकी रक्षा करते हैं। आपकी कथासुधाका दान होता है। इसके दाता महान् हो जाते हैं।' परंतु जब व्रजांगनाओंके प्रेमपाथोधिमें ईर्ष्याकी तरंग उठती है, तब वे उसकी भरपेट निन्दा भी करती हैं, कहती हैं—'आपकी कथा क्या है, मनुष्यकी साक्षात् मृत्यु है। कोई विरहिणी आपकी कथा सुनकर दुःख मोल लेती है, कथाके सुननेसे उनका विप्रयोगसन्निपात तीव्र हो जाता है। आपकी विस्मृतिमें वह सुखसे रहती है। उसको होशमें लानेकी दवा आपकी कथाका त्याग है।' यही कहा है— सन्त्यज सखि तदुदन्तं यदि सुखलवमपि समीहसे सख्याः । स्मारय किमपि तदितरद् विस्मारय हन्त मोहनं मनसः ॥ अर्थात् उनकी कथा मत छेड़ो, यदि इस सखीको थोड़ा भी सुख-शान्ति देना चाहती हो। जैसे भी बने, इसके मनसे मोहनको भुलवा दो, उसकी कथा मत चलाओ। उसके आवेशमें इसकी व्रीडा विलुप्त हो जाती है, धैर्यका बाँध टूट जाता है—'व्रीडां विलोपयति मुञ्चति धैर्यम्।' बस, उस विरहिणीके लिये आपकी कथा ही मरण है, जलेमें नमक छिड़कना है। जैसे

यहाँ पृष्ठ ३१८ का संपूर्ण पाठ पंक्ति-दर-पंक्ति प्रस्तुत है:

३१८ भक्तिसुधा तैलपूर्ण महाकटाह भट्ठेपर चढ़ा हो, नीचे खूब आग की—'सखि! जब हमारे रोने-धोनेसे वे निष्ठुर श्यामसुन्दर धधक रही हो, तैल खूब परितप्त हो चुका हो और भी प्रसन्न होते हैं, तब इसकी तो बात ही क्या?' २-३ सेर महाविष भी मिला हो, उसमें पड़ा एक कीट अच्छा सखियो, देखो, वह सामने आम्र दिख कितना जीयेगा ('तप्ते कटाह यथा जीवनम्')। रहा है, उसके पत्ते हिल रहे हैं, मालूम पड़ता है, वह हम विरहिणी व्रजांगनाओंके जीवनके लिये आपकी अपनी पल्लवांगुलियोंसे हमें बुला रहा है, चलो, कथा वही सुतप्त तैलपूर्ण कटाह-पातके जैसी है। फिर उससे पूछें। कितना सुन्दर नाम है—'आम्रः अमयति कथा सुननेसे एक गहरी वेदना, सन्ताप यह होता है श्रीकृष्णं अथवा अम्यते प्राप्यते सेव्यते कि जो हमारे अन्तःकरणमें बसा है, हमारे अंग-अंगसे अर्थाभिलाषुकैयैः।' आम काटनेवालेको पछताना सम्मिलित रहता है हाय, हम आज उसकी कथामान्न पड़ता है, यह देववृक्ष है। यह वृन्दावनस्थ आम्र ही सुन रही हैं, क्या आज हमें उसका वियोग है, श्रीश्यामसुन्दरको मिलानेवाला है। यह 'रसाल' है, समालिंगन नहीं प्राप्त है? उस अवसरपर उसकी कथा, रसनिर्यांस श्रीश्यामसुन्दरको समर्पण करता है ('रस- केवल कथा, वही काम करती है, जो तप्ततैलपूर्ण मालातीति रसालः')। हे रसाल! यदि रस न दो तो महाकटाहमें जलकी बूँदें—'तप्ते कटाह जीवनम्- तुम फिर 'रसाल' ही कैसे? रस तो प्राणप्यारे जलमिव।' उस समय जैसे कटाहमें आग भभक नन्ददुलारे ही हैं—'रसो वै सः' वे ही हैं, अवश्य उठती है, हमारे हृदयमें वैसे ही प्रिय-विरह-वैश्वानरकी उन्हें बतलाओ। जब असूयापर उतरीं, तब कहती महाज्वाला प्रदीप्त हो उठती है। यदि कोई पूछे कि हैं—कुछ नहीं जी, यह रस-वस कुछ नहीं देता, यह इतनी दुःखद मरणप्रद यह कथा है तो इसको लोग तो रोग देता है—'अमयति रोगं यच्छतीत्याम्रः।' क्यों गाते हैं? इसपर कहती हैं—इसे गाते कौन हैं? रातको इसके नीचे सोनेपर बीमारी निश्चित है। जाने कवि न! कवि क्या नहीं कहते?—'कवयः किन्न दो सखि इसे। जल्पन्ति।' वे तो भैंसकी भी तारीफ करते हैं। फिर 'चलो अपने उस 'कदम्ब' के पास चलें। जैसे यह कथा 'श्रवणमात्रे मङ्गलम्' है, किंतु 'परिणामे श्रीरामका सिंहासन कल्पवृक्ष है, वैसे प्यारेका सिंहासन दुःखदम् अमङ्गलम्' है। जिसने इस कथाको सुना, यह कदम्ब है। सप्तावरण, अष्ट प्रकृतिके भीतर जो वह बाबा बनकर भीख माँगता है। 'राधेश्याम, वृन्दावन है, उसमें यह कदम्ब है। इसकी स्तुतिमें नारायण, हरि' कहकर गली-गली टुकड़ा माँगता भगवान् व्यासने क्या अच्छा कहा है— फिरता है। प्रश्न होगा—ऐसी चीजका दुनियामें विस्तार 'कदम्बकिञ्जल्कपिशङ्गवाससम्।' (श्रीमद्भा० कैसे हो गया? तो उत्तर यही है कि प्रमादी धनियोंने २।२।९) इसका सौगन्ध्य, इसके फल सब लोकोत्तर कष्ट देनेके लिये उसे दुनियामें फैला दिया है— हैं। आनन्दकन्द, वृन्दावनचन्द्र यशोदानन्दके भी 'श्रीमदाततम्।' किंच जो उस कथाको गाते फिरते मनोरथोंको यह पूर्ण करता है—'कं प्रेमात्मकं सुखं हैं, उनके लिये हम क्या कहें, वे तो सर्वस्वनाशक हैं। ददातीति कदः।' साधारण क्षुद्रानन्दको देनेवाले 'भुवि गृणन्ति ते, भूरिदा जनाः' ('भूरीणि द्यन्ति बहुत हैं। वे श्रीघनश्याम उदार हैं, घन पात्रका विचार दोऽवखण्डने') चित्रकेतु कर घरु उन घाला। नहीं करते। श्यामल घन भी जीवन-जलरूप- कनककसिपु कर पुनि अस हाला॥' (रा०च०मा० परमामृतका खूब वर्षण करते हैं। यह जल केवल १।७९।२) इन ऐसे लोगोंने राजा चित्रकेतुको लाखों जीवन है, पर श्रीश्याम तो साक्षात् जीवन हैं। रानियोंसे वियुक्त कराकर वन-वनमें भटकाया। प्रह्लादको यह घन-नवनीलनीरद-दामिनीसे आवेष्टित है और गर्भमें ही ऐसा पढ़ाया कि बेचारेका वंश ही मिट गया। वे घनश्याम कनकलतावेष्टित-श्रीवृषभानुनन्दिनीसे व्रजांगनाओंकी यह सब असूया प्रेमोन्मादकी विचित्र आवेष्टित हैं।' यहाँ दामिनीस्थानीया श्रीवृषभानुनन्दिनी दशा है। उसी दशामें ग्रस्त उन्होंने बकुलकी भी निन्दा हैं। दामिनीको देखकर श्रीजीको ईर्ष्या होती है—

श्रीरासपञ्चाध्यायी ३९९ तडितः पुण्यशालिन्यो याः सदा घनजीविताः। तेन सार्द्धं व्यदृश्यन्त न व्यदृश्यन्त कर्हिचित्॥ अर्थात् ये सौदामिनी धन्य हैं, जिनका घन ही जीवन है। ये सदा अपने प्रियके अंगमें ही दीखती हैं। घनके बिना इनका दर्शन ही नहीं होता। व्रजांगना भी इसकी प्रशंसा करती हैं—'सखि, तुमने कौन देश, तीर्थमें कितने दिन पवित्र तपस्या की है, जो श्याम- मेघके उरमें, जो श्रीहरिके वक्षःस्थलके समान है, सदा रमण करती हो?—'अयि तडित् त्वमसौ क्व नु किन्तपः यदिदमम्बुधरं हरिवक्षसस्तुलितम्।' 'गोपालचम्पू' में एक भाव है—जब श्रीव्रजेन्द्रनन्दिनी मेघकी श्यामलताको देखतीं, तब उड़कर वहाँ पहुँचनेका यत्न करतीं। उन्हें प्रत्यक्ष ही भान होता कि यह मेरे प्राणप्यारेका उरःस्थल है, शीघ्र आलिंगन करूँ। चैतन्य महाप्रभुकी भी ऐसी ही स्थिति थी—वे भी जब मेघका दर्शन करते, तब समुद्रकी ओर दौड़ पड़ते। श्रीघनश्यामके आकर्षक सौन्दर्यकी स्तुति गौड़ब्रह्मानन्दीकारने अपनी वन्दनामें भी की है'— नमो नवघनश्यामकामकामितदेहिने। कमलाकामसौदामणकामुकगेहिने ॥ अर्थात् जिनका देहसौन्दर्य कामदेवके भी द्वारा वांछित हुआ, दूसरोंको महावैभवप्रदाता होकर भी जिन्होंने लक्ष्मीकी इच्छा रखनेवाले सुदामा ब्राह्मणके कणोंको चाहा और ग्रहण किया, उन नवीन घनके समान श्यामको मैं नमस्कार करता हूँ। लोकमें प्रायः देखा जाता है—कामद्वारा लोगोंकी कामना होती है, परंतु यहाँ तो उन व्रजेन्द्रचन्द्रकी अपूर्व छविमाधुरीपर काम भी मुग्ध हो गया। वह उन प्रभुपादारविन्दकी नखमणिचन्द्रिकाकी छटाको दूरसे ही देखकर इतना व्यामुग्ध हुआ कि अपनी सब सुध-बुध भूल गया, मूर्च्छित होकर कहीं आप गिरा और कहीं धनुष; कुछ होश आनेपर उसने विचार किया, अब खूब उग्र तपस्या करके कामिनी बनकर इस नखमणिचन्द्रिकाका सेवन करूँ, तब जन्म सफल हो। वह पुंस्त्वको मिटाकर स्त्रीत्व-प्राप्तिके लिये तपस्याका निश्चय करता है— 'कामैरपि कामितो देहो यस्य।' एक क्या, सैकड़ों और सहस्रों काम उस त्रिभंगललितके लावण्यपर न्यौछावर हो गये। अस्तु, प्राकृत मेघमें और इस मेघमें बहुत अन्तर है, वह पात्रापात्रका विवेक नहीं करता, यह लताओंको भी प्रेम-रस देता है— सन्त्ववतारा बहवः पुष्करनाभस्य सर्वतोभद्राः । कृष्णादन्यः को वा लतास्वपि प्रेमदो भवति ? उस महोमयी मूर्ति मेघने सबमें प्रेमरस बरसाया। रसालको तो परिपूर्ण ही किया। कदम्बकी तो बात ही क्या, उसे तो आत्मसमर्पण ही कर दिया। उसीके प्रेमानन्दकी वर्षा करनेवाले हुए 'कदा' और उन्हें 'वातीति कदम्बः।' यह वह कदम्ब है। जिसने इसका सेवन किया, श्रीराधावेष्टित कृष्णका—घनश्यामका ध्यान किया, उसे यह श्रीश्यामसुन्दरको दे देता है। 'अतः हे कदम्ब ! हे सर्वानन्ददाता ! हमें प्राणप्यारेको बतला दो'—'शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां नः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।९) 'कदम्ब' और 'नीप' एक ही वस्तु है, भेद इतना ही है कि नीप रजःप्रधान एवं बड़े पुष्पवाला होता है और कदम्बके पुष्प छोटे होते हैं। 'नयति—प्रापयति मोहनमिति नीपः।' इसकी भी व्रजांगनाओंने खूब स्तुति की—'हे नीप! तुमपर मोहन बड़े मुग्ध रहते हैं, तुम्हारे बड़े-बड़े फूलोंकी माला उन्हें खूब पसन्द है। तुम्हारी सुगन्ध उनको खूब प्रिय है। तुम्हारी ठण्डी छायामें बैठकर वे वंशीकी मधुर ध्वनिसे वृन्दावनको गुंजार देते हैं। हे मोहनके प्रिय सखा, जरा अपने मित्रका पता देकर हमें भी सुखी करो।' सब तरह प्रयल करनेपर भी जब कदम्बकी ओरसे कोई आशा न मिली, तब निराश व्रजांगनाओंने उसकी निन्दापर कमर कसी। कहने लगीं—'यह कदम्ब है, कदम्बका अर्थ होता है— खोटी माँका बेटा—'कुत्सिता अम्बा यस्य असौ कदम्बः।' इसकी उत्पत्ति काकखातशेषसे होती है। 'नीप' भी ऐसा ही है—'नयति दूरङ्गमयति श्रेयस इति।' व्रजदेवियोंने वृन्दावनके सब वृक्षोंका दरवाजा प्रियकी प्राप्तिके लिये खटखटाया, सबकी स्तुति की, प्रार्थना की, परंतु किसीसे भी उनको आश्वासन नहीं मिला। निराश होकर सभी वृक्षोंको उन्होंने परोपकारकी परीक्षामें 'फेल' कर दिया। 'परार्थभवकाः' आदिका

स्तुतिपक्षमें पहले अर्थ किया जा चुका है, असूयार्थ भी प्रायः उन-उन स्थलोंमें निर्दिष्ट हुआ है। अब उनके विषयमें व्रजांगनाओंने आखिरी फैसला किया— ‘ये परार्थाय भवकाः रुद्राः संहारकाः’ हैं। ‘दूसरोंका नाश करनेके लिये, उनके अर्थका संहार करनेके लिये इन सब वृक्षोंका जन्म है। ये ‘यमुनोपकूलाः’ तीर्थवासी पण्डे हैं, महाकठोर हैं। अच्छा, इनकी करनी ये जानें।’ कहीं ‘भविकम्’ पाठ है, जिसका अर्थ अभ्युदय है अर्थात् ‘दूसरेका माल हड़पनेमें ही ये तीर्थ-पुरोहित अपना अभ्युदय समझते हैं।’ इस प्रसंगमें वृक्षादिसे पूछना, अपनी अनभिज्ञता प्रकट करना, यह मानिनी व्रजांगनाओंकी बात नहीं है। वृक्षोंसे प्रश्न मानिनियोंने भी किये हैं, पर उनमें भेद है। उनके प्रश्न इस तरहके हुए हैं—‘वृक्षो ! अपने सखा, उन चौरचक्रवर्तीको बतलाओ, वे हमारा ‘मन’ चुराकर ले भागे हैं, किस मार्गसे गये, जरा बतलाओ तो’—‘शंसन्तु कृष्णपदवीम्।’ यदि वृक्ष उपेक्षा करें कि ‘जाने दो व्रजांगनाओ, साधारण वस्तुकी चोरीपर क्यों झगड़ा करती हो’ तो कहती हैं—‘नहीं, उन्होंने हमारी सबसे बड़ी चोरी की है, सर्वस्व लूट लिया है, हमें उन्होंने आत्मासे रहित कर दिया है। कोई देह, गेह, आभूषण आदिसे रहित होता है, हम तो आत्मासे रहित हैं—‘रहितात्र्नाम्।’ आप सब सन्त हो, तीर्थवासी हो, कृपा करो, बतलाओ, हम उस चोरको धरेंगी। देखो, झूठ न बोलना। शपथ देती हैं—‘यमुनोपकूलाः’ यमुनाके किनारे आपलोग खड़े हो। दूसरा मार्ग मत बतला देना।’ जब वृक्ष कुछ उत्तर नहीं देते, तब कहती हैं—‘जाने दो, इनको ज्यादा न छेड़ो, ये प्रेमसमाधिमें मग्न हैं, अतः कैसे बतलायें ?’ गोपांगनाओंद्वारा पृथ्वीसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवेात्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि । अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) व्रजदेवियाँ अपने प्राणधन श्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दनको वृन्दावनधाममें सब जगह ढूँढ़ चुकीं, लता, तरु, सबसे पूछ चुकीं, पर कहीं पता न मिला। अन्तमें एक सखी कहती है—‘आप सब यों ही पूछ रही हैं, पहले जिनसे आप पूछ रही हैं, वे उन्हें जानते भी हैं या नहीं, यह तो सोच लो। जो जानता है, वही न बतलायेगा ? अतः उनसे पूछो, जो उन्हें जानें। वृथा ही इन बेचारे तीर्थवासियोंकी निन्दा क्यों करती हो ?’ दूसरी सखी कहती है—‘अच्छा सखि, फिर तुम्हीं बतलाओ, किससे पूछें? कौन उन्हें जानता है ?’ इसपर पहली कहती है—‘पूछना ही है तो इस भूमिसे पूछो, यह उन्हें अवश्य जानती है; क्योंकि वे कहींपर छिपे होंगे तो आखिर पृथ्वीपर ही।’ यह सुनते ही सबकी दृष्टि पृथ्वीपर गयी और वे कहने लगीं—‘ये दूर्वा, तरु, लता इसके रोमांच हैं और यह रोमांच श्रीश्यामसुन्दरके चरण-संस्पर्शसे ही हुआ है। यह बड़ी सौभाग्यशालिनी है।’ पृथ्वीसे कहती हैं—‘हे क्षिते (‘क्षिति’ यह प्रयोग छान्दस है) ! तुमने कौन- सा तप किया है, जिससे यह संयोग तुम्हें प्राप्त हुआ ? यद्यपि हमलोगोंको, गोप, यशोदा आदिको भी उनका संयोग प्राप्त होता है, किंतु वियोग भी होता है। परंतु तुम्हें तो कभी उनका वियोग होता ही नहीं। वे श्यामसुन्दर जहाँ भी जाते हैं, तुम्हें कभी नहीं छोड़ते। देवि ! वह तप हमको भी बतलाओ, हम भी करें और इस तीव्र विरहतापसे सदाके लिये मुक्त हो जायें।’ कदाचित् क्षिति कहे कि इसमें क्या प्रमाण कि मैंने तपस्या की और मुझे श्रीकेशवके चरणका अविच्छिन्न संस्पर्श मिला है ? तो इसपर कहती हैं— ‘केशवके चरणका संस्पर्श बिना तपके नहीं मिलता, तुम्हें वह मिला है, इसका प्रमाण तुम्हारी यह


  • ‘भगवान्‌की प्रेयसी पृथ्वीदेवी ! तुमने ऐसी कौन-सी तपस्या की है कि श्रीकृष्णके चरणकमलोंका स्पर्श प्राप्त करके तुम आनन्दसे भर रही हो और तृण-लता आदिके रूपमें अपना रोमांच प्रकट कर रही हो ? तुम्हारा यह उल्लास-विलास श्रीकृष्णके चरणस्पर्शके कारण है अथवा वामनावतारमें विश्वरूप धारण करके उन्होंने तुम्हें जो नापा था, उसके कारण है ? कहीं उनसे भी पहले वराह- भगवान्‌के अंग-संगके कारण तो तुम्हारी यह दशा नहीं हो रही है ?’

! And before 'श', there is 'ह्म' with an 'e' matra on top! So it is indeed: ब्रह्मेशो! Wait, let me re-examine: is there an 'o' matra on ह्म? Wait, look at line 32 of col 1: ब्रह्मा, शिव (line 32 of right col: जिस भूमिकी रजको ब्रह्मा, शिव, लक्ष्मी...). Here in line 34: यान् ब्रह्मेशो रमा देवी... Wait, look at the text: ब्रह्मेशो or ब्रह्मोशो? Let me look with maximum magnification: It's यान् space ब्र ह्म... wait, above ह्म is an e-matra slanting to the left. Wait, between ह्म and , there is a little gap. Is there a kana line? No! It's just the top line. Wait, why does it look like ब्रह्मेशो? Because it IS ब्रह्मेशो! Sanskrit grammar and the actual Bhāgavatam verse 10.30.34 is: "यान् ब्रह्मेशो रमा देवी दधुर्मूर्ध्न्याघनुत्तये" Wait, wait! Let me look at that word again: दधुर्मूर्... Is it `दध

४०२ भक्तिसुधा

पुत्रवत्सला यशोदा अम्बाने गोचारणके लिये जाने ही क्यों दिया ? वह तो जैसे फणी अपनी मणिको छिपाकर रखे, वैसे अपने लालको अंकमें छिपाकर रखती थी, रातमें भी जाग-जागकर मस्तक सूंघती थी, जैसे रंक अपनी निधिको बराबर टटोले। फिर उसने अपने कन्हैयाको कहीं जाने ही क्यों दिया ? लक्ष्मी व्रजमें सेविका बनकर रहना चाहती थी। फिर वह लक्ष्मी रासेश्वरी विराजमान है, वह भी श्री है 'श्रीयते सर्वगुणैः।' श्री ही हैं एक लक्ष्मी, एक श्रीराधा। पहली 'श्रयते हरिमिति श्रीः' है और दूसरी 'श्रीयते हरिणा या सा श्रीः' सुन्दरता, मृदुता, कोमलता आदि उनकी सेवाके लिये लालायित रहती हैं। 'देवीभागवत' में वर्णित शोभा, शान्ति, कान्ति आदि सब गोपांगनाओंके रूपमें श्रीराधाकी सेविकाएँ हैं। उन्हींकी सरसता आदि लोकमें कणमात्र है। अनन्तकोटिब्रह्माण्डान्तर्गत मृदुता, कोमलताकी मूर्तिमती महाशक्ति, जिसके चरणोंमें प्राकृत कमलकी पंखुड़ीके भी गड़ जानेका डर है, वे अपने परम कोमल करोंसे श्रीराधाके चरण-स्पर्श करनेमें सकुचाती हैं कि कहीं आघात न लग जाय। अतः 'श्रीयते सर्वैर्गुणैर्हरिणा च या सा श्रीः' ठीक ही है। जब वृन्दावनमें निवास करें, तब धनकी कैसी कमी ? सैकड़ों नौकर लगाकर गोचारण आदि कराया जा सकता है, फिर स्वयं श्यामसुन्दर भगवान्‌को वह क्यों करने दिया गया ? परंतु ये तो गोपालकी लीला थी, बाललीला, वनलीला आदि उनके विनोद थे। श्रीमद्वल्लभाचार्यके सिद्धान्तानुसार जगत्के, प्रकृतिके सब तत्त्व उस प्राणप्यारेके आलिंगनके लिये उत्कट उत्कण्ठित हैं। इसके लिये वनकी देवी, वनकी शक्ति कोई दूर्वा, कोई लता, कोई पाषाण आदि बने हैं। यदि वनलीला न हो तो इनकी अभिलाषा कैसे पूर्ण हो ? भगवान् वांछाकल्पतरु कैसे कहे जायँ ? किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि । अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०)

पुत्रवत्सला अम्बा यशोदाने अपने लालको गोचारण, वनगमनकी कभी अनुमति नहीं दी। हठीले श्यामसुन्दरके हठ अथवा परिस्थितिसे विवश यशोदाने वैसा होने दिया। परंतु वनगमनकी बात सुनकर नन्दरानी न जाने कितनी बार मूर्च्छित हुई। 'दिनभर कैसे कटेगा' आदि चिन्ता उसके चित्तसे क्षणभरके लिये भी शान्त न होती थी। गोचारणके लिये वन जानेके समयकी गोपालकी मूर्तिको निहारकर गोप, गोपी सब चित्रलिखे-से खड़े रहते, वे सब उनका तबतक एकटक दर्शन करते रहते, जबतक वे अपने सखाओंके साथ ओझल न हो जाते। इसके बाद भी घण्टों उनके पीछे उड़ रही धूलिका दर्शन करते रहते और अन्तमें उनकी विविध चिन्ताओंमें ही बेसुध हो जाते। वन, पक्षी, मृग, जड़, चेतन सबकी यही स्थिति थी। तब नन्दरानीकी स्थिति कैसी होगी, यह वर्णनके बाहर है। इसके साथ एक बात यह भी थी कि छोटे बछड़े श्रीश्याम और श्रीबलरामके साथ इतने मिल- जुल गये थे कि उनके बिना आँगनके बाहर पैर ही नहीं रखते थे। दोनों भैया उनकी पूँछ पकड़कर व्रजकर्दममें खेलते, वे उनको एकटक दृष्टिसे देखते, सूँघते और जिह्वासे चाटते थे। ऐसी स्थितिमें बड़े होकर भी श्रीकन्हैया और श्रीदाऊको छोड़कर डण्डाकी मार खाकर भी वे बाहर जानेका नाम न लेते। किसी समय तो वे स्वयं कृष्ण हो गये। आगे चलकर गायोंने भी बछड़ोंका ही अनुकरण किया, उन्होंने भी अपने प्रिय श्यामसुन्दरके बिना कहीं भी जाना-आना छोड़ दिया। अब तो एक समस्या उपस्थित हो गयी। इधर गोपालन निज धर्म था ही। जहाँ धर्मका सम्बन्ध आया, नन्द, यशोदा दोनों ही मूक हो गये। गर्गाचार्यकी प्रतीक्षा होने लगी। वन, लता, मृगादिके मनोरथ पूर्ण होनेका अवसर आ गया। स्मरण-समकाल ही गर्गजी पधारे और तुरंत दूसरे ही दिन गोपाष्टमीका ही मुहूर्त निकल आया, मानो प्रतीक्षामें ही बैठे थे। परंतु गोपियाँ बड़े कष्टमें पड़ गयीं। जिन्हें एक क्षण भी बिना देखे नहीं रह सकतीं, उनका अब दिनभरके लिये असह्य वियोग कैसे सहा जायगा ? दूसरे, 'इतने मधुर, सुकोमल मनमोहन कण्टकाकीर्ण वनमें कैसे विचरेंगे'

श्रीरासपञ्चाध्यायी ४०३

इस बातकी चिन्ता तो सभीको और भी अधिक कष्ट दे रही थी, परंतु बड़े कष्टसे उन्होंने सब कुछ सहा। गोपजनके कुतूहलमें भावी कष्ट कुछ विस्मृत हुआ। बड़े समारोहसे गोपूजन हुआ। गौ, वत्स वस्त्रालंकारादिसे सजाये गये; धूप, दीप, नैवेद्यके साथ उनकी परिक्रमा, दण्डवत् प्रणाम आदि हुआ। माता यशोदाने, गोपांगनाओंने श्रीश्यामसुन्दरको पादुका पहनकर वन जानेका प्रस्ताव रखा, परंतु उन्होंने अस्वीकार किया, कहा—यह धर्मविरुद्ध है, जब हमारे उपास्य देवता गौएँ बिना पादत्राणके विचरेंगी, तब हम भी वैसे ही रहेंगे। अतएव गोपदेवियोंको चिन्ता है— चलसि यद् व्रजाच्चारयन् पशून् नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम्। शिलतृणाङ्कुरैः सीदतीति नः कलिलतां मनः कान्त गच्छति॥* (श्रीमद्भा० १०।३१।११) और भी '····तेनाटवीमटसि तद् व्यथते न किंस्वित् कूर्पादिभिर्भ्रमति धीर्भवदायुषां नः।' (श्रीमद्भा० १०।३१।१९) यदि प्रभुके पादोंमें पादत्राण होते तो पद-पदपर काँटा आदि गड़नेकी गोपियोंको चिन्ता न होती। अतः यह सौभाग्य किसीको प्राप्त नहीं हुआ। यह तो श्रीवृन्दावनभूमिको ही प्राप्त हुआ, जिसने निरावरण केशव-चरणोंको प्राप्त किया। अतएव 'वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।१०) कहा गया है। भगवच्चरणारविन्दके विषयमें गोपांगनाओंकी कई अन्तरंग भावनाएँ हैं। उन्होंने अपने प्रेष्ठ श्रीश्यामसुन्दरको कई स्थानोंमें 'देवकीसुत' कहा है, यह उनकी ओरसे प्रणयकोपमें साभिप्राय उक्ति है अर्थात् देवकीके—क्षत्राणीके—कठोरहृदयके सुत हैं, उनके शरीरमें क्षत्रियाणीका कठोर खून है, अतएव इनके पाद कठोर हैं, विप्रयोगतापसन्तप्त कठिन हृदयमें हम उनको धारण करके तापशान्ति चाहती हैं। इसी प्रकार 'न खलु गोपिकानन्दनो भवान्' (श्रीमद्भा० १०।३१।४) कहकर यह बतलाया कि 'आप कोमलहृदया गोपिका—यशोदाके सुत नहीं हैं, अन्यथा इतने कठोर न होते।' वृन्दावनधामके प्रसंगमें यह भी समझना चाहिये कि वृन्दावनधाम अलग और भूमि अलग है। नित्य वृन्दावनधामका जो व्यापी वैकुण्ठ है, यहाँ अवतार है। यह सब महत्त्व भूमिके एक देशको था, पर इतनेसे ही समस्त भूमिको बड़ा अभिमान था। परंतु किसीका भी अभिमान सदा स्थिर नहीं रहता। भगवान्‌को तो वह अच्छा ही नहीं लगता। फलतः पृथिवी एक बार गौ बनी और त्रिपादक्षीण धर्म—वृषभ। पृथिवी अपने ऊपर हो रहे अत्याचारोंसे दुःखी होकर भगवान्‌से करुण प्रार्थना कर रही थी, कलियुग दोनोंको डण्डा मारकर भगा रहा था। धर्म भूमिसे उस समय पूछ रहा था—'तुम इतनी दुःखी क्यों हो? रोती क्यों हो?' इसपर गोरूपधारिणी भूमिने कहा—'श्रीभगवान् पूर्णपुरुषोत्तम श्यामसुन्दरके साक्षात् चरणस्पर्शकी प्राप्तिसे कृतकृत्य होकर मैं महाभिमानमत्त हो गयी थी, उसीका यह फल भोग रही हूँ।' एक बार श्रीनारदने विन्ध्याचलसे पूछा—तुम बड़े हो या सुमेरु ? मैं तो समझता हूँ कि सुमेरु बड़ा है। विन्ध्याचलसे सुमेरुकी स्तुति न सही गयी, वह खड़ा हो गया। अब तो भूमि और आकाश एक हो गया, आफत मच गयी। तब देवताओंने महामुनि अगस्त्यको उसके समीप भेजा, जो उसके गुरु थे। उन्हें देखते ही विन्ध्यने साष्टांग प्रणाम किया और उनकी आज्ञा मानकर वैसे ही रह गया। लोगोंने शान्तिकी साँस ली, पर उसके हृदयमें छोटेपनका सन्ताप बना ही रहा। परंतु जब भगवान् रामचन्द्र वनवासके प्रसंगसे उसके यहाँ पधारे, तब तो सुमेरु, हिमालय आदि सभी विन्ध्यकी स्तुति करने लगे। उस समय विन्ध्याचलने बिना परिश्रमके ही बड़ाई पायी—'बिनु श्रम बिपुल बड़ाई पाई।' ऐसे ही भगवत्पादार्पणसे चित्रकूटका


  • हमारे प्यारे स्वामी ! तुम्हारे चरण कमलसे भी सुकोमल और सुन्दर हैं। जब तुम गौओंको चरानेके लिये व्रजसे निकलते हो, तब यह सोचकर कि तुम्हारे वे युगल चरण कंकड़, तिनके और कुश-काँटे गड़ जानेसे कष्ट पाते होंगे, हमारा मन बेचैन हो जाता है। हमें बड़ा दुःख होता है।

४०४ भक्तिसुधा महत्त्व माना गया और इस एक देशके महत्त्वसे समस्त भूमिकामहत्त्व माना गया। इसी प्रकार 'वृन्दावनं सखि भुवो वितनोति कीर्तिम्' की बात है। अतः व्रजरजकी महिमा महान् है। व्रजदेवियोंने अपने शरीरकी वृन्दावनसे तुलना की है। वृन्दावनमें श्रीयमुना बहती हैं। व्रजांगना कहती हैं—हमारे शरीरमें श्रीकृष्णप्रेमधारा निरन्तर प्रवाहित है। हमारा हृदय ही श्रीगोवर्द्धनपर्वत है और ये वृन्दावनकी लताएँ हमारी रोमराजि हैं। पर हाय, तब भी प्यारे श्यामसुन्दर वृन्दावनमें साक्षात् विहार करते हैं, उसे सदा अलंकृत करते हैं और हमें दर्शनतक नहीं देते। वृन्दावनमें स्थल-स्थलपर झरने झरते हैं, व्रजांगना उनकी समानता अपने प्रेमद्रव, मूर्च्छा, स्वेद आदि आठ सात्त्विक भावोंसे करती हैं। वृन्दावनमें लतादिकी अलौकिकता है, जो सर्वथा लोकोत्तर है। अतः अब व्रजदेवियाँ वृन्दावनकी भूमिसे ही पूछती हैं— 'किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि ।' 'हे सखि भूमि ! बतलाओ, छिपाओ नहीं— तुमने कौन-सी तपस्यासे यह लोकोत्तरता प्राप्त की है।' भूमि बोलती नहीं, तब अपने ही आप कल्पना करती हैं—मालूम होता है इसकी कोई उग्र तपस्या है, आत्मसन्तापन, पीड़न भी एक तप है। जब भगवान् श्रीवामनने महाविराट् रूपमें अपने चरणसे तुम्हारा स्पर्श किया, उस समय तुम दबी, तुम्हारा उत्पीड़न हुआ। यह एक तपस्या हुई। यह आनन्दोद्रेकका रोमाँचोद्गम साधारण तपका फल नहीं, अपितु श्रीवामनभारसे है अथवा उतनेसे न होगा। श्रीवामनका स्पर्श ऐश्वर्यवाला है, यहाँ माधुर्य है, ऐश्वर्यमें माधुर्य सम्भव नहीं, वह तो तपसे ही सम्भव है, अतः श्रीवामनस्पर्शरूप तपसे यह मिला होगा अथवा वराह भगवान्‌के द्वारा निपीडनरूप तपका फल होगा, जो श्रीश्यामसुन्दरके स्पर्शोत्सवसे तुम अति पुलकित हो रही हो। किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि । अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा आहो वराहवपुषः परिरम्भणेन ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) इस प्रकार व्रजांगनाएँ अपने प्राणाधिकप्रिय श्रीश्यामसुन्दरका अन्वेषण करती हुई वृक्षादिकोंसे कुछ उत्तर न पाकर भूमिसे पूछती हैं और विविध भावमय कल्पनाओंसे पुष्ट अनुमानद्वारा उसे श्रीकृष्ण- सम्पर्कवती जानकर उसके प्रति विमुग्ध हो जाती हैं और उनकी कल्पनाओंका प्रवाह बढ़ता ही जाता है। निवास और गत्यर्थक 'क्षि' धातुसे ('क्षि निवास गत्योः') 'क्षिति' शब्द निष्पन्न हुआ है। उसका अर्थ है सर्वनिवास और गमनकी आधारभूता। संसारके सभी प्राणियोंकी स्थिति, गति भूमिके ही आधारपर है। व्रजांगनाएँ प्रार्थना करती हैं—'हे सर्वाधारभूते भूमि ! तुम परोपकारिणी हो, बड़ी दयामयी हो, श्रीश्यामसुन्दरका पता बतलाकर हमपर दया दिखाओ। सखि ! सच- सच बतलाओ, तुम्हारी किस तपस्याका यह फल है, जो श्रीश्यामचरण तुम्हें प्राप्त हुआ है? श्रीकेशवाङ्घ्रिस्पर्श तुम्हें मिला है? यह तो स्पष्ट है कि तुम्हें उन प्रभुका चरणस्पर्श अवश्य मिला है; क्योंकि उसके बिना तुम्हारा यह लता, झरनारूप अंगरुह, यह हर्षोद्रेक, यह लोकोत्तर उत्सव कभी सम्भव नहीं। अब जानना यह है कि यह तुम्हें भगवान्‌के किस स्वरूपसे प्राप्त हुआ? यदि महाविराटका रूप धारण करते समय भगवान् वामनसे तो यह हम मान सकतीं नहीं; क्योंकि उनके द्वारा इतना उत्सव मिलना असम्भव है। यह तो हमारे श्रीश्यामसुन्दरके चरण-सम्मिलनका ही महाफल हो सकता है। आहोस्वित् रसातलसे तुम्हारा उद्धार करते समय भगवान् वराहके परिरम्भणका यह फल है। परंतु जड़-चेतन सबमें रसका संचार कर देनेवाली यह विशेषता तो उन मुरलीमनोहरमें ही है। वामन या वाराहकी तो यह बात कहीं भी प्रसिद्ध नहीं। यह तो उन्हींकी महिमा है, जो अमृतमय निज मुखचन्द्रसे विनिर्गत वेणुगीत-पीयूषके पानसे स्थावर जंगम और जंगम स्थावर हो जाते हैं, वृक्ष भी हृष्यत्त्वक्- रोमांचवाले हो जाते हैं। यह तुम्हारा लोकोत्तर उत्पुलोत्सव अवश्य उन्हींकी कृपाका प्रसाद है।

श्रीरासपंचाध्यायी ४०५ सखि! तुम भाग्यशालिनी हो, हम तो भाग्यविधुरा हैं। सखि, वसुधे! तुम ऐसी महाभाग्यवती हो कि ये श्यामसुन्दर कभी वामनरूपसे तो कभी वाराहरूपसे तुम्हारा आलिंगन करते हैं और साक्षात् श्रीकृष्णचन्द्र यशोदा-नन्दन आनन्द-कन्दरूपसे भी सदा तुमसे संयुक्त रहते हैं। हमसे, गोपालसे, अपने प्रियसखाओंसे वे वियुक्त हो जाते हैं, पर तुमसे कभी वियुक्त नहीं होते। सचमुच तुम स्वाधीनभर्तृका हो। अनन्तानन्त महापुण्यवानोंको भगवद्ध्यान, भगवत्स्पर्श प्राप्त होता है, फिर साक्षात् सम्बन्ध हो जाय तो कहना ही क्या?' अघासुरकी मुक्ति लोग चकित रह गये, अघासुरकी मुक्ति देखकर। पहले उसके कन्दराकार मुखमें ग्वाल-बाल, वत्स प्रविष्ट हुए, फिर श्रीगोपाल स्वयं भी प्रविष्ट हो गये और उसके मुखका विदारणकर वत्सादिके सहित उससे बाहर निकल आये। अपनी दृष्टिसे सुधासिंचनकर वत्स-वत्सपोंको सजीव किया। उस समय उस असुरके मुखसे एक ज्योति निकली और उन त्रिभुवनमोहनके मुखमें समा गयी। इस घटनासे सब आश्चर्यचकित रह गये। जो प्रत्यक्ष सायुज्य देवोंको दुर्लभ है, वह इस हत्यारेको मिली। श्रीशुकदेव महामुनि कहते हैं— सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्। स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि- व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः ॥ (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) एक बार भी अन्तःकरणमें विराजित प्रभुकी मनोमयी मूर्ति भावुकोंको भागवती गति देती है— आत्मसमर्पण कर देती है। उक्त अघासुरको तो फिर वह साक्षात् ही मिली, फिर उसको प्रभुप्राप्तिमें सन्देह ही क्या? बाहर मन्दिरादिमें प्रतिष्ठित दिव्य काष्ठादि-निर्मित भगवन्मूर्तिका दर्शन करके भक्तलोग वैसी ही मूर्ति अपने हृदयमें पधराकर रखते हैं। इसीके लिये काष्ठादिकी मूर्ति बनाकर पूजा- सेवाके विधान हैं। इस विषयमें श्रीवल्लभाचार्यजीका सिद्धान्त इस प्रकार है— मानसी-आराधनाकी महिमा कृष्णसेवा सदा कार्या मानसी सा परा मता। चेतस्तत्प्रवणं सेवा तत् सिद्धयै तनुवित्तजा॥ तत्प्रवणता ही सेवा है, अपने प्रियतम, पूर्णतम पुरुषोत्तमकी ओर संसार छोड़कर मन ऐसा प्रवाहित हो, जैसा सावन-भादोंकी गंगा आदि नदियाँ समुद्रकी ओर प्रवाहित होती हैं। मनमें प्रभुस्वरूप प्रकट हो जाय। ध्यान करने बैठें, मन नहीं लगता, भजनके समय कामिनी, शिशु और भी अत्यन्त सुन्दर वस्तुओंका स्मरण हो आता है। परंतु, क्या कोई भी वस्तु उन त्रिभुवन-मोहन श्यामसे अधिक सुन्दर है? फिर क्या बात है, उनके देवदुर्लभ चरणारविन्दको छोड़कर वह अन्यत्र क्यों भटकता है? कारण स्पष्ट है, उसमें प्रभुकी मूर्ति अंकित नहीं हुई—मानसी मूर्ति नहीं बन पायी। 'स्वमूर्त्या लोकलावण्यनिर्मुुक्त्या लोचनं नृणाम्।' (श्रीमद्भा० ११।१।६) ('लोकेभ्यो लावण्यस्य निर्मुक्तिर्यया सा') प्रभुकी मंगलमयी मूर्तिके एक-एक रोममें अनन्त सौन्दर्यामृत-माधुर्यामृत- सिन्धु समाये हैं, सारे संसारमें उसका एक कण बँटा है। जब सब सौन्दर्य-विश्वमोहन कन्दर्प भी जिसकी नखमणिचन्द्रिकासे व्यामुग्ध हो जाता है, उसकी यदि मनोमयी मूर्ति बन जाय तो यह शिकायत न रह जाय कि मन नहीं लगता। प्रभुने देखा कि जीवोंके चित्त माधुर्यादिकी तरफ खिंचते हैं, पर वे नरक ले जानेवाले हैं—'ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।' (गीता ५।२२) आद्यन्तवन्त हैं, क्षणभंगुर हैं, बुध इनमें नहीं रमते। पर ये जो हमारे शब्द, रूपादि, माधुर्यादि हैं, इनको हम ऐसे रूपमें प्रकट करें कि सबका चित्त एक बार ही उधर आकृष्ट हो जाय। प्राणियोंके चित्तका परिचय अदृश्य, अग्राद्य, अलक्षण, अरूप, अचिन्त्य, अव्यपदेश्य, अशब्दसे नहीं हुआ, इसीलिये वह लौकिक शब्दादिके लिये मचलता है। यही सब विचारकर प्रभुने अपना ऐसा रूप बनाया कि सनकादि, शुकादि भी उसपर विमुग्ध हो गये। श्रीश्यामसुन्दर पूर्णतम पुरुषोत्तमका ही एक रामरूप है, जिसे देखकर दण्डकारण्यवासी तपस्वी मुग्ध हो गये। श्रीकृष्णका रूप तो जरा और ठाटका है, कहीं

४०६ भक्तिसुधा मुकुट, कहीं लकुट, कहीं पीताम्बर, कहीं फेंटा, कहीं वंशी आदिसे वह खूब सजा है। पर श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र तो बाबाजीकी तरह जटा, चीर आदि धारण किये थे, उनपर भी मुनियोंका चित्त खिंच गया। यद्यपि खरदूषणकी बहनका नाक-कान काटा, पर जब सामने आये, तब उनके भी मुखसे निकल पड़ा— जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा ॥ (रा०च०मा० ३।१९।५) क्रूर, गोभक्षक भी उन्हें देखकर सहज ही विभोर हो गये। राह चलती स्त्रियोंने भी उन्हें देखकर उनके मार्गकी निर्बाधता-सर्प, वृश्चिक आदिसे राहित्य विधातासे माँगा। फिर श्रीश्यामसुन्दर मुरलीमनोहरके रूपमें जो शृङ्गाराक्रान्त परम कमनीय था, प्रकट होकर तो अपने साधकोंके मनकी सभी शिकायतोंको दूर कर दिया। लावण्य, सौरस्य, सौरस्य- सुधा-सिन्धुको छोड़कर भला कौन ऐसा है, जो अप्सरा आदिको चाहेगा? परंतु उस मूर्तिके मनोमयी होनेपर ही यह बात होती है, अतएव 'मानसी सा परा मता।' यह सिद्ध कैसे हो, इसके लिये पहले एक ऊँचे अभिनिवेशसे तनुजा और वित्तजा सेवा होनी चाहिये। धातु आदिकी प्रभुप्रतिमा पधराकर अष्टयामकी सेवा, भावना, दिव्यातिदिव्य शृंगार, भोगरागसे उन्हें अपना सर्वस्व समझकर महावैभवसे खूब सेवा करनी चाहिये, तब वह मूर्ति मनमें आयेगी और एक बार आकर ही सदाके लिये कृतकृत्य कर देगी। अतएव कहा गया है— 'सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्।' (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) ध्रुव, प्रह्लाद आदिको इसी मानसी प्रतिमाने— मनोमयी मूर्तिने आत्मसमर्पण किया। फिर उस अघासुरकी क्या बात, जिसके मुखमें वह मूर्ति साक्षात् समा गयी ! मुख्य बात यह है कि किसी भी स्वरूपसे, कैसे भी प्रभु-सम्बन्ध होना चाहिये। व्रजांगनाएँ कहती हैं—'सखि धरित्रि ! तुम्हें यह जो श्रीकृष्ण-स्पर्श मिला, वह जन्म-जन्मकी उग्र तपस्याओंका फल है। पहले वामनचरणके तीव्राघात तपसे पुण्य उत्पन्न हुआ, उससे वाराह-संस्पर्शपुण्य उत्पन्न हुआ। फिर इन दोनों पुण्योंसे श्रीश्यामसुन्दरके सार्वदिक् संस्पर्श-सौभाग्यका उदय हुआ। सखि! हमको भी उस तपस्याका क्रम बतलाओ, जिससे तुमने उत्तरोत्तर उन्नति की।' व्रजांगनाओंने श्रीश्यामसुन्दरके चरणसंस्पर्शको अधिक महत्त्व दिया है। कोई कहे कि स्पर्श तो सब समान ही है—जैसे श्रीवामनभगवान्‌का या वाराह- भगवान्‌का, वैसे ही श्रीश्यामसुन्दरका, केशवभगवान्‌का, उसमें कोई भी अन्तर कैसा? परंतु ऐसा नहीं कहा जा सकता। यह भेद तो भावुक ही समझ सकते हैं, दूसरोंके लिये यह अगम्य है। इसपर व्रजदेवियोंके बहुत ऊँचे भाव हैं। केशव उनकी दृष्टिमें साधारण केशव नहीं, अपितु ब्रह्मा, विष्णु और महेशको वशमें करनेवाला केशव—('कः-ब्रह्मा, ईः-विष्णुः, शः- शिव, तान् वशयतीति केशवः') है। भगवदवतारोंमें कोई अंशावतार, कोई कलावतार और कोई आवेशावतार होते हैं। परंतु पूर्ण, पूर्णतर और पूर्णतम अवतार पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द यशोदानन्दनका ही हुआ है। इसमें भी भक्तोंकी उच्च भावनाके अनुसार—'व्रजे वने निकुञ्जे च श्रैष्ठ्यमत्रोत्तरोत्तरम्' की व्यवस्था है। इसके अनुसार निकुंजस्थ श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहन ही पूर्णतम अथवा श्रेष्ठतम हैं। निकुंजस्थ माधुर्यनिधि श्यामसुन्दरकी श्रेष्ठता—एक रोचक दृष्टान्त कदम्बखण्डीके नागाजी व्रजमें एक अतिप्रसिद्ध भावुक भक्त हो गये हैं। वे वहीं आनन्दमग्नावस्थामें घूमा करते थे। एक दिन उनकी जटा एक झाड़ीमें उलझ गयी। प्रयत्न किया, पर नहीं सुलझी, तब आपने निश्चय किया—'जिसने उलझायी है, अब वही आकर सुलझायेगा।' वहाँ गौओंको चराने आनेवाले ग्वालबालों तथा अन्यान्य लोगोंने बहुत प्रार्थना की—'बाबा, हम सुलझा दें।' पर आपने किसीकी न सुनी, अटल निश्चय किया—'बस, अब तो वही आयेगा, तभी सुलझेगी।' आप इसी प्रणयकोप अथवा भावावेशमें बहुत समयतक उसी तरह खड़े

रहे। नागाजीकी प्रतिज्ञासे श्रीश्यामसुन्दर अधीर हो उठे। वे आये और नागाजीकी जटा अपने कोमल करोंसे सुलझानेको ज्यों ही उद्यत हुए, नागाजीने रोक दिया। कहा—‘पहले आप अपना परिचय दीजिये, आप कौनसे कृष्ण हैं—व्रजके, वनके या निकुंजके ? हम तो निकुंजके उपासक हैं।’ श्रीप्रभुने कहा— ‘बाबा, मैं वही हूँ, जाकी तुम उपासना करो हो।’ नागाजीने कहा—‘कैसे विश्वास हो ? इसका प्रमाण कौन दे ?’ श्रीप्रभुने कहा—‘जैसे तुमकूं विश्वास हो, सोई करो।’ नागाजीने कहा—‘यदि हमारी श्रीस्वामिनीजू आकर कहें कि हाँ, ये निकुंजके ही श्याम हैं, तब हम मानें।’ इतनेमें श्रीव्रजेश्वरी वृषभानुनन्दिनी श्रीस्वामिनीजू भी पधारीं और उन्होंने नागाजीको विश्वास दिलाया कि ये ही नित्यनिकुंज-मन्दिरस्थ श्रीश्यामसुन्दर हैं, तब अनुमति मिलनेपर बड़ी उत्सुकतासे श्रीप्रभुने चार हाथ लगाकर नागाजीकी जटा सुलझायी। कहनेका तात्पर्य यही कि इस प्रकार श्रीकृष्णके तीन भेद हुए। इनमें मथुरानाथ और द्वारकानाथके दो भेद और जोड़ देनेसे पाँच भेद हो जाते हैं। जैसे एक ही स्वातिबिन्दु स्थानभेदसे विभिन्न नामवाला होता है—सीपमें मोती, हाथीमें गजमुक्ता, गौमें गोरोचन आदि, वैसे ही श्यामसुन्दरके ये पाँच भेद हैं। रसिक भक्तोंके यहाँ जितनी माधुर्यकी अधिकता है, उतनी ही ऐश्वर्यकी कमी। व्रजनाथ, द्वारकानाथमें यही भेद है। उत्तरोत्तर ऐश्वर्यकी न्यूनता और माधुर्यकी अधिकतासे व्रजमें पूर्ण, वृन्दावनधाममें पूर्णतर और नित्य निकुंजमें पूर्णतम प्रभु माने गये हैं। अतएव अन्य अवतारोंके स्पर्शकी अपेक्षा श्रीश्यामसुन्दरके चरणका स्पर्श व्रजांगनाओंकी दृष्टिमें अधिक महत्त्व रखता है। भगवान्‌की लोकोत्तर अलकावलीका माधुर्य केशवका एक दूसरा अर्थ है—(‘प्रशस्ताः केशा यस्य सः’) सुन्दर केशवाला। सचमुच श्रीश्यामसुन्दर केशवके समान किसीके भी केश नहीं हैं। गोपांगनाएँ उनके केशोंपर मुग्ध हैं— वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्री- गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम्। दत्ताभयं च भुजदण्डयुगं विलोक्य वक्षः श्रियैकरमणं च भवाम दास्यः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३९) कहती हैं—‘श्यामसुन्दर! हम आपके इस लोकोत्तर सुन्दर अलकावलीसे आवृत्त मुखपर विमुग्ध हैं और अक्रीत, अशुल्कदासी हैं।’ उन सौन्दर्यगर्वप्रमत्त गोपांगनाओंका गुमान गोविन्दके घुँघराले केशपाशको देखकर ही चूर-चूर हो गया, वे सदाके लिये नायिकात्व, स्वाधीनभर्तृकात्व छोड़कर दासी बन जानेको प्रस्तुत हो गयीं। कदाचित् भगवान् कहें कि ‘गोपांगनाओ, आप ऐसा मत कहो, आप कुलांगना हो’ तो कहती हैं—‘श्यामसुन्दर, आपकी इस रूपराशिको देखकर हम भुला जाती हैं, ठगी-सी रह जाती हैं। ये आपकी बिखरी अलकें मनको खींच लेती हैं। ये आपकी अलकें कुटिल हैं, स्निग्ध हैं, स्वच्छ हैं और हमारा मन भी सत्त्वसम्पन्न होनेसे स्निग्ध, रजोगुणसम्पृक्त होनेसे कुटिल और तमसे जुष्ट होकर श्यामलताको धारण करता है। जैसे आपके केशोंमें घुँघरालापन है, वैसे ही हमारे मनमें कुटिलता है। इस प्रकार हमारा मन आपके केशोंको बन्धु समझकर उनके पास चला गया और वहाँ जाकर उनके जालमें फँस गया।’ भगवान्‌के केशोंके विषयमें ‘कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद् दृशाम्’ (श्रीमद्भा० १०।३१।१५)-में कुटिलता कही गयी है। कोई तो इन सचिक्कण काले केशोंकी काले नागोंसे उत्प्रेक्षा करते हैं—मानो श्रीकृष्णचन्द्रके अद्भुत अमृतमय, निष्कलंक पूर्णमुखचन्द्रपर अमृतके लोभसे वे काले-काले नागशिशु फैले हैं। किसी भावुकके मतसे पूर्णानुरागससारसरोवरसमुद्भूत नीलकमलपर ये मधुलम्पट आ विराजे प्रतीत होते हैं। श्रीधर स्वामीने भगवान्‌के केशावृत मुखको अलिकुलमालासंकुल परागपरिप्लुत नीलकमल माना है। फिर संशय होता है कि यह अलिकुल स्थिर क्यों है ? तो उत्तर मिलता है—मकरन्दपानसे स्तब्ध है, विभोर होनेसे गुंजार नहीं करता। ऐसा है भगवान्‌का अलकावृत मुख। इस प्रकार उन केशवके माधुर्य-लावण्य-सौन्दर्य-सम्पन्न एक-एक अंगकी बड़ी विलक्षण शोभा है। उनका

' or 'वेा'? Look at line 46: 'स्पर्शोत्स' then 'वेात्' or 'वोत्'? Wait, 'त्' is there! "ोत्" -> उत्! स्पर्श-उत्सव-उत्पुलकित: स्पर्श + उत्सव = स्पर्शोत्सव. स्पर्शोत्सव + उत्पुलकित = स्पर्शोत्सवोत्पुलकित! So it IS स्पर्शोत्सवोत्पुलकिता! Wait, but why is there a 'त्'? If it's स्पर्शोत्सव + उत्पुलकित, then: त्सव + उत् = त्सवोत् ! त् - स - व - ो - त् - प - ु = त्सवोत्पु ! YES! त्स-वो-त्-पु-ल-कि-ता ! WOW! That explains EVERYTHING! It is NOT 'वात्'! It is 'वोत्'! Because: उत्सव + उत्-पुलकित = उत्सवोत्पुलकित! And how is 'वोत्' spelled in this typeface? Wait, let's look at 'वोत्': Is it 'वोत्' or 'वेात्'? Look at the glyph: there is 'व', an 'े' on top of 'व', an 'ा', and a 'त्' attached to 'पु'! Wait, why is there an 'े' on 'व' and an 'ा' after 'व'? That is the way SOME typesetters accidentally typeset 'ो' (as 'े' +

प्रश्न करती हैं—‘सखि! किस पुण्यसे तुम्हें यह हमारे युगलसरकारका संस्पर्श मिला है?’ श्रीकृष्णानुरागरससारसागरकी विविध वीचियोंसे संस्पृष्टहृदया व्रजदेवियाँ जब अन्तर्हित प्राणप्रियके अन्वेषणमें निमग्न हैं, वृन्दावनकी प्रत्येक वस्तु उनके लिये प्रष्टव्य बनी हुई है, कल्पनाका कोश उनके सामने खुला पड़ा है, भगवती भूमिसे, उसके केशावाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवकी प्रश्न-परम्परा अभी अपूर्ण ही थी कि सहसा उसी रमणीक रमणान्वेषण-स्थलमें उन्हें मन और लोचनको कौतुक प्रदान करनेवाली एक वस्तु दिख पड़ी। वह थी किसलय-कुसुमसज्जित वन- विहार-शय्या, जो अंजन और ताम्बूलके रागसे रंजित, उपभुक्त तथा अतिप्रमृष्ट थी। उसके सुखावह दर्शनसे श्रीरासेश्वरीकी अन्तरंगा, परमप्रेष्ठा या अन्य सखी भाववती व्रजांगनाओंने श्रीराधा-कृष्णके विहारका अनुमान किया। भूमिको आत्मभावग्राहिणी समझकर परम सौभाग्यशालिनी और अपनी ही तरह परम अन्तरंगा प्राणसखी आदि भी माना। साथ ही उन्हें यह भी निश्चय हुआ कि श्रीगौरश्याम उभय तेजोविशेषके दर्शनसे यह भूमि भी कृतार्थ हो चुकी है। यह महत्त्व बिना किसी महातपोजन्य अतिपुण्यके सम्भव नहीं। अतः पूछती हैं— ‘किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि ।’ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) मनोहर केशवाले श्रीश्यामसुन्दर अथवा प्रसाधनीयकेशा श्रीरासेश्वरी—दोनोंका दर्शन, संस्पर्श, हे भूमि ! तुम्हें प्राप्त हुआ है, तुम धन्य-धन्य हो। व्रजांगनाओंकी कल्पना है कि श्रीरसिकशेखरके श्रीजीकी वेणीगूँथनके समय भूमिको पादस्पर्श होनेसे उत्पुलकितता हुई और जैसे अपनेको श्रीश्यामाश्यामके सम्मिलित दर्शनसे सीमोल्लंघी आनन्द मिलता है, वैसा ही भूमिके विषयमें भी उन्होंने समझा। ‘अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा’ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) आगे गोपांगनाएँ भूमिसे पूछती हैं कि ‘क्या यह आनन्द अंघ्रिसम्भवमात्र है अथवा उरुक्रमके विक्रमसे है ? उरुक्रमका अर्थ है— बहुत प्रकारके अथवा विशेष क्रमवाला। यहाँ ‘केलि’ अलंकार है। ये बहुत प्रकारके क्रम वेणीगूँथनके लिये पुष्पचयार्थ हैं। फूल चुननेके लिये श्रीराधामाधव दोनोंका अहमहमिकया विहरण हुआ। यदि उरुक्रम- विक्रम हुआ—‘क्रमु पादविक्षेपे, क्रमणं क्रमः।’ (‘उरुधा—बहुधा क्रम एव उरुक्रमः, स एव विक्रमो यस्य ययोर्वा तस्मात्’) क्या श्रीराधा- माधवके पुष्पचयार्थ विधि-गतिवाले विहारसे हे भूमि ! यह तुम्हें आनन्दोद्रेक-रससंचार हुआ है अथवा फूल तोड़नेके लिये दोनों चले, उनमें होड़ लगी कि ‘पहले मैं जाकर फूल तोडूंगा’ तो दूसरेने कहा— ‘नहीं, पहले मैं।’ पर फिर भी दोनोंसे पृथक् नहीं हुआ जाता, दोनों मिले चलते हैं। इससे श्रीराधा- माधवमें परस्पर संघर्ष हुआ, यह विशुद्ध आनन्दोद्रेकका जनक हुआ। हे भूमि ! क्या उसीसे यह विशेष उत्पुलक तुझे हुआ है?’ इसीको ‘वराहवपुषा’ से कहा है—‘वरेण आहवो रतिरणः। तत्पोषकः प्रागल्भ्यभावः तेन’ उक्त प्रागल्भ्य यही है कि पहिलेहीका बाहुल्य, फिर प्रागल्भ्यमें प्रतिचुम्बन होनेसे चुम्बन, आलिंगन होनेसे आलिंगन और दन्तक्षत, नखक्षत आदिका होना। क्या इन्हें देखकर यह उत्पुलक हुआ ? दूसरे, इसीसे नायकमें नायिकात्वका और नायिकामें नायकत्वका उद्रेक हुआ और इसी रूपमें वेणीगूँथन प्रस्तुत हुआ। सखि भूमि ! क्या इस अद्भुतभावके अवलोकनद्वारा लतांकुरादिव्याजसे तुम्हें यह अतिस्निग्ध रोमोद्गम हुआ है ? जरा हमें भी बतलाओ।’ यह सखी जो पूछ रही है, विपक्षी नहीं, अपितु प्रेष्ठसखीपक्षकी है। यह धरित्री इतनी सुन्दर सुस्निग्ध कैसे दीख पड़ रही है, इसपर व्रजदेवियोंका अनुमान है कि पहले तो श्रीश्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन ललितकिशोरके अंग-प्रत्यंगकी स्वाभाविक सुन्दरताके उद्गम-स्थल हैं, उनमें भी दिव्यातिदिव्य भूषणोंका यथास्थान विन्यास है, जिसमें छविकी— सौन्दर्यादिकी हिलोरें उठती हैं। फिर प्रिया-प्रियतम दोनोंके श्रीअंगोंमें सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्यादिके समुद्रकी उत्ताल तरंगोंसे अमृतमय वर्षा हो रही है। इसीसे धरित्रीमें आज यह इतना लोकोत्तर सौन्दर्य है। ‘हे

४१० भक्तिसुधा भूमि ! सचमुच तुम बड़ी सुशोभित हो रही हो, बतलाओ किस पुण्यका यह फल है ?' इस प्रकार ब्रजांगनाएँ धरित्रीका बहुत अनुनय-विनय कर रही हैं, पर वह काष्ठमौन है, कुछ भी नहीं बोलती। इसपर ब्रजांगनाएँ कल्पना करती हैं कि यह मधुर विहारका आस्वाद करके गर्वीली हो गयी है, हम वियोगिनियोंको प्राणप्यारेका पता न देगी अथवा प्रेम समाधिमें यह तल्लीन है, अतः बाह्यवृत्तिविहीन होनेसे हमारे प्रश्न नहीं सुनती, तब उत्तर ही कैसे दे ? दूसरे भाववाली ब्रजांगनाएँ कहती हैं—'बात कुछ और है। हमारी समझमें तो यह लजा गयी है। इसको तीन-तीन पतियोंका सम्बन्ध है—वामन और वाराह। अतः लज्जाजड़ होनेसे यह कुछ बोलती नहीं। इसे विप्रयोगदुःखका परिज्ञान ही नहीं। नन्द- यशोदा, गोपालोंको श्रीश्यामसुन्दरका वियोग सम्भव है, पर यह तो विप्रयोगोत्पन्ना भाववती है। हमारे वियोगको यह नहीं जान सकती। अतः सखियो ! चलो, किसी विरहिणीसे पूछें। जिसे काँटा गड़ा होता है, वही उसकी पीड़ा जानता है, वह रास्तेके काँटोंको बीनता रहता है।' ब्रजांगनाओंका वियोगिनी हरिणीसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना श्रीकृष्ण-प्रेयसी गोपांगनाओंने अपने प्रियतम प्राणधनके विषयमें वृक्ष, लता, भूमि, जो भी दृष्टिके सामने पड़ा, सबसे पूछा। भूमिसे प्रश्नोत्तर करनेके बाद ज्यों ही उन्होंने आगे कदम बढ़ाया, ऊपर दृष्टि उठायी कि सामने हरिणी दीख पड़ी। ब्रजांगनाओंको आश्वासन- सा मिला। उनकी कल्पना, जो भूमिके अनुत्तरसे उठी थी, अब हरिणीके साथ समन्वित होने लगी। व्रजवधुओंने सोचा—यह अकेली है, उसका पति हरिण उसके साथ नहीं है; अतः यह सिद्ध है कि यह वियोगिनी है, प्रिय- वियोग-वेदनासे सुपरिचित है, अवश्य ही यह हम वियोगिनियोंकी बात सुनेगी और प्यारे श्यामसुन्दरका मार्ग बतायेगी। वे उससे पूछती हैं— अप्येणपत्त्युपगतः प्रिययेह गात्रै- स्तन्वन् दृशां सखि सुनिर्वृतिमच्युतो वः । कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुमरञ्जितायाः कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।११) 'हे हरिणपतिव्रते ! क्या तुमने हमारे प्राणधन श्रीश्यामसुन्दरको देखा है ? क्या वे अपनी परमप्रेयसीके साथ इधर पधारे हैं ?' अबतक गोपांगनाओं द्वारा यह नहीं सूचित हुआ कि श्रीकृष्णभगवान्के साथ और भी कोई है। अब यहाँ यह कहा गया कि 'प्रियया उपगतः' 'अपनी प्रियाके साथ'—क्या उन श्रीकृष्णको हे हरिणि ! तुमने यहाँ कहीं देखा है ? यह प्रिया कौन है ? वही वृषभानुनन्दिनी रासेश्वरी श्रीराधा। यहींसे श्रीराधाकी चर्चा चली। पूछती हैं—'क्या श्रीराधा- कृष्ण इधर पधारे हैं?' परंतु 'श्रीमद्भागवत' में यह नाम प्रत्यक्ष रूपसे कहीं भी नहीं लिया गया, ऐसा क्यों हुआ ? इसपर श्रीजीवगोस्वामीका मत है कि श्रीशुकाचार्य परम भावुक भागवत थे, उन्होंने अपने भावको—अपनी आराध्याको—हृदयमें छिपाकर रखा, भाव छिपानेकी वस्तु है। प्रेमपन्थके पथिकोंकी आचार्या गोपिकाएँ हैं, उन्होंने यही बतलाया कि प्रेमको छिपाओ। साठी धान्य भीतर-ही-भीतर अव्यक्त रूपमें ही परिपक्व होता है। ऐसे ही इन भावुकोंका प्रेम- परिपाक है। प्रेमकी ऊँची दशा प्राप्त होनेपर भी गोपियोंने लोक-लज्जा, शास्त्रीय धर्मादिको नहीं त्यागा, योगीकी तरह अपने-आप ही वे छूट गये— 'न कर्माणि त्यजेद् योगी कर्मभिस्त्यज्यते ह्यसौ ।' इस तरह कर्मोंने ही इन्हें छोड़ा। यहाँतक कि घरका काम-काज करते-करते भूल जाती थीं। जब दही बेचने जातीं, 'दही लो' की जगह 'श्याम लो' कहती थीं, इन्हें अपनी देहतककी विस्मृति हो जाती थी। कोई गोपी गोदोहन, कोई पतिशुश्रूषण आदि जाति- धर्म, कुल-धर्म, वर्ण-धर्म आदि स्वधर्मके पालनमें लगी थीं। 'पाययन्त्यः शिशून् पयः' आदि स्थलोंमें

  • अरी सखी ! हरिणियो ! हमारे श्यामसुन्दरके अंग-संगसे सुषमा-सौन्दर्यकी धारा बहती रहती है, वे कहीं अपनी प्राणप्रियाके साथ तुम्हारे नयनोंको परमानन्दका दान करते हुए इधरसे ही तो नहीं गये हैं ? देखो, देखो, यहाँ कुलपति श्रीकृष्णकी कुन्दकलीकी मालाकी मनोहर गन्ध आ रही है, जो उनकी परम प्रेयसीके अंग-संगसे लगे हुए कुच-कुंकुमसे अनुरंजित रहती है।

श्रीरासपंचाध्यायी ४११ 'शिशून्' का अर्थ भतीजे आदि समझना चाहिये, अन्यथा पुत्रवती कान्ताके अभिसारसे रसाभास होगा। हाँ तो इस प्रकार पहले ये गोपियाँ अपने-अपने वर्णादि धर्मोंमें व्यासक्त थीं, पीछे श्रीश्यामसुन्दरके वेणु-गीतपीयूषके प्रवाहमें बह चलीं— निशम्य गीतं तदनङ्गवर्धनं व्रजस्त्रियः कृष्णगृहीतमानसाः। आजग्मुरन्योन्यमलक्षितोद्यमाः स यत्र कान्तो जवलोलकुण्डलाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।४) जैसे अयस्कान्त (चुम्बक) लौहका आकर्षण कर ले, वैसे ही अथवा उससे भी अधिक आकर्षणसे वे श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनार्थ सब कुछ छोड़कर दौड़ पड़ीं, आकर्षणशील श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दके द्वारा वे आकृष्ट हुईं, यह आकर्षणका महत्त्व है अथवा वेणुगीतपीयूष-प्रवाहमें उनका मन बह चला, जैसे भाद्रपदमासके गंगाप्रवाहमें नाव बह चले, मल्लाह रोकना भी चाहे पर रुके नहीं, वैसे ही वे वेणुगीतप्रवाहमें बह चलीं। उनके मनमें एक वेगवान् प्रेमका ही प्रभाव था, उसमें वर्णधर्मके सेतुबन्ध या बन्धन लगे थे, परंतु जब वेणुगीतपीयूषका महाप्रवाह कर्णकुहरोंद्वारा उनके अन्तरमें प्रविष्ट हुआ, तब उससे वे बाँध तोड़-फोड़ डाले गये, उसमें उनकी वह देहकी नाव बह चली, मन-मल्लाह उसे न रोक सका और किनारेके लोग 'रोको-रोको' की पुकार करते ही रह गये। हठात् यह कार्य हो गया। अनंगका उक्त पद्यमें अंगी अर्थात् श्रृंगार अर्थ है, श्रृंगार अंगी रस है, बाकी आठ अंग रस। कविजन शुद्ध शृंगाररसमें परोढाको महत्त्व नहीं देते, परंतु यह कृष्ण-कथातिरिक्त स्थलकी बात है— 'नेष्टा यदङ्गिनि रसे कविभिः परोढा तद् गोकुलाम्बुजदृशां कुलमन्तरेण।' इस तरह अंगी रस बढ़ा और उसके वेगमें गोपीजनोंके देहकी नौका भी बह चली, मन या बुद्धिरूप मल्लाह भी उसीमें कूद पड़ा। गोपांगनाएँ अपने इस आचरणसे शिक्षा देती हैं कि 'अपनी बन पड़ते वर्णधर्म, आश्रमधर्म, कुलधर्म, जातिधर्म आदिको कदापि न छोड़ो, सन्ध्योपासनादि नित्यनैमित्तिक कर्मोंका बराबर सम्पादन करते रहो। हमें विश्वप्रपंचका स्मरण नहीं, पर फिर भी पतिशुश्रूषा आदिमें लगी हुई हैं।' आज तो ऐसा नहीं होता, पर यह ठीक नहीं। यदि वे त्रिलोकीपति पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम श्रीश्यामसुन्दर ही अपूर्व अनुग्रह- द्वारा अपने प्रेमपीयूष-प्रवाहमें बहा ले चलें तो बात अलग है, अन्यथा भगवत्प्रेमको हृदयमें सर्वथा गुप्त रखकर वैध कृत्योंमें निरन्तर लगे रहना चाहिये, विशिष्ट स्थिति उत्पन्न होनेपर वे स्वयं छूटेंगे। 'पाययन्त्यः' आदिमें 'लक्षणहेत्वोः क्रियायाः' इससे हेत्वर्थमें 'शतृ' प्रत्यय है। यहाँ पतिशुश्रूषण हेतु है। गोपांगनाओंका पतिशुश्रूषण उपलक्षण है। पतिशुश्रूषणरूप कारणने 'श्रीकृष्ण-प्रेम-प्रवाहमें बहने रूप कार्यको पुरतः स्थापित किया। 'यतः पतीन् शुश्रूषन्त्यः अतः श्रीकृष्णं परमात्मानं ययुः।' क्योंकि वे गार्हस्थ्यधर्म, स्वजात्यादि-धर्मका पालन करती रहीं, अतः उनका फल देनेके लिये श्रीकृष्णचन्द्र परमात्माने उन्हें अपनी ओर खींचा। हम भी यदि ऐसा ही करें तो हमें भी बुलायेंगे। यदि चाहते हो कि भगवान् कृष्णका हमपर भी वैसा ही अनुग्रह हो तो वैसा ही करें, जैसा व्रजांगनाएँ करती थीं, स्वधर्ममें लगी थीं। 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥' (गीता १८।४६) स्व-स्वकर्म-सम्पादनसे ही ऊँची-से-ऊँची सिद्धि प्राप्त होती है। गोपांगनाएँ प्रेम मार्गकी आचार्य हैं।' आचार्यकी परिभाषा है— आचिनोति च शास्त्रार्थमाचारे स्थापयत्यपि। स्वयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन उच्यते ॥ केवल ग्रन्थ घोटकर आचार्य नहीं बनना है, दूसरोंको उपदेश देनेमात्रके लिये आचार्य नहीं बनना है। इस प्रकार जो एक योगीकी स्थिति हो सकती है, वही उन व्रजदेवियोंकी हुई— तं काचिनेत्ररन्ध्रेण हृदिकृत्य निमील्य च। पुलकाङ्ग्युपगुह्यास्ते योगीवानन्दसम्प्लुता ॥ बाहर बहुत विघ्न हैं, अतः एक गोपी उन परमप्रेष्ठको हृदयमें पधराकर, नेत्रद्वार बन्द करके, जिसमें वे भाग न जायें, परिरम्भणसौख्यका अनुभव

करती है। उस लोकोत्तर आनन्दसे रोमांच हुआ, वह रोमांच नहीं, अपितु पहरेदार खड़े कर दिये गये हैं— श्यामसुन्दर कहीं—हृदयमन्दिरसे नेत्रादि द्वारों, रोम- रन्ध्रोंसे भाग न निकलें। फिर भी उसे विश्वास नहीं हुआ, श्रीश्यामसुन्दरकी अटपटी चालोंको वह खूब जानती थी, अतः उन्हें खूब छिपाकर आनन्दसिन्धुमें गोता लगा गयी। गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है—'लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥' (रा०च०मा० १।२३२।७) यों गोपीजनकी उपमा योगीसे दी गयी। कर्मोंने उन्हें स्वयं छोड़ा, वे तो बराबर स्वकर्म-सम्पादनमें लगी रहीं। गोपांगनाओंका सर्वातिशय माहात्म्य एक बड़े मार्केकी बात है, गोपीजनकी इतनी महिमा क्यों है? उन्हें सबसे अधिक महत्त्व क्यों दिया जाता है? श्रीनारद, श्रीलक्ष्मी, श्रीरुक्मिणी आदिका कितना गौरव है, भगवान्‌की उनपर कितनी अनुकम्पा है, कितना प्रेम है, परंतु ब्रह्मा उनके विषयमें कुछ न कहकर इनका महत्त्व-प्रतिपादन करते हैं। ब्रह्मा व्रजके कीट-पतंग बननेमें अपना अहोभाग्य समझते हैं— तदस्तु मे नाथ स भूरिभागो भवेऽत्र वान्यत्र तु वा तिरश्चाम्। येनाहमेकोऽपि भवज्जनानां भूत्वा निषेवे तव पादपल्लवम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३०) इतना ही नहीं, ब्रह्मा व्रजमें, वृन्दाटवीमें कीट- पतंग, लता-पत्र कुछ भी बननेको तैयार हैं। उन व्रजवासियोंकी, जिनका जीवनसर्वस्व वे मुकुन्द हैं, जिनकी पाद-धूलिको श्रुतियाँ आजतक ढूँढ़ रही हैं, पाद-धूलिसे स्नान करनेमें वे अपनी महाभाग्यता समझते हैं— तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम्। यज्जीवितं तु निखिलं भगवान् मुकुन्द- स्त्वद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३४) ब्रह्माका भाव यह है कि यदि वहाँ उत्पन्न होंगे तो गोकुलवासियोंकी पाद-धूलिसे पवित्र हो जायेंगे, पर उद्धव तो इनसे भी आगे बढ़ गये, वे तो उन गोपीजनोंकी पाद-धूलिको सेवन करनेके लिये वृन्दावनके तरु, गुल्म, लता, कुछ भी बनना चाहते हैं; क्योंकि उन व्रजदेवियोंने दुस्त्यज आर्यपथ और स्वजनोंको त्यागकर श्रीमुकुन्दकी पदवीका सेवन किया था— आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्। या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।६१) उन प्रेमपथिकोंकी आचार्या व्रजदेवियोंकी पाद-धूलिके स्पर्शसे अपनी कृतकृत्यता मानते हैं और भी— निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्। अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभिः॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।१६) जब भगवान् शान्त मुनियोंकी पदरेणुसे पवित्र होनेकी आकांक्षा रखते हैं, तब उनके ज्ञानी भक्त उद्धव व्रजबालाओंकी पाद-धूलिकी लता-गुल्म बनकर सेवन करनेकी आकांक्षा करें, यह कैसी बात? परंतु उद्धव उनके—'या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा' पर मन्त्रमुग्ध हैं। उन गोपबालाओंने लोक-परलोकको तिलांजलि देकर अपने प्रियतम प्राणधन श्रीश्यामसुन्दरपर समस्त विश्वको, विश्वके सौख्यको वार डाला; राई- नोन करके फेंक दिया। उनकी यह परमप्रीति उद्धवकी प्रमुग्धता और आश्चर्यका कारण है। आज भी आर्यधर्मको कितनी ही स्त्रियाँ छोड़ रही हैं, स्वजनोंको भी छोड़ ही बैठी हैं, पर क्या मुकुन्द मिले? यहाँ व्रजांगनाओंके लिये आर्य-धर्म और स्वजनोंका त्याग 'दुस्त्यज' बतलाया है। परंतु आजकी स्त्रियोंके लिये तो जो कि शिक्षिता हैं, वह सुत्यज ही है। जिन्होंने आर्य-धर्मसे सम्बन्ध ही नहीं जोड़ा, वे छोड़ेंगे क्या? वैसे तो दुर्व्यसन दुस्त्यज होता है। जैसे किसीको परपुरुष प्रेम हो,

श्रीरासपञ्चाध्यायी ४१३ उसे माता-पिता सब मना करें, रोगादि, नरकादिकी भीति भी हो, कलंक भी लगे, पर वह छूटता नहीं। यह है दुस्त्यज दुर्व्यसन। इसी प्रकार कुलीनोंके लिये आर्य-धर्म दुस्त्यज होता है। व्रजांगनाओंके लिये यह आर्यधर्म दुस्त्यज था, ऐसी स्थितिमें क्या उन्हें दुर्व्यसनी कहा जा सकता है? यह तो काँटेसे काँटेको निकालनेकी तरह पाशविक उच्छृंखल चेष्टाओंको मिटाना था, शास्त्रीय धर्मके सद्व्यसनसे यह मिटाया जाता है। जिन्हें यह बात हो गयी, वे दुर्व्यसनकी ओर कैसे जायँ? अब तो वे श्रीकृष्ण परमात्माको ही भजेंगी। प्राकृत कुलटा ही आर्यधर्मको छोड़कर लोकके किसी हीन-दीन, मूत्र-पुरीष- भाण्डागारको ही भज सकती हैं। गोपांगनाओंको तो वह घरमें ही प्राप्त था, परंतु वे तो उस अपरको छोड़कर परपुरुष, पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको भजने लगीं। स्व-स्वपतियोंका सेवन उनके लिये शालग्राममें विष्णुबुद्ध्या था, यही कारण था कि उद्धव-जैसे भक्त इनकी चरण-धूलि चाहते थे। इनकी योगीजनदुरवाप परम सद्गति हुई। क्या आर्यधर्म- त्यागिनी कुलटाओंके लिये यह कदापि सम्भव हो सकता है? उनमें-इनमें महान् अन्तर है। इस तरह सुदुस्त्यज आर्यपथ और स्वजनको त्यागकर गोपांगनाओंने मुकुन्द-पदवीका सेवन किया, उन्हें महान् कष्ट हुआ। वेदोक्त-शास्त्रोक्त, सद्धर्म, सत्कर्मको त्यागनेमें अनन्तानन्त सन्ताप सत्कुलीनको ही होगा, पर अन्तमें भगवत्सम्बन्धसे वह उतना ही सुखमय भी होता है। यही इन ब्रजदेवियोंकी विशेषता और महिमा है। श्रीजीवगोस्वामी, श्रीरूपगोस्वामी- प्रभृति भावुकोंने उनके स्वकीयत्व, परकीयत्वपर यही विचार किया है कि वे यदि स्वकीया होतीं तो आर्य-धर्मके त्यागका प्रश्न ही नहीं आता। 'दुरापजनवर्त्तिनी रतिरपत्रपा भूयसी'-की वहाँ भावना ही नहीं, प्रसंग ही नहीं। श्रीरुक्मिणी, सत्यभामा आदिको श्रीकृष्ण दुरवाप कब हुए? यह तो व्रजांगनाजन आदिकी ही दशा रही, रंकको निधिकी तरह उन्हें ही श्रीश्यामसुन्दर दुष्प्राप रहे और जँचे। पारावारविहीन लज्जा, गुरूक्तिविषवर्षण, श्रीश्यामसुन्दरके दर्शन भी लुक-छिपकर करना, सास-ससुरका प्रतिबन्ध, कलंक- कालिमाका भय, यह सब रुक्मिणी आदिको कहाँ? भगवत्प्राप्तिके निमित्त इन दुस्त्यजोंके त्यागका साहस तो ब्रजदेवियोंको ही करना पड़ा- माधवो यदि विहन्ति हन्यताम् साधवो यदि हसन्ति हस्यताम्। बान्धवो यदि जहाति त्यज्यताम् माधवः स्वयमुरीकृतो मया॥ और भी- जीवितं सखि पणीकृतं मया किं गुरोश्च सुहृदश्च मे भयम्। अतएव श्रीजीवगोस्वामीने कहा है कि उद्धव- जैसे इनकी सुदुस्त्यजताको ही हेतु देते हैं, अतएव इनके त्यागमें ही महिमा है। कुलटाके आर्यधर्म- त्यागमें कोई महिमा नहीं। इस अपने चरितसे गोपांगनाओंने स्पष्ट ही उपदेश दिया कि पहले धर्मको दुस्त्यज बनाओ, फिर श्रीश्यामसुन्दर मनमोहनविषयिणी उत्कट उत्कण्ठासे उसे त्यागो, नहीं-नहीं, वह स्वयं ही छूट जायगा। उस प्रेमको भी गुप्त रखनेका प्रयत्न करो। अतएव श्रीशुक भी उनके प्रणयको सुगुप्त रखनेका प्रयत्न करते हैं। वे सोचते हैं-हमसे कर्मतत्त्व, उपासनातत्त्व आदिका ही प्रतिपादन करते हुए भी कुछ प्रेमपक्षपात व्यक्त हो गया, भक्तोंमें वह झलका, भगवदवतारोंमें, श्रीकृष्णमें, वह अधिक व्यक्त हो गया, वह केवल श्रीराधाके सम्बन्धमें ही व्यक्त होनेसे बचा है, अतः अब हम उसे सर्वथा छिपायेंगे। परंतु फिर भी 'ज्ञानखले यथा सरस्वती' के भयसे उसे 'कदाचित्' आदि गुप्त रीतिसे व्यक्त करेंगे, सुस्पष्ट नहीं करेंगे। 'कदाचित्' का अर्थ है-क्षण- क्षणमें सौख्यवृद्धि। अतएव प्रस्तुत 'अप्येणपत्नि' पद्यमें 'प्रियया' मात्रसे श्रीराधा-कृष्णके सुगुप्त प्रणयका संकेत किया, स्पष्टतः नहीं। वेदोंमें १३ काण्डके 'शतपथ' में १६ हजार कण्डिकाद्वारा उपासना, ४ हजारद्वारा ज्ञान और शेष सबसे कर्मकाण्डका प्रतिपादन हुआ है। ४० अध्यायकी शुक्लयजुःसंहिताके ३९ अध्यायोंमें कर्मकाण्डका प्रतिपादन और केवल अन्तिम १ अध्यायमें ज्ञानका प्रतिपादन है, जो 'ईशावास्योपनिषद्' के नामसे

४१४ | भक्तिसुधा

प्रसिद्ध है। तात्पर्य यह कि गूढ़तत्त्व थोड़ेमें छिपाकर कहा जाता है—'परोक्षप्रिया ह वै देवाः।' 'इदं सर्वं दृष्टवान्' इस व्युत्पत्ति-सम्पन्न 'इन्द्र' को इन्द्र कहा, क्योंकि सब जान न लें। परम धन राधानाम अधार। जाहि पिया वंशी में गावत सुमिरत बारंबार। तातें शुक प्रकट नहिं कीनो 'जानि सार को सार'। श्रीशुकजीने द्वादशस्कन्धात्मक वाङ्मय भगवद्रूप भागवतमें दशम स्कन्धको हृदयरूप बतलाया है, उसमें रासपञ्चाध्यायी पंचप्राणात्मक है। इसमें भी उस तत्त्वको गुप्त करके केवल 'प्रिया' शब्दसे कहा। जहाँ नहीं ही रहा गया, वहाँ 'अनयाराधितो नूनम्' से संश्लिष्ट करके कहा। अपने लोकोत्तर प्रेमसे श्रीकृष्ण परमात्माको जिसने वशीकृत किया है, वह स्वाधीनभर्तृका श्रीराधा हैं। वस्तुतस्तु 'तस्माज्ज्योतिरभूद् द्वेधा राधामाधवरूपकम्' के गुप्त रहस्यको गुप्त रीतिसे यहाँ श्रीशुकने कहा है, जिसका स्वरूप वेदोंमें भी अत्यन्त गुप्त है। इस प्रकार श्रीकृष्णान्वेषणकातरा व्रजांगनाओंने प्रियाके साथ श्रीश्यामसुन्दर भगवान्‌का हरिणीसे पता पूछा। धरित्रीके प्रति वे उदासीन हो गयीं, उसे उन्होंने महामदान्ध समझा। इसका कारण स्पष्ट ही था कि वह उनके प्रिय श्रीश्यामसुन्दरके अंकुश, कमल, ध्वजा, वज्रादि चिह्नोंसे अलंकृत चरण तथा श्रीप्रियाजीके चरण-संस्पर्शसे भी विचित्रितांगी हो रही थीं। यह उन्मदान्ध हमारी वेदनाको क्या जानेगी, यही सब सोचकर व्रजांगनाओंने उससे अधिक बात नहीं की। दूसरी बात यह कि उससे अधिक महत्त्व उन्हें हरिणीमें दीख पड़ा; क्योंकि वह अकेली वियोगिनी वियोग दुःखको जाननेवाली थी। इसीलिये उसकी प्रशंसा करती हैं—'एणपत्नी' ('पत्युर्नो यज्ञसंयोगे' यज्ञस्य फलभोक्त्रीत्यर्थः) अर्थात् हे हरिणसति! तुम याज्ञिककी पत्नी हो। बड़े-बड़े याज्ञिक कर्मकलाप हरिणी और हरिणका रूप धरकर वृन्दावनमें रासेश्वरीके नित्यविहारका दर्शन करने आये हैं। अतः हे यज्ञसम्बन्धी पत्नि! तुम बड़ी पवित्र हो, हमें मनमोहन श्यामसुन्दरका पता बतलाओ। दूसरे, तुम्हारा यह सौभाग्य है कि श्रीकृष्णचन्द्र मुरलीमनोहर स्वयं तुम्हारे पास आये हैं और तीसरी विशेषता यह है कि तुम वृन्दावनकी हरिणी हो। इससे बढ़कर और क्या पुण्य होगा? फिर सखि, वे प्यारे नन्दलाल भी अकेले नहीं आये, किंतु अपनी प्रेयसीरत्नचूड़ामणि श्रीव्रजेश्वरीके साथ आये हैं। अतः तुमने प्रिया-प्रियतमका दर्शन अवश्य पाया है। विशेषकर उन यशोदानन्दनका तुमसे बड़ा अनुराग है; क्योंकि तुम्हारे नेत्र उनकी प्रियाजीके जैसे हैं और तुम्हारे इन नेत्रोंको देखकर श्रीश्यामसुन्दर विभोर हो जाते हैं। तुम भी उन श्रीकृष्णचन्द्र आनन्द- कन्दके मुख-सौन्दर्य-दर्शनकी प्रेमी हो, इन विशाल नेत्रोंसे उन घनश्यामके मुखमाधुर्यामृत, सौन्दर्यामृतका पान न हो तो ये व्यर्थ हैं। ये हरिणियाँ बड़ी भाग्यशालिनी हैं— क्वणितवेणुरववञ्चितचित्ताः कृष्णमन्वसत कृष्णगृहिण्यः। गुणगणार्णमनुगत्य हरिण्यो गोपिका इव विमुक्तगृहाशाः॥ (श्रीमद्भा० १०।३५।१९) श्रीमुरलीमनोहरके मुखपर विराजमान वंशीके क्वणनसे जो श्रीप्रियाजीकी नूपुरध्वनिके सदृश है, इन हरिणांगनाओंका चित्त हरा गया। श्रीकृष्णके वेणुनिनादसे वे आकृष्ट और आसक्त हो गयीं। गुणोंके समुद्र उन श्यामसुन्दरके समीप पहुँच गयीं और कुटुम्बकी आशा छोड़कर, भोजनादिकी चिन्तासे मुक्त होकर या लोकव्यवहारको भुलाकर उन्होंने गोपांगनाओंका अनुसरण किया। कृष्णप्रेमप्रमत्त ये एणपत्नियां उत्कृष्ट कोटिकी हैं, ऐसा समझकर व्रजांगना उनसे पूछती हैं— ‘देवियो! क्या तुमने हमारे प्राणाधारको इधर कहीं देखा है?' हरिणी स्वभावतः कुछ आगे जा रही हैं, परंतु गोपांगना समझती हैं कि इन्होंने हमारी प्रार्थनाको सुन लिया और अभी श्रीश्यामसुन्दर जहाँ विराज रहे हैं, वहाँ पहुँचानेके लिये, वहाँका पता देनेके लिये ये आगे-आगे जा रही हैं। मानो ये कह रही हैं कि 'आओ, हम तुम्हें श्रीश्यामाश्यामका पता दें, पता क्या दें, तुम हमारे पीछे-पीछे चली आओ, हम तुम्हें उनसे मिला ही दें' और ये फिर-फिर ग्रीवा मोड़कर मानो