भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासपञ्चाध्यायी ४१३ उसे माता-पिता सब मना करें, रोगादि, नरकादिकी भीति भी हो, कलंक भी लगे, पर वह छूटता नहीं। यह है दुस्त्यज दुर्व्यसन। इसी प्रकार कुलीनोंके लिये आर्य-धर्म दुस्त्यज होता है। व्रजांगनाओंके लिये यह आर्यधर्म दुस्त्यज था, ऐसी स्थितिमें क्या उन्हें दुर्व्यसनी कहा जा सकता है? यह तो काँटेसे काँटेको निकालनेकी तरह पाशविक उच्छृंखल चेष्टाओंको मिटाना था, शास्त्रीय धर्मके सद्व्यसनसे यह मिटाया जाता है। जिन्हें यह बात हो गयी, वे दुर्व्यसनकी ओर कैसे जायँ? अब तो वे श्रीकृष्ण परमात्माको ही भजेंगी। प्राकृत कुलटा ही आर्यधर्मको छोड़कर लोकके किसी हीन-दीन, मूत्र-पुरीष- भाण्डागारको ही भज सकती हैं। गोपांगनाओंको तो वह घरमें ही प्राप्त था, परंतु वे तो उस अपरको छोड़कर परपुरुष, पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको भजने लगीं। स्व-स्वपतियोंका सेवन उनके लिये शालग्राममें विष्णुबुद्ध्या था, यही कारण था कि उद्धव-जैसे भक्त इनकी चरण-धूलि चाहते थे। इनकी योगीजनदुरवाप परम सद्गति हुई। क्या आर्यधर्म- त्यागिनी कुलटाओंके लिये यह कदापि सम्भव हो सकता है? उनमें-इनमें महान् अन्तर है। इस तरह सुदुस्त्यज आर्यपथ और स्वजनको त्यागकर गोपांगनाओंने मुकुन्द-पदवीका सेवन किया, उन्हें महान् कष्ट हुआ। वेदोक्त-शास्त्रोक्त, सद्धर्म, सत्कर्मको त्यागनेमें अनन्तानन्त सन्ताप सत्कुलीनको ही होगा, पर अन्तमें भगवत्सम्बन्धसे वह उतना ही सुखमय भी होता है। यही इन ब्रजदेवियोंकी विशेषता और महिमा है। श्रीजीवगोस्वामी, श्रीरूपगोस्वामी- प्रभृति भावुकोंने उनके स्वकीयत्व, परकीयत्वपर यही विचार किया है कि वे यदि स्वकीया होतीं तो आर्य-धर्मके त्यागका प्रश्न ही नहीं आता। 'दुरापजनवर्त्तिनी रतिरपत्रपा भूयसी'-की वहाँ भावना ही नहीं, प्रसंग ही नहीं। श्रीरुक्मिणी, सत्यभामा आदिको श्रीकृष्ण दुरवाप कब हुए? यह तो व्रजांगनाजन आदिकी ही दशा रही, रंकको निधिकी तरह उन्हें ही श्रीश्यामसुन्दर दुष्प्राप रहे और जँचे। पारावारविहीन लज्जा, गुरूक्तिविषवर्षण, श्रीश्यामसुन्दरके दर्शन भी लुक-छिपकर करना, सास-ससुरका प्रतिबन्ध, कलंक- कालिमाका भय, यह सब रुक्मिणी आदिको कहाँ? भगवत्प्राप्तिके निमित्त इन दुस्त्यजोंके त्यागका साहस तो ब्रजदेवियोंको ही करना पड़ा- माधवो यदि विहन्ति हन्यताम् साधवो यदि हसन्ति हस्यताम्। बान्धवो यदि जहाति त्यज्यताम् माधवः स्वयमुरीकृतो मया॥ और भी- जीवितं सखि पणीकृतं मया किं गुरोश्च सुहृदश्च मे भयम्। अतएव श्रीजीवगोस्वामीने कहा है कि उद्धव- जैसे इनकी सुदुस्त्यजताको ही हेतु देते हैं, अतएव इनके त्यागमें ही महिमा है। कुलटाके आर्यधर्म- त्यागमें कोई महिमा नहीं। इस अपने चरितसे गोपांगनाओंने स्पष्ट ही उपदेश दिया कि पहले धर्मको दुस्त्यज बनाओ, फिर श्रीश्यामसुन्दर मनमोहनविषयिणी उत्कट उत्कण्ठासे उसे त्यागो, नहीं-नहीं, वह स्वयं ही छूट जायगा। उस प्रेमको भी गुप्त रखनेका प्रयत्न करो। अतएव श्रीशुक भी उनके प्रणयको सुगुप्त रखनेका प्रयत्न करते हैं। वे सोचते हैं-हमसे कर्मतत्त्व, उपासनातत्त्व आदिका ही प्रतिपादन करते हुए भी कुछ प्रेमपक्षपात व्यक्त हो गया, भक्तोंमें वह झलका, भगवदवतारोंमें, श्रीकृष्णमें, वह अधिक व्यक्त हो गया, वह केवल श्रीराधाके सम्बन्धमें ही व्यक्त होनेसे बचा है, अतः अब हम उसे सर्वथा छिपायेंगे। परंतु फिर भी 'ज्ञानखले यथा सरस्वती' के भयसे उसे 'कदाचित्' आदि गुप्त रीतिसे व्यक्त करेंगे, सुस्पष्ट नहीं करेंगे। 'कदाचित्' का अर्थ है-क्षण- क्षणमें सौख्यवृद्धि। अतएव प्रस्तुत 'अप्येणपत्नि' पद्यमें 'प्रियया' मात्रसे श्रीराधा-कृष्णके सुगुप्त प्रणयका संकेत किया, स्पष्टतः नहीं। वेदोंमें १३ काण्डके 'शतपथ' में १६ हजार कण्डिकाद्वारा उपासना, ४ हजारद्वारा ज्ञान और शेष सबसे कर्मकाण्डका प्रतिपादन हुआ है। ४० अध्यायकी शुक्लयजुःसंहिताके ३९ अध्यायोंमें कर्मकाण्डका प्रतिपादन और केवल अन्तिम १ अध्यायमें ज्ञानका प्रतिपादन है, जो 'ईशावास्योपनिषद्' के नामसे