भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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करती है। उस लोकोत्तर आनन्दसे रोमांच हुआ, वह रोमांच नहीं, अपितु पहरेदार खड़े कर दिये गये हैं— श्यामसुन्दर कहीं—हृदयमन्दिरसे नेत्रादि द्वारों, रोम- रन्ध्रोंसे भाग न निकलें। फिर भी उसे विश्वास नहीं हुआ, श्रीश्यामसुन्दरकी अटपटी चालोंको वह खूब जानती थी, अतः उन्हें खूब छिपाकर आनन्दसिन्धुमें गोता लगा गयी। गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है—'लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥' (रा०च०मा० १।२३२।७) यों गोपीजनकी उपमा योगीसे दी गयी। कर्मोंने उन्हें स्वयं छोड़ा, वे तो बराबर स्वकर्म-सम्पादनमें लगी रहीं। गोपांगनाओंका सर्वातिशय माहात्म्य एक बड़े मार्केकी बात है, गोपीजनकी इतनी महिमा क्यों है? उन्हें सबसे अधिक महत्त्व क्यों दिया जाता है? श्रीनारद, श्रीलक्ष्मी, श्रीरुक्मिणी आदिका कितना गौरव है, भगवान्‌की उनपर कितनी अनुकम्पा है, कितना प्रेम है, परंतु ब्रह्मा उनके विषयमें कुछ न कहकर इनका महत्त्व-प्रतिपादन करते हैं। ब्रह्मा व्रजके कीट-पतंग बननेमें अपना अहोभाग्य समझते हैं— तदस्तु मे नाथ स भूरिभागो भवेऽत्र वान्यत्र तु वा तिरश्चाम्। येनाहमेकोऽपि भवज्जनानां भूत्वा निषेवे तव पादपल्लवम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३०) इतना ही नहीं, ब्रह्मा व्रजमें, वृन्दाटवीमें कीट- पतंग, लता-पत्र कुछ भी बननेको तैयार हैं। उन व्रजवासियोंकी, जिनका जीवनसर्वस्व वे मुकुन्द हैं, जिनकी पाद-धूलिको श्रुतियाँ आजतक ढूँढ़ रही हैं, पाद-धूलिसे स्नान करनेमें वे अपनी महाभाग्यता समझते हैं— तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम्। यज्जीवितं तु निखिलं भगवान् मुकुन्द- स्त्वद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३४) ब्रह्माका भाव यह है कि यदि वहाँ उत्पन्न होंगे तो गोकुलवासियोंकी पाद-धूलिसे पवित्र हो जायेंगे, पर उद्धव तो इनसे भी आगे बढ़ गये, वे तो उन गोपीजनोंकी पाद-धूलिको सेवन करनेके लिये वृन्दावनके तरु, गुल्म, लता, कुछ भी बनना चाहते हैं; क्योंकि उन व्रजदेवियोंने दुस्त्यज आर्यपथ और स्वजनोंको त्यागकर श्रीमुकुन्दकी पदवीका सेवन किया था— आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्। या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।६१) उन प्रेमपथिकोंकी आचार्या व्रजदेवियोंकी पाद-धूलिके स्पर्शसे अपनी कृतकृत्यता मानते हैं और भी— निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्। अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभिः॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।१६) जब भगवान् शान्त मुनियोंकी पदरेणुसे पवित्र होनेकी आकांक्षा रखते हैं, तब उनके ज्ञानी भक्त उद्धव व्रजबालाओंकी पाद-धूलिकी लता-गुल्म बनकर सेवन करनेकी आकांक्षा करें, यह कैसी बात? परंतु उद्धव उनके—'या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा' पर मन्त्रमुग्ध हैं। उन गोपबालाओंने लोक-परलोकको तिलांजलि देकर अपने प्रियतम प्राणधन श्रीश्यामसुन्दरपर समस्त विश्वको, विश्वके सौख्यको वार डाला; राई- नोन करके फेंक दिया। उनकी यह परमप्रीति उद्धवकी प्रमुग्धता और आश्चर्यका कारण है। आज भी आर्यधर्मको कितनी ही स्त्रियाँ छोड़ रही हैं, स्वजनोंको भी छोड़ ही बैठी हैं, पर क्या मुकुन्द मिले? यहाँ व्रजांगनाओंके लिये आर्य-धर्म और स्वजनोंका त्याग 'दुस्त्यज' बतलाया है। परंतु आजकी स्त्रियोंके लिये तो जो कि शिक्षिता हैं, वह सुत्यज ही है। जिन्होंने आर्य-धर्मसे सम्बन्ध ही नहीं जोड़ा, वे छोड़ेंगे क्या? वैसे तो दुर्व्यसन दुस्त्यज होता है। जैसे किसीको परपुरुष प्रेम हो,