भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासपंचाध्यायी ४११ 'शिशून्' का अर्थ भतीजे आदि समझना चाहिये, अन्यथा पुत्रवती कान्ताके अभिसारसे रसाभास होगा। हाँ तो इस प्रकार पहले ये गोपियाँ अपने-अपने वर्णादि धर्मोंमें व्यासक्त थीं, पीछे श्रीश्यामसुन्दरके वेणु-गीतपीयूषके प्रवाहमें बह चलीं— निशम्य गीतं तदनङ्गवर्धनं व्रजस्त्रियः कृष्णगृहीतमानसाः। आजग्मुरन्योन्यमलक्षितोद्यमाः स यत्र कान्तो जवलोलकुण्डलाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।४) जैसे अयस्कान्त (चुम्बक) लौहका आकर्षण कर ले, वैसे ही अथवा उससे भी अधिक आकर्षणसे वे श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनार्थ सब कुछ छोड़कर दौड़ पड़ीं, आकर्षणशील श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दके द्वारा वे आकृष्ट हुईं, यह आकर्षणका महत्त्व है अथवा वेणुगीतपीयूष-प्रवाहमें उनका मन बह चला, जैसे भाद्रपदमासके गंगाप्रवाहमें नाव बह चले, मल्लाह रोकना भी चाहे पर रुके नहीं, वैसे ही वे वेणुगीतप्रवाहमें बह चलीं। उनके मनमें एक वेगवान् प्रेमका ही प्रभाव था, उसमें वर्णधर्मके सेतुबन्ध या बन्धन लगे थे, परंतु जब वेणुगीतपीयूषका महाप्रवाह कर्णकुहरोंद्वारा उनके अन्तरमें प्रविष्ट हुआ, तब उससे वे बाँध तोड़-फोड़ डाले गये, उसमें उनकी वह देहकी नाव बह चली, मन-मल्लाह उसे न रोक सका और किनारेके लोग 'रोको-रोको' की पुकार करते ही रह गये। हठात् यह कार्य हो गया। अनंगका उक्त पद्यमें अंगी अर्थात् श्रृंगार अर्थ है, श्रृंगार अंगी रस है, बाकी आठ अंग रस। कविजन शुद्ध शृंगाररसमें परोढाको महत्त्व नहीं देते, परंतु यह कृष्ण-कथातिरिक्त स्थलकी बात है— 'नेष्टा यदङ्गिनि रसे कविभिः परोढा तद् गोकुलाम्बुजदृशां कुलमन्तरेण।' इस तरह अंगी रस बढ़ा और उसके वेगमें गोपीजनोंके देहकी नौका भी बह चली, मन या बुद्धिरूप मल्लाह भी उसीमें कूद पड़ा। गोपांगनाएँ अपने इस आचरणसे शिक्षा देती हैं कि 'अपनी बन पड़ते वर्णधर्म, आश्रमधर्म, कुलधर्म, जातिधर्म आदिको कदापि न छोड़ो, सन्ध्योपासनादि नित्यनैमित्तिक कर्मोंका बराबर सम्पादन करते रहो। हमें विश्वप्रपंचका स्मरण नहीं, पर फिर भी पतिशुश्रूषा आदिमें लगी हुई हैं।' आज तो ऐसा नहीं होता, पर यह ठीक नहीं। यदि वे त्रिलोकीपति पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम श्रीश्यामसुन्दर ही अपूर्व अनुग्रह- द्वारा अपने प्रेमपीयूष-प्रवाहमें बहा ले चलें तो बात अलग है, अन्यथा भगवत्प्रेमको हृदयमें सर्वथा गुप्त रखकर वैध कृत्योंमें निरन्तर लगे रहना चाहिये, विशिष्ट स्थिति उत्पन्न होनेपर वे स्वयं छूटेंगे। 'पाययन्त्यः' आदिमें 'लक्षणहेत्वोः क्रियायाः' इससे हेत्वर्थमें 'शतृ' प्रत्यय है। यहाँ पतिशुश्रूषण हेतु है। गोपांगनाओंका पतिशुश्रूषण उपलक्षण है। पतिशुश्रूषणरूप कारणने 'श्रीकृष्ण-प्रेम-प्रवाहमें बहने रूप कार्यको पुरतः स्थापित किया। 'यतः पतीन् शुश्रूषन्त्यः अतः श्रीकृष्णं परमात्मानं ययुः।' क्योंकि वे गार्हस्थ्यधर्म, स्वजात्यादि-धर्मका पालन करती रहीं, अतः उनका फल देनेके लिये श्रीकृष्णचन्द्र परमात्माने उन्हें अपनी ओर खींचा। हम भी यदि ऐसा ही करें तो हमें भी बुलायेंगे। यदि चाहते हो कि भगवान् कृष्णका हमपर भी वैसा ही अनुग्रह हो तो वैसा ही करें, जैसा व्रजांगनाएँ करती थीं, स्वधर्ममें लगी थीं। 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥' (गीता १८।४६) स्व-स्वकर्म-सम्पादनसे ही ऊँची-से-ऊँची सिद्धि प्राप्त होती है। गोपांगनाएँ प्रेम मार्गकी आचार्य हैं।' आचार्यकी परिभाषा है— आचिनोति च शास्त्रार्थमाचारे स्थापयत्यपि। स्वयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन उच्यते ॥ केवल ग्रन्थ घोटकर आचार्य नहीं बनना है, दूसरोंको उपदेश देनेमात्रके लिये आचार्य नहीं बनना है। इस प्रकार जो एक योगीकी स्थिति हो सकती है, वही उन व्रजदेवियोंकी हुई— तं काचिनेत्ररन्ध्रेण हृदिकृत्य निमील्य च। पुलकाङ्ग्युपगुह्यास्ते योगीवानन्दसम्प्लुता ॥ बाहर बहुत विघ्न हैं, अतः एक गोपी उन परमप्रेष्ठको हृदयमें पधराकर, नेत्रद्वार बन्द करके, जिसमें वे भाग न जायें, परिरम्भणसौख्यका अनुभव