भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१० भक्तिसुधा भूमि ! सचमुच तुम बड़ी सुशोभित हो रही हो, बतलाओ किस पुण्यका यह फल है ?' इस प्रकार ब्रजांगनाएँ धरित्रीका बहुत अनुनय-विनय कर रही हैं, पर वह काष्ठमौन है, कुछ भी नहीं बोलती। इसपर ब्रजांगनाएँ कल्पना करती हैं कि यह मधुर विहारका आस्वाद करके गर्वीली हो गयी है, हम वियोगिनियोंको प्राणप्यारेका पता न देगी अथवा प्रेम समाधिमें यह तल्लीन है, अतः बाह्यवृत्तिविहीन होनेसे हमारे प्रश्न नहीं सुनती, तब उत्तर ही कैसे दे ? दूसरे भाववाली ब्रजांगनाएँ कहती हैं—'बात कुछ और है। हमारी समझमें तो यह लजा गयी है। इसको तीन-तीन पतियोंका सम्बन्ध है—वामन और वाराह। अतः लज्जाजड़ होनेसे यह कुछ बोलती नहीं। इसे विप्रयोगदुःखका परिज्ञान ही नहीं। नन्द- यशोदा, गोपालोंको श्रीश्यामसुन्दरका वियोग सम्भव है, पर यह तो विप्रयोगोत्पन्ना भाववती है। हमारे वियोगको यह नहीं जान सकती। अतः सखियो ! चलो, किसी विरहिणीसे पूछें। जिसे काँटा गड़ा होता है, वही उसकी पीड़ा जानता है, वह रास्तेके काँटोंको बीनता रहता है।' ब्रजांगनाओंका वियोगिनी हरिणीसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना श्रीकृष्ण-प्रेयसी गोपांगनाओंने अपने प्रियतम प्राणधनके विषयमें वृक्ष, लता, भूमि, जो भी दृष्टिके सामने पड़ा, सबसे पूछा। भूमिसे प्रश्नोत्तर करनेके बाद ज्यों ही उन्होंने आगे कदम बढ़ाया, ऊपर दृष्टि उठायी कि सामने हरिणी दीख पड़ी। ब्रजांगनाओंको आश्वासन- सा मिला। उनकी कल्पना, जो भूमिके अनुत्तरसे उठी थी, अब हरिणीके साथ समन्वित होने लगी। व्रजवधुओंने सोचा—यह अकेली है, उसका पति हरिण उसके साथ नहीं है; अतः यह सिद्ध है कि यह वियोगिनी है, प्रिय- वियोग-वेदनासे सुपरिचित है, अवश्य ही यह हम वियोगिनियोंकी बात सुनेगी और प्यारे श्यामसुन्दरका मार्ग बतायेगी। वे उससे पूछती हैं— अप्येणपत्त्युपगतः प्रिययेह गात्रै- स्तन्वन् दृशां सखि सुनिर्वृतिमच्युतो वः । कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुमरञ्जितायाः कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।११) 'हे हरिणपतिव्रते ! क्या तुमने हमारे प्राणधन श्रीश्यामसुन्दरको देखा है ? क्या वे अपनी परमप्रेयसीके साथ इधर पधारे हैं ?' अबतक गोपांगनाओं द्वारा यह नहीं सूचित हुआ कि श्रीकृष्णभगवान्के साथ और भी कोई है। अब यहाँ यह कहा गया कि 'प्रियया उपगतः' 'अपनी प्रियाके साथ'—क्या उन श्रीकृष्णको हे हरिणि ! तुमने यहाँ कहीं देखा है ? यह प्रिया कौन है ? वही वृषभानुनन्दिनी रासेश्वरी श्रीराधा। यहींसे श्रीराधाकी चर्चा चली। पूछती हैं—'क्या श्रीराधा- कृष्ण इधर पधारे हैं?' परंतु 'श्रीमद्भागवत' में यह नाम प्रत्यक्ष रूपसे कहीं भी नहीं लिया गया, ऐसा क्यों हुआ ? इसपर श्रीजीवगोस्वामीका मत है कि श्रीशुकाचार्य परम भावुक भागवत थे, उन्होंने अपने भावको—अपनी आराध्याको—हृदयमें छिपाकर रखा, भाव छिपानेकी वस्तु है। प्रेमपन्थके पथिकोंकी आचार्या गोपिकाएँ हैं, उन्होंने यही बतलाया कि प्रेमको छिपाओ। साठी धान्य भीतर-ही-भीतर अव्यक्त रूपमें ही परिपक्व होता है। ऐसे ही इन भावुकोंका प्रेम- परिपाक है। प्रेमकी ऊँची दशा प्राप्त होनेपर भी गोपियोंने लोक-लज्जा, शास्त्रीय धर्मादिको नहीं त्यागा, योगीकी तरह अपने-आप ही वे छूट गये— 'न कर्माणि त्यजेद् योगी कर्मभिस्त्यज्यते ह्यसौ ।' इस तरह कर्मोंने ही इन्हें छोड़ा। यहाँतक कि घरका काम-काज करते-करते भूल जाती थीं। जब दही बेचने जातीं, 'दही लो' की जगह 'श्याम लो' कहती थीं, इन्हें अपनी देहतककी विस्मृति हो जाती थी। कोई गोपी गोदोहन, कोई पतिशुश्रूषण आदि जाति- धर्म, कुल-धर्म, वर्ण-धर्म आदि स्वधर्मके पालनमें लगी थीं। 'पाययन्त्यः शिशून् पयः' आदि स्थलोंमें
- अरी सखी ! हरिणियो ! हमारे श्यामसुन्दरके अंग-संगसे सुषमा-सौन्दर्यकी धारा बहती रहती है, वे कहीं अपनी प्राणप्रियाके साथ तुम्हारे नयनोंको परमानन्दका दान करते हुए इधरसे ही तो नहीं गये हैं ? देखो, देखो, यहाँ कुलपति श्रीकृष्णकी कुन्दकलीकी मालाकी मनोहर गन्ध आ रही है, जो उनकी परम प्रेयसीके अंग-संगसे लगे हुए कुच-कुंकुमसे अनुरंजित रहती है।