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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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प्रश्न करती हैं—‘सखि! किस पुण्यसे तुम्हें यह हमारे युगलसरकारका संस्पर्श मिला है?’ श्रीकृष्णानुरागरससारसागरकी विविध वीचियोंसे संस्पृष्टहृदया व्रजदेवियाँ जब अन्तर्हित प्राणप्रियके अन्वेषणमें निमग्न हैं, वृन्दावनकी प्रत्येक वस्तु उनके लिये प्रष्टव्य बनी हुई है, कल्पनाका कोश उनके सामने खुला पड़ा है, भगवती भूमिसे, उसके केशावाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवकी प्रश्न-परम्परा अभी अपूर्ण ही थी कि सहसा उसी रमणीक रमणान्वेषण-स्थलमें उन्हें मन और लोचनको कौतुक प्रदान करनेवाली एक वस्तु दिख पड़ी। वह थी किसलय-कुसुमसज्जित वन- विहार-शय्या, जो अंजन और ताम्बूलके रागसे रंजित, उपभुक्त तथा अतिप्रमृष्ट थी। उसके सुखावह दर्शनसे श्रीरासेश्वरीकी अन्तरंगा, परमप्रेष्ठा या अन्य सखी भाववती व्रजांगनाओंने श्रीराधा-कृष्णके विहारका अनुमान किया। भूमिको आत्मभावग्राहिणी समझकर परम सौभाग्यशालिनी और अपनी ही तरह परम अन्तरंगा प्राणसखी आदि भी माना। साथ ही उन्हें यह भी निश्चय हुआ कि श्रीगौरश्याम उभय तेजोविशेषके दर्शनसे यह भूमि भी कृतार्थ हो चुकी है। यह महत्त्व बिना किसी महातपोजन्य अतिपुण्यके सम्भव नहीं। अतः पूछती हैं— ‘किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि ।’ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) मनोहर केशवाले श्रीश्यामसुन्दर अथवा प्रसाधनीयकेशा श्रीरासेश्वरी—दोनोंका दर्शन, संस्पर्श, हे भूमि ! तुम्हें प्राप्त हुआ है, तुम धन्य-धन्य हो। व्रजांगनाओंकी कल्पना है कि श्रीरसिकशेखरके श्रीजीकी वेणीगूँथनके समय भूमिको पादस्पर्श होनेसे उत्पुलकितता हुई और जैसे अपनेको श्रीश्यामाश्यामके सम्मिलित दर्शनसे सीमोल्लंघी आनन्द मिलता है, वैसा ही भूमिके विषयमें भी उन्होंने समझा। ‘अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा’ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) आगे गोपांगनाएँ भूमिसे पूछती हैं कि ‘क्या यह आनन्द अंघ्रिसम्भवमात्र है अथवा उरुक्रमके विक्रमसे है ? उरुक्रमका अर्थ है— बहुत प्रकारके अथवा विशेष क्रमवाला। यहाँ ‘केलि’ अलंकार है। ये बहुत प्रकारके क्रम वेणीगूँथनके लिये पुष्पचयार्थ हैं। फूल चुननेके लिये श्रीराधामाधव दोनोंका अहमहमिकया विहरण हुआ। यदि उरुक्रम- विक्रम हुआ—‘क्रमु पादविक्षेपे, क्रमणं क्रमः।’ (‘उरुधा—बहुधा क्रम एव उरुक्रमः, स एव विक्रमो यस्य ययोर्वा तस्मात्’) क्या श्रीराधा- माधवके पुष्पचयार्थ विधि-गतिवाले विहारसे हे भूमि ! यह तुम्हें आनन्दोद्रेक-रससंचार हुआ है अथवा फूल तोड़नेके लिये दोनों चले, उनमें होड़ लगी कि ‘पहले मैं जाकर फूल तोडूंगा’ तो दूसरेने कहा— ‘नहीं, पहले मैं।’ पर फिर भी दोनोंसे पृथक् नहीं हुआ जाता, दोनों मिले चलते हैं। इससे श्रीराधा- माधवमें परस्पर संघर्ष हुआ, यह विशुद्ध आनन्दोद्रेकका जनक हुआ। हे भूमि ! क्या उसीसे यह विशेष उत्पुलक तुझे हुआ है?’ इसीको ‘वराहवपुषा’ से कहा है—‘वरेण आहवो रतिरणः। तत्पोषकः प्रागल्भ्यभावः तेन’ उक्त प्रागल्भ्य यही है कि पहिलेहीका बाहुल्य, फिर प्रागल्भ्यमें प्रतिचुम्बन होनेसे चुम्बन, आलिंगन होनेसे आलिंगन और दन्तक्षत, नखक्षत आदिका होना। क्या इन्हें देखकर यह उत्पुलक हुआ ? दूसरे, इसीसे नायकमें नायिकात्वका और नायिकामें नायकत्वका उद्रेक हुआ और इसी रूपमें वेणीगूँथन प्रस्तुत हुआ। सखि भूमि ! क्या इस अद्भुतभावके अवलोकनद्वारा लतांकुरादिव्याजसे तुम्हें यह अतिस्निग्ध रोमोद्गम हुआ है ? जरा हमें भी बतलाओ।’ यह सखी जो पूछ रही है, विपक्षी नहीं, अपितु प्रेष्ठसखीपक्षकी है। यह धरित्री इतनी सुन्दर सुस्निग्ध कैसे दीख पड़ रही है, इसपर व्रजदेवियोंका अनुमान है कि पहले तो श्रीश्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन ललितकिशोरके अंग-प्रत्यंगकी स्वाभाविक सुन्दरताके उद्गम-स्थल हैं, उनमें भी दिव्यातिदिव्य भूषणोंका यथास्थान विन्यास है, जिसमें छविकी— सौन्दर्यादिकी हिलोरें उठती हैं। फिर प्रिया-प्रियतम दोनोंके श्रीअंगोंमें सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्यादिके समुद्रकी उत्ताल तरंगोंसे अमृतमय वर्षा हो रही है। इसीसे धरित्रीमें आज यह इतना लोकोत्तर सौन्दर्य है। ‘हे

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