भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें' or 'वेा'? Look at line 46: 'स्पर्शोत्स' then 'वेात्' or 'वोत्'? Wait, 'त्' is there! "ोत्" -> उत्! स्पर्श-उत्सव-उत्पुलकित: स्पर्श + उत्सव = स्पर्शोत्सव. स्पर्शोत्सव + उत्पुलकित = स्पर्शोत्सवोत्पुलकित! So it IS स्पर्शोत्सवोत्पुलकिता! Wait, but why is there a 'त्'? If it's स्पर्शोत्सव + उत्पुलकित, then: त्सव + उत् = त्सवोत् ! त् - स - व - ो - त् - प - ु = त्सवोत्पु ! YES! त्स-वो-त्-पु-ल-कि-ता ! WOW! That explains EVERYTHING! It is NOT 'वात्'! It is 'वोत्'! Because: उत्सव + उत्-पुलकित = उत्सवोत्पुलकित! And how is 'वोत्' spelled in this typeface? Wait, let's look at 'वोत्': Is it 'वोत्' or 'वेात्'? Look at the glyph: there is 'व', an 'े' on top of 'व', an 'ा', and a 'त्' attached to 'पु'! Wait, why is there an 'े' on 'व' and an 'ा' after 'व'? That is the way SOME typesetters accidentally typeset 'ो' (as 'े' +