भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरहे। नागाजीकी प्रतिज्ञासे श्रीश्यामसुन्दर अधीर हो उठे। वे आये और नागाजीकी जटा अपने कोमल करोंसे सुलझानेको ज्यों ही उद्यत हुए, नागाजीने रोक दिया। कहा—‘पहले आप अपना परिचय दीजिये, आप कौनसे कृष्ण हैं—व्रजके, वनके या निकुंजके ? हम तो निकुंजके उपासक हैं।’ श्रीप्रभुने कहा— ‘बाबा, मैं वही हूँ, जाकी तुम उपासना करो हो।’ नागाजीने कहा—‘कैसे विश्वास हो ? इसका प्रमाण कौन दे ?’ श्रीप्रभुने कहा—‘जैसे तुमकूं विश्वास हो, सोई करो।’ नागाजीने कहा—‘यदि हमारी श्रीस्वामिनीजू आकर कहें कि हाँ, ये निकुंजके ही श्याम हैं, तब हम मानें।’ इतनेमें श्रीव्रजेश्वरी वृषभानुनन्दिनी श्रीस्वामिनीजू भी पधारीं और उन्होंने नागाजीको विश्वास दिलाया कि ये ही नित्यनिकुंज-मन्दिरस्थ श्रीश्यामसुन्दर हैं, तब अनुमति मिलनेपर बड़ी उत्सुकतासे श्रीप्रभुने चार हाथ लगाकर नागाजीकी जटा सुलझायी। कहनेका तात्पर्य यही कि इस प्रकार श्रीकृष्णके तीन भेद हुए। इनमें मथुरानाथ और द्वारकानाथके दो भेद और जोड़ देनेसे पाँच भेद हो जाते हैं। जैसे एक ही स्वातिबिन्दु स्थानभेदसे विभिन्न नामवाला होता है—सीपमें मोती, हाथीमें गजमुक्ता, गौमें गोरोचन आदि, वैसे ही श्यामसुन्दरके ये पाँच भेद हैं। रसिक भक्तोंके यहाँ जितनी माधुर्यकी अधिकता है, उतनी ही ऐश्वर्यकी कमी। व्रजनाथ, द्वारकानाथमें यही भेद है। उत्तरोत्तर ऐश्वर्यकी न्यूनता और माधुर्यकी अधिकतासे व्रजमें पूर्ण, वृन्दावनधाममें पूर्णतर और नित्य निकुंजमें पूर्णतम प्रभु माने गये हैं। अतएव अन्य अवतारोंके स्पर्शकी अपेक्षा श्रीश्यामसुन्दरके चरणका स्पर्श व्रजांगनाओंकी दृष्टिमें अधिक महत्त्व रखता है। भगवान्की लोकोत्तर अलकावलीका माधुर्य केशवका एक दूसरा अर्थ है—(‘प्रशस्ताः केशा यस्य सः’) सुन्दर केशवाला। सचमुच श्रीश्यामसुन्दर केशवके समान किसीके भी केश नहीं हैं। गोपांगनाएँ उनके केशोंपर मुग्ध हैं— वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्री- गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम्। दत्ताभयं च भुजदण्डयुगं विलोक्य वक्षः श्रियैकरमणं च भवाम दास्यः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३९) कहती हैं—‘श्यामसुन्दर! हम आपके इस लोकोत्तर सुन्दर अलकावलीसे आवृत्त मुखपर विमुग्ध हैं और अक्रीत, अशुल्कदासी हैं।’ उन सौन्दर्यगर्वप्रमत्त गोपांगनाओंका गुमान गोविन्दके घुँघराले केशपाशको देखकर ही चूर-चूर हो गया, वे सदाके लिये नायिकात्व, स्वाधीनभर्तृकात्व छोड़कर दासी बन जानेको प्रस्तुत हो गयीं। कदाचित् भगवान् कहें कि ‘गोपांगनाओ, आप ऐसा मत कहो, आप कुलांगना हो’ तो कहती हैं—‘श्यामसुन्दर, आपकी इस रूपराशिको देखकर हम भुला जाती हैं, ठगी-सी रह जाती हैं। ये आपकी बिखरी अलकें मनको खींच लेती हैं। ये आपकी अलकें कुटिल हैं, स्निग्ध हैं, स्वच्छ हैं और हमारा मन भी सत्त्वसम्पन्न होनेसे स्निग्ध, रजोगुणसम्पृक्त होनेसे कुटिल और तमसे जुष्ट होकर श्यामलताको धारण करता है। जैसे आपके केशोंमें घुँघरालापन है, वैसे ही हमारे मनमें कुटिलता है। इस प्रकार हमारा मन आपके केशोंको बन्धु समझकर उनके पास चला गया और वहाँ जाकर उनके जालमें फँस गया।’ भगवान्के केशोंके विषयमें ‘कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद् दृशाम्’ (श्रीमद्भा० १०।३१।१५)-में कुटिलता कही गयी है। कोई तो इन सचिक्कण काले केशोंकी काले नागोंसे उत्प्रेक्षा करते हैं—मानो श्रीकृष्णचन्द्रके अद्भुत अमृतमय, निष्कलंक पूर्णमुखचन्द्रपर अमृतके लोभसे वे काले-काले नागशिशु फैले हैं। किसी भावुकके मतसे पूर्णानुरागससारसरोवरसमुद्भूत नीलकमलपर ये मधुलम्पट आ विराजे प्रतीत होते हैं। श्रीधर स्वामीने भगवान्के केशावृत मुखको अलिकुलमालासंकुल परागपरिप्लुत नीलकमल माना है। फिर संशय होता है कि यह अलिकुल स्थिर क्यों है ? तो उत्तर मिलता है—मकरन्दपानसे स्तब्ध है, विभोर होनेसे गुंजार नहीं करता। ऐसा है भगवान्का अलकावृत मुख। इस प्रकार उन केशवके माधुर्य-लावण्य-सौन्दर्य-सम्पन्न एक-एक अंगकी बड़ी विलक्षण शोभा है। उनका