भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०६ भक्तिसुधा मुकुट, कहीं लकुट, कहीं पीताम्बर, कहीं फेंटा, कहीं वंशी आदिसे वह खूब सजा है। पर श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र तो बाबाजीकी तरह जटा, चीर आदि धारण किये थे, उनपर भी मुनियोंका चित्त खिंच गया। यद्यपि खरदूषणकी बहनका नाक-कान काटा, पर जब सामने आये, तब उनके भी मुखसे निकल पड़ा— जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा ॥ (रा०च०मा० ३।१९।५) क्रूर, गोभक्षक भी उन्हें देखकर सहज ही विभोर हो गये। राह चलती स्त्रियोंने भी उन्हें देखकर उनके मार्गकी निर्बाधता-सर्प, वृश्चिक आदिसे राहित्य विधातासे माँगा। फिर श्रीश्यामसुन्दर मुरलीमनोहरके रूपमें जो शृङ्गाराक्रान्त परम कमनीय था, प्रकट होकर तो अपने साधकोंके मनकी सभी शिकायतोंको दूर कर दिया। लावण्य, सौरस्य, सौरस्य- सुधा-सिन्धुको छोड़कर भला कौन ऐसा है, जो अप्सरा आदिको चाहेगा? परंतु उस मूर्तिके मनोमयी होनेपर ही यह बात होती है, अतएव 'मानसी सा परा मता।' यह सिद्ध कैसे हो, इसके लिये पहले एक ऊँचे अभिनिवेशसे तनुजा और वित्तजा सेवा होनी चाहिये। धातु आदिकी प्रभुप्रतिमा पधराकर अष्टयामकी सेवा, भावना, दिव्यातिदिव्य शृंगार, भोगरागसे उन्हें अपना सर्वस्व समझकर महावैभवसे खूब सेवा करनी चाहिये, तब वह मूर्ति मनमें आयेगी और एक बार आकर ही सदाके लिये कृतकृत्य कर देगी। अतएव कहा गया है— 'सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्।' (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) ध्रुव, प्रह्लाद आदिको इसी मानसी प्रतिमाने— मनोमयी मूर्तिने आत्मसमर्पण किया। फिर उस अघासुरकी क्या बात, जिसके मुखमें वह मूर्ति साक्षात् समा गयी ! मुख्य बात यह है कि किसी भी स्वरूपसे, कैसे भी प्रभु-सम्बन्ध होना चाहिये। व्रजांगनाएँ कहती हैं—'सखि धरित्रि ! तुम्हें यह जो श्रीकृष्ण-स्पर्श मिला, वह जन्म-जन्मकी उग्र तपस्याओंका फल है। पहले वामनचरणके तीव्राघात तपसे पुण्य उत्पन्न हुआ, उससे वाराह-संस्पर्शपुण्य उत्पन्न हुआ। फिर इन दोनों पुण्योंसे श्रीश्यामसुन्दरके सार्वदिक् संस्पर्श-सौभाग्यका उदय हुआ। सखि! हमको भी उस तपस्याका क्रम बतलाओ, जिससे तुमने उत्तरोत्तर उन्नति की।' व्रजांगनाओंने श्रीश्यामसुन्दरके चरणसंस्पर्शको अधिक महत्त्व दिया है। कोई कहे कि स्पर्श तो सब समान ही है—जैसे श्रीवामनभगवान्का या वाराह- भगवान्का, वैसे ही श्रीश्यामसुन्दरका, केशवभगवान्का, उसमें कोई भी अन्तर कैसा? परंतु ऐसा नहीं कहा जा सकता। यह भेद तो भावुक ही समझ सकते हैं, दूसरोंके लिये यह अगम्य है। इसपर व्रजदेवियोंके बहुत ऊँचे भाव हैं। केशव उनकी दृष्टिमें साधारण केशव नहीं, अपितु ब्रह्मा, विष्णु और महेशको वशमें करनेवाला केशव—('कः-ब्रह्मा, ईः-विष्णुः, शः- शिव, तान् वशयतीति केशवः') है। भगवदवतारोंमें कोई अंशावतार, कोई कलावतार और कोई आवेशावतार होते हैं। परंतु पूर्ण, पूर्णतर और पूर्णतम अवतार पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द यशोदानन्दनका ही हुआ है। इसमें भी भक्तोंकी उच्च भावनाके अनुसार—'व्रजे वने निकुञ्जे च श्रैष्ठ्यमत्रोत्तरोत्तरम्' की व्यवस्था है। इसके अनुसार निकुंजस्थ श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहन ही पूर्णतम अथवा श्रेष्ठतम हैं। निकुंजस्थ माधुर्यनिधि श्यामसुन्दरकी श्रेष्ठता—एक रोचक दृष्टान्त कदम्बखण्डीके नागाजी व्रजमें एक अतिप्रसिद्ध भावुक भक्त हो गये हैं। वे वहीं आनन्दमग्नावस्थामें घूमा करते थे। एक दिन उनकी जटा एक झाड़ीमें उलझ गयी। प्रयत्न किया, पर नहीं सुलझी, तब आपने निश्चय किया—'जिसने उलझायी है, अब वही आकर सुलझायेगा।' वहाँ गौओंको चराने आनेवाले ग्वालबालों तथा अन्यान्य लोगोंने बहुत प्रार्थना की—'बाबा, हम सुलझा दें।' पर आपने किसीकी न सुनी, अटल निश्चय किया—'बस, अब तो वही आयेगा, तभी सुलझेगी।' आप इसी प्रणयकोप अथवा भावावेशमें बहुत समयतक उसी तरह खड़े