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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

४०६ भक्तिसुधा मुकुट, कहीं लकुट, कहीं पीताम्बर, कहीं फेंटा, कहीं वंशी आदिसे वह खूब सजा है। पर श्रीमद्राघवेन्द्र रामचन्द्र तो बाबाजीकी तरह जटा, चीर आदि धारण किये थे, उनपर भी मुनियोंका चित्त खिंच गया। यद्यपि खरदूषणकी बहनका नाक-कान काटा, पर जब सामने आये, तब उनके भी मुखसे निकल पड़ा— जद्यपि भगिनी कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा ॥ (रा०च०मा० ३।१९।५) क्रूर, गोभक्षक भी उन्हें देखकर सहज ही विभोर हो गये। राह चलती स्त्रियोंने भी उन्हें देखकर उनके मार्गकी निर्बाधता-सर्प, वृश्चिक आदिसे राहित्य विधातासे माँगा। फिर श्रीश्यामसुन्दर मुरलीमनोहरके रूपमें जो शृङ्गाराक्रान्त परम कमनीय था, प्रकट होकर तो अपने साधकोंके मनकी सभी शिकायतोंको दूर कर दिया। लावण्य, सौरस्य, सौरस्य- सुधा-सिन्धुको छोड़कर भला कौन ऐसा है, जो अप्सरा आदिको चाहेगा? परंतु उस मूर्तिके मनोमयी होनेपर ही यह बात होती है, अतएव 'मानसी सा परा मता।' यह सिद्ध कैसे हो, इसके लिये पहले एक ऊँचे अभिनिवेशसे तनुजा और वित्तजा सेवा होनी चाहिये। धातु आदिकी प्रभुप्रतिमा पधराकर अष्टयामकी सेवा, भावना, दिव्यातिदिव्य शृंगार, भोगरागसे उन्हें अपना सर्वस्व समझकर महावैभवसे खूब सेवा करनी चाहिये, तब वह मूर्ति मनमें आयेगी और एक बार आकर ही सदाके लिये कृतकृत्य कर देगी। अतएव कहा गया है— 'सकृद् यदङ्गप्रतिमान्तराहिता मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्।' (श्रीमद्भा० १०।१२।३९) ध्रुव, प्रह्लाद आदिको इसी मानसी प्रतिमाने— मनोमयी मूर्तिने आत्मसमर्पण किया। फिर उस अघासुरकी क्या बात, जिसके मुखमें वह मूर्ति साक्षात् समा गयी ! मुख्य बात यह है कि किसी भी स्वरूपसे, कैसे भी प्रभु-सम्बन्ध होना चाहिये। व्रजांगनाएँ कहती हैं—'सखि धरित्रि ! तुम्हें यह जो श्रीकृष्ण-स्पर्श मिला, वह जन्म-जन्मकी उग्र तपस्याओंका फल है। पहले वामनचरणके तीव्राघात तपसे पुण्य उत्पन्न हुआ, उससे वाराह-संस्पर्शपुण्य उत्पन्न हुआ। फिर इन दोनों पुण्योंसे श्रीश्यामसुन्दरके सार्वदिक् संस्पर्श-सौभाग्यका उदय हुआ। सखि! हमको भी उस तपस्याका क्रम बतलाओ, जिससे तुमने उत्तरोत्तर उन्नति की।' व्रजांगनाओंने श्रीश्यामसुन्दरके चरणसंस्पर्शको अधिक महत्त्व दिया है। कोई कहे कि स्पर्श तो सब समान ही है—जैसे श्रीवामनभगवान्‌का या वाराह- भगवान्‌का, वैसे ही श्रीश्यामसुन्दरका, केशवभगवान्‌का, उसमें कोई भी अन्तर कैसा? परंतु ऐसा नहीं कहा जा सकता। यह भेद तो भावुक ही समझ सकते हैं, दूसरोंके लिये यह अगम्य है। इसपर व्रजदेवियोंके बहुत ऊँचे भाव हैं। केशव उनकी दृष्टिमें साधारण केशव नहीं, अपितु ब्रह्मा, विष्णु और महेशको वशमें करनेवाला केशव—('कः-ब्रह्मा, ईः-विष्णुः, शः- शिव, तान् वशयतीति केशवः') है। भगवदवतारोंमें कोई अंशावतार, कोई कलावतार और कोई आवेशावतार होते हैं। परंतु पूर्ण, पूर्णतर और पूर्णतम अवतार पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द यशोदानन्दनका ही हुआ है। इसमें भी भक्तोंकी उच्च भावनाके अनुसार—'व्रजे वने निकुञ्जे च श्रैष्ठ्यमत्रोत्तरोत्तरम्' की व्यवस्था है। इसके अनुसार निकुंजस्थ श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहन ही पूर्णतम अथवा श्रेष्ठतम हैं। निकुंजस्थ माधुर्यनिधि श्यामसुन्दरकी श्रेष्ठता—एक रोचक दृष्टान्त कदम्बखण्डीके नागाजी व्रजमें एक अतिप्रसिद्ध भावुक भक्त हो गये हैं। वे वहीं आनन्दमग्नावस्थामें घूमा करते थे। एक दिन उनकी जटा एक झाड़ीमें उलझ गयी। प्रयत्न किया, पर नहीं सुलझी, तब आपने निश्चय किया—'जिसने उलझायी है, अब वही आकर सुलझायेगा।' वहाँ गौओंको चराने आनेवाले ग्वालबालों तथा अन्यान्य लोगोंने बहुत प्रार्थना की—'बाबा, हम सुलझा दें।' पर आपने किसीकी न सुनी, अटल निश्चय किया—'बस, अब तो वही आयेगा, तभी सुलझेगी।' आप इसी प्रणयकोप अथवा भावावेशमें बहुत समयतक उसी तरह खड़े

रहे। नागाजीकी प्रतिज्ञासे श्रीश्यामसुन्दर अधीर हो उठे। वे आये और नागाजीकी जटा अपने कोमल करोंसे सुलझानेको ज्यों ही उद्यत हुए, नागाजीने रोक दिया। कहा—‘पहले आप अपना परिचय दीजिये, आप कौनसे कृष्ण हैं—व्रजके, वनके या निकुंजके ? हम तो निकुंजके उपासक हैं।’ श्रीप्रभुने कहा— ‘बाबा, मैं वही हूँ, जाकी तुम उपासना करो हो।’ नागाजीने कहा—‘कैसे विश्वास हो ? इसका प्रमाण कौन दे ?’ श्रीप्रभुने कहा—‘जैसे तुमकूं विश्वास हो, सोई करो।’ नागाजीने कहा—‘यदि हमारी श्रीस्वामिनीजू आकर कहें कि हाँ, ये निकुंजके ही श्याम हैं, तब हम मानें।’ इतनेमें श्रीव्रजेश्वरी वृषभानुनन्दिनी श्रीस्वामिनीजू भी पधारीं और उन्होंने नागाजीको विश्वास दिलाया कि ये ही नित्यनिकुंज-मन्दिरस्थ श्रीश्यामसुन्दर हैं, तब अनुमति मिलनेपर बड़ी उत्सुकतासे श्रीप्रभुने चार हाथ लगाकर नागाजीकी जटा सुलझायी। कहनेका तात्पर्य यही कि इस प्रकार श्रीकृष्णके तीन भेद हुए। इनमें मथुरानाथ और द्वारकानाथके दो भेद और जोड़ देनेसे पाँच भेद हो जाते हैं। जैसे एक ही स्वातिबिन्दु स्थानभेदसे विभिन्न नामवाला होता है—सीपमें मोती, हाथीमें गजमुक्ता, गौमें गोरोचन आदि, वैसे ही श्यामसुन्दरके ये पाँच भेद हैं। रसिक भक्तोंके यहाँ जितनी माधुर्यकी अधिकता है, उतनी ही ऐश्वर्यकी कमी। व्रजनाथ, द्वारकानाथमें यही भेद है। उत्तरोत्तर ऐश्वर्यकी न्यूनता और माधुर्यकी अधिकतासे व्रजमें पूर्ण, वृन्दावनधाममें पूर्णतर और नित्य निकुंजमें पूर्णतम प्रभु माने गये हैं। अतएव अन्य अवतारोंके स्पर्शकी अपेक्षा श्रीश्यामसुन्दरके चरणका स्पर्श व्रजांगनाओंकी दृष्टिमें अधिक महत्त्व रखता है। भगवान्‌की लोकोत्तर अलकावलीका माधुर्य केशवका एक दूसरा अर्थ है—(‘प्रशस्ताः केशा यस्य सः’) सुन्दर केशवाला। सचमुच श्रीश्यामसुन्दर केशवके समान किसीके भी केश नहीं हैं। गोपांगनाएँ उनके केशोंपर मुग्ध हैं— वीक्ष्यालकावृतमुखं तव कुण्डलश्री- गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम्। दत्ताभयं च भुजदण्डयुगं विलोक्य वक्षः श्रियैकरमणं च भवाम दास्यः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३९) कहती हैं—‘श्यामसुन्दर! हम आपके इस लोकोत्तर सुन्दर अलकावलीसे आवृत्त मुखपर विमुग्ध हैं और अक्रीत, अशुल्कदासी हैं।’ उन सौन्दर्यगर्वप्रमत्त गोपांगनाओंका गुमान गोविन्दके घुँघराले केशपाशको देखकर ही चूर-चूर हो गया, वे सदाके लिये नायिकात्व, स्वाधीनभर्तृकात्व छोड़कर दासी बन जानेको प्रस्तुत हो गयीं। कदाचित् भगवान् कहें कि ‘गोपांगनाओ, आप ऐसा मत कहो, आप कुलांगना हो’ तो कहती हैं—‘श्यामसुन्दर, आपकी इस रूपराशिको देखकर हम भुला जाती हैं, ठगी-सी रह जाती हैं। ये आपकी बिखरी अलकें मनको खींच लेती हैं। ये आपकी अलकें कुटिल हैं, स्निग्ध हैं, स्वच्छ हैं और हमारा मन भी सत्त्वसम्पन्न होनेसे स्निग्ध, रजोगुणसम्पृक्त होनेसे कुटिल और तमसे जुष्ट होकर श्यामलताको धारण करता है। जैसे आपके केशोंमें घुँघरालापन है, वैसे ही हमारे मनमें कुटिलता है। इस प्रकार हमारा मन आपके केशोंको बन्धु समझकर उनके पास चला गया और वहाँ जाकर उनके जालमें फँस गया।’ भगवान्‌के केशोंके विषयमें ‘कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद् दृशाम्’ (श्रीमद्भा० १०।३१।१५)-में कुटिलता कही गयी है। कोई तो इन सचिक्कण काले केशोंकी काले नागोंसे उत्प्रेक्षा करते हैं—मानो श्रीकृष्णचन्द्रके अद्भुत अमृतमय, निष्कलंक पूर्णमुखचन्द्रपर अमृतके लोभसे वे काले-काले नागशिशु फैले हैं। किसी भावुकके मतसे पूर्णानुरागससारसरोवरसमुद्भूत नीलकमलपर ये मधुलम्पट आ विराजे प्रतीत होते हैं। श्रीधर स्वामीने भगवान्‌के केशावृत मुखको अलिकुलमालासंकुल परागपरिप्लुत नीलकमल माना है। फिर संशय होता है कि यह अलिकुल स्थिर क्यों है ? तो उत्तर मिलता है—मकरन्दपानसे स्तब्ध है, विभोर होनेसे गुंजार नहीं करता। ऐसा है भगवान्‌का अलकावृत मुख। इस प्रकार उन केशवके माधुर्य-लावण्य-सौन्दर्य-सम्पन्न एक-एक अंगकी बड़ी विलक्षण शोभा है। उनका

' or 'वेा'? Look at line 46: 'स्पर्शोत्स' then 'वेात्' or 'वोत्'? Wait, 'त्' is there! "ोत्" -> उत्! स्पर्श-उत्सव-उत्पुलकित: स्पर्श + उत्सव = स्पर्शोत्सव. स्पर्शोत्सव + उत्पुलकित = स्पर्शोत्सवोत्पुलकित! So it IS स्पर्शोत्सवोत्पुलकिता! Wait, but why is there a 'त्'? If it's स्पर्शोत्सव + उत्पुलकित, then: त्सव + उत् = त्सवोत् ! त् - स - व - ो - त् - प - ु = त्सवोत्पु ! YES! त्स-वो-त्-पु-ल-कि-ता ! WOW! That explains EVERYTHING! It is NOT 'वात्'! It is 'वोत्'! Because: उत्सव + उत्-पुलकित = उत्सवोत्पुलकित! And how is 'वोत्' spelled in this typeface? Wait, let's look at 'वोत्': Is it 'वोत्' or 'वेात्'? Look at the glyph: there is 'व', an 'े' on top of 'व', an 'ा', and a 'त्' attached to 'पु'! Wait, why is there an 'े' on 'व' and an 'ा' after 'व'? That is the way SOME typesetters accidentally typeset 'ो' (as 'े' +

प्रश्न करती हैं—‘सखि! किस पुण्यसे तुम्हें यह हमारे युगलसरकारका संस्पर्श मिला है?’ श्रीकृष्णानुरागरससारसागरकी विविध वीचियोंसे संस्पृष्टहृदया व्रजदेवियाँ जब अन्तर्हित प्राणप्रियके अन्वेषणमें निमग्न हैं, वृन्दावनकी प्रत्येक वस्तु उनके लिये प्रष्टव्य बनी हुई है, कल्पनाका कोश उनके सामने खुला पड़ा है, भगवती भूमिसे, उसके केशावाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवकी प्रश्न-परम्परा अभी अपूर्ण ही थी कि सहसा उसी रमणीक रमणान्वेषण-स्थलमें उन्हें मन और लोचनको कौतुक प्रदान करनेवाली एक वस्तु दिख पड़ी। वह थी किसलय-कुसुमसज्जित वन- विहार-शय्या, जो अंजन और ताम्बूलके रागसे रंजित, उपभुक्त तथा अतिप्रमृष्ट थी। उसके सुखावह दर्शनसे श्रीरासेश्वरीकी अन्तरंगा, परमप्रेष्ठा या अन्य सखी भाववती व्रजांगनाओंने श्रीराधा-कृष्णके विहारका अनुमान किया। भूमिको आत्मभावग्राहिणी समझकर परम सौभाग्यशालिनी और अपनी ही तरह परम अन्तरंगा प्राणसखी आदि भी माना। साथ ही उन्हें यह भी निश्चय हुआ कि श्रीगौरश्याम उभय तेजोविशेषके दर्शनसे यह भूमि भी कृतार्थ हो चुकी है। यह महत्त्व बिना किसी महातपोजन्य अतिपुण्यके सम्भव नहीं। अतः पूछती हैं— ‘किं ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाङ्घ्रि- स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताङ्गरुहैर्विभासि ।’ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) मनोहर केशवाले श्रीश्यामसुन्दर अथवा प्रसाधनीयकेशा श्रीरासेश्वरी—दोनोंका दर्शन, संस्पर्श, हे भूमि ! तुम्हें प्राप्त हुआ है, तुम धन्य-धन्य हो। व्रजांगनाओंकी कल्पना है कि श्रीरसिकशेखरके श्रीजीकी वेणीगूँथनके समय भूमिको पादस्पर्श होनेसे उत्पुलकितता हुई और जैसे अपनेको श्रीश्यामाश्यामके सम्मिलित दर्शनसे सीमोल्लंघी आनन्द मिलता है, वैसा ही भूमिके विषयमें भी उन्होंने समझा। ‘अप्यङ्घ्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद् वा’ (श्रीमद्भा० १०।३०।१०) आगे गोपांगनाएँ भूमिसे पूछती हैं कि ‘क्या यह आनन्द अंघ्रिसम्भवमात्र है अथवा उरुक्रमके विक्रमसे है ? उरुक्रमका अर्थ है— बहुत प्रकारके अथवा विशेष क्रमवाला। यहाँ ‘केलि’ अलंकार है। ये बहुत प्रकारके क्रम वेणीगूँथनके लिये पुष्पचयार्थ हैं। फूल चुननेके लिये श्रीराधामाधव दोनोंका अहमहमिकया विहरण हुआ। यदि उरुक्रम- विक्रम हुआ—‘क्रमु पादविक्षेपे, क्रमणं क्रमः।’ (‘उरुधा—बहुधा क्रम एव उरुक्रमः, स एव विक्रमो यस्य ययोर्वा तस्मात्’) क्या श्रीराधा- माधवके पुष्पचयार्थ विधि-गतिवाले विहारसे हे भूमि ! यह तुम्हें आनन्दोद्रेक-रससंचार हुआ है अथवा फूल तोड़नेके लिये दोनों चले, उनमें होड़ लगी कि ‘पहले मैं जाकर फूल तोडूंगा’ तो दूसरेने कहा— ‘नहीं, पहले मैं।’ पर फिर भी दोनोंसे पृथक् नहीं हुआ जाता, दोनों मिले चलते हैं। इससे श्रीराधा- माधवमें परस्पर संघर्ष हुआ, यह विशुद्ध आनन्दोद्रेकका जनक हुआ। हे भूमि ! क्या उसीसे यह विशेष उत्पुलक तुझे हुआ है?’ इसीको ‘वराहवपुषा’ से कहा है—‘वरेण आहवो रतिरणः। तत्पोषकः प्रागल्भ्यभावः तेन’ उक्त प्रागल्भ्य यही है कि पहिलेहीका बाहुल्य, फिर प्रागल्भ्यमें प्रतिचुम्बन होनेसे चुम्बन, आलिंगन होनेसे आलिंगन और दन्तक्षत, नखक्षत आदिका होना। क्या इन्हें देखकर यह उत्पुलक हुआ ? दूसरे, इसीसे नायकमें नायिकात्वका और नायिकामें नायकत्वका उद्रेक हुआ और इसी रूपमें वेणीगूँथन प्रस्तुत हुआ। सखि भूमि ! क्या इस अद्भुतभावके अवलोकनद्वारा लतांकुरादिव्याजसे तुम्हें यह अतिस्निग्ध रोमोद्गम हुआ है ? जरा हमें भी बतलाओ।’ यह सखी जो पूछ रही है, विपक्षी नहीं, अपितु प्रेष्ठसखीपक्षकी है। यह धरित्री इतनी सुन्दर सुस्निग्ध कैसे दीख पड़ रही है, इसपर व्रजदेवियोंका अनुमान है कि पहले तो श्रीश्यामसुन्दर व्रजेन्द्रनन्दन ललितकिशोरके अंग-प्रत्यंगकी स्वाभाविक सुन्दरताके उद्गम-स्थल हैं, उनमें भी दिव्यातिदिव्य भूषणोंका यथास्थान विन्यास है, जिसमें छविकी— सौन्दर्यादिकी हिलोरें उठती हैं। फिर प्रिया-प्रियतम दोनोंके श्रीअंगोंमें सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्यादिके समुद्रकी उत्ताल तरंगोंसे अमृतमय वर्षा हो रही है। इसीसे धरित्रीमें आज यह इतना लोकोत्तर सौन्दर्य है। ‘हे

४१० भक्तिसुधा भूमि ! सचमुच तुम बड़ी सुशोभित हो रही हो, बतलाओ किस पुण्यका यह फल है ?' इस प्रकार ब्रजांगनाएँ धरित्रीका बहुत अनुनय-विनय कर रही हैं, पर वह काष्ठमौन है, कुछ भी नहीं बोलती। इसपर ब्रजांगनाएँ कल्पना करती हैं कि यह मधुर विहारका आस्वाद करके गर्वीली हो गयी है, हम वियोगिनियोंको प्राणप्यारेका पता न देगी अथवा प्रेम समाधिमें यह तल्लीन है, अतः बाह्यवृत्तिविहीन होनेसे हमारे प्रश्न नहीं सुनती, तब उत्तर ही कैसे दे ? दूसरे भाववाली ब्रजांगनाएँ कहती हैं—'बात कुछ और है। हमारी समझमें तो यह लजा गयी है। इसको तीन-तीन पतियोंका सम्बन्ध है—वामन और वाराह। अतः लज्जाजड़ होनेसे यह कुछ बोलती नहीं। इसे विप्रयोगदुःखका परिज्ञान ही नहीं। नन्द- यशोदा, गोपालोंको श्रीश्यामसुन्दरका वियोग सम्भव है, पर यह तो विप्रयोगोत्पन्ना भाववती है। हमारे वियोगको यह नहीं जान सकती। अतः सखियो ! चलो, किसी विरहिणीसे पूछें। जिसे काँटा गड़ा होता है, वही उसकी पीड़ा जानता है, वह रास्तेके काँटोंको बीनता रहता है।' ब्रजांगनाओंका वियोगिनी हरिणीसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना श्रीकृष्ण-प्रेयसी गोपांगनाओंने अपने प्रियतम प्राणधनके विषयमें वृक्ष, लता, भूमि, जो भी दृष्टिके सामने पड़ा, सबसे पूछा। भूमिसे प्रश्नोत्तर करनेके बाद ज्यों ही उन्होंने आगे कदम बढ़ाया, ऊपर दृष्टि उठायी कि सामने हरिणी दीख पड़ी। ब्रजांगनाओंको आश्वासन- सा मिला। उनकी कल्पना, जो भूमिके अनुत्तरसे उठी थी, अब हरिणीके साथ समन्वित होने लगी। व्रजवधुओंने सोचा—यह अकेली है, उसका पति हरिण उसके साथ नहीं है; अतः यह सिद्ध है कि यह वियोगिनी है, प्रिय- वियोग-वेदनासे सुपरिचित है, अवश्य ही यह हम वियोगिनियोंकी बात सुनेगी और प्यारे श्यामसुन्दरका मार्ग बतायेगी। वे उससे पूछती हैं— अप्येणपत्त्युपगतः प्रिययेह गात्रै- स्तन्वन् दृशां सखि सुनिर्वृतिमच्युतो वः । कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुमरञ्जितायाः कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।११) 'हे हरिणपतिव्रते ! क्या तुमने हमारे प्राणधन श्रीश्यामसुन्दरको देखा है ? क्या वे अपनी परमप्रेयसीके साथ इधर पधारे हैं ?' अबतक गोपांगनाओं द्वारा यह नहीं सूचित हुआ कि श्रीकृष्णभगवान्के साथ और भी कोई है। अब यहाँ यह कहा गया कि 'प्रियया उपगतः' 'अपनी प्रियाके साथ'—क्या उन श्रीकृष्णको हे हरिणि ! तुमने यहाँ कहीं देखा है ? यह प्रिया कौन है ? वही वृषभानुनन्दिनी रासेश्वरी श्रीराधा। यहींसे श्रीराधाकी चर्चा चली। पूछती हैं—'क्या श्रीराधा- कृष्ण इधर पधारे हैं?' परंतु 'श्रीमद्भागवत' में यह नाम प्रत्यक्ष रूपसे कहीं भी नहीं लिया गया, ऐसा क्यों हुआ ? इसपर श्रीजीवगोस्वामीका मत है कि श्रीशुकाचार्य परम भावुक भागवत थे, उन्होंने अपने भावको—अपनी आराध्याको—हृदयमें छिपाकर रखा, भाव छिपानेकी वस्तु है। प्रेमपन्थके पथिकोंकी आचार्या गोपिकाएँ हैं, उन्होंने यही बतलाया कि प्रेमको छिपाओ। साठी धान्य भीतर-ही-भीतर अव्यक्त रूपमें ही परिपक्व होता है। ऐसे ही इन भावुकोंका प्रेम- परिपाक है। प्रेमकी ऊँची दशा प्राप्त होनेपर भी गोपियोंने लोक-लज्जा, शास्त्रीय धर्मादिको नहीं त्यागा, योगीकी तरह अपने-आप ही वे छूट गये— 'न कर्माणि त्यजेद् योगी कर्मभिस्त्यज्यते ह्यसौ ।' इस तरह कर्मोंने ही इन्हें छोड़ा। यहाँतक कि घरका काम-काज करते-करते भूल जाती थीं। जब दही बेचने जातीं, 'दही लो' की जगह 'श्याम लो' कहती थीं, इन्हें अपनी देहतककी विस्मृति हो जाती थी। कोई गोपी गोदोहन, कोई पतिशुश्रूषण आदि जाति- धर्म, कुल-धर्म, वर्ण-धर्म आदि स्वधर्मके पालनमें लगी थीं। 'पाययन्त्यः शिशून् पयः' आदि स्थलोंमें

  • अरी सखी ! हरिणियो ! हमारे श्यामसुन्दरके अंग-संगसे सुषमा-सौन्दर्यकी धारा बहती रहती है, वे कहीं अपनी प्राणप्रियाके साथ तुम्हारे नयनोंको परमानन्दका दान करते हुए इधरसे ही तो नहीं गये हैं ? देखो, देखो, यहाँ कुलपति श्रीकृष्णकी कुन्दकलीकी मालाकी मनोहर गन्ध आ रही है, जो उनकी परम प्रेयसीके अंग-संगसे लगे हुए कुच-कुंकुमसे अनुरंजित रहती है।

श्रीरासपंचाध्यायी ४११ 'शिशून्' का अर्थ भतीजे आदि समझना चाहिये, अन्यथा पुत्रवती कान्ताके अभिसारसे रसाभास होगा। हाँ तो इस प्रकार पहले ये गोपियाँ अपने-अपने वर्णादि धर्मोंमें व्यासक्त थीं, पीछे श्रीश्यामसुन्दरके वेणु-गीतपीयूषके प्रवाहमें बह चलीं— निशम्य गीतं तदनङ्गवर्धनं व्रजस्त्रियः कृष्णगृहीतमानसाः। आजग्मुरन्योन्यमलक्षितोद्यमाः स यत्र कान्तो जवलोलकुण्डलाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।४) जैसे अयस्कान्त (चुम्बक) लौहका आकर्षण कर ले, वैसे ही अथवा उससे भी अधिक आकर्षणसे वे श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनार्थ सब कुछ छोड़कर दौड़ पड़ीं, आकर्षणशील श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दके द्वारा वे आकृष्ट हुईं, यह आकर्षणका महत्त्व है अथवा वेणुगीतपीयूष-प्रवाहमें उनका मन बह चला, जैसे भाद्रपदमासके गंगाप्रवाहमें नाव बह चले, मल्लाह रोकना भी चाहे पर रुके नहीं, वैसे ही वे वेणुगीतप्रवाहमें बह चलीं। उनके मनमें एक वेगवान् प्रेमका ही प्रभाव था, उसमें वर्णधर्मके सेतुबन्ध या बन्धन लगे थे, परंतु जब वेणुगीतपीयूषका महाप्रवाह कर्णकुहरोंद्वारा उनके अन्तरमें प्रविष्ट हुआ, तब उससे वे बाँध तोड़-फोड़ डाले गये, उसमें उनकी वह देहकी नाव बह चली, मन-मल्लाह उसे न रोक सका और किनारेके लोग 'रोको-रोको' की पुकार करते ही रह गये। हठात् यह कार्य हो गया। अनंगका उक्त पद्यमें अंगी अर्थात् श्रृंगार अर्थ है, श्रृंगार अंगी रस है, बाकी आठ अंग रस। कविजन शुद्ध शृंगाररसमें परोढाको महत्त्व नहीं देते, परंतु यह कृष्ण-कथातिरिक्त स्थलकी बात है— 'नेष्टा यदङ्गिनि रसे कविभिः परोढा तद् गोकुलाम्बुजदृशां कुलमन्तरेण।' इस तरह अंगी रस बढ़ा और उसके वेगमें गोपीजनोंके देहकी नौका भी बह चली, मन या बुद्धिरूप मल्लाह भी उसीमें कूद पड़ा। गोपांगनाएँ अपने इस आचरणसे शिक्षा देती हैं कि 'अपनी बन पड़ते वर्णधर्म, आश्रमधर्म, कुलधर्म, जातिधर्म आदिको कदापि न छोड़ो, सन्ध्योपासनादि नित्यनैमित्तिक कर्मोंका बराबर सम्पादन करते रहो। हमें विश्वप्रपंचका स्मरण नहीं, पर फिर भी पतिशुश्रूषा आदिमें लगी हुई हैं।' आज तो ऐसा नहीं होता, पर यह ठीक नहीं। यदि वे त्रिलोकीपति पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम श्रीश्यामसुन्दर ही अपूर्व अनुग्रह- द्वारा अपने प्रेमपीयूष-प्रवाहमें बहा ले चलें तो बात अलग है, अन्यथा भगवत्प्रेमको हृदयमें सर्वथा गुप्त रखकर वैध कृत्योंमें निरन्तर लगे रहना चाहिये, विशिष्ट स्थिति उत्पन्न होनेपर वे स्वयं छूटेंगे। 'पाययन्त्यः' आदिमें 'लक्षणहेत्वोः क्रियायाः' इससे हेत्वर्थमें 'शतृ' प्रत्यय है। यहाँ पतिशुश्रूषण हेतु है। गोपांगनाओंका पतिशुश्रूषण उपलक्षण है। पतिशुश्रूषणरूप कारणने 'श्रीकृष्ण-प्रेम-प्रवाहमें बहने रूप कार्यको पुरतः स्थापित किया। 'यतः पतीन् शुश्रूषन्त्यः अतः श्रीकृष्णं परमात्मानं ययुः।' क्योंकि वे गार्हस्थ्यधर्म, स्वजात्यादि-धर्मका पालन करती रहीं, अतः उनका फल देनेके लिये श्रीकृष्णचन्द्र परमात्माने उन्हें अपनी ओर खींचा। हम भी यदि ऐसा ही करें तो हमें भी बुलायेंगे। यदि चाहते हो कि भगवान् कृष्णका हमपर भी वैसा ही अनुग्रह हो तो वैसा ही करें, जैसा व्रजांगनाएँ करती थीं, स्वधर्ममें लगी थीं। 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥' (गीता १८।४६) स्व-स्वकर्म-सम्पादनसे ही ऊँची-से-ऊँची सिद्धि प्राप्त होती है। गोपांगनाएँ प्रेम मार्गकी आचार्य हैं।' आचार्यकी परिभाषा है— आचिनोति च शास्त्रार्थमाचारे स्थापयत्यपि। स्वयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन उच्यते ॥ केवल ग्रन्थ घोटकर आचार्य नहीं बनना है, दूसरोंको उपदेश देनेमात्रके लिये आचार्य नहीं बनना है। इस प्रकार जो एक योगीकी स्थिति हो सकती है, वही उन व्रजदेवियोंकी हुई— तं काचिनेत्ररन्ध्रेण हृदिकृत्य निमील्य च। पुलकाङ्ग्युपगुह्यास्ते योगीवानन्दसम्प्लुता ॥ बाहर बहुत विघ्न हैं, अतः एक गोपी उन परमप्रेष्ठको हृदयमें पधराकर, नेत्रद्वार बन्द करके, जिसमें वे भाग न जायें, परिरम्भणसौख्यका अनुभव

करती है। उस लोकोत्तर आनन्दसे रोमांच हुआ, वह रोमांच नहीं, अपितु पहरेदार खड़े कर दिये गये हैं— श्यामसुन्दर कहीं—हृदयमन्दिरसे नेत्रादि द्वारों, रोम- रन्ध्रोंसे भाग न निकलें। फिर भी उसे विश्वास नहीं हुआ, श्रीश्यामसुन्दरकी अटपटी चालोंको वह खूब जानती थी, अतः उन्हें खूब छिपाकर आनन्दसिन्धुमें गोता लगा गयी। गोस्वामी तुलसीदासजीने कहा है—'लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥' (रा०च०मा० १।२३२।७) यों गोपीजनकी उपमा योगीसे दी गयी। कर्मोंने उन्हें स्वयं छोड़ा, वे तो बराबर स्वकर्म-सम्पादनमें लगी रहीं। गोपांगनाओंका सर्वातिशय माहात्म्य एक बड़े मार्केकी बात है, गोपीजनकी इतनी महिमा क्यों है? उन्हें सबसे अधिक महत्त्व क्यों दिया जाता है? श्रीनारद, श्रीलक्ष्मी, श्रीरुक्मिणी आदिका कितना गौरव है, भगवान्‌की उनपर कितनी अनुकम्पा है, कितना प्रेम है, परंतु ब्रह्मा उनके विषयमें कुछ न कहकर इनका महत्त्व-प्रतिपादन करते हैं। ब्रह्मा व्रजके कीट-पतंग बननेमें अपना अहोभाग्य समझते हैं— तदस्तु मे नाथ स भूरिभागो भवेऽत्र वान्यत्र तु वा तिरश्चाम्। येनाहमेकोऽपि भवज्जनानां भूत्वा निषेवे तव पादपल्लवम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३०) इतना ही नहीं, ब्रह्मा व्रजमें, वृन्दाटवीमें कीट- पतंग, लता-पत्र कुछ भी बननेको तैयार हैं। उन व्रजवासियोंकी, जिनका जीवनसर्वस्व वे मुकुन्द हैं, जिनकी पाद-धूलिको श्रुतियाँ आजतक ढूँढ़ रही हैं, पाद-धूलिसे स्नान करनेमें वे अपनी महाभाग्यता समझते हैं— तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्घ्रिरजोऽभिषेकम्। यज्जीवितं तु निखिलं भगवान् मुकुन्द- स्त्वद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव॥ (श्रीमद्भा० १०।१४।३४) ब्रह्माका भाव यह है कि यदि वहाँ उत्पन्न होंगे तो गोकुलवासियोंकी पाद-धूलिसे पवित्र हो जायेंगे, पर उद्धव तो इनसे भी आगे बढ़ गये, वे तो उन गोपीजनोंकी पाद-धूलिको सेवन करनेके लिये वृन्दावनके तरु, गुल्म, लता, कुछ भी बनना चाहते हैं; क्योंकि उन व्रजदेवियोंने दुस्त्यज आर्यपथ और स्वजनोंको त्यागकर श्रीमुकुन्दकी पदवीका सेवन किया था— आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां वृन्दावने किमपि गुल्मलतौषधीनाम्। या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा भेजुर्मुकुन्दपदवीं श्रुतिभिर्विमृग्याम्॥ (श्रीमद्भा० १०।४७।६१) उन प्रेमपथिकोंकी आचार्या व्रजदेवियोंकी पाद-धूलिके स्पर्शसे अपनी कृतकृत्यता मानते हैं और भी— निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्। अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभिः॥ (श्रीमद्भा० ११।१४।१६) जब भगवान् शान्त मुनियोंकी पदरेणुसे पवित्र होनेकी आकांक्षा रखते हैं, तब उनके ज्ञानी भक्त उद्धव व्रजबालाओंकी पाद-धूलिकी लता-गुल्म बनकर सेवन करनेकी आकांक्षा करें, यह कैसी बात? परंतु उद्धव उनके—'या दुस्त्यजं स्वजनमार्यपथं च हित्वा' पर मन्त्रमुग्ध हैं। उन गोपबालाओंने लोक-परलोकको तिलांजलि देकर अपने प्रियतम प्राणधन श्रीश्यामसुन्दरपर समस्त विश्वको, विश्वके सौख्यको वार डाला; राई- नोन करके फेंक दिया। उनकी यह परमप्रीति उद्धवकी प्रमुग्धता और आश्चर्यका कारण है। आज भी आर्यधर्मको कितनी ही स्त्रियाँ छोड़ रही हैं, स्वजनोंको भी छोड़ ही बैठी हैं, पर क्या मुकुन्द मिले? यहाँ व्रजांगनाओंके लिये आर्य-धर्म और स्वजनोंका त्याग 'दुस्त्यज' बतलाया है। परंतु आजकी स्त्रियोंके लिये तो जो कि शिक्षिता हैं, वह सुत्यज ही है। जिन्होंने आर्य-धर्मसे सम्बन्ध ही नहीं जोड़ा, वे छोड़ेंगे क्या? वैसे तो दुर्व्यसन दुस्त्यज होता है। जैसे किसीको परपुरुष प्रेम हो,

श्रीरासपञ्चाध्यायी ४१३ उसे माता-पिता सब मना करें, रोगादि, नरकादिकी भीति भी हो, कलंक भी लगे, पर वह छूटता नहीं। यह है दुस्त्यज दुर्व्यसन। इसी प्रकार कुलीनोंके लिये आर्य-धर्म दुस्त्यज होता है। व्रजांगनाओंके लिये यह आर्यधर्म दुस्त्यज था, ऐसी स्थितिमें क्या उन्हें दुर्व्यसनी कहा जा सकता है? यह तो काँटेसे काँटेको निकालनेकी तरह पाशविक उच्छृंखल चेष्टाओंको मिटाना था, शास्त्रीय धर्मके सद्व्यसनसे यह मिटाया जाता है। जिन्हें यह बात हो गयी, वे दुर्व्यसनकी ओर कैसे जायँ? अब तो वे श्रीकृष्ण परमात्माको ही भजेंगी। प्राकृत कुलटा ही आर्यधर्मको छोड़कर लोकके किसी हीन-दीन, मूत्र-पुरीष- भाण्डागारको ही भज सकती हैं। गोपांगनाओंको तो वह घरमें ही प्राप्त था, परंतु वे तो उस अपरको छोड़कर परपुरुष, पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्णको भजने लगीं। स्व-स्वपतियोंका सेवन उनके लिये शालग्राममें विष्णुबुद्ध्या था, यही कारण था कि उद्धव-जैसे भक्त इनकी चरण-धूलि चाहते थे। इनकी योगीजनदुरवाप परम सद्गति हुई। क्या आर्यधर्म- त्यागिनी कुलटाओंके लिये यह कदापि सम्भव हो सकता है? उनमें-इनमें महान् अन्तर है। इस तरह सुदुस्त्यज आर्यपथ और स्वजनको त्यागकर गोपांगनाओंने मुकुन्द-पदवीका सेवन किया, उन्हें महान् कष्ट हुआ। वेदोक्त-शास्त्रोक्त, सद्धर्म, सत्कर्मको त्यागनेमें अनन्तानन्त सन्ताप सत्कुलीनको ही होगा, पर अन्तमें भगवत्सम्बन्धसे वह उतना ही सुखमय भी होता है। यही इन ब्रजदेवियोंकी विशेषता और महिमा है। श्रीजीवगोस्वामी, श्रीरूपगोस्वामी- प्रभृति भावुकोंने उनके स्वकीयत्व, परकीयत्वपर यही विचार किया है कि वे यदि स्वकीया होतीं तो आर्य-धर्मके त्यागका प्रश्न ही नहीं आता। 'दुरापजनवर्त्तिनी रतिरपत्रपा भूयसी'-की वहाँ भावना ही नहीं, प्रसंग ही नहीं। श्रीरुक्मिणी, सत्यभामा आदिको श्रीकृष्ण दुरवाप कब हुए? यह तो व्रजांगनाजन आदिकी ही दशा रही, रंकको निधिकी तरह उन्हें ही श्रीश्यामसुन्दर दुष्प्राप रहे और जँचे। पारावारविहीन लज्जा, गुरूक्तिविषवर्षण, श्रीश्यामसुन्दरके दर्शन भी लुक-छिपकर करना, सास-ससुरका प्रतिबन्ध, कलंक- कालिमाका भय, यह सब रुक्मिणी आदिको कहाँ? भगवत्प्राप्तिके निमित्त इन दुस्त्यजोंके त्यागका साहस तो ब्रजदेवियोंको ही करना पड़ा- माधवो यदि विहन्ति हन्यताम् साधवो यदि हसन्ति हस्यताम्। बान्धवो यदि जहाति त्यज्यताम् माधवः स्वयमुरीकृतो मया॥ और भी- जीवितं सखि पणीकृतं मया किं गुरोश्च सुहृदश्च मे भयम्। अतएव श्रीजीवगोस्वामीने कहा है कि उद्धव- जैसे इनकी सुदुस्त्यजताको ही हेतु देते हैं, अतएव इनके त्यागमें ही महिमा है। कुलटाके आर्यधर्म- त्यागमें कोई महिमा नहीं। इस अपने चरितसे गोपांगनाओंने स्पष्ट ही उपदेश दिया कि पहले धर्मको दुस्त्यज बनाओ, फिर श्रीश्यामसुन्दर मनमोहनविषयिणी उत्कट उत्कण्ठासे उसे त्यागो, नहीं-नहीं, वह स्वयं ही छूट जायगा। उस प्रेमको भी गुप्त रखनेका प्रयत्न करो। अतएव श्रीशुक भी उनके प्रणयको सुगुप्त रखनेका प्रयत्न करते हैं। वे सोचते हैं-हमसे कर्मतत्त्व, उपासनातत्त्व आदिका ही प्रतिपादन करते हुए भी कुछ प्रेमपक्षपात व्यक्त हो गया, भक्तोंमें वह झलका, भगवदवतारोंमें, श्रीकृष्णमें, वह अधिक व्यक्त हो गया, वह केवल श्रीराधाके सम्बन्धमें ही व्यक्त होनेसे बचा है, अतः अब हम उसे सर्वथा छिपायेंगे। परंतु फिर भी 'ज्ञानखले यथा सरस्वती' के भयसे उसे 'कदाचित्' आदि गुप्त रीतिसे व्यक्त करेंगे, सुस्पष्ट नहीं करेंगे। 'कदाचित्' का अर्थ है-क्षण- क्षणमें सौख्यवृद्धि। अतएव प्रस्तुत 'अप्येणपत्नि' पद्यमें 'प्रियया' मात्रसे श्रीराधा-कृष्णके सुगुप्त प्रणयका संकेत किया, स्पष्टतः नहीं। वेदोंमें १३ काण्डके 'शतपथ' में १६ हजार कण्डिकाद्वारा उपासना, ४ हजारद्वारा ज्ञान और शेष सबसे कर्मकाण्डका प्रतिपादन हुआ है। ४० अध्यायकी शुक्लयजुःसंहिताके ३९ अध्यायोंमें कर्मकाण्डका प्रतिपादन और केवल अन्तिम १ अध्यायमें ज्ञानका प्रतिपादन है, जो 'ईशावास्योपनिषद्' के नामसे

४१४ | भक्तिसुधा

प्रसिद्ध है। तात्पर्य यह कि गूढ़तत्त्व थोड़ेमें छिपाकर कहा जाता है—'परोक्षप्रिया ह वै देवाः।' 'इदं सर्वं दृष्टवान्' इस व्युत्पत्ति-सम्पन्न 'इन्द्र' को इन्द्र कहा, क्योंकि सब जान न लें। परम धन राधानाम अधार। जाहि पिया वंशी में गावत सुमिरत बारंबार। तातें शुक प्रकट नहिं कीनो 'जानि सार को सार'। श्रीशुकजीने द्वादशस्कन्धात्मक वाङ्मय भगवद्रूप भागवतमें दशम स्कन्धको हृदयरूप बतलाया है, उसमें रासपञ्चाध्यायी पंचप्राणात्मक है। इसमें भी उस तत्त्वको गुप्त करके केवल 'प्रिया' शब्दसे कहा। जहाँ नहीं ही रहा गया, वहाँ 'अनयाराधितो नूनम्' से संश्लिष्ट करके कहा। अपने लोकोत्तर प्रेमसे श्रीकृष्ण परमात्माको जिसने वशीकृत किया है, वह स्वाधीनभर्तृका श्रीराधा हैं। वस्तुतस्तु 'तस्माज्ज्योतिरभूद् द्वेधा राधामाधवरूपकम्' के गुप्त रहस्यको गुप्त रीतिसे यहाँ श्रीशुकने कहा है, जिसका स्वरूप वेदोंमें भी अत्यन्त गुप्त है। इस प्रकार श्रीकृष्णान्वेषणकातरा व्रजांगनाओंने प्रियाके साथ श्रीश्यामसुन्दर भगवान्‌का हरिणीसे पता पूछा। धरित्रीके प्रति वे उदासीन हो गयीं, उसे उन्होंने महामदान्ध समझा। इसका कारण स्पष्ट ही था कि वह उनके प्रिय श्रीश्यामसुन्दरके अंकुश, कमल, ध्वजा, वज्रादि चिह्नोंसे अलंकृत चरण तथा श्रीप्रियाजीके चरण-संस्पर्शसे भी विचित्रितांगी हो रही थीं। यह उन्मदान्ध हमारी वेदनाको क्या जानेगी, यही सब सोचकर व्रजांगनाओंने उससे अधिक बात नहीं की। दूसरी बात यह कि उससे अधिक महत्त्व उन्हें हरिणीमें दीख पड़ा; क्योंकि वह अकेली वियोगिनी वियोग दुःखको जाननेवाली थी। इसीलिये उसकी प्रशंसा करती हैं—'एणपत्नी' ('पत्युर्नो यज्ञसंयोगे' यज्ञस्य फलभोक्त्रीत्यर्थः) अर्थात् हे हरिणसति! तुम याज्ञिककी पत्नी हो। बड़े-बड़े याज्ञिक कर्मकलाप हरिणी और हरिणका रूप धरकर वृन्दावनमें रासेश्वरीके नित्यविहारका दर्शन करने आये हैं। अतः हे यज्ञसम्बन्धी पत्नि! तुम बड़ी पवित्र हो, हमें मनमोहन श्यामसुन्दरका पता बतलाओ। दूसरे, तुम्हारा यह सौभाग्य है कि श्रीकृष्णचन्द्र मुरलीमनोहर स्वयं तुम्हारे पास आये हैं और तीसरी विशेषता यह है कि तुम वृन्दावनकी हरिणी हो। इससे बढ़कर और क्या पुण्य होगा? फिर सखि, वे प्यारे नन्दलाल भी अकेले नहीं आये, किंतु अपनी प्रेयसीरत्नचूड़ामणि श्रीव्रजेश्वरीके साथ आये हैं। अतः तुमने प्रिया-प्रियतमका दर्शन अवश्य पाया है। विशेषकर उन यशोदानन्दनका तुमसे बड़ा अनुराग है; क्योंकि तुम्हारे नेत्र उनकी प्रियाजीके जैसे हैं और तुम्हारे इन नेत्रोंको देखकर श्रीश्यामसुन्दर विभोर हो जाते हैं। तुम भी उन श्रीकृष्णचन्द्र आनन्द- कन्दके मुख-सौन्दर्य-दर्शनकी प्रेमी हो, इन विशाल नेत्रोंसे उन घनश्यामके मुखमाधुर्यामृत, सौन्दर्यामृतका पान न हो तो ये व्यर्थ हैं। ये हरिणियाँ बड़ी भाग्यशालिनी हैं— क्वणितवेणुरववञ्चितचित्ताः कृष्णमन्वसत कृष्णगृहिण्यः। गुणगणार्णमनुगत्य हरिण्यो गोपिका इव विमुक्तगृहाशाः॥ (श्रीमद्भा० १०।३५।१९) श्रीमुरलीमनोहरके मुखपर विराजमान वंशीके क्वणनसे जो श्रीप्रियाजीकी नूपुरध्वनिके सदृश है, इन हरिणांगनाओंका चित्त हरा गया। श्रीकृष्णके वेणुनिनादसे वे आकृष्ट और आसक्त हो गयीं। गुणोंके समुद्र उन श्यामसुन्दरके समीप पहुँच गयीं और कुटुम्बकी आशा छोड़कर, भोजनादिकी चिन्तासे मुक्त होकर या लोकव्यवहारको भुलाकर उन्होंने गोपांगनाओंका अनुसरण किया। कृष्णप्रेमप्रमत्त ये एणपत्नियां उत्कृष्ट कोटिकी हैं, ऐसा समझकर व्रजांगना उनसे पूछती हैं— ‘देवियो! क्या तुमने हमारे प्राणाधारको इधर कहीं देखा है?' हरिणी स्वभावतः कुछ आगे जा रही हैं, परंतु गोपांगना समझती हैं कि इन्होंने हमारी प्रार्थनाको सुन लिया और अभी श्रीश्यामसुन्दर जहाँ विराज रहे हैं, वहाँ पहुँचानेके लिये, वहाँका पता देनेके लिये ये आगे-आगे जा रही हैं। मानो ये कह रही हैं कि 'आओ, हम तुम्हें श्रीश्यामाश्यामका पता दें, पता क्या दें, तुम हमारे पीछे-पीछे चली आओ, हम तुम्हें उनसे मिला ही दें' और ये फिर-फिर ग्रीवा मोड़कर मानो

श्रीरासपञ्चाध्यायी ४१५ आश्वासन दे रही हैं। श्रीकृष्ण-प्राप्तिकी अनुगुण कल्पनामें बही जा रहीं गोपांगनाएँ हरिणीके पीछे हो लेती हैं और कहती जाती हैं—'ये बड़ी दयावती हैं, देखो, इनके बिना अन्य किसीने भी परिचय नहीं दिया।' थोड़ी दूर चलकर हरिणी गायब हो गयीं। अब वे आपसमें पूछती हैं कि 'वह कहाँ चली गयीं?' तब एक उत्तर देती है—'बस, प्रियतमाके साथ प्राणधन यहीं विराज रहे हैं। अतः सूचकत्वदोषसे मुक्त होनेके लिये वह हरिणी हमें यहाँ छोड़कर चली गयी।' इतनेहीमें एक वायुका झोंका आया, उसके लोकोत्तर सौगन्ध्यका प्रत्यक्ष अनुभव करके सब एक साथ कह उठीं— 'कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुमरण्जितायाः कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।११) अवश्य श्रीश्यामसुन्दर यही हैं, उनके बिना यहाँ यह गन्ध

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४१६ भक्तिसुधा बनकर कानोंका कुण्डल बनूँ। प्राकृत कस्तूरी, कमल नहीं होती, ये तो श्रीयुगलकिशोर श्यामश्यामाका ही आदिसे उन्हें ईर्ष्या होती है—ये वक्षोजमें विलिप्त, अन्तरंग दर्शन करके, जिस युगलसम्मिलित सौन्दर्य- गण्डचुम्बी क्यों हो गये ? श्रीजीके कंचुकी कमल लावण्यसुधाका वे स्वयं भी अनुभव नहीं कर सकते, कस्तूरी बननेको लालायित होते हैं, अधिक अन्तरंगता उसमें निरन्तर छकी रहती हैं। इनमें स्वसुखित्वकी चाहते हैं, तदर्थ तप करनेका संकल्प करते हैं। इसी गन्ध भी नहीं, ये केवल तत्सुखसुखित्व-भावनाकी प्रकार श्रीजी भी श्रीश्यामसुन्दरके अंगभूषण बननेको प्रतीक हैं। श्रीश्यामाश्याममें भी परस्पर तत्सुखसुखित्वकी लालायित रहती हैं। इस प्रसंगमें उनकी उक्ति है— ही भावना है। जहाँ कहीं श्रीनन्दनन्दनकी विभोरता ऐसे पुरुषभूषणके द्वारा जो सुन्दरियाँ अपने हृदयको या विह्वलता दीख पड़ती है, वह श्रीजीके उद्देश्यसे भूषित नहीं करतीं, उनके कुल, शील, यौवन, गुण, उन्हें प्रसन्न करनेके लिये ही। इसी तरह श्रीजीकी भी रूप आदिको धिक्कार है— समस्त क्रियाएँ इसी उद्देश्यसे होती हैं। परमप्रेष्ठ ईदृशा पुरुषभूषणेन या अन्तरंग ये सखी, जिन्हें कभी कामगन्ध नहीं, इन भूषयन्ति हृदयं न सुभ्रुवः । दोनोंके अद्भुत प्रेमानन्द-सुधासिन्धुमें सदा मग्न रहती धिक् तदीयकुलशील यौवनं हैं। लोकमें तो नायक-नायिका-सम्मिलनमें संयोजकोंको धिक् तदीयगुणरूपसम्पदः ॥ ही ईर्ष्या होती है, सम्भली आदि उसकी अधिकारिणी श्रीकृष्णको जिसने अपना सर्वस्व नहीं ही नहीं। किंतु यहाँ तो सर्वथा श्रीकिशोरीजीके समान बनाया, वह सोचनीय है होते हुए भी यह सखियाँ कभी श्रीश्यामसुन्दरके जिसने श्रीकृष्ण परमात्माको अपना सर्वस्व नहीं परिरम्भणकी इच्छांतक नहीं करतीं। इस प्रकार बनाया, वह धिक्कृत ही है, वही सोचनीय है, वही प्रेमानन्दसुधासिन्धुके मध्यमें नित्य वृन्दावनधाम विराजमान शूकर, कूकर, कीट, पतंग आदि बनते हैं। जो है, उसमें कदम्ब कुसुमित हो रहे हैं, वहीं विशाल भवाटवीमें भटकते-भटकते परेशान हैं, उन्हें अपने कमल विकसित हैं, उनपर प्रेष्ठा सखी स्थित है, वहीं उद्धारके लिये श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दको अपने नित्यनिकुंजमन्दिर शोभित है, उसमें श्रीलाडिली और हृदयका भूषण बनाना चाहिये। फिर ये तो प्रेष्ठ सखी लाल लीलामुग्ध हो विराजते हैं। ये जब कभी हैं, इनका पूर्वराग भी श्रीश्यामसुन्दरमें नहीं हुआ। क्रम लीलावियोगके तीव्रतापमें विह्वलताका अनुभव करते यह है कि पहले श्रीकृष्ण-प्रेम, फिर उसका आस्वादन हैं, तब वे सखियाँ सम्प्रयोगसुधाकी सृष्टि करके उन्हें और उसके बाद श्रीप्रियाजीका संग। परंतु इनको तो तोष पहुँचाती हैं, उनकी लीलामें सहायक होती हैं। संयुक्त श्रीश्यामाश्यामविषयक अनुराग ही पहले हुआ, यह है हित विशुद्ध अनुराग। ऐसा उदाहरण लोकमें नहीं है। अपने रूप, वेश 'कौषीतकी उपनिषद्' का प्रसंग है—प्रतर्दन आदिसे सर्वथा श्रीजीके समान होनेपर भी इन्हें इन्द्रलोकमें इन्द्रसे युद्ध करके वर माँगता है— श्रीश्यामसुन्दरविषयक पूर्वानुरागतक नहीं हुआ, केवल 'यन्मनुष्याय हिततमं तन्मे ब्रूहि।' वह विशुद्धरसात्मक सम्मिलित स्वरूपका दर्शन ही अभिप्रेत रहा, यह सर्वाधिष्ठान ही हित है, उसीका परिणाम वृन्दावन है, कितनी निःस्पृहता है। 'क्रिया सर्वापि सैवात्र परं उसमें व्रजांगनाएँ हैं, उनके अंकमें पूर्णतम पुरुषोत्तम कामी न विद्यते।' (श्रीवल्लभाचार्य) यह विशुद्ध परब्रह्म आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र यशोदानन्दन विराजमान प्रेम है। कामको तो बतलाया कि वह कोटिकामकमनीय हैं, उनके अंकमें ब्रह्मविद्याधिष्ठात्री वृषभानुनन्दिनी किशोरमूर्ति श्रीवनमालीके दर्शनमात्रसे काममोहित हो श्रीजी स्थित हैं। दूसरी तरहसे हितमय देहात्मक मूर्च्छित हो गया और कान्ता बनकर उनकी सेवा वृन्दावन है, उसमें हितमय इन्द्रियाँ गोपी हैं, अन्तः करनेके लिये तपस्या करने चला गया। ये परमप्रेष्ठा श्रीकृष्ण और अन्तस्तम श्रीजी हैं। इनमें जब सावधानीकी सखी हैं, इन्हें केवल श्रीश्यामके दर्शनकी इच्छा ही स्थिति रहती है, तब सब अपने-अपने स्वरूपमें रहते

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श्रीरासपञ्चाध्यायी ४१७ हैं, पर जहाँ वह शृंगारसुधासागर हितसमुद्र उमड़ा कि सब उसमें अन्तर्हित हो जाते हैं, अहर्निश डूबने- उतराने लगते हैं, जैसे बर्फकी पूतरी कभी गलती है, कभी पानी और बर्फ बनती है। विप्रयोगातापमें गलनेकी और शुद्ध शृंगारमें पूतरी-भावना है। इस प्रकार ऊँचे भावकी आराधिका ये व्रजांगनाएँ हैं, सम्मिलित रूप ही इनकी उपासना है, इन्हें ही उस सम्मिलित सौगन्ध्यका परिचय है, इन्होंने ही पूछा— अप्येणपत्त्युपगतः प्रिययेह गात्रै- स्तन्वन् दृशां सखि सुनिर्वृतिमच्युतो वः। कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुमरञ्जितायाः कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।११) हरिणीके कुछ दूर जाकर अन्तर्हित होनेपर यह गन्ध आया है, ऐसा वे अनुभव कर रही हैं। वे सोच रही हैं—यह गन्ध अवश्य कान्तांगसंगकुचकुंकुमरंजित कुन्दमालाका ही है। वह प्रियाजीके वक्षोजलग्न कुंकुमसे रँग उठी है, भीज गयी है; उसके बिना यह विविध रूपसे सम्मिश्रित अष्टगन्ध अन्यका हो ही नहीं सकता। अतः यहीं कहीं प्राणप्यारे छिपे हैं अथवा हरिणी कहे कि 'मैं नहीं जानती तुम्हारे श्यामसुन्दर कहाँ हैं?' तो कहती हैं—'नहीं, तुम झूठ बोलती हो, श्यामसुन्दर यहीं हैं, इसका प्रमाण यह सौगन्ध्य दे रहा है। सखि हरिणी! मान न करो, बतलाओ, प्यारे मनमोहन कहाँ विराजे हैं?' ये प्रेष्ठ सखीके भाव हैं। दूसरे भावकी सखी कहती हैं—'वे श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहन केवल वृषभानुनन्दिनीके पति नहीं, अपितु 'कुलपति' हैं, फिर देखो उनका अन्याय, वे अकेली वृषभानुनन्दिनीके साथ ही रमण कर रहे हैं।' व्रजांगनाओंकी पुनः हरिणीपर दृष्टि जाती है। वे कहती हैं—'यह हरिणी नहीं, सर्वदुःखहारिणी हैं, श्रीकृष्ण-दर्शन कराकर सर्वदुःख दूर करनेवाली हैं।' वे उसे अपनी सखी मानती हैं, यह इसलिये कि समान ख्याति होनेसे सख्य होता है। व्रजांगना भी कृष्णपत्नी हैं और हरिणी भी (कृष्णसार)-पत्नी हैं, अतः कृष्णपत्नीत्वेन सख्य हुआ। दूसरे यह पुण्यवती है। 'कृष्णो मृगयतेऽनेनेति कृष्णमृगः।' वही 'एण' कहलाता है। पत्नी कहनेसे 'पत्युर्नो यज्ञसंयोगे' से यज्ञसम्बन्ध सूचित हुआ—याज्ञिककी पत्नी। मानो दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्यादि श्रीकृष्णमिलनके लिये ही किया और उसे कृष्णार्पण कर दिया। इस तरह कृष्णको ढूँढ़नेवाले मृगकी—एणकी पत्नी यह हरिणी कृष्णको ही ढूँढ़नेवाली है, यह हमारी सखी है। फिर यह और हम दोनों हरिणाक्षी हैं। श्रीकृष्णमनोहारिणी हम हैं और दुःखहारिणी यह है। गोपांगनाओंके हरिणीके प्रति बड़े मार्मिक भाव हैं। वे कहती हैं— 'हे सखि हरिणी! हमको एक शंका है कि कहीं तुम हमसे सापत्यभाव तो नहीं रखती हो? यह तो नहीं सोचती हो कि इन सौतोंको उनका परिचय कैसे दूँ, श्रीश्यामसुन्दरका तो मुझे अवश्य दर्शन मिला, पर इन सौतोंको कैसे बतलाऊँ?' फिर कहती हैं—'पहले यह एणपत्नी अवश्य रही, पर अब तो कृष्णपत्नी ही हो गयी है; क्योंकि 'क्वचित्वेणुरववञ्चितचित्ताः** गोपिका** इव विमुक्तगृहाशाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३५।१९) श्रीकृष्णकी मुरलीने गोपिकाओंकी तरह इनके भी घरबारकी आशा छुड़ा दी। ऐसा होनेसे मृगोंने इनके साथ द्वेष नहीं किया, प्रत्युत इनको साथ लेकर भगवान् कृष्णकी पूजा की— 'पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः ॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।११) गोपांगनाओंद्वारा हरिणियोंके सौभाग्यकी सराहना इनके पति स्वयं 'कृष्णसार' हैं, वे भगवत्परायणा अपनी पत्नीसे द्वेष कैसे करेंगे? हरिणी पशुकोटिमें है, पशु मूढ़मति गिने जाते हैं। परंतु ये कृष्णप्रेमवती हरिणी मूढ़मति भी धन्य है, हम व्रजांगना विवेकवती भी अहरिणाक्षी हैं, अधन्य हैं। इनके पति कृष्णसार (कृष्णपरायण) हैं, इनको साथ लेकर श्रीकृष्णका दर्शन करने आते हैं। हमारे पति अभिमानसार हैं, अतः 'इमा धन्याः वयं विवेकवत्योऽधन्याः।' प्रेमवती होनेके कारण जैसे व्रजांगना कृष्णपत्नी, वैसे ही हरिणी भी कृष्णपत्नी हैं—

४१८ भक्तिसुधा 'धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९) इसमें 'अपि' का 'हरिण्यः' के साथ सम्बन्ध लगाया। मूढमति हैं, अतः धन्य हैं। मूढ़—मोहसे (श्रीकृष्ण-मोहसे) व्याप्त है मति जिनकी, ऐसी ये हैं। ये 'पुष्टिमार्गी' हो गयीं। 'पोषणं तदनुग्रहः' सभी इसे मानते हैं। कहीं अपने पुरुषार्थसे प्राणी कृतार्थ होता है और कहीं श्रीकृष्णचन्द्र पूर्णतम पुरुषोत्तम ही अपनी अनुकम्पासे उसे कृतार्थ करते हैं। उत्तराके गर्भमें परीक्षित्‌का अपना कोई पुरुषार्थ नहीं था, वहाँ मायाजवनिकाका अपसारण करके भगवान्‌ने अनुग्रह किया। तात्पर्य यह कि जो सर्वसाधनशून्य हो, उसे भगवान् अपने अनुग्रहसे साधनसम्पन्न करके अपना दर्शन देते हैं। हरिणीको अपने प्रभुकी पूजासामग्रीका परिज्ञान नहीं, कोई बोध नहीं, कोई सामग्री ही नहीं। ऐसी स्थितिमें उन्हें भगवान्‌ने अपनी अनुकम्पासे स्वरूपसाक्षात्कार कराया। अब उनका वही मूढ़मतित्व भूषण हो गया, विवेकशून्य न होकर अब वे कृष्णविषयक आसक्तिमती हो गयीं। मोह दो प्रकारका होता है—एक तो वह, जिसमें कुछ पता न रहे, दूसरा गाढ़ स्नेह, श्रीकृष्णके प्रति आसक्ति। श्रीकृष्णविषयक स्नेह ही तरल न होकर अत्यन्त गाढ़ मुद्रामें मोह होता है, अतः 'मूढमतयोऽपि धन्याः' कहा गया। इसके प्रतिकूल विवेकवती भी अधन्य हैं। विज्ञानकी यथार्थ सफलता श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द पूर्णतम पुरुषोत्तममें उक्त मोह ही सम्भव है और सब तो दो कौड़ीका है। स्वयं भगवान्‌ने इनका अपनेमें प्रेम प्रकट किया, आसक्तिभरे नेत्रोंसे प्रभुके दर्शन करें, यही इनकी पूजा है। पूजामें फूल चढ़ाये जाते हैं। हरिणियोंने अपने कमलदलसदृश नयनोंको जो प्रेमरसपूर्ण थे, श्रीश्यामसुन्दर मुरलीमनोहरके चरणोंमें चढ़ाया। उन्होंने इस पूजाके बदलेमें प्रतिपूजन भी प्राप्त किया, पूजाकी सफलता तभी है। प्रतिपूजन न मिले, पूजा ही स्वीकार हो जाय यह भी बहुत है। किसी भक्तने भगवान्‌के इस प्रतिपूजनपर उन्हें उलाहना भी दिया है—'प्यारे श्यामसुन्दर, वह तुम्हारी नीति समझमें नहीं आती, तुम व्रजकर्दममें विचरते हो, पर याज्ञिकोंके मण्डपमें एक बार भी नहीं पधारे। उनकी लम्बी स्तुतियोंका कोई उत्तर नहीं देते, पर व्रजमें बछड़ोंकी भी हुंकारका उत्तर देते हो, बड़े-बड़े महात्माओंके स्वामी बनना नहीं चाहते, पर इन पुंश्चली गोपियोंका दास बनना चाहते हो।' हरिणांगनाओंकी पूजाके फलमें भगवान्‌ने उनका प्रतिपूजन किया, अपने अनुकम्पापूर्ण नेत्रोंसे उनकी ओर देख दिया। बड़े-बड़े पुजारियोंको पूज्य-स्वरूप आदिका परिज्ञान रहता है, पर पूजामें मोह, आसक्ति, बछड़ोंकी-सी हुंकार एक बार भी नहीं होती। जैसे स्नेहसे पुजारी पूजा करेगा, प्रभु भी वैसे ही स्नेहसे प्रतिपूजन कर देंगे। हरिणांगनाओंको तो मंगलमयी स्वानुकम्पासे स्वविषयक मोह, सूझ आदि प्रभुने दी कि 'तुम अपने इन नेत्रोंसे हमारी पूजा करो' और फिर प्रतिपूजन भी किया। परंतु इस पूजाकी सफलता 'मूढमति' होनेसे ही हुई। पुजारी पूजा करते-करते पूजाकी सामग्रीको भूल जाय, सेव्यमें सेवककी आसक्ति हो जाय, यही मूढ़मतित्व है, यही सच्ची पूजा है और यही सहस्रों करोंसे स्वीकृत होती है। उन हरिणांगनाओंका ही यह सौभाग्य है कि भगवान्‌ने उनके समीप वेशपरिवर्तन किया, विचित्र वेश धारण किया—'उपात्तविचित्रवेषम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९) विचित्र अर्थात् नायिकावेश धारण किया। मानो श्रीवृषभानुनन्दिनीके साथ वर्तमान होकर हरिणियोंके समक्ष श्रीश्यामसुन्दरने वेश बदला। इतना मूढ़मतित्व, इतनी आसक्ति भगवान्‌के प्रति हरिणांगनाओंको हुई। अतएव पहले मृगपत्नी, फिर कृष्णपत्नी होनेपर भी इनके पतियोंको श्रीकृष्णसे द्वेष नहीं हुआ। इस गहराईपर दृष्टि डालनेसे व्रजांगनाओंने अपनी शंकाका समाधान पा लिया कि इन्हें हमारे प्रति सापत्न्य, ईर्ष्या नहीं है, ये तो हमारी ही तरह अन्तरंग हैं। अतएव उन्हें 'सखी' सम्बोधन करनेमें कोई संकोच नहीं। नित्यकुंजमन्दिरमें प्रविष्ट सखी कहती है कि 'हे हरिणांगने! तुम हमारे बराबर हो; क्योंकि हमारी मति उनके सामने मूढ़ हो जाती है। इस तुल्यतासे तुममें हमारा सखित्व है, सापत्न्य नहीं।'

श्रीरामपञ्चाध्यायी ४१९ जो कान्तभाववती व्रजांगना हैं, उनका भी तुम्हारे दर्शन करने इधरसे निकले हैं?' यहाँ सम्भावना सापत्‍न्य नहीं; क्योंकि वैसा होनेपर कोई भी सौत और प्रश्न दोनों हैं- 'दृशां सुनिर्वृतिं तन्वन् इह पतिका पता किसीको न देगी। अतः ये भी 'सखी' उपगतः।' 'निर्वृति' परानन्दका नाम है, उसके साथ कहकर परम प्रीति बतला रही हैं। यदि कोई कहे कि 'सु' भी जुड़ा है। नेत्रोंकी सुन्दरता, विशेष आह्लादकी एकपत्नीत्वेन सापत्‍न्य तो होगा ही, तब कहा-वे सार्थकता तभी सम्भव है, जब उन्हें श्रीश्यामसुन्दर भगवान् 'अच्युत' हैं। इसी आशयसे प्रकृत पद्य मदनमोहन देखनेको मिलें। अन्यथा उनकी सुघराई दो 'अप्येणपत्न्यो०' (श्रीमद्भा० १०।३०।११)-में कौड़ीकी है। यह बहुत ऊँची बात है कि वे 'अच्युत' पद है। ईर्ष्या वहाँ होती है, जहाँ एक कमलदललोचन जगभयमोचन मोहन भी इन नेत्रोंको स्वामी और अनेक पत्नी हों अर्थात् स्वामी, सौन्दर्य, देखनेके लिये उत्सुक हों और दोनों, दोनोंके नेत्रोंको सौभाग्य आदिका परिच्छिन्न होना, प्रेमके चुक जानेका लुभायें। यह तो श्रीव्रजसुन्दरी-जैसोंके लिये ही सम्भव डर होना आदि ही ईर्ष्याका मूल है, यह प्राकृत है, जो उन त्रैलोक्य-मनोमोहनके भी मनको मोह लेती नायकभावमें है, परंतु जहाँके सौगन्ध्य, सौन्दर्यादि है-हरण कर लेती है-'आभीरवामनयनाहृत- अपरिच्छन्न हैं, चुकनेवाले नहीं, संविदानन्दसुधानिधि मानसाय''''।' यह गोपी-कृष्ण दोनोंकी शिकायत है। हैं, वहाँ ईर्ष्या कैसी? 'यह रस विरस होत नहीं वे कहती हैं-'वे हमारे धैर्यादिको चुरा ले गये, कबहूँ।' जहाँ थाह ही नहीं, वहाँ ईर्ष्या भी नहीं। मनोमंजूषिकाके भीतरसे। यह सब किया उन्होंने केवल अतएव भक्त नहीं चाहते कि हमारे भगवान्‌को कोई नेत्रोंसे।' उधर आभीरवामनयनाओंने उनके मनको हर न भजे। हाँ, ऐसा भी भाव कभी होता है। जैसे लिया, वह भी नेत्रोंसे ही। अतएव वे अमना हो गये। श्रीश्यामसुन्दरके पक्षकी सखी जब श्रीवृषभानुनन्दिनीके पहले भी वे 'अमना' ही थे। तभी तो 'रन्तुं मनश्चक्रे' पास जाती है, तब उस पक्षकी सखियोंको यह शंका कहा गया है। गोपांगनाओंके सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्यपर होती है कि 'कहीं यह हमारे प्यारे श्यामसुन्दरको न वे 'अमना' मुग्ध हो गये और उनके साथ रास करनेके भजने लग जाय' और उसे वहाँसे हटानेका प्रयत्न लिये मन बनाया, पर वह भी फिर हृत हो गया। करती है कि यदि सखि! तुम अपने धर्मकी रक्षा अपने प्रियतमके दर्शनोंकी तीव्र चाहती हो तो शीघ्र ही उनके सामीप्यका परिवर्जन उत्कण्ठा ही सच्ची प्रीति है करो। प्रेमकी 'अहेरिव कुटिला गतिः' है। यह ये अन्तरंग भाव हैं। जैसे वेदान्ती 'त्वं' पदार्थका केवल तात्कालिक भावविशेष है। वास्तवमें यह शोधन करते हैं, वैसे ही भावुक अपना शोधन करते प्रेमरस समुद्र अथाह है, कभी चुकनेवाला नहीं, हैं। दोनों भाव हैं। अपने इष्टपर स्वयं लुब्ध होना और अतएव सभी भक्त सभीको बुलाते हैं। इस प्रकार अपनेपर उन्हें लुभाना। प्यारेके दर्शनोंकी प्रतीक्षांमें सापत्‍न्यव्यावृत्त्यर्थ ही उक्त पदमें 'अच्युत' पद है। चित्त सदा ललचा रहे। इसी प्रतीक्षाकी पुष्टिके लिये अथवा व्रजांगनाओंका कहना है कि 'सापत्‍न्य वृन्दावनके बाँके बिहारीजीके मन्दिरमें दर्शनके समय बराबरीमें होता है, सो तुम तो सखि हरिणि ! हमसे क्षण-क्षणमें परदा आता रहता है, जिससे दर्शनोंकी बहुत बड़ी हो, उन प्राणप्यारे नन्दनन्दनके साथ सब प्रतीक्षा, उत्कण्ठा बढ़ती ही रहती है। प्रियतमके जगह जा सकती हो, दर्शन कर सकती हो। परंतु हम दर्शनोंकी दिनभर चिन्ता, विह्वलता, नवीनता बनी तो कुलांगना हैं, हमारे लिये सर्वत्र जाना मना है। सखि रहे-यही सच्ची प्रीति है। बहिर्मुखोंके लिये यह हरिणि! यह मत कहना कि हमने तुम्हारे प्यारे कठिन है, परंतु भावुकोंके लिये यह सुगम बन जाता मनमोहनका दर्शन नहीं किया है; क्योंकि हम उन है। 'चलापि यच्छ्रीर्न जहाति कर्हिचित् ॥' (श्रीमद्भा० आँखोंको पहचानती हैं, जिन्होंने हमारे प्यारे मोहनका १।११।३३) समस्त सौन्दर्यका धाम साक्षात् लक्ष्मी दर्शन किया है। सखि ! बतलाओ, क्या प्यारे श्यामसुन्दर भी लोभवश प्रतिक्षण नवनवायमान रमणीयताके

४२० भक्तिसुधा अपारसागर उन प्रभुके पादारविन्दको छोड़ती ही नहीं, क्योंकि क्षण-क्षणके बाद उसमें सुन्दरता आ रही है, लक्ष्मी विचारती ही रह जाती हैं कि 'अब अगले क्षण आनेवाली सुन्दरताका और आस्वाद ले लूँ, तब चलूँ।' आजतक अगली सुन्दरताके लिये उनका लोभ न कभी पूरा ही हुआ और न वे गयीं हीं। 'यद्यप्यसौ पार्श्वगतो रहोगतस्तथापि तस्याङ्घ्रियुगं नवं नवम्।' (श्रीमद्भा० १।११।३३) एक-एक रोममें अनन्त नेत्र, नासिका आदिके होनेपर भी उस आनन्दकी समस्तताका अनुभव असम्भव ही है, वह बढ़ता ही जायगा। इस समयकी, इसके पहलेकी, इससे अगली और उससे भी अगले क्षणकी आनन्दानुभूति किंरूप है, इसका विवेक सर्वदा दुर्घट ही रहेगा। जिसका नाम ही चंचला (बिजली) है, वह भी यहाँ अचंचला (स्थिर) हो जाती है। यह है उस प्रभुके स्वरूपकी महिमा। इसके एक लेशका भी अनुभव होनेपर, 'भजन करनेमें मन नहीं लगता' की शिकायत कैसे रह जायगी? हाँ, तब उलटी शिकायत हो सकती है—'घरके काम-काजमें मन नहीं लगता।' परंतु यह शिकायत तो केवल गोपांगनाओंने ही की— चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु यन्निर्विवेशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये। पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद् यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३४) उन्हें यह चिन्ता अवश्य हुई कि इस मनोमृगको मोहनके मधुर मोहपाशसे कैसे मुक्त करें? जबतक यह स्थिति न आये, तबतक उन पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म श्रीकृष्णचन्द्रकी मोहन मधुर मूर्तिको हर तरह नवीन बनाये रखनेका प्रयत्न करते रहो। प्रभुकी सेवामें नया वेष, नये भूषण, नवीन भोज, झूलोंके अवसरपर सावन-भादोंकी नवीन-नवीन मनोहर घटाओंका चमत्कार आदि यथावसर होता रहे, जिससे नवीनता आती रहे, उत्सुकता बनी रहे, बढ़ती रहे। पहले बनावटी चमत्कारकी पूर्णता हो ले तो फिर तुरंत स्वाभाविक चमत्कार नयनोंको लुभा लेगा। इसलिये पहले प्रभुके नये-नये शृंगार, भोग, राग आदिसे चित्तकी तत्प्रवणता सम्पादित होती रहे। उसकी सिद्धिके लिये तनुजा, वित्तजा सेवा होती रहे— 'तत्सिद्धयै तनुवित्तजा।' कई सम्प्रदायोंमें विप्रयोग शृंगार भावना चलती है। असमयमें भी वे उसमें मग्न होते हैं। श्रीश्यामसुन्दरके मथुरागमन और गोपियोंकी व्रजमें विरहदशाके पदोंसे उसमें तल्लीन हो जाते हैं। तभी यह भाव पुष्ट होता है। यद्यपि वास्तवमें 'वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति' का सिद्धान्त है तथापि विप्रयोगोत्पादनार्थ यह उचित है। इसीलिये सभी भावुक आचार्यों, श्रीजीवगोस्वामी, श्रीवल्लभाचार्य आदिने उन अंशोंपर व्याख्या लिखी है। जिस समय भगवान्‌का मन्दिर खुले, दर्शन हों, उस समय भगवत्सम्प्रयोगकी और मन्दिर बन्द होनेपर भगवद्विप्रयोगकी भावना प्रभुके स्मरण बनाये रखनेमें साधन है। मन्दिर बन्द होनेपर अपनेमें गोकुलस्थ गोपी और भगवान्‌में मथुरास्थ कृष्णकी भावना करनी चाहिये, समझना चाहिये कि श्रीश्यामसुन्दर मथुरा गये हैं, अभी दो-तीन क्षणमें ही पधारनेवाले हैं। उस भावकी भावना करके देखना चाहिये। कैसी स्थिति प्रकट होती है। इस प्रकार मन्दिरादिमें दर्शनके समय संयोग और पटमंगलके समय वियोगकी भावना आदिसे नवीन-नवीन भावोंकी उत्कण्ठा, प्रतीक्षा आदिका उदय होनेके भाव चित्तमें आने चाहिये। लोकमें नायकको नवीन-नवीन शृंगारवती नायिकाएँ ही वशमें कर सकती हैं, यही स्थिति नायककी है। परंतु यह भगवद्विषयक स्थिति बहुत ऊँची है। इस तरह हरिणी अपने नेत्रोंको सफल समझती हैं। पर सफलता तब, जब उनके नेत्र भी इन्हें देखें। ये हरिणीके भाव हैं। ये गोपांगनाएँ किसी साधारण हरिणीको अपनी सखी नहीं बना रहीं, अपितु वे श्रीमोहनमनोहारिणी, गोपीदुःखहारिणी हरिणी हैं। जैसे हरिणी श्यामसुन्दरको रागसे देखती हैं, वैसे ही वे भी देखते हैं, उनका मन, हृदय-रागका बड़ा ही लोभी है। श्रीश्यामसुन्दरके हरिणी-दर्शनमें दो भाव हैं, एक तो यह कि इसके नेत्र श्रीवृषभानुनन्दिनीके जैसे हैं। दूसरा यह कि यह सुरंगी है, अन्तरंगा है, अतः इसे वृषभानुनन्दिनीके जैसे रागसे देखते हैं। इस

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श्रीरामपञ्चाध्यायी ४२१ तरह हरिणीके सामने व्रजदेवियोंका प्रणय-पाथोधि वे माधुर्यरसके व्यंजक होते हैं। प्रस्तुत पद्यमें 'तन्वन् नाना भावोंमें उद्वेलित हो पड़ा और न जाने अभी दृशां निर्वृतिम्' (श्रीमद्भा० १०।३०।११) से ही कितना हो। आनन्द अर्थ स्फुट था, पर उसके साथ 'सु' भी '.....तन्वन् दृशां सखि सुनिर्वृतिमच्युतो वः।' लगाया गया। यह विशेष तात्पर्यावद्योतक है। (श्रीमद्भा० १०।३०।११) व्रजांगनाओंका कहना है कि 'श्रीश्यामसुन्दर इधर इसपर बहुतसे भाव पीछे कहे गये। इसमें एक आये होंगे, पर यह माधुर्य तो जो तुम्हारे नेत्रोंमें है, भाव यह भी अन्तर्हित है कि हरिणीको श्रीकृष्णका श्रीप्रियाजीके संयोगका सूचक है। उनके श्रीअंगसे सन्दर्शन अवश्य हुआ है, वह इसका निषेध कर नहीं परिवेष्टित श्यामसुन्दरका स्वरूप सखि हरिणांगने! सकती। अवश्य ही भगवान् कृष्ण इस मार्गसे पधारे तुम्हारे नेत्रोंमें बसा है।' यही 'निर्वृति' के साथ 'सु' हैं और हरिणीको उन्होंने दर्शन दिया है; क्योंकि का वैशिष्ट्य है। यही बात 'गात्रैस्तन्वन् दृशां सखि वस्तुतः कृष्णसारसतीके नेत्रोंमें व्रजांगनाओंको मनोहरता, सुनिर्वृतिमच्युतो वः।' (श्रीमद्भा० १०।३०।११)- अद्भुतता, मुग्धता, सुभगता, चपलता, तीक्ष्णता, श्यामता से भी ध्वनित हुई है। व्रजांगनाजनके विचारसे केवल आदिका अनुभव हुआ है। ये सब गुण रसिकशेखर श्रीश्यामसुन्दरके गात्रमात्रसे हरिणांगनाके नेत्रोंकी सुनिर्वृति श्रीश्यामसुन्दरमें विराजते हैं। व्रजांगनाएँ यह कल्पना नहीं हुई, अपितु श्रीराधासंयुक्त मोहनके दर्शनसे ही करती हैं कि प्राणप्यारे मोहनका दर्शन करते-करते वह सम्भव हुई। फिर उस लोकोत्तर निर्वृतिमें गात्रमात्र हरिणीके इन नेत्रोंमें वे बस गये, उन्हींकी वह ही सहायक नहीं, अपितु स्वेद, रोमांच, कम्प, परस्पर मादकता, मोहकता इनमें छायी हुई है। यद्यपि अनुरागोद्रेक आदिका उद्भव भी मुख्य है। मिलित श्रीश्यामसुन्दरके नेत्रोंमें तीक्ष्णता नहीं है, परंतु विप्रयोगवश युगलमूर्तिके दर्शनसे हरिणांगनाके भी गात्रोंमें स्वेद, गोपांगनाओंको उसकी प्रतीति हो रही है। इस प्रकार कम्प, रोमांच, अनुरागोद्रेक आदि हुआ। अनुरागोद्रेक श्रीकृष्णपरमात्मक सभी भाव हरिणीके नेत्रोंमें और वैसे ही तत्तदनुभावोंसे युक्त सरसता, सुनिर्वृति व्रजांगनाओंको स्पष्ट प्रतिफलित दीख पड़ रहे हैं, उसके नेत्रोंमें व्यक्त हुई। इस तरह हरिणांगनाके अतएव वे कहती हैं—'सखि हरिणी, तुम छिपानेकी नेत्रोंके लिये सुनिर्वृतिका विस्तार अथवा प्रदान करते चेष्टा न करो, अवश्य ही वे हमारे प्राणधन, परमानन्दमूर्ति हुए श्रीश्यामसुन्दर इधरसे होते हुए गये हैं। तात्पर्य श्रीश्यामसुन्दर तुम्हारे नेत्रोंमें आनन्द उड़ेलते हुए यह कि प्रथम तो रसका दर्शन, वह भी अनुपानसहित, अवश्य इधरसे ही गये हैं; क्योंकि उनके दर्शनके बिना रसाक्रान्त तथा रसानुभवसहित हुआ। रसोद्रेकसे रोमांच तुम्हारे इन नेत्रोंमें यह विशेषता आ नहीं सकती।' होता है, पर यहाँ मूर्तिमान् रसमें ही रोमांच, स्वेद, इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि श्रीकृष्ण कम्प आदि हैं। ये सब गात्रगत बहुवचन और 'रस' हैं, 'रसो वै सः' (तैत्तिरीय० २।७) यह श्रुति सुनिर्वृति आदि पदद्योत्य विशेषताएँ हैं। ही इसमें प्रमाण है। इस प्रकार रसस्वरूप श्रीकृष्ण

श्यामसुन्दरके दर्शनमें ही नेत्रोंके

स्वरूपसे ही मधुर हैं। फिर अनुपानकी विशेषतासे

होनेका साफल्य

उनकी रसात्मकता और भी चमत्कृत हो जाती है। हरिणांगनाके नेत्र और श्रीश्यामसुन्दरका रूप, लोकमें एक रस अनुपानभेदसे सेवनकर्ताको अनेक इन दोनोंसे व्रजांगनाएँ खूब परिचित हैं। जितना वे प्रकारसे लाभ पहुँचाता है, विभिन्न रोगोंकी निवृत्ति जानती हैं, उतना कोई कह ही नहीं सकता। करता है। वैसे ही ये निखिलरसामृतमूर्ति, अनन्तकोटि- उन्हींकी कृपासे कुछ कणका पता लगता है। फिर कन्दर्पदर्पदलनपटीयान् श्रीकृष्ण परमात्मा हैं। इनमें विरहावस्था-प्रयुक्त वाक्योंका अर्थ तो वे ही जानती अनुपानभेदसे रसभेद है। माधुर्यरसकी अभिस्रुति जब हैं। पहले इस व्याख्या-प्रसंगमें कहा गया है— वे कान्तासंयुक्त होते हैं, तब होती है। श्रीराधासंयोगसे 'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः' (श्रीमद्भा०

४२२ भक्तिसुधा १०।२१।७)। इसे श्रीमद्वल्लभाचार्यने फलाध्याय ही माना है। व्रजदेवियोंकी दृष्टिमें श्रीमदनमोहन मुरलीधरका दर्शन ही नेत्रवानोंके नेत्रवान् होनेका फल है। कोई भले ही स्वर्ग, अपवर्ग, कल्पवृक्ष आदिके दर्शन या प्राप्तिको नेत्रवत्ता या जप, तपका फल माने। परंतु व्रजसुन्दरियाँ तो कहती हैं— 'आँखवालोंका तो फल यही है। यदि इसके अतिरिक्त और कोई फल हो सकता है तो वह अन्धोंका ही होगा।' 'अक्षण्वतां फलमिदम्' में 'इदम्' कहा गया है, जिसका अर्थ 'सामने वर्तमान' है, पर श्रीश्याम वृन्दावनमें हैं और गोपांगना अपने भवनोंमें यह भावना कर रही हैं, तब श्रीकृष्ण उनके 'इदम्' के विषय कैसे हुए? परंतु इसका पर्यवसान इसीमें है कि व्रजांगनाओंके तीव्र संवेग-संचालित भावना- परिपाकका यह फल है कि वह यशोदोत्संगलालित पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण उनके समक्ष वहीं हैं, अतः 'इदम्' कहा। 'अक्षण्वताम्' यह पद देहधारियोंका उपलक्षण है, अतः व्रजांगनाओंके विचारसे प्राणिमात्रके नेत्रोंके लिये यदि कोई फल हो सकता है तो यही कि उन्हें श्रीश्यामसुन्दरके मुखारविन्दका दर्शन प्राप्त हो, अन्यथा नेत्र व्यर्थ हैं। श्रवण भी व्यर्थ हैं, यदि उन्हें उन श्रीभगवान्के वचनामृत और वेणुरवका पान करनेको न मिले। क्या यह घ्राण भी सार्थक कहा जा सकता है, जिसने एक बार भी भगवान्के चरणामृत-सौगन्ध्यका आस्वाद नहीं पाया ? भगवत्-सेवा-विमुख बाहुओंको कौन बाहु कहेगा? वे सब व्यर्थ ही हैं, जिनसे भगवत्सम्बन्धका ज्ञान नहीं होता। व्रजांगनाओंका तो स्पष्ट कहना है कि 'और कोई जाने चाहे न जाने, पर हम तो श्रीनन्दनन्दनके दर्शनको ही नेत्रोंका परम फल मानती हैं। अलौकिक साध्य-साधन श्रुतिरूप है—'धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः' वही वेदमन्त्रोंकी अधिष्ठात्री श्रुतिरूप व्रजदेवियाँ यह कह रही हैं।' यदि वह तत्त्व श्रुतिसे अविदित है तो भावुक कहता है—'श्रवणयोरलम श्रवर्णिर्मम··· तमवि- लोकयतो नयने वृथा···।' महर्षि वाल्मीकि भी कहते हैं— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ (वा०रा० २।१७।१४) आत्मा, बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ कोसती हैं—'हाय, किस दुष्टसे सम्बन्ध हुआ। किसके पल्ले पड़ीं, जो कभी भी एक बार भी उस दर्शनीयके दर्शन न मिले।' यह ठीक है पर—'स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते।' वह तो निर्वृत्तिक अन्तःकरणसे उपलब्ध होता है। वह तत्त्व तो बुद्धिसे भी परे है, इन्द्रियोंकी वहाँ पहुँच ही कहाँ— इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ (गीता ३।४२) परंतु इन्द्रियाँ इससे सहमत नहीं, वे तो कहा करती हैं—'हाय, हमारा जन्म उस दर्शनीयके दर्शनसे सफल न हुआ, हम उससे वंचित रह गयीं, हमारा रोम-रोम उसके साक्षात्कारके लिये तड़पता है, हम व्याकुल हैं।' कोई भी ऐसा नहीं, जो उन्हें न चाहे। वनगमनके समय भगवान् रामके मार्गको साँप और बिच्छू-जैसे विषैले जन्तुओंने भी साफ कर दिया और उनके दर्शनसे अपनेको धन्य समझा। एक और भी उक्ति है—'जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता॥' (रा०च०मा० १।२०४।२) काँटे भी उनके लिये कोमल हो जाते हैं। प्रकृतिका प्रत्येक परमाणु उनसे मिलनेके लिये उतावला हो उठता है। एक श्रुतिद्वारा इसका पूर्ण समर्थन प्राप्त है। वे अज्ञ हैं, जो यह कहते हैं कि 'जो श्रुतिमें नहीं, वह हमारे यहाँ है।' वस्तुतः जो श्रुतिमें नहीं, वह कहीं भी नहीं। महापुरुषों एवं महाभक्तोंने वेदप्रतिपाद्य वेदसारको ही अपनी 'वाणी' में कहा है—'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूः ·····आवृत्तचक्षुः···· (कठ० २।१।१) ब्रह्माने इन्द्रियोंकी बाह्य वृत्ति बना दी, अतः वे बाहर ही देखती हैं, भीतर नहीं। यहाँ 'व्यतृणत्' कहा, 'व्यरचयत्' ही कह देते। ऐसा कहनेमें कुछ तात्पर्य है। 'व्यतृणत्' हिंसार्थक 'तृंह्' धातुका रूप है, जिसका अर्थ हुआ 'हिंसितवान्।'

श्रीरामपञ्चाध्यायी ४२३ भाव यह कि ब्रह्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख बनाकर मारे जायें, वह काष्ठखण्ड अथवा पशु जिससे मारे उनको मार डाला। वे बिलबिलाती हैं, दुःखी हैं। जायें वह दण्ड ('पशवो हन्यते यत्र यद्वा अनेनेति 'पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।' (रा०च०मा० पशुघ्नः शुष्ककाष्ठम्') है अर्थात् श्रीहरिकथासे २।६४।७) मरण तो अच्छा, वियोगी तो इसे शौकसे कदाचित् जड काष्ठको ही विराग हो तो हो, पर चाहते हैं। ब्रह्माने इन्द्रियोंको शब्दादिकी ओर प्रवृत्त इन्द्रियवान् ऐसा कोई नहीं हो सकता। अतएव किया, यह ठीक नहीं किया; क्योंकि ऐसा करनेसे वे गोस्वामीजीने कहा है- 'श्रवनवंत अस को जग तत्त्वमात्रके सर्वाधिक अनुभवसे वंचित रह गयीं। इन्हें माहीं।' (रा०च०मा० ७।५३।५) 'यदि कोई है परमप्रज्ञासे जो आन्तर दर्शन करती हैं, ईर्ष्या है। तो वह दुःसंस्कारवश ही। बाकी सभी श्रीकृष्ण परतत्त्वका महत्त्व समझनेपर ये रोती हैं कि हाय, हमें परमात्माको चाहते हैं। इन्द्रियाँ रोती हैं, कोसती हैं- प्रपंचमें लगाया गया। ये इन सबको नहीं चाहतीं, ये 'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः' वे 'पिय तो पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र बियोग सम दुखु जग नाहीं' समझती हैं। आनन्दकन्दका परिरम्भण ही चाहती हैं। इस प्रकार यह जो प्रकृतिके पदार्थमात्रमें हलचल दिखायी चक्षु, श्रोत्र, घ्राणादि वास्तवमें उस सर्वान्तर्यामी सगुण पड़ रही है, वह और कुछ नहीं, केवल श्यामसुन्दरके स्वरूपके ही दिव्य रूप, दिव्य शब्द आदिको चाहते मिलनकी उतावली है। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रमण्डल, हैं, दुस्संस्कारवशात् शूकरकी विष्ठा प्रवृत्तिकी तरह अणु-अणु जो अविश्रान्त गतिसे दौड़ रहे हैं, इनका उन्हें प्राकृत शब्दादिमें स्वाद मिलता है। वही एकमात्र उद्देश्य है। प्रकृतिका प्रत्येक परमाणु अतएव कहा गया है- इसके लिये लालायित है। इसके प्राप्त होनेपर तो निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद्- सबकी चंचलता विलीन हो जाती है। इसका एक भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात्। उदाहरण लक्ष्मी है- 'चलापि यच्छ्रीर्न जहाति क उत्तमश्लोकगुणानुवादात् कर्हिचित्॥' (श्रीमद्भा० १।११।३३) उस समय पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात् ॥ आनन्दमग्न सब कूटस्थकी तरह होंगे। जिस समय (श्रीमद्भा० १०।१।४) मधुप मकरन्दपानमें मग्न होता है, उस समय उसका सचमुच श्रीकृष्ण परमात्माके चरितसे कौन गुंजारव समाप्त हो जाता है। अलिकुलमालासंकुल विमुख होगा? वह तत्त्व महामुनि, भक्त, मुमुक्षु, वनमालाधारी मुरलीमनोहरके दिव्य दर्शन होते ही सब यहाँतक कि विषयीका भी सेव्य है। 'सुनहिं बिमुक्त आनन्दविभोर, शान्त हो जाते हैं। ये सब दुःख उसके बिरत अरु बिषई।' (रा०च०मा० ७।१५।५) बिना हैं। हम 'रस' को सावरण रखते हैं। 'बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद श्रीमद्वल्लभाचार्यने 'बर्हापीडम्' (श्रीमद्भा० अरु मन अभिरामा ॥' (रा०च०मा० ७।५३।४) १०।२१।५) (वेणुगीत) पद्यकी व्याख्यामें वह गुणानुवाद अच्छा नहीं लगता केवल पशुघ्नको, श्रीभगवान्‌को उद्बुद्ध उभयविधशृंगार बतलाया है कसाईको, महापापीको। परंतु सदन कसाईको तो बड़ा और 'कनककपिशम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) अच्छा लगता था। अतः 'पशुघ्न' का अर्थ दूसरा से पीतवस्त्रको उस (रस)-का आवरण। अंगको है- 'अपगता शुक् यस्मात् सः, शोकमोह- उससे समाच्छन्न रखा है। यह इसलिये कि भावुक शून्यस्तत्त्वज्ञानी, तं हन्तीति अपशुघ्नः' अर्थात् जैसा देखेंगे, वैसा ही वर्णन करेंगे, उफान उसीका महाब्रह्मनिष्ठवधजन्य पातकवालेको ही श्रीहरिगुणानुवाद आयेगा। झरनोंके सम्पर्कमें जलकी तरह भावोंमें रस अच्छा नहीं लगता। परंतु कितने ही ऐसे पापी भी बढ़ता है और फिर वह प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, श्रीहरिगुण-श्रवणमहिमासे मुग्ध और मुक्त हुए सुने आनन्दमयादि कोशोंमें परिपूर्ण होकर रोम-रोममें गये हैं, अतः 'पशुघ्न' का अर्थ पशु जिसपर रखकर भरपूर होता है। जैसा अनुभव होगा, वैसा ही उद्गार

४२४ भक्तिसुधा होगा, उसीमें 'रसाभास' भी होगा। भगवान्का पीताम्बर माया है, दिव्य माया है, उनके सत्त्वादि विभिन्न रूप जैसे ब्रह्मदर्शन (ज्ञान)-में माया प्रतिबन्ध है, वैसे ही यह 'कनककपिश' वस्त्र है। मायाकी चकाचौंधमें ही जैसे दृष्टि रुक जाती है, वैसे ही भगवान्के देदीप्यमान पीतवस्त्रमें ही दृष्टि रह जाती है। इस प्रकार प्रभुविग्रहका साधारण वर्णन किया गया है। प्रकृतमें जिसकी प्रेप्साके लिये तत्त्वमात्र उतावले हो रहे हैं, उसके लिये यदि गोपांगनाएँ सर्वस्व त्याग करके उतावली हो रही हैं, उस रसास्वादके लिये व्यग्र हैं तो इसमें उनका क्या दोष है ? उनका कहना है कि जब ये हीरा, मोती (कंकड़-पत्थर), जड़ भी श्रीहरिके उरःस्थलको छोड़ना नहीं चाहते, तब 'का वा स्मरवशाः स्त्रियः?' कामकिंकरी, अज्ञानमूर्ति हम स्त्रियाँ कैसे उन्हें भुला सकती हैं? हमारे मन, बुद्धि, अन्तःकरण, रोम-रोममें वे बसे हुए हैं, हम उन्हें कैसे छोड़ें? श्रीमद्वल्लभाचार्यका कहना है कि सारे विधि- निषेध साधनमें होते हैं, फलमें नहीं, रसपानमें भेद नहीं। रसिकोंने समझा कि जो तत्त्व इन्द्रियादिसे अग्राह्य था, जो 'स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते' से व्यपदिष्ट हुआ, इन्द्रियोंकी विकलता दूर करनेके लिये, उनकी वांछाकी पूर्तिके लिये उन्हीं वांछाकल्पद्रुम प्रभुने अपना दिव्य रूप प्रकट किया और मानो कहा—'बाहुओ! मिल लो, आँखो! देख लो।' जो प्रभुकी इस कृपाका लाभ नहीं उठाते, वे वस्तुतः इन इन्द्रियोंसे कोसे जाते हैं। इस प्रसंगमें महर्षि वाल्मीकिके ये शब्द विशेष अर्थवान् हैं— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ (वा० रा० २।१७।१४) अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननु विवेशयतोर्र्वयस्यैः। वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।७) गोपियाँ कहती हैं—'सखियो! अपने सखाओंके साथ गायोंको खिरकमें भेजते हुए नन्दनन्दनके वेणुशोभित मुखका जिन्होंने सानुराग दर्शन किया है, उन्हीं नेत्रवानोंके नेत्र सफल हैं। इससे बढ़कर उनकी सफलता हम तो नहीं समझतीं।' हाँ तो वे श्रुतिरूपा गोपांगनाएँ 'अक्षण्वतां फलमिदम्' के 'इदम्' को खूब जानती हैं। इसके अतिरिक्त नेत्रवालोंके लिये उनकी दृष्टिमें और कोई फल ही नहीं—'न परं विदामः ।' जो वेदसम्मत नहीं, वह तो अवैदिक ही है। यहाँ गोपीरूपधरा श्रुतियाँ ही यह कह रही हैं—'अनुरक्तकटाक्षमोक्षपूर्वक जिन्होंने व्रजेशसुत श्रीबलराम तथा श्रीकृष्णके मुखका सातिशय दर्शन किया है, उन्हें ही नेत्रवत्ताका फल मिला है, क्योंकि नेत्रोंकी फलवत्ता इसीमें है।' इस प्रसंगमें व्रजांगनाएँ बड़ी चतुराईसे बात कर रही हैं। वे 'व्रजेशसुतयोः' में द्विवचन भावगुप्तिके लिये देती हैं, जिससे बलराम और कृष्ण दोनोंका ग्रहण हो। परंतु सहसा 'वक्त्रम्' एकवचन ही निकल जाता है; क्योंकि उनका तो अनुराग श्रीश्यामसुन्दरमें ही है। पर कहीं उनकी देवरानी, जेठानीके कानमें यह शब्द न पड़ जायें, इसलिये द्विवचनसे छिपाती हैं। वे व्रजकी नारियोंकी प्रकृतिसे परिचित हैं, वे खूब जानती हैं कि 'बलिहारि करो व्रजको बसिबो जहाँ पानीमें आग लगावें लुगाई।' श्रीश्यामसुन्दरके प्रेमको वे छिपाती हैं। कोई पूछे तो वे चट उत्तर दे दें कि 'हम तो व्रजपालके प्रति राजभक्ति प्रदर्शन कर रही हैं।' इन सब भावोंसे 'सुतयोः' द्विवचन बोलती हैं। परंतु जबतक श्रीश्यामसुन्दरका मुखचन्द्र सामने नहीं; तभीतक यह बनावट छिपी है और भावमहासागर शान्त है। पूर्णचन्द्रके दर्शन होते ही सागरकी मर्यादा भंग हो जाती है। यह प्राकृत पूर्णचन्द्र जलसमुद्रके हृदयसे उदित हुआ है और वह अप्राकृत श्रीकृष्णचन्द्र इसी व्रजांगनाओं या श्रीवृषभानुनन्दिनीके हृदयमहाभावसमुद्रसे आविर्भूत होता है। महाभावसमुद्र जबतक शान्त रहा, तबतक सर्वविधगोपन, सर्वविधविवेचन, पर ज्यों ही श्रीश्याममुखचन्द्रका ध्यान आया कि बस भावसमुद्र उमड़ पड़ा—छिपानेकी सब चालें भूल गयीं, 'वक्त्रम्'

श्रीरामपंचाध्यायी ४२५ एकवचन मुखसे निकल पड़ा। जबतक भावसमुद्रमें किस ओर गये हैं?' ज्वार-भाटा नहीं आया, तबतक लोक-वेद सबकी इस प्रकार श्रीव्रजेन्द्रनन्दनको ढूँढ़ती हुई गोपांगनाएँ मर्यादा सुरक्षित रही, फिर नहीं। ('व्रजेशसुतयोर्वक्त्रं लताओंसे, वृक्षोंसे, भूमिसे पूछती फिरती हैं। हरिणांगनाको यैर्निपीतम्', 'अक्षण्वतां फलमिदमेव') वे 'दर्शन' देखकर तो उनकी प्रश्नपरम्परा, उनकी जिज्ञासा, नहीं कहतीं, क्योंकि यह मोटी बात है, स्थूलदर्शिता उनकी श्रीकृष्णविषयिणी स्मृति उद्वेल महानदीका है। यहाँ तो कहा 'निपीतम्' जिसका सुधासमुद्रका अनुकरण करने लगी है। वे उसे सकलदुःखहारिणी भी समवगाहन करना है। इतने कुशल, सजीव हरिणी मान रही हैं। उन्हें विश्वास हो गया है कि नेत्रपुटोंके सामने सुवर्ण, हीरक आदिके पात्र तुच्छ हैं। इस हरिणीने हमारे प्राणधनको अवश्य देखा है। तभी ये इसी पूर्वानुभवसे हरिणीके प्रति 'तन्वन् दृशां सखि तो इसके नेत्रोंमें यह श्याम छवि, यह श्यामलता, सुनिर्वृतिमच्युतो वः' (श्रीमद्भा० १०।३०।११) चंचलता आदि उपलब्ध हो रही हैं। गोपांगना- कर रही हैं। 'अनुरक्तकटाक्षमोक्षम्' में दो भाव हैं- समूहमें मानिनी गोपियाँ परस्पर कहती हैं- 'वे यह मुखचन्द्र अनुरागियोंके कटाक्षमोक्षका स्थान है यशोदानन्दन सदा तो हमारा मान मनाते रहे, पर अब अथवा अनुरक्तोंकी ओर सानुराग कटाक्षमोक्षका स्थान क्या हो गया जो हम सब पूछती फिरती हैं, आकुला है अथवा अनुरक्तोंकी ओर सानुराग कटाक्षमोक्षणकी हैं और वे मिलतेतक नहीं। पहले वे हमें ढूँढ़ा करते क्रिया जिसमें हो रही है, वह है अथवा उस अवसरपर थे, हमारा मान मनाते थे, पर आज हमारी सुधितक गोपांगनाएँ कहती हैं- 'सखि! दर्शन करने कैसे जायँ, नहीं लेते- हम कितनी बेहाल हैं। इसपर कोई कहती कुललज्जा मुखचन्द्रका दर्शन नहीं करने देती।' दूसरी है- 'कयाचिद् धूर्तया नीतः' अर्थात् 'कोई धूर्त कहती है- 'चलो, किसी निकुंजमें छिपकर दर्शन सखी उन्हें बहकाकर ले गयी, अन्यथा वे ऐसे नहीं करेंगी।' इसपर भी एक तीसरीका तर्क उठता है- हैं।' इस समय उनकी घ्राणने कुन्दमालाके, जो 'क्या वे मोहन अपने भृकुटिकोदण्ड तानकर तुम्हारी कान्तांगसंगकुचकुंकुमरंजिता थी, सौगन्ध्यका अनुभव लज्जाको कहीं फेंक न देंगे?' यह तो एक मुखचन्द्रके किया। वे कहने लगीं- अब तो वह बात स्पष्ट हो दर्शनकी भावकल्पना हुई। यहाँ तो प्रिया-प्रियतम दोनों गयी, देखो, यह कुन्दमालाकी सुगन्ध आ रही है, यह विराजमान हैं। इन्हें भी अकेले मुख-चन्द्रदर्शनमें बाधा केवल मालाकी ही सुगन्ध नहीं। किंतु उस धूर्ताके है, अतः सम्मिलित दर्शन चाहती हैं। वहाँ भी अंगमें लगे कुंकुमका भी इसमें समावेश है। 'सखियो! 'व्रजेशसुतयोः' कहा गया है। 'सुतयोः' में सुता वे तो स्वयं हमें छोड़कर कहीं जानेवाले नहीं थे, और सुत दो हैं, व्रजेश वृषभानु बाबा और व्रजेश अवश्य किसी धूर्ताने ही उन्हें फँसाया है।' दूसरी नन्दबाबा, दोनोंके पुत्री और पुत्र श्रीराधा-कृष्णका कहती है- 'सखि! देखो, वे श्यामसुन्दर बड़े छलिया दर्शन अभिप्रेत है। मुखत्वसे मुखमें एकवचन कहा हैं, वास्तवमें वे किसीके नहीं। अपने सुन्दर शरीरको गया है। व्रजांगनाओंके भावमहावायुने गौर-श्याम दिखाकर उन्होंने केवल तुम्हारे नेत्रोंकी सुनिर्वृति, समुद्रको एक कर दिया और सम्मिलित दर्शन करके सानन्दता सम्पादित की है। इससे वे तुम्हें आकांक्षा कृतार्थ हो गयीं। भाव यह कि जिन्होंने सम्मिलित दर्शन या मोहमें डाल गये। उनके त्रिलोकमनोहर दर्शनसे किया, वे ही कृतार्थ हुए, शेष तो मोरपंखकी तरह तुम्हारे नेत्र अवश्य सफल हुए, उनमें उनकी वह व्यर्थ ही रहे। व्रजांगना कहती हैं- 'अतः हे एणपलि! त्रिभंग-ललित छवि अवश्य बस गयी, पर मन नहीं तुम्हारे नेत्रोंसे, तुम्हारे नेत्रोंमें छलक रही इस सुनिर्वृतिसे भरा, हृदय तरसता रह गया। सुन्दर वस्तुके दर्शनमात्रसे यह निश्चित है कि तुम्हें युगलसरकारका अवश्य दर्शन तृप्ति नहीं होती। दर्शनाभावमें उसके लिये उत्कट हुआ है, हम इस वस्तुको खूब समझती हैं, तुम हमसे उत्कण्ठा बनी रहती है। एक उग्र रुचि जागरित हो छिपा नहीं सकती। शीघ्र बताओ, वे श्रीश्यामाश्याम जाती है। कथंचित् दर्शनकी अभिलाषा पूरी होनेपर