भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 778 में से

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पृष्ठ 426

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४१६ भक्तिसुधा बनकर कानोंका कुण्डल बनूँ। प्राकृत कस्तूरी, कमल नहीं होती, ये तो श्रीयुगलकिशोर श्यामश्यामाका ही आदिसे उन्हें ईर्ष्या होती है—ये वक्षोजमें विलिप्त, अन्तरंग दर्शन करके, जिस युगलसम्मिलित सौन्दर्य- गण्डचुम्बी क्यों हो गये ? श्रीजीके कंचुकी कमल लावण्यसुधाका वे स्वयं भी अनुभव नहीं कर सकते, कस्तूरी बननेको लालायित होते हैं, अधिक अन्तरंगता उसमें निरन्तर छकी रहती हैं। इनमें स्वसुखित्वकी चाहते हैं, तदर्थ तप करनेका संकल्प करते हैं। इसी गन्ध भी नहीं, ये केवल तत्सुखसुखित्व-भावनाकी प्रकार श्रीजी भी श्रीश्यामसुन्दरके अंगभूषण बननेको प्रतीक हैं। श्रीश्यामाश्याममें भी परस्पर तत्सुखसुखित्वकी लालायित रहती हैं। इस प्रसंगमें उनकी उक्ति है— ही भावना है। जहाँ कहीं श्रीनन्दनन्दनकी विभोरता ऐसे पुरुषभूषणके द्वारा जो सुन्दरियाँ अपने हृदयको या विह्वलता दीख पड़ती है, वह श्रीजीके उद्देश्यसे भूषित नहीं करतीं, उनके कुल, शील, यौवन, गुण, उन्हें प्रसन्न करनेके लिये ही। इसी तरह श्रीजीकी भी रूप आदिको धिक्कार है— समस्त क्रियाएँ इसी उद्देश्यसे होती हैं। परमप्रेष्ठ ईदृशा पुरुषभूषणेन या अन्तरंग ये सखी, जिन्हें कभी कामगन्ध नहीं, इन भूषयन्ति हृदयं न सुभ्रुवः । दोनोंके अद्भुत प्रेमानन्द-सुधासिन्धुमें सदा मग्न रहती धिक् तदीयकुलशील यौवनं हैं। लोकमें तो नायक-नायिका-सम्मिलनमें संयोजकोंको धिक् तदीयगुणरूपसम्पदः ॥ ही ईर्ष्या होती है, सम्भली आदि उसकी अधिकारिणी श्रीकृष्णको जिसने अपना सर्वस्व नहीं ही नहीं। किंतु यहाँ तो सर्वथा श्रीकिशोरीजीके समान बनाया, वह सोचनीय है होते हुए भी यह सखियाँ कभी श्रीश्यामसुन्दरके जिसने श्रीकृष्ण परमात्माको अपना सर्वस्व नहीं परिरम्भणकी इच्छांतक नहीं करतीं। इस प्रकार बनाया, वह धिक्कृत ही है, वही सोचनीय है, वही प्रेमानन्दसुधासिन्धुके मध्यमें नित्य वृन्दावनधाम विराजमान शूकर, कूकर, कीट, पतंग आदि बनते हैं। जो है, उसमें कदम्ब कुसुमित हो रहे हैं, वहीं विशाल भवाटवीमें भटकते-भटकते परेशान हैं, उन्हें अपने कमल विकसित हैं, उनपर प्रेष्ठा सखी स्थित है, वहीं उद्धारके लिये श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दको अपने नित्यनिकुंजमन्दिर शोभित है, उसमें श्रीलाडिली और हृदयका भूषण बनाना चाहिये। फिर ये तो प्रेष्ठ सखी लाल लीलामुग्ध हो विराजते हैं। ये जब कभी हैं, इनका पूर्वराग भी श्रीश्यामसुन्दरमें नहीं हुआ। क्रम लीलावियोगके तीव्रतापमें विह्वलताका अनुभव करते यह है कि पहले श्रीकृष्ण-प्रेम, फिर उसका आस्वादन हैं, तब वे सखियाँ सम्प्रयोगसुधाकी सृष्टि करके उन्हें और उसके बाद श्रीप्रियाजीका संग। परंतु इनको तो तोष पहुँचाती हैं, उनकी लीलामें सहायक होती हैं। संयुक्त श्रीश्यामाश्यामविषयक अनुराग ही पहले हुआ, यह है हित विशुद्ध अनुराग। ऐसा उदाहरण लोकमें नहीं है। अपने रूप, वेश 'कौषीतकी उपनिषद्' का प्रसंग है—प्रतर्दन आदिसे सर्वथा श्रीजीके समान होनेपर भी इन्हें इन्द्रलोकमें इन्द्रसे युद्ध करके वर माँगता है— श्रीश्यामसुन्दरविषयक पूर्वानुरागतक नहीं हुआ, केवल 'यन्मनुष्याय हिततमं तन्मे ब्रूहि।' वह विशुद्धरसात्मक सम्मिलित स्वरूपका दर्शन ही अभिप्रेत रहा, यह सर्वाधिष्ठान ही हित है, उसीका परिणाम वृन्दावन है, कितनी निःस्पृहता है। 'क्रिया सर्वापि सैवात्र परं उसमें व्रजांगनाएँ हैं, उनके अंकमें पूर्णतम पुरुषोत्तम कामी न विद्यते।' (श्रीवल्लभाचार्य) यह विशुद्ध परब्रह्म आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र यशोदानन्दन विराजमान प्रेम है। कामको तो बतलाया कि वह कोटिकामकमनीय हैं, उनके अंकमें ब्रह्मविद्याधिष्ठात्री वृषभानुनन्दिनी किशोरमूर्ति श्रीवनमालीके दर्शनमात्रसे काममोहित हो श्रीजी स्थित हैं। दूसरी तरहसे हितमय देहात्मक मूर्च्छित हो गया और कान्ता बनकर उनकी सेवा वृन्दावन है, उसमें हितमय इन्द्रियाँ गोपी हैं, अन्तः करनेके लिये तपस्या करने चला गया। ये परमप्रेष्ठा श्रीकृष्ण और अन्तस्तम श्रीजी हैं। इनमें जब सावधानीकी सखी हैं, इन्हें केवल श्रीश्यामके दर्शनकी इच्छा ही स्थिति रहती है, तब सब अपने-अपने स्वरूपमें रहते