भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरासपञ्चाध्यायी ४१५ आश्वासन दे रही हैं। श्रीकृष्ण-प्राप्तिकी अनुगुण कल्पनामें बही जा रहीं गोपांगनाएँ हरिणीके पीछे हो लेती हैं और कहती जाती हैं—'ये बड़ी दयावती हैं, देखो, इनके बिना अन्य किसीने भी परिचय नहीं दिया।' थोड़ी दूर चलकर हरिणी गायब हो गयीं। अब वे आपसमें पूछती हैं कि 'वह कहाँ चली गयीं?' तब एक उत्तर देती है—'बस, प्रियतमाके साथ प्राणधन यहीं विराज रहे हैं। अतः सूचकत्वदोषसे मुक्त होनेके लिये वह हरिणी हमें यहाँ छोड़कर चली गयी।' इतनेहीमें एक वायुका झोंका आया, उसके लोकोत्तर सौगन्ध्यका प्रत्यक्ष अनुभव करके सब एक साथ कह उठीं— 'कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुमरण्जितायाः कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।११) अवश्य श्रीश्यामसुन्दर यही हैं, उनके बिना यहाँ यह गन्ध