भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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४१४ | भक्तिसुधा

प्रसिद्ध है। तात्पर्य यह कि गूढ़तत्त्व थोड़ेमें छिपाकर कहा जाता है—'परोक्षप्रिया ह वै देवाः।' 'इदं सर्वं दृष्टवान्' इस व्युत्पत्ति-सम्पन्न 'इन्द्र' को इन्द्र कहा, क्योंकि सब जान न लें। परम धन राधानाम अधार। जाहि पिया वंशी में गावत सुमिरत बारंबार। तातें शुक प्रकट नहिं कीनो 'जानि सार को सार'। श्रीशुकजीने द्वादशस्कन्धात्मक वाङ्मय भगवद्रूप भागवतमें दशम स्कन्धको हृदयरूप बतलाया है, उसमें रासपञ्चाध्यायी पंचप्राणात्मक है। इसमें भी उस तत्त्वको गुप्त करके केवल 'प्रिया' शब्दसे कहा। जहाँ नहीं ही रहा गया, वहाँ 'अनयाराधितो नूनम्' से संश्लिष्ट करके कहा। अपने लोकोत्तर प्रेमसे श्रीकृष्ण परमात्माको जिसने वशीकृत किया है, वह स्वाधीनभर्तृका श्रीराधा हैं। वस्तुतस्तु 'तस्माज्ज्योतिरभूद् द्वेधा राधामाधवरूपकम्' के गुप्त रहस्यको गुप्त रीतिसे यहाँ श्रीशुकने कहा है, जिसका स्वरूप वेदोंमें भी अत्यन्त गुप्त है। इस प्रकार श्रीकृष्णान्वेषणकातरा व्रजांगनाओंने प्रियाके साथ श्रीश्यामसुन्दर भगवान्‌का हरिणीसे पता पूछा। धरित्रीके प्रति वे उदासीन हो गयीं, उसे उन्होंने महामदान्ध समझा। इसका कारण स्पष्ट ही था कि वह उनके प्रिय श्रीश्यामसुन्दरके अंकुश, कमल, ध्वजा, वज्रादि चिह्नोंसे अलंकृत चरण तथा श्रीप्रियाजीके चरण-संस्पर्शसे भी विचित्रितांगी हो रही थीं। यह उन्मदान्ध हमारी वेदनाको क्या जानेगी, यही सब सोचकर व्रजांगनाओंने उससे अधिक बात नहीं की। दूसरी बात यह कि उससे अधिक महत्त्व उन्हें हरिणीमें दीख पड़ा; क्योंकि वह अकेली वियोगिनी वियोग दुःखको जाननेवाली थी। इसीलिये उसकी प्रशंसा करती हैं—'एणपत्नी' ('पत्युर्नो यज्ञसंयोगे' यज्ञस्य फलभोक्त्रीत्यर्थः) अर्थात् हे हरिणसति! तुम याज्ञिककी पत्नी हो। बड़े-बड़े याज्ञिक कर्मकलाप हरिणी और हरिणका रूप धरकर वृन्दावनमें रासेश्वरीके नित्यविहारका दर्शन करने आये हैं। अतः हे यज्ञसम्बन्धी पत्नि! तुम बड़ी पवित्र हो, हमें मनमोहन श्यामसुन्दरका पता बतलाओ। दूसरे, तुम्हारा यह सौभाग्य है कि श्रीकृष्णचन्द्र मुरलीमनोहर स्वयं तुम्हारे पास आये हैं और तीसरी विशेषता यह है कि तुम वृन्दावनकी हरिणी हो। इससे बढ़कर और क्या पुण्य होगा? फिर सखि, वे प्यारे नन्दलाल भी अकेले नहीं आये, किंतु अपनी प्रेयसीरत्नचूड़ामणि श्रीव्रजेश्वरीके साथ आये हैं। अतः तुमने प्रिया-प्रियतमका दर्शन अवश्य पाया है। विशेषकर उन यशोदानन्दनका तुमसे बड़ा अनुराग है; क्योंकि तुम्हारे नेत्र उनकी प्रियाजीके जैसे हैं और तुम्हारे इन नेत्रोंको देखकर श्रीश्यामसुन्दर विभोर हो जाते हैं। तुम भी उन श्रीकृष्णचन्द्र आनन्द- कन्दके मुख-सौन्दर्य-दर्शनकी प्रेमी हो, इन विशाल नेत्रोंसे उन घनश्यामके मुखमाधुर्यामृत, सौन्दर्यामृतका पान न हो तो ये व्यर्थ हैं। ये हरिणियाँ बड़ी भाग्यशालिनी हैं— क्वणितवेणुरववञ्चितचित्ताः कृष्णमन्वसत कृष्णगृहिण्यः। गुणगणार्णमनुगत्य हरिण्यो गोपिका इव विमुक्तगृहाशाः॥ (श्रीमद्भा० १०।३५।१९) श्रीमुरलीमनोहरके मुखपर विराजमान वंशीके क्वणनसे जो श्रीप्रियाजीकी नूपुरध्वनिके सदृश है, इन हरिणांगनाओंका चित्त हरा गया। श्रीकृष्णके वेणुनिनादसे वे आकृष्ट और आसक्त हो गयीं। गुणोंके समुद्र उन श्यामसुन्दरके समीप पहुँच गयीं और कुटुम्बकी आशा छोड़कर, भोजनादिकी चिन्तासे मुक्त होकर या लोकव्यवहारको भुलाकर उन्होंने गोपांगनाओंका अनुसरण किया। कृष्णप्रेमप्रमत्त ये एणपत्नियां उत्कृष्ट कोटिकी हैं, ऐसा समझकर व्रजांगना उनसे पूछती हैं— ‘देवियो! क्या तुमने हमारे प्राणाधारको इधर कहीं देखा है?' हरिणी स्वभावतः कुछ आगे जा रही हैं, परंतु गोपांगना समझती हैं कि इन्होंने हमारी प्रार्थनाको सुन लिया और अभी श्रीश्यामसुन्दर जहाँ विराज रहे हैं, वहाँ पहुँचानेके लिये, वहाँका पता देनेके लिये ये आगे-आगे जा रही हैं। मानो ये कह रही हैं कि 'आओ, हम तुम्हें श्रीश्यामाश्यामका पता दें, पता क्या दें, तुम हमारे पीछे-पीछे चली आओ, हम तुम्हें उनसे मिला ही दें' और ये फिर-फिर ग्रीवा मोड़कर मानो