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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

४१४ | भक्तिसुधा

प्रसिद्ध है। तात्पर्य यह कि गूढ़तत्त्व थोड़ेमें छिपाकर कहा जाता है—'परोक्षप्रिया ह वै देवाः।' 'इदं सर्वं दृष्टवान्' इस व्युत्पत्ति-सम्पन्न 'इन्द्र' को इन्द्र कहा, क्योंकि सब जान न लें। परम धन राधानाम अधार। जाहि पिया वंशी में गावत सुमिरत बारंबार। तातें शुक प्रकट नहिं कीनो 'जानि सार को सार'। श्रीशुकजीने द्वादशस्कन्धात्मक वाङ्मय भगवद्रूप भागवतमें दशम स्कन्धको हृदयरूप बतलाया है, उसमें रासपञ्चाध्यायी पंचप्राणात्मक है। इसमें भी उस तत्त्वको गुप्त करके केवल 'प्रिया' शब्दसे कहा। जहाँ नहीं ही रहा गया, वहाँ 'अनयाराधितो नूनम्' से संश्लिष्ट करके कहा। अपने लोकोत्तर प्रेमसे श्रीकृष्ण परमात्माको जिसने वशीकृत किया है, वह स्वाधीनभर्तृका श्रीराधा हैं। वस्तुतस्तु 'तस्माज्ज्योतिरभूद् द्वेधा राधामाधवरूपकम्' के गुप्त रहस्यको गुप्त रीतिसे यहाँ श्रीशुकने कहा है, जिसका स्वरूप वेदोंमें भी अत्यन्त गुप्त है। इस प्रकार श्रीकृष्णान्वेषणकातरा व्रजांगनाओंने प्रियाके साथ श्रीश्यामसुन्दर भगवान्‌का हरिणीसे पता पूछा। धरित्रीके प्रति वे उदासीन हो गयीं, उसे उन्होंने महामदान्ध समझा। इसका कारण स्पष्ट ही था कि वह उनके प्रिय श्रीश्यामसुन्दरके अंकुश, कमल, ध्वजा, वज्रादि चिह्नोंसे अलंकृत चरण तथा श्रीप्रियाजीके चरण-संस्पर्शसे भी विचित्रितांगी हो रही थीं। यह उन्मदान्ध हमारी वेदनाको क्या जानेगी, यही सब सोचकर व्रजांगनाओंने उससे अधिक बात नहीं की। दूसरी बात यह कि उससे अधिक महत्त्व उन्हें हरिणीमें दीख पड़ा; क्योंकि वह अकेली वियोगिनी वियोग दुःखको जाननेवाली थी। इसीलिये उसकी प्रशंसा करती हैं—'एणपत्नी' ('पत्युर्नो यज्ञसंयोगे' यज्ञस्य फलभोक्त्रीत्यर्थः) अर्थात् हे हरिणसति! तुम याज्ञिककी पत्नी हो। बड़े-बड़े याज्ञिक कर्मकलाप हरिणी और हरिणका रूप धरकर वृन्दावनमें रासेश्वरीके नित्यविहारका दर्शन करने आये हैं। अतः हे यज्ञसम्बन्धी पत्नि! तुम बड़ी पवित्र हो, हमें मनमोहन श्यामसुन्दरका पता बतलाओ। दूसरे, तुम्हारा यह सौभाग्य है कि श्रीकृष्णचन्द्र मुरलीमनोहर स्वयं तुम्हारे पास आये हैं और तीसरी विशेषता यह है कि तुम वृन्दावनकी हरिणी हो। इससे बढ़कर और क्या पुण्य होगा? फिर सखि, वे प्यारे नन्दलाल भी अकेले नहीं आये, किंतु अपनी प्रेयसीरत्नचूड़ामणि श्रीव्रजेश्वरीके साथ आये हैं। अतः तुमने प्रिया-प्रियतमका दर्शन अवश्य पाया है। विशेषकर उन यशोदानन्दनका तुमसे बड़ा अनुराग है; क्योंकि तुम्हारे नेत्र उनकी प्रियाजीके जैसे हैं और तुम्हारे इन नेत्रोंको देखकर श्रीश्यामसुन्दर विभोर हो जाते हैं। तुम भी उन श्रीकृष्णचन्द्र आनन्द- कन्दके मुख-सौन्दर्य-दर्शनकी प्रेमी हो, इन विशाल नेत्रोंसे उन घनश्यामके मुखमाधुर्यामृत, सौन्दर्यामृतका पान न हो तो ये व्यर्थ हैं। ये हरिणियाँ बड़ी भाग्यशालिनी हैं— क्वणितवेणुरववञ्चितचित्ताः कृष्णमन्वसत कृष्णगृहिण्यः। गुणगणार्णमनुगत्य हरिण्यो गोपिका इव विमुक्तगृहाशाः॥ (श्रीमद्भा० १०।३५।१९) श्रीमुरलीमनोहरके मुखपर विराजमान वंशीके क्वणनसे जो श्रीप्रियाजीकी नूपुरध्वनिके सदृश है, इन हरिणांगनाओंका चित्त हरा गया। श्रीकृष्णके वेणुनिनादसे वे आकृष्ट और आसक्त हो गयीं। गुणोंके समुद्र उन श्यामसुन्दरके समीप पहुँच गयीं और कुटुम्बकी आशा छोड़कर, भोजनादिकी चिन्तासे मुक्त होकर या लोकव्यवहारको भुलाकर उन्होंने गोपांगनाओंका अनुसरण किया। कृष्णप्रेमप्रमत्त ये एणपत्नियां उत्कृष्ट कोटिकी हैं, ऐसा समझकर व्रजांगना उनसे पूछती हैं— ‘देवियो! क्या तुमने हमारे प्राणाधारको इधर कहीं देखा है?' हरिणी स्वभावतः कुछ आगे जा रही हैं, परंतु गोपांगना समझती हैं कि इन्होंने हमारी प्रार्थनाको सुन लिया और अभी श्रीश्यामसुन्दर जहाँ विराज रहे हैं, वहाँ पहुँचानेके लिये, वहाँका पता देनेके लिये ये आगे-आगे जा रही हैं। मानो ये कह रही हैं कि 'आओ, हम तुम्हें श्रीश्यामाश्यामका पता दें, पता क्या दें, तुम हमारे पीछे-पीछे चली आओ, हम तुम्हें उनसे मिला ही दें' और ये फिर-फिर ग्रीवा मोड़कर मानो

श्रीरासपञ्चाध्यायी ४१५ आश्वासन दे रही हैं। श्रीकृष्ण-प्राप्तिकी अनुगुण कल्पनामें बही जा रहीं गोपांगनाएँ हरिणीके पीछे हो लेती हैं और कहती जाती हैं—'ये बड़ी दयावती हैं, देखो, इनके बिना अन्य किसीने भी परिचय नहीं दिया।' थोड़ी दूर चलकर हरिणी गायब हो गयीं। अब वे आपसमें पूछती हैं कि 'वह कहाँ चली गयीं?' तब एक उत्तर देती है—'बस, प्रियतमाके साथ प्राणधन यहीं विराज रहे हैं। अतः सूचकत्वदोषसे मुक्त होनेके लिये वह हरिणी हमें यहाँ छोड़कर चली गयी।' इतनेहीमें एक वायुका झोंका आया, उसके लोकोत्तर सौगन्ध्यका प्रत्यक्ष अनुभव करके सब एक साथ कह उठीं— 'कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुमरण्जितायाः कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।११) अवश्य श्रीश्यामसुन्दर यही हैं, उनके बिना यहाँ यह गन्ध

यहाँ पृष्ठ का सुस्पष्ट, पंक्ति-दर-पंक्ति (line-by-line) देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

४१६ भक्तिसुधा बनकर कानोंका कुण्डल बनूँ। प्राकृत कस्तूरी, कमल नहीं होती, ये तो श्रीयुगलकिशोर श्यामश्यामाका ही आदिसे उन्हें ईर्ष्या होती है—ये वक्षोजमें विलिप्त, अन्तरंग दर्शन करके, जिस युगलसम्मिलित सौन्दर्य- गण्डचुम्बी क्यों हो गये ? श्रीजीके कंचुकी कमल लावण्यसुधाका वे स्वयं भी अनुभव नहीं कर सकते, कस्तूरी बननेको लालायित होते हैं, अधिक अन्तरंगता उसमें निरन्तर छकी रहती हैं। इनमें स्वसुखित्वकी चाहते हैं, तदर्थ तप करनेका संकल्प करते हैं। इसी गन्ध भी नहीं, ये केवल तत्सुखसुखित्व-भावनाकी प्रकार श्रीजी भी श्रीश्यामसुन्दरके अंगभूषण बननेको प्रतीक हैं। श्रीश्यामाश्याममें भी परस्पर तत्सुखसुखित्वकी लालायित रहती हैं। इस प्रसंगमें उनकी उक्ति है— ही भावना है। जहाँ कहीं श्रीनन्दनन्दनकी विभोरता ऐसे पुरुषभूषणके द्वारा जो सुन्दरियाँ अपने हृदयको या विह्वलता दीख पड़ती है, वह श्रीजीके उद्देश्यसे भूषित नहीं करतीं, उनके कुल, शील, यौवन, गुण, उन्हें प्रसन्न करनेके लिये ही। इसी तरह श्रीजीकी भी रूप आदिको धिक्कार है— समस्त क्रियाएँ इसी उद्देश्यसे होती हैं। परमप्रेष्ठ ईदृशा पुरुषभूषणेन या अन्तरंग ये सखी, जिन्हें कभी कामगन्ध नहीं, इन भूषयन्ति हृदयं न सुभ्रुवः । दोनोंके अद्भुत प्रेमानन्द-सुधासिन्धुमें सदा मग्न रहती धिक् तदीयकुलशील यौवनं हैं। लोकमें तो नायक-नायिका-सम्मिलनमें संयोजकोंको धिक् तदीयगुणरूपसम्पदः ॥ ही ईर्ष्या होती है, सम्भली आदि उसकी अधिकारिणी श्रीकृष्णको जिसने अपना सर्वस्व नहीं ही नहीं। किंतु यहाँ तो सर्वथा श्रीकिशोरीजीके समान बनाया, वह सोचनीय है होते हुए भी यह सखियाँ कभी श्रीश्यामसुन्दरके जिसने श्रीकृष्ण परमात्माको अपना सर्वस्व नहीं परिरम्भणकी इच्छांतक नहीं करतीं। इस प्रकार बनाया, वह धिक्कृत ही है, वही सोचनीय है, वही प्रेमानन्दसुधासिन्धुके मध्यमें नित्य वृन्दावनधाम विराजमान शूकर, कूकर, कीट, पतंग आदि बनते हैं। जो है, उसमें कदम्ब कुसुमित हो रहे हैं, वहीं विशाल भवाटवीमें भटकते-भटकते परेशान हैं, उन्हें अपने कमल विकसित हैं, उनपर प्रेष्ठा सखी स्थित है, वहीं उद्धारके लिये श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दको अपने नित्यनिकुंजमन्दिर शोभित है, उसमें श्रीलाडिली और हृदयका भूषण बनाना चाहिये। फिर ये तो प्रेष्ठ सखी लाल लीलामुग्ध हो विराजते हैं। ये जब कभी हैं, इनका पूर्वराग भी श्रीश्यामसुन्दरमें नहीं हुआ। क्रम लीलावियोगके तीव्रतापमें विह्वलताका अनुभव करते यह है कि पहले श्रीकृष्ण-प्रेम, फिर उसका आस्वादन हैं, तब वे सखियाँ सम्प्रयोगसुधाकी सृष्टि करके उन्हें और उसके बाद श्रीप्रियाजीका संग। परंतु इनको तो तोष पहुँचाती हैं, उनकी लीलामें सहायक होती हैं। संयुक्त श्रीश्यामाश्यामविषयक अनुराग ही पहले हुआ, यह है हित विशुद्ध अनुराग। ऐसा उदाहरण लोकमें नहीं है। अपने रूप, वेश 'कौषीतकी उपनिषद्' का प्रसंग है—प्रतर्दन आदिसे सर्वथा श्रीजीके समान होनेपर भी इन्हें इन्द्रलोकमें इन्द्रसे युद्ध करके वर माँगता है— श्रीश्यामसुन्दरविषयक पूर्वानुरागतक नहीं हुआ, केवल 'यन्मनुष्याय हिततमं तन्मे ब्रूहि।' वह विशुद्धरसात्मक सम्मिलित स्वरूपका दर्शन ही अभिप्रेत रहा, यह सर्वाधिष्ठान ही हित है, उसीका परिणाम वृन्दावन है, कितनी निःस्पृहता है। 'क्रिया सर्वापि सैवात्र परं उसमें व्रजांगनाएँ हैं, उनके अंकमें पूर्णतम पुरुषोत्तम कामी न विद्यते।' (श्रीवल्लभाचार्य) यह विशुद्ध परब्रह्म आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र यशोदानन्दन विराजमान प्रेम है। कामको तो बतलाया कि वह कोटिकामकमनीय हैं, उनके अंकमें ब्रह्मविद्याधिष्ठात्री वृषभानुनन्दिनी किशोरमूर्ति श्रीवनमालीके दर्शनमात्रसे काममोहित हो श्रीजी स्थित हैं। दूसरी तरहसे हितमय देहात्मक मूर्च्छित हो गया और कान्ता बनकर उनकी सेवा वृन्दावन है, उसमें हितमय इन्द्रियाँ गोपी हैं, अन्तः करनेके लिये तपस्या करने चला गया। ये परमप्रेष्ठा श्रीकृष्ण और अन्तस्तम श्रीजी हैं। इनमें जब सावधानीकी सखी हैं, इन्हें केवल श्रीश्यामके दर्शनकी इच्छा ही स्थिति रहती है, तब सब अपने-अपने स्वरूपमें रहते

यहाँ दिए गए पृष्ठ का शुद्ध देवनागरी में पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण प्रस्तुत है:

श्रीरासपञ्चाध्यायी ४१७ हैं, पर जहाँ वह शृंगारसुधासागर हितसमुद्र उमड़ा कि सब उसमें अन्तर्हित हो जाते हैं, अहर्निश डूबने- उतराने लगते हैं, जैसे बर्फकी पूतरी कभी गलती है, कभी पानी और बर्फ बनती है। विप्रयोगातापमें गलनेकी और शुद्ध शृंगारमें पूतरी-भावना है। इस प्रकार ऊँचे भावकी आराधिका ये व्रजांगनाएँ हैं, सम्मिलित रूप ही इनकी उपासना है, इन्हें ही उस सम्मिलित सौगन्ध्यका परिचय है, इन्होंने ही पूछा— अप्येणपत्त्युपगतः प्रिययेह गात्रै- स्तन्वन् दृशां सखि सुनिर्वृतिमच्युतो वः। कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुमरञ्जितायाः कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।११) हरिणीके कुछ दूर जाकर अन्तर्हित होनेपर यह गन्ध आया है, ऐसा वे अनुभव कर रही हैं। वे सोच रही हैं—यह गन्ध अवश्य कान्तांगसंगकुचकुंकुमरंजित कुन्दमालाका ही है। वह प्रियाजीके वक्षोजलग्न कुंकुमसे रँग उठी है, भीज गयी है; उसके बिना यह विविध रूपसे सम्मिश्रित अष्टगन्ध अन्यका हो ही नहीं सकता। अतः यहीं कहीं प्राणप्यारे छिपे हैं अथवा हरिणी कहे कि 'मैं नहीं जानती तुम्हारे श्यामसुन्दर कहाँ हैं?' तो कहती हैं—'नहीं, तुम झूठ बोलती हो, श्यामसुन्दर यहीं हैं, इसका प्रमाण यह सौगन्ध्य दे रहा है। सखि हरिणी! मान न करो, बतलाओ, प्यारे मनमोहन कहाँ विराजे हैं?' ये प्रेष्ठ सखीके भाव हैं। दूसरे भावकी सखी कहती हैं—'वे श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहन केवल वृषभानुनन्दिनीके पति नहीं, अपितु 'कुलपति' हैं, फिर देखो उनका अन्याय, वे अकेली वृषभानुनन्दिनीके साथ ही रमण कर रहे हैं।' व्रजांगनाओंकी पुनः हरिणीपर दृष्टि जाती है। वे कहती हैं—'यह हरिणी नहीं, सर्वदुःखहारिणी हैं, श्रीकृष्ण-दर्शन कराकर सर्वदुःख दूर करनेवाली हैं।' वे उसे अपनी सखी मानती हैं, यह इसलिये कि समान ख्याति होनेसे सख्य होता है। व्रजांगना भी कृष्णपत्नी हैं और हरिणी भी (कृष्णसार)-पत्नी हैं, अतः कृष्णपत्नीत्वेन सख्य हुआ। दूसरे यह पुण्यवती है। 'कृष्णो मृगयतेऽनेनेति कृष्णमृगः।' वही 'एण' कहलाता है। पत्नी कहनेसे 'पत्युर्नो यज्ञसंयोगे' से यज्ञसम्बन्ध सूचित हुआ—याज्ञिककी पत्नी। मानो दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्यादि श्रीकृष्णमिलनके लिये ही किया और उसे कृष्णार्पण कर दिया। इस तरह कृष्णको ढूँढ़नेवाले मृगकी—एणकी पत्नी यह हरिणी कृष्णको ही ढूँढ़नेवाली है, यह हमारी सखी है। फिर यह और हम दोनों हरिणाक्षी हैं। श्रीकृष्णमनोहारिणी हम हैं और दुःखहारिणी यह है। गोपांगनाओंके हरिणीके प्रति बड़े मार्मिक भाव हैं। वे कहती हैं— 'हे सखि हरिणी! हमको एक शंका है कि कहीं तुम हमसे सापत्यभाव तो नहीं रखती हो? यह तो नहीं सोचती हो कि इन सौतोंको उनका परिचय कैसे दूँ, श्रीश्यामसुन्दरका तो मुझे अवश्य दर्शन मिला, पर इन सौतोंको कैसे बतलाऊँ?' फिर कहती हैं—'पहले यह एणपत्नी अवश्य रही, पर अब तो कृष्णपत्नी ही हो गयी है; क्योंकि 'क्वचित्वेणुरववञ्चितचित्ताः** गोपिका** इव विमुक्तगृहाशाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३५।१९) श्रीकृष्णकी मुरलीने गोपिकाओंकी तरह इनके भी घरबारकी आशा छुड़ा दी। ऐसा होनेसे मृगोंने इनके साथ द्वेष नहीं किया, प्रत्युत इनको साथ लेकर भगवान् कृष्णकी पूजा की— 'पूजां दधुर्विरचितां प्रणयावलोकैः ॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।११) गोपांगनाओंद्वारा हरिणियोंके सौभाग्यकी सराहना इनके पति स्वयं 'कृष्णसार' हैं, वे भगवत्परायणा अपनी पत्नीसे द्वेष कैसे करेंगे? हरिणी पशुकोटिमें है, पशु मूढ़मति गिने जाते हैं। परंतु ये कृष्णप्रेमवती हरिणी मूढ़मति भी धन्य है, हम व्रजांगना विवेकवती भी अहरिणाक्षी हैं, अधन्य हैं। इनके पति कृष्णसार (कृष्णपरायण) हैं, इनको साथ लेकर श्रीकृष्णका दर्शन करने आते हैं। हमारे पति अभिमानसार हैं, अतः 'इमा धन्याः वयं विवेकवत्योऽधन्याः।' प्रेमवती होनेके कारण जैसे व्रजांगना कृष्णपत्नी, वैसे ही हरिणी भी कृष्णपत्नी हैं—

४१८ भक्तिसुधा 'धन्याः स्म मूढमतयोऽपि हरिण्य एता या नन्दनन्दनमुपात्तविचित्रवेषम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९) इसमें 'अपि' का 'हरिण्यः' के साथ सम्बन्ध लगाया। मूढमति हैं, अतः धन्य हैं। मूढ़—मोहसे (श्रीकृष्ण-मोहसे) व्याप्त है मति जिनकी, ऐसी ये हैं। ये 'पुष्टिमार्गी' हो गयीं। 'पोषणं तदनुग्रहः' सभी इसे मानते हैं। कहीं अपने पुरुषार्थसे प्राणी कृतार्थ होता है और कहीं श्रीकृष्णचन्द्र पूर्णतम पुरुषोत्तम ही अपनी अनुकम्पासे उसे कृतार्थ करते हैं। उत्तराके गर्भमें परीक्षित्‌का अपना कोई पुरुषार्थ नहीं था, वहाँ मायाजवनिकाका अपसारण करके भगवान्‌ने अनुग्रह किया। तात्पर्य यह कि जो सर्वसाधनशून्य हो, उसे भगवान् अपने अनुग्रहसे साधनसम्पन्न करके अपना दर्शन देते हैं। हरिणीको अपने प्रभुकी पूजासामग्रीका परिज्ञान नहीं, कोई बोध नहीं, कोई सामग्री ही नहीं। ऐसी स्थितिमें उन्हें भगवान्‌ने अपनी अनुकम्पासे स्वरूपसाक्षात्कार कराया। अब उनका वही मूढ़मतित्व भूषण हो गया, विवेकशून्य न होकर अब वे कृष्णविषयक आसक्तिमती हो गयीं। मोह दो प्रकारका होता है—एक तो वह, जिसमें कुछ पता न रहे, दूसरा गाढ़ स्नेह, श्रीकृष्णके प्रति आसक्ति। श्रीकृष्णविषयक स्नेह ही तरल न होकर अत्यन्त गाढ़ मुद्रामें मोह होता है, अतः 'मूढमतयोऽपि धन्याः' कहा गया। इसके प्रतिकूल विवेकवती भी अधन्य हैं। विज्ञानकी यथार्थ सफलता श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द पूर्णतम पुरुषोत्तममें उक्त मोह ही सम्भव है और सब तो दो कौड़ीका है। स्वयं भगवान्‌ने इनका अपनेमें प्रेम प्रकट किया, आसक्तिभरे नेत्रोंसे प्रभुके दर्शन करें, यही इनकी पूजा है। पूजामें फूल चढ़ाये जाते हैं। हरिणियोंने अपने कमलदलसदृश नयनोंको जो प्रेमरसपूर्ण थे, श्रीश्यामसुन्दर मुरलीमनोहरके चरणोंमें चढ़ाया। उन्होंने इस पूजाके बदलेमें प्रतिपूजन भी प्राप्त किया, पूजाकी सफलता तभी है। प्रतिपूजन न मिले, पूजा ही स्वीकार हो जाय यह भी बहुत है। किसी भक्तने भगवान्‌के इस प्रतिपूजनपर उन्हें उलाहना भी दिया है—'प्यारे श्यामसुन्दर, वह तुम्हारी नीति समझमें नहीं आती, तुम व्रजकर्दममें विचरते हो, पर याज्ञिकोंके मण्डपमें एक बार भी नहीं पधारे। उनकी लम्बी स्तुतियोंका कोई उत्तर नहीं देते, पर व्रजमें बछड़ोंकी भी हुंकारका उत्तर देते हो, बड़े-बड़े महात्माओंके स्वामी बनना नहीं चाहते, पर इन पुंश्चली गोपियोंका दास बनना चाहते हो।' हरिणांगनाओंकी पूजाके फलमें भगवान्‌ने उनका प्रतिपूजन किया, अपने अनुकम्पापूर्ण नेत्रोंसे उनकी ओर देख दिया। बड़े-बड़े पुजारियोंको पूज्य-स्वरूप आदिका परिज्ञान रहता है, पर पूजामें मोह, आसक्ति, बछड़ोंकी-सी हुंकार एक बार भी नहीं होती। जैसे स्नेहसे पुजारी पूजा करेगा, प्रभु भी वैसे ही स्नेहसे प्रतिपूजन कर देंगे। हरिणांगनाओंको तो मंगलमयी स्वानुकम्पासे स्वविषयक मोह, सूझ आदि प्रभुने दी कि 'तुम अपने इन नेत्रोंसे हमारी पूजा करो' और फिर प्रतिपूजन भी किया। परंतु इस पूजाकी सफलता 'मूढमति' होनेसे ही हुई। पुजारी पूजा करते-करते पूजाकी सामग्रीको भूल जाय, सेव्यमें सेवककी आसक्ति हो जाय, यही मूढ़मतित्व है, यही सच्ची पूजा है और यही सहस्रों करोंसे स्वीकृत होती है। उन हरिणांगनाओंका ही यह सौभाग्य है कि भगवान्‌ने उनके समीप वेशपरिवर्तन किया, विचित्र वेश धारण किया—'उपात्तविचित्रवेषम्।' (श्रीमद्भा० १०।२१।१९) विचित्र अर्थात् नायिकावेश धारण किया। मानो श्रीवृषभानुनन्दिनीके साथ वर्तमान होकर हरिणियोंके समक्ष श्रीश्यामसुन्दरने वेश बदला। इतना मूढ़मतित्व, इतनी आसक्ति भगवान्‌के प्रति हरिणांगनाओंको हुई। अतएव पहले मृगपत्नी, फिर कृष्णपत्नी होनेपर भी इनके पतियोंको श्रीकृष्णसे द्वेष नहीं हुआ। इस गहराईपर दृष्टि डालनेसे व्रजांगनाओंने अपनी शंकाका समाधान पा लिया कि इन्हें हमारे प्रति सापत्न्य, ईर्ष्या नहीं है, ये तो हमारी ही तरह अन्तरंग हैं। अतएव उन्हें 'सखी' सम्बोधन करनेमें कोई संकोच नहीं। नित्यकुंजमन्दिरमें प्रविष्ट सखी कहती है कि 'हे हरिणांगने! तुम हमारे बराबर हो; क्योंकि हमारी मति उनके सामने मूढ़ हो जाती है। इस तुल्यतासे तुममें हमारा सखित्व है, सापत्न्य नहीं।'

श्रीरामपञ्चाध्यायी ४१९ जो कान्तभाववती व्रजांगना हैं, उनका भी तुम्हारे दर्शन करने इधरसे निकले हैं?' यहाँ सम्भावना सापत्‍न्य नहीं; क्योंकि वैसा होनेपर कोई भी सौत और प्रश्न दोनों हैं- 'दृशां सुनिर्वृतिं तन्वन् इह पतिका पता किसीको न देगी। अतः ये भी 'सखी' उपगतः।' 'निर्वृति' परानन्दका नाम है, उसके साथ कहकर परम प्रीति बतला रही हैं। यदि कोई कहे कि 'सु' भी जुड़ा है। नेत्रोंकी सुन्दरता, विशेष आह्लादकी एकपत्नीत्वेन सापत्‍न्य तो होगा ही, तब कहा-वे सार्थकता तभी सम्भव है, जब उन्हें श्रीश्यामसुन्दर भगवान् 'अच्युत' हैं। इसी आशयसे प्रकृत पद्य मदनमोहन देखनेको मिलें। अन्यथा उनकी सुघराई दो 'अप्येणपत्न्यो०' (श्रीमद्भा० १०।३०।११)-में कौड़ीकी है। यह बहुत ऊँची बात है कि वे 'अच्युत' पद है। ईर्ष्या वहाँ होती है, जहाँ एक कमलदललोचन जगभयमोचन मोहन भी इन नेत्रोंको स्वामी और अनेक पत्नी हों अर्थात् स्वामी, सौन्दर्य, देखनेके लिये उत्सुक हों और दोनों, दोनोंके नेत्रोंको सौभाग्य आदिका परिच्छिन्न होना, प्रेमके चुक जानेका लुभायें। यह तो श्रीव्रजसुन्दरी-जैसोंके लिये ही सम्भव डर होना आदि ही ईर्ष्याका मूल है, यह प्राकृत है, जो उन त्रैलोक्य-मनोमोहनके भी मनको मोह लेती नायकभावमें है, परंतु जहाँके सौगन्ध्य, सौन्दर्यादि है-हरण कर लेती है-'आभीरवामनयनाहृत- अपरिच्छन्न हैं, चुकनेवाले नहीं, संविदानन्दसुधानिधि मानसाय''''।' यह गोपी-कृष्ण दोनोंकी शिकायत है। हैं, वहाँ ईर्ष्या कैसी? 'यह रस विरस होत नहीं वे कहती हैं-'वे हमारे धैर्यादिको चुरा ले गये, कबहूँ।' जहाँ थाह ही नहीं, वहाँ ईर्ष्या भी नहीं। मनोमंजूषिकाके भीतरसे। यह सब किया उन्होंने केवल अतएव भक्त नहीं चाहते कि हमारे भगवान्‌को कोई नेत्रोंसे।' उधर आभीरवामनयनाओंने उनके मनको हर न भजे। हाँ, ऐसा भी भाव कभी होता है। जैसे लिया, वह भी नेत्रोंसे ही। अतएव वे अमना हो गये। श्रीश्यामसुन्दरके पक्षकी सखी जब श्रीवृषभानुनन्दिनीके पहले भी वे 'अमना' ही थे। तभी तो 'रन्तुं मनश्चक्रे' पास जाती है, तब उस पक्षकी सखियोंको यह शंका कहा गया है। गोपांगनाओंके सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्यपर होती है कि 'कहीं यह हमारे प्यारे श्यामसुन्दरको न वे 'अमना' मुग्ध हो गये और उनके साथ रास करनेके भजने लग जाय' और उसे वहाँसे हटानेका प्रयत्न लिये मन बनाया, पर वह भी फिर हृत हो गया। करती है कि यदि सखि! तुम अपने धर्मकी रक्षा अपने प्रियतमके दर्शनोंकी तीव्र चाहती हो तो शीघ्र ही उनके सामीप्यका परिवर्जन उत्कण्ठा ही सच्ची प्रीति है करो। प्रेमकी 'अहेरिव कुटिला गतिः' है। यह ये अन्तरंग भाव हैं। जैसे वेदान्ती 'त्वं' पदार्थका केवल तात्कालिक भावविशेष है। वास्तवमें यह शोधन करते हैं, वैसे ही भावुक अपना शोधन करते प्रेमरस समुद्र अथाह है, कभी चुकनेवाला नहीं, हैं। दोनों भाव हैं। अपने इष्टपर स्वयं लुब्ध होना और अतएव सभी भक्त सभीको बुलाते हैं। इस प्रकार अपनेपर उन्हें लुभाना। प्यारेके दर्शनोंकी प्रतीक्षांमें सापत्‍न्यव्यावृत्त्यर्थ ही उक्त पदमें 'अच्युत' पद है। चित्त सदा ललचा रहे। इसी प्रतीक्षाकी पुष्टिके लिये अथवा व्रजांगनाओंका कहना है कि 'सापत्‍न्य वृन्दावनके बाँके बिहारीजीके मन्दिरमें दर्शनके समय बराबरीमें होता है, सो तुम तो सखि हरिणि ! हमसे क्षण-क्षणमें परदा आता रहता है, जिससे दर्शनोंकी बहुत बड़ी हो, उन प्राणप्यारे नन्दनन्दनके साथ सब प्रतीक्षा, उत्कण्ठा बढ़ती ही रहती है। प्रियतमके जगह जा सकती हो, दर्शन कर सकती हो। परंतु हम दर्शनोंकी दिनभर चिन्ता, विह्वलता, नवीनता बनी तो कुलांगना हैं, हमारे लिये सर्वत्र जाना मना है। सखि रहे-यही सच्ची प्रीति है। बहिर्मुखोंके लिये यह हरिणि! यह मत कहना कि हमने तुम्हारे प्यारे कठिन है, परंतु भावुकोंके लिये यह सुगम बन जाता मनमोहनका दर्शन नहीं किया है; क्योंकि हम उन है। 'चलापि यच्छ्रीर्न जहाति कर्हिचित् ॥' (श्रीमद्भा० आँखोंको पहचानती हैं, जिन्होंने हमारे प्यारे मोहनका १।११।३३) समस्त सौन्दर्यका धाम साक्षात् लक्ष्मी दर्शन किया है। सखि ! बतलाओ, क्या प्यारे श्यामसुन्दर भी लोभवश प्रतिक्षण नवनवायमान रमणीयताके

४२० भक्तिसुधा अपारसागर उन प्रभुके पादारविन्दको छोड़ती ही नहीं, क्योंकि क्षण-क्षणके बाद उसमें सुन्दरता आ रही है, लक्ष्मी विचारती ही रह जाती हैं कि 'अब अगले क्षण आनेवाली सुन्दरताका और आस्वाद ले लूँ, तब चलूँ।' आजतक अगली सुन्दरताके लिये उनका लोभ न कभी पूरा ही हुआ और न वे गयीं हीं। 'यद्यप्यसौ पार्श्वगतो रहोगतस्तथापि तस्याङ्घ्रियुगं नवं नवम्।' (श्रीमद्भा० १।११।३३) एक-एक रोममें अनन्त नेत्र, नासिका आदिके होनेपर भी उस आनन्दकी समस्तताका अनुभव असम्भव ही है, वह बढ़ता ही जायगा। इस समयकी, इसके पहलेकी, इससे अगली और उससे भी अगले क्षणकी आनन्दानुभूति किंरूप है, इसका विवेक सर्वदा दुर्घट ही रहेगा। जिसका नाम ही चंचला (बिजली) है, वह भी यहाँ अचंचला (स्थिर) हो जाती है। यह है उस प्रभुके स्वरूपकी महिमा। इसके एक लेशका भी अनुभव होनेपर, 'भजन करनेमें मन नहीं लगता' की शिकायत कैसे रह जायगी? हाँ, तब उलटी शिकायत हो सकती है—'घरके काम-काजमें मन नहीं लगता।' परंतु यह शिकायत तो केवल गोपांगनाओंने ही की— चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु यन्निर्विवेशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये। पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद् यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।३४) उन्हें यह चिन्ता अवश्य हुई कि इस मनोमृगको मोहनके मधुर मोहपाशसे कैसे मुक्त करें? जबतक यह स्थिति न आये, तबतक उन पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म श्रीकृष्णचन्द्रकी मोहन मधुर मूर्तिको हर तरह नवीन बनाये रखनेका प्रयत्न करते रहो। प्रभुकी सेवामें नया वेष, नये भूषण, नवीन भोज, झूलोंके अवसरपर सावन-भादोंकी नवीन-नवीन मनोहर घटाओंका चमत्कार आदि यथावसर होता रहे, जिससे नवीनता आती रहे, उत्सुकता बनी रहे, बढ़ती रहे। पहले बनावटी चमत्कारकी पूर्णता हो ले तो फिर तुरंत स्वाभाविक चमत्कार नयनोंको लुभा लेगा। इसलिये पहले प्रभुके नये-नये शृंगार, भोग, राग आदिसे चित्तकी तत्प्रवणता सम्पादित होती रहे। उसकी सिद्धिके लिये तनुजा, वित्तजा सेवा होती रहे— 'तत्सिद्धयै तनुवित्तजा।' कई सम्प्रदायोंमें विप्रयोग शृंगार भावना चलती है। असमयमें भी वे उसमें मग्न होते हैं। श्रीश्यामसुन्दरके मथुरागमन और गोपियोंकी व्रजमें विरहदशाके पदोंसे उसमें तल्लीन हो जाते हैं। तभी यह भाव पुष्ट होता है। यद्यपि वास्तवमें 'वृन्दावनं परित्यज्य पादमेकं न गच्छति' का सिद्धान्त है तथापि विप्रयोगोत्पादनार्थ यह उचित है। इसीलिये सभी भावुक आचार्यों, श्रीजीवगोस्वामी, श्रीवल्लभाचार्य आदिने उन अंशोंपर व्याख्या लिखी है। जिस समय भगवान्‌का मन्दिर खुले, दर्शन हों, उस समय भगवत्सम्प्रयोगकी और मन्दिर बन्द होनेपर भगवद्विप्रयोगकी भावना प्रभुके स्मरण बनाये रखनेमें साधन है। मन्दिर बन्द होनेपर अपनेमें गोकुलस्थ गोपी और भगवान्‌में मथुरास्थ कृष्णकी भावना करनी चाहिये, समझना चाहिये कि श्रीश्यामसुन्दर मथुरा गये हैं, अभी दो-तीन क्षणमें ही पधारनेवाले हैं। उस भावकी भावना करके देखना चाहिये। कैसी स्थिति प्रकट होती है। इस प्रकार मन्दिरादिमें दर्शनके समय संयोग और पटमंगलके समय वियोगकी भावना आदिसे नवीन-नवीन भावोंकी उत्कण्ठा, प्रतीक्षा आदिका उदय होनेके भाव चित्तमें आने चाहिये। लोकमें नायकको नवीन-नवीन शृंगारवती नायिकाएँ ही वशमें कर सकती हैं, यही स्थिति नायककी है। परंतु यह भगवद्विषयक स्थिति बहुत ऊँची है। इस तरह हरिणी अपने नेत्रोंको सफल समझती हैं। पर सफलता तब, जब उनके नेत्र भी इन्हें देखें। ये हरिणीके भाव हैं। ये गोपांगनाएँ किसी साधारण हरिणीको अपनी सखी नहीं बना रहीं, अपितु वे श्रीमोहनमनोहारिणी, गोपीदुःखहारिणी हरिणी हैं। जैसे हरिणी श्यामसुन्दरको रागसे देखती हैं, वैसे ही वे भी देखते हैं, उनका मन, हृदय-रागका बड़ा ही लोभी है। श्रीश्यामसुन्दरके हरिणी-दर्शनमें दो भाव हैं, एक तो यह कि इसके नेत्र श्रीवृषभानुनन्दिनीके जैसे हैं। दूसरा यह कि यह सुरंगी है, अन्तरंगा है, अतः इसे वृषभानुनन्दिनीके जैसे रागसे देखते हैं। इस

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श्रीरामपञ्चाध्यायी ४२१ तरह हरिणीके सामने व्रजदेवियोंका प्रणय-पाथोधि वे माधुर्यरसके व्यंजक होते हैं। प्रस्तुत पद्यमें 'तन्वन् नाना भावोंमें उद्वेलित हो पड़ा और न जाने अभी दृशां निर्वृतिम्' (श्रीमद्भा० १०।३०।११) से ही कितना हो। आनन्द अर्थ स्फुट था, पर उसके साथ 'सु' भी '.....तन्वन् दृशां सखि सुनिर्वृतिमच्युतो वः।' लगाया गया। यह विशेष तात्पर्यावद्योतक है। (श्रीमद्भा० १०।३०।११) व्रजांगनाओंका कहना है कि 'श्रीश्यामसुन्दर इधर इसपर बहुतसे भाव पीछे कहे गये। इसमें एक आये होंगे, पर यह माधुर्य तो जो तुम्हारे नेत्रोंमें है, भाव यह भी अन्तर्हित है कि हरिणीको श्रीकृष्णका श्रीप्रियाजीके संयोगका सूचक है। उनके श्रीअंगसे सन्दर्शन अवश्य हुआ है, वह इसका निषेध कर नहीं परिवेष्टित श्यामसुन्दरका स्वरूप सखि हरिणांगने! सकती। अवश्य ही भगवान् कृष्ण इस मार्गसे पधारे तुम्हारे नेत्रोंमें बसा है।' यही 'निर्वृति' के साथ 'सु' हैं और हरिणीको उन्होंने दर्शन दिया है; क्योंकि का वैशिष्ट्य है। यही बात 'गात्रैस्तन्वन् दृशां सखि वस्तुतः कृष्णसारसतीके नेत्रोंमें व्रजांगनाओंको मनोहरता, सुनिर्वृतिमच्युतो वः।' (श्रीमद्भा० १०।३०।११)- अद्भुतता, मुग्धता, सुभगता, चपलता, तीक्ष्णता, श्यामता से भी ध्वनित हुई है। व्रजांगनाजनके विचारसे केवल आदिका अनुभव हुआ है। ये सब गुण रसिकशेखर श्रीश्यामसुन्दरके गात्रमात्रसे हरिणांगनाके नेत्रोंकी सुनिर्वृति श्रीश्यामसुन्दरमें विराजते हैं। व्रजांगनाएँ यह कल्पना नहीं हुई, अपितु श्रीराधासंयुक्त मोहनके दर्शनसे ही करती हैं कि प्राणप्यारे मोहनका दर्शन करते-करते वह सम्भव हुई। फिर उस लोकोत्तर निर्वृतिमें गात्रमात्र हरिणीके इन नेत्रोंमें वे बस गये, उन्हींकी वह ही सहायक नहीं, अपितु स्वेद, रोमांच, कम्प, परस्पर मादकता, मोहकता इनमें छायी हुई है। यद्यपि अनुरागोद्रेक आदिका उद्भव भी मुख्य है। मिलित श्रीश्यामसुन्दरके नेत्रोंमें तीक्ष्णता नहीं है, परंतु विप्रयोगवश युगलमूर्तिके दर्शनसे हरिणांगनाके भी गात्रोंमें स्वेद, गोपांगनाओंको उसकी प्रतीति हो रही है। इस प्रकार कम्प, रोमांच, अनुरागोद्रेक आदि हुआ। अनुरागोद्रेक श्रीकृष्णपरमात्मक सभी भाव हरिणीके नेत्रोंमें और वैसे ही तत्तदनुभावोंसे युक्त सरसता, सुनिर्वृति व्रजांगनाओंको स्पष्ट प्रतिफलित दीख पड़ रहे हैं, उसके नेत्रोंमें व्यक्त हुई। इस तरह हरिणांगनाके अतएव वे कहती हैं—'सखि हरिणी, तुम छिपानेकी नेत्रोंके लिये सुनिर्वृतिका विस्तार अथवा प्रदान करते चेष्टा न करो, अवश्य ही वे हमारे प्राणधन, परमानन्दमूर्ति हुए श्रीश्यामसुन्दर इधरसे होते हुए गये हैं। तात्पर्य श्रीश्यामसुन्दर तुम्हारे नेत्रोंमें आनन्द उड़ेलते हुए यह कि प्रथम तो रसका दर्शन, वह भी अनुपानसहित, अवश्य इधरसे ही गये हैं; क्योंकि उनके दर्शनके बिना रसाक्रान्त तथा रसानुभवसहित हुआ। रसोद्रेकसे रोमांच तुम्हारे इन नेत्रोंमें यह विशेषता आ नहीं सकती।' होता है, पर यहाँ मूर्तिमान् रसमें ही रोमांच, स्वेद, इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि श्रीकृष्ण कम्प आदि हैं। ये सब गात्रगत बहुवचन और 'रस' हैं, 'रसो वै सः' (तैत्तिरीय० २।७) यह श्रुति सुनिर्वृति आदि पदद्योत्य विशेषताएँ हैं। ही इसमें प्रमाण है। इस प्रकार रसस्वरूप श्रीकृष्ण

श्यामसुन्दरके दर्शनमें ही नेत्रोंके

स्वरूपसे ही मधुर हैं। फिर अनुपानकी विशेषतासे

होनेका साफल्य

उनकी रसात्मकता और भी चमत्कृत हो जाती है। हरिणांगनाके नेत्र और श्रीश्यामसुन्दरका रूप, लोकमें एक रस अनुपानभेदसे सेवनकर्ताको अनेक इन दोनोंसे व्रजांगनाएँ खूब परिचित हैं। जितना वे प्रकारसे लाभ पहुँचाता है, विभिन्न रोगोंकी निवृत्ति जानती हैं, उतना कोई कह ही नहीं सकता। करता है। वैसे ही ये निखिलरसामृतमूर्ति, अनन्तकोटि- उन्हींकी कृपासे कुछ कणका पता लगता है। फिर कन्दर्पदर्पदलनपटीयान् श्रीकृष्ण परमात्मा हैं। इनमें विरहावस्था-प्रयुक्त वाक्योंका अर्थ तो वे ही जानती अनुपानभेदसे रसभेद है। माधुर्यरसकी अभिस्रुति जब हैं। पहले इस व्याख्या-प्रसंगमें कहा गया है— वे कान्तासंयुक्त होते हैं, तब होती है। श्रीराधासंयोगसे 'अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः' (श्रीमद्भा०

४२२ भक्तिसुधा १०।२१।७)। इसे श्रीमद्वल्लभाचार्यने फलाध्याय ही माना है। व्रजदेवियोंकी दृष्टिमें श्रीमदनमोहन मुरलीधरका दर्शन ही नेत्रवानोंके नेत्रवान् होनेका फल है। कोई भले ही स्वर्ग, अपवर्ग, कल्पवृक्ष आदिके दर्शन या प्राप्तिको नेत्रवत्ता या जप, तपका फल माने। परंतु व्रजसुन्दरियाँ तो कहती हैं— 'आँखवालोंका तो फल यही है। यदि इसके अतिरिक्त और कोई फल हो सकता है तो वह अन्धोंका ही होगा।' 'अक्षण्वतां फलमिदम्' में 'इदम्' कहा गया है, जिसका अर्थ 'सामने वर्तमान' है, पर श्रीश्याम वृन्दावनमें हैं और गोपांगना अपने भवनोंमें यह भावना कर रही हैं, तब श्रीकृष्ण उनके 'इदम्' के विषय कैसे हुए? परंतु इसका पर्यवसान इसीमें है कि व्रजांगनाओंके तीव्र संवेग-संचालित भावना- परिपाकका यह फल है कि वह यशोदोत्संगलालित पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण उनके समक्ष वहीं हैं, अतः 'इदम्' कहा। 'अक्षण्वताम्' यह पद देहधारियोंका उपलक्षण है, अतः व्रजांगनाओंके विचारसे प्राणिमात्रके नेत्रोंके लिये यदि कोई फल हो सकता है तो यही कि उन्हें श्रीश्यामसुन्दरके मुखारविन्दका दर्शन प्राप्त हो, अन्यथा नेत्र व्यर्थ हैं। श्रवण भी व्यर्थ हैं, यदि उन्हें उन श्रीभगवान्के वचनामृत और वेणुरवका पान करनेको न मिले। क्या यह घ्राण भी सार्थक कहा जा सकता है, जिसने एक बार भी भगवान्के चरणामृत-सौगन्ध्यका आस्वाद नहीं पाया ? भगवत्-सेवा-विमुख बाहुओंको कौन बाहु कहेगा? वे सब व्यर्थ ही हैं, जिनसे भगवत्सम्बन्धका ज्ञान नहीं होता। व्रजांगनाओंका तो स्पष्ट कहना है कि 'और कोई जाने चाहे न जाने, पर हम तो श्रीनन्दनन्दनके दर्शनको ही नेत्रोंका परम फल मानती हैं। अलौकिक साध्य-साधन श्रुतिरूप है—'धर्मं जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः' वही वेदमन्त्रोंकी अधिष्ठात्री श्रुतिरूप व्रजदेवियाँ यह कह रही हैं।' यदि वह तत्त्व श्रुतिसे अविदित है तो भावुक कहता है—'श्रवणयोरलम श्रवर्णिर्मम··· तमवि- लोकयतो नयने वृथा···।' महर्षि वाल्मीकि भी कहते हैं— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ (वा०रा० २।१७।१४) आत्मा, बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ कोसती हैं—'हाय, किस दुष्टसे सम्बन्ध हुआ। किसके पल्ले पड़ीं, जो कभी भी एक बार भी उस दर्शनीयके दर्शन न मिले।' यह ठीक है पर—'स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते।' वह तो निर्वृत्तिक अन्तःकरणसे उपलब्ध होता है। वह तत्त्व तो बुद्धिसे भी परे है, इन्द्रियोंकी वहाँ पहुँच ही कहाँ— इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ (गीता ३।४२) परंतु इन्द्रियाँ इससे सहमत नहीं, वे तो कहा करती हैं—'हाय, हमारा जन्म उस दर्शनीयके दर्शनसे सफल न हुआ, हम उससे वंचित रह गयीं, हमारा रोम-रोम उसके साक्षात्कारके लिये तड़पता है, हम व्याकुल हैं।' कोई भी ऐसा नहीं, जो उन्हें न चाहे। वनगमनके समय भगवान् रामके मार्गको साँप और बिच्छू-जैसे विषैले जन्तुओंने भी साफ कर दिया और उनके दर्शनसे अपनेको धन्य समझा। एक और भी उक्ति है—'जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता॥' (रा०च०मा० १।२०४।२) काँटे भी उनके लिये कोमल हो जाते हैं। प्रकृतिका प्रत्येक परमाणु उनसे मिलनेके लिये उतावला हो उठता है। एक श्रुतिद्वारा इसका पूर्ण समर्थन प्राप्त है। वे अज्ञ हैं, जो यह कहते हैं कि 'जो श्रुतिमें नहीं, वह हमारे यहाँ है।' वस्तुतः जो श्रुतिमें नहीं, वह कहीं भी नहीं। महापुरुषों एवं महाभक्तोंने वेदप्रतिपाद्य वेदसारको ही अपनी 'वाणी' में कहा है—'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयंभूः ·····आवृत्तचक्षुः···· (कठ० २।१।१) ब्रह्माने इन्द्रियोंकी बाह्य वृत्ति बना दी, अतः वे बाहर ही देखती हैं, भीतर नहीं। यहाँ 'व्यतृणत्' कहा, 'व्यरचयत्' ही कह देते। ऐसा कहनेमें कुछ तात्पर्य है। 'व्यतृणत्' हिंसार्थक 'तृंह्' धातुका रूप है, जिसका अर्थ हुआ 'हिंसितवान्।'

श्रीरामपञ्चाध्यायी ४२३ भाव यह कि ब्रह्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख बनाकर मारे जायें, वह काष्ठखण्ड अथवा पशु जिससे मारे उनको मार डाला। वे बिलबिलाती हैं, दुःखी हैं। जायें वह दण्ड ('पशवो हन्यते यत्र यद्वा अनेनेति 'पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।' (रा०च०मा० पशुघ्नः शुष्ककाष्ठम्') है अर्थात् श्रीहरिकथासे २।६४।७) मरण तो अच्छा, वियोगी तो इसे शौकसे कदाचित् जड काष्ठको ही विराग हो तो हो, पर चाहते हैं। ब्रह्माने इन्द्रियोंको शब्दादिकी ओर प्रवृत्त इन्द्रियवान् ऐसा कोई नहीं हो सकता। अतएव किया, यह ठीक नहीं किया; क्योंकि ऐसा करनेसे वे गोस्वामीजीने कहा है- 'श्रवनवंत अस को जग तत्त्वमात्रके सर्वाधिक अनुभवसे वंचित रह गयीं। इन्हें माहीं।' (रा०च०मा० ७।५३।५) 'यदि कोई है परमप्रज्ञासे जो आन्तर दर्शन करती हैं, ईर्ष्या है। तो वह दुःसंस्कारवश ही। बाकी सभी श्रीकृष्ण परतत्त्वका महत्त्व समझनेपर ये रोती हैं कि हाय, हमें परमात्माको चाहते हैं। इन्द्रियाँ रोती हैं, कोसती हैं- प्रपंचमें लगाया गया। ये इन सबको नहीं चाहतीं, ये 'पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः' वे 'पिय तो पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णचन्द्र बियोग सम दुखु जग नाहीं' समझती हैं। आनन्दकन्दका परिरम्भण ही चाहती हैं। इस प्रकार यह जो प्रकृतिके पदार्थमात्रमें हलचल दिखायी चक्षु, श्रोत्र, घ्राणादि वास्तवमें उस सर्वान्तर्यामी सगुण पड़ रही है, वह और कुछ नहीं, केवल श्यामसुन्दरके स्वरूपके ही दिव्य रूप, दिव्य शब्द आदिको चाहते मिलनकी उतावली है। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रमण्डल, हैं, दुस्संस्कारवशात् शूकरकी विष्ठा प्रवृत्तिकी तरह अणु-अणु जो अविश्रान्त गतिसे दौड़ रहे हैं, इनका उन्हें प्राकृत शब्दादिमें स्वाद मिलता है। वही एकमात्र उद्देश्य है। प्रकृतिका प्रत्येक परमाणु अतएव कहा गया है- इसके लिये लालायित है। इसके प्राप्त होनेपर तो निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद्- सबकी चंचलता विलीन हो जाती है। इसका एक भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात्। उदाहरण लक्ष्मी है- 'चलापि यच्छ्रीर्न जहाति क उत्तमश्लोकगुणानुवादात् कर्हिचित्॥' (श्रीमद्भा० १।११।३३) उस समय पुमान् विरज्येत विना पशुघ्नात् ॥ आनन्दमग्न सब कूटस्थकी तरह होंगे। जिस समय (श्रीमद्भा० १०।१।४) मधुप मकरन्दपानमें मग्न होता है, उस समय उसका सचमुच श्रीकृष्ण परमात्माके चरितसे कौन गुंजारव समाप्त हो जाता है। अलिकुलमालासंकुल विमुख होगा? वह तत्त्व महामुनि, भक्त, मुमुक्षु, वनमालाधारी मुरलीमनोहरके दिव्य दर्शन होते ही सब यहाँतक कि विषयीका भी सेव्य है। 'सुनहिं बिमुक्त आनन्दविभोर, शान्त हो जाते हैं। ये सब दुःख उसके बिरत अरु बिषई।' (रा०च०मा० ७।१५।५) बिना हैं। हम 'रस' को सावरण रखते हैं। 'बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद श्रीमद्वल्लभाचार्यने 'बर्हापीडम्' (श्रीमद्भा० अरु मन अभिरामा ॥' (रा०च०मा० ७।५३।४) १०।२१।५) (वेणुगीत) पद्यकी व्याख्यामें वह गुणानुवाद अच्छा नहीं लगता केवल पशुघ्नको, श्रीभगवान्‌को उद्बुद्ध उभयविधशृंगार बतलाया है कसाईको, महापापीको। परंतु सदन कसाईको तो बड़ा और 'कनककपिशम्' (श्रीमद्भा० १०।२१।५) अच्छा लगता था। अतः 'पशुघ्न' का अर्थ दूसरा से पीतवस्त्रको उस (रस)-का आवरण। अंगको है- 'अपगता शुक् यस्मात् सः, शोकमोह- उससे समाच्छन्न रखा है। यह इसलिये कि भावुक शून्यस्तत्त्वज्ञानी, तं हन्तीति अपशुघ्नः' अर्थात् जैसा देखेंगे, वैसा ही वर्णन करेंगे, उफान उसीका महाब्रह्मनिष्ठवधजन्य पातकवालेको ही श्रीहरिगुणानुवाद आयेगा। झरनोंके सम्पर्कमें जलकी तरह भावोंमें रस अच्छा नहीं लगता। परंतु कितने ही ऐसे पापी भी बढ़ता है और फिर वह प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, श्रीहरिगुण-श्रवणमहिमासे मुग्ध और मुक्त हुए सुने आनन्दमयादि कोशोंमें परिपूर्ण होकर रोम-रोममें गये हैं, अतः 'पशुघ्न' का अर्थ पशु जिसपर रखकर भरपूर होता है। जैसा अनुभव होगा, वैसा ही उद्गार

४२४ भक्तिसुधा होगा, उसीमें 'रसाभास' भी होगा। भगवान्का पीताम्बर माया है, दिव्य माया है, उनके सत्त्वादि विभिन्न रूप जैसे ब्रह्मदर्शन (ज्ञान)-में माया प्रतिबन्ध है, वैसे ही यह 'कनककपिश' वस्त्र है। मायाकी चकाचौंधमें ही जैसे दृष्टि रुक जाती है, वैसे ही भगवान्के देदीप्यमान पीतवस्त्रमें ही दृष्टि रह जाती है। इस प्रकार प्रभुविग्रहका साधारण वर्णन किया गया है। प्रकृतमें जिसकी प्रेप्साके लिये तत्त्वमात्र उतावले हो रहे हैं, उसके लिये यदि गोपांगनाएँ सर्वस्व त्याग करके उतावली हो रही हैं, उस रसास्वादके लिये व्यग्र हैं तो इसमें उनका क्या दोष है ? उनका कहना है कि जब ये हीरा, मोती (कंकड़-पत्थर), जड़ भी श्रीहरिके उरःस्थलको छोड़ना नहीं चाहते, तब 'का वा स्मरवशाः स्त्रियः?' कामकिंकरी, अज्ञानमूर्ति हम स्त्रियाँ कैसे उन्हें भुला सकती हैं? हमारे मन, बुद्धि, अन्तःकरण, रोम-रोममें वे बसे हुए हैं, हम उन्हें कैसे छोड़ें? श्रीमद्वल्लभाचार्यका कहना है कि सारे विधि- निषेध साधनमें होते हैं, फलमें नहीं, रसपानमें भेद नहीं। रसिकोंने समझा कि जो तत्त्व इन्द्रियादिसे अग्राह्य था, जो 'स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते' से व्यपदिष्ट हुआ, इन्द्रियोंकी विकलता दूर करनेके लिये, उनकी वांछाकी पूर्तिके लिये उन्हीं वांछाकल्पद्रुम प्रभुने अपना दिव्य रूप प्रकट किया और मानो कहा—'बाहुओ! मिल लो, आँखो! देख लो।' जो प्रभुकी इस कृपाका लाभ नहीं उठाते, वे वस्तुतः इन इन्द्रियोंसे कोसे जाते हैं। इस प्रसंगमें महर्षि वाल्मीकिके ये शब्द विशेष अर्थवान् हैं— यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामो न पश्यति। निन्दितः सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हते ॥ (वा० रा० २।१७।१४) अक्षण्वतां फलमिदं न परं विदामः सख्यः पशूननु विवेशयतोर्र्वयस्यैः। वक्त्रं व्रजेशसुतयोरनुवेणु जुष्टं यैर्वा निपीतमनुरक्तकटाक्षमोक्षम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।२१।७) गोपियाँ कहती हैं—'सखियो! अपने सखाओंके साथ गायोंको खिरकमें भेजते हुए नन्दनन्दनके वेणुशोभित मुखका जिन्होंने सानुराग दर्शन किया है, उन्हीं नेत्रवानोंके नेत्र सफल हैं। इससे बढ़कर उनकी सफलता हम तो नहीं समझतीं।' हाँ तो वे श्रुतिरूपा गोपांगनाएँ 'अक्षण्वतां फलमिदम्' के 'इदम्' को खूब जानती हैं। इसके अतिरिक्त नेत्रवालोंके लिये उनकी दृष्टिमें और कोई फल ही नहीं—'न परं विदामः ।' जो वेदसम्मत नहीं, वह तो अवैदिक ही है। यहाँ गोपीरूपधरा श्रुतियाँ ही यह कह रही हैं—'अनुरक्तकटाक्षमोक्षपूर्वक जिन्होंने व्रजेशसुत श्रीबलराम तथा श्रीकृष्णके मुखका सातिशय दर्शन किया है, उन्हें ही नेत्रवत्ताका फल मिला है, क्योंकि नेत्रोंकी फलवत्ता इसीमें है।' इस प्रसंगमें व्रजांगनाएँ बड़ी चतुराईसे बात कर रही हैं। वे 'व्रजेशसुतयोः' में द्विवचन भावगुप्तिके लिये देती हैं, जिससे बलराम और कृष्ण दोनोंका ग्रहण हो। परंतु सहसा 'वक्त्रम्' एकवचन ही निकल जाता है; क्योंकि उनका तो अनुराग श्रीश्यामसुन्दरमें ही है। पर कहीं उनकी देवरानी, जेठानीके कानमें यह शब्द न पड़ जायें, इसलिये द्विवचनसे छिपाती हैं। वे व्रजकी नारियोंकी प्रकृतिसे परिचित हैं, वे खूब जानती हैं कि 'बलिहारि करो व्रजको बसिबो जहाँ पानीमें आग लगावें लुगाई।' श्रीश्यामसुन्दरके प्रेमको वे छिपाती हैं। कोई पूछे तो वे चट उत्तर दे दें कि 'हम तो व्रजपालके प्रति राजभक्ति प्रदर्शन कर रही हैं।' इन सब भावोंसे 'सुतयोः' द्विवचन बोलती हैं। परंतु जबतक श्रीश्यामसुन्दरका मुखचन्द्र सामने नहीं; तभीतक यह बनावट छिपी है और भावमहासागर शान्त है। पूर्णचन्द्रके दर्शन होते ही सागरकी मर्यादा भंग हो जाती है। यह प्राकृत पूर्णचन्द्र जलसमुद्रके हृदयसे उदित हुआ है और वह अप्राकृत श्रीकृष्णचन्द्र इसी व्रजांगनाओं या श्रीवृषभानुनन्दिनीके हृदयमहाभावसमुद्रसे आविर्भूत होता है। महाभावसमुद्र जबतक शान्त रहा, तबतक सर्वविधगोपन, सर्वविधविवेचन, पर ज्यों ही श्रीश्याममुखचन्द्रका ध्यान आया कि बस भावसमुद्र उमड़ पड़ा—छिपानेकी सब चालें भूल गयीं, 'वक्त्रम्'

श्रीरामपंचाध्यायी ४२५ एकवचन मुखसे निकल पड़ा। जबतक भावसमुद्रमें किस ओर गये हैं?' ज्वार-भाटा नहीं आया, तबतक लोक-वेद सबकी इस प्रकार श्रीव्रजेन्द्रनन्दनको ढूँढ़ती हुई गोपांगनाएँ मर्यादा सुरक्षित रही, फिर नहीं। ('व्रजेशसुतयोर्वक्त्रं लताओंसे, वृक्षोंसे, भूमिसे पूछती फिरती हैं। हरिणांगनाको यैर्निपीतम्', 'अक्षण्वतां फलमिदमेव') वे 'दर्शन' देखकर तो उनकी प्रश्नपरम्परा, उनकी जिज्ञासा, नहीं कहतीं, क्योंकि यह मोटी बात है, स्थूलदर्शिता उनकी श्रीकृष्णविषयिणी स्मृति उद्वेल महानदीका है। यहाँ तो कहा 'निपीतम्' जिसका सुधासमुद्रका अनुकरण करने लगी है। वे उसे सकलदुःखहारिणी भी समवगाहन करना है। इतने कुशल, सजीव हरिणी मान रही हैं। उन्हें विश्वास हो गया है कि नेत्रपुटोंके सामने सुवर्ण, हीरक आदिके पात्र तुच्छ हैं। इस हरिणीने हमारे प्राणधनको अवश्य देखा है। तभी ये इसी पूर्वानुभवसे हरिणीके प्रति 'तन्वन् दृशां सखि तो इसके नेत्रोंमें यह श्याम छवि, यह श्यामलता, सुनिर्वृतिमच्युतो वः' (श्रीमद्भा० १०।३०।११) चंचलता आदि उपलब्ध हो रही हैं। गोपांगना- कर रही हैं। 'अनुरक्तकटाक्षमोक्षम्' में दो भाव हैं- समूहमें मानिनी गोपियाँ परस्पर कहती हैं- 'वे यह मुखचन्द्र अनुरागियोंके कटाक्षमोक्षका स्थान है यशोदानन्दन सदा तो हमारा मान मनाते रहे, पर अब अथवा अनुरक्तोंकी ओर सानुराग कटाक्षमोक्षका स्थान क्या हो गया जो हम सब पूछती फिरती हैं, आकुला है अथवा अनुरक्तोंकी ओर सानुराग कटाक्षमोक्षणकी हैं और वे मिलतेतक नहीं। पहले वे हमें ढूँढ़ा करते क्रिया जिसमें हो रही है, वह है अथवा उस अवसरपर थे, हमारा मान मनाते थे, पर आज हमारी सुधितक गोपांगनाएँ कहती हैं- 'सखि! दर्शन करने कैसे जायँ, नहीं लेते- हम कितनी बेहाल हैं। इसपर कोई कहती कुललज्जा मुखचन्द्रका दर्शन नहीं करने देती।' दूसरी है- 'कयाचिद् धूर्तया नीतः' अर्थात् 'कोई धूर्त कहती है- 'चलो, किसी निकुंजमें छिपकर दर्शन सखी उन्हें बहकाकर ले गयी, अन्यथा वे ऐसे नहीं करेंगी।' इसपर भी एक तीसरीका तर्क उठता है- हैं।' इस समय उनकी घ्राणने कुन्दमालाके, जो 'क्या वे मोहन अपने भृकुटिकोदण्ड तानकर तुम्हारी कान्तांगसंगकुचकुंकुमरंजिता थी, सौगन्ध्यका अनुभव लज्जाको कहीं फेंक न देंगे?' यह तो एक मुखचन्द्रके किया। वे कहने लगीं- अब तो वह बात स्पष्ट हो दर्शनकी भावकल्पना हुई। यहाँ तो प्रिया-प्रियतम दोनों गयी, देखो, यह कुन्दमालाकी सुगन्ध आ रही है, यह विराजमान हैं। इन्हें भी अकेले मुख-चन्द्रदर्शनमें बाधा केवल मालाकी ही सुगन्ध नहीं। किंतु उस धूर्ताके है, अतः सम्मिलित दर्शन चाहती हैं। वहाँ भी अंगमें लगे कुंकुमका भी इसमें समावेश है। 'सखियो! 'व्रजेशसुतयोः' कहा गया है। 'सुतयोः' में सुता वे तो स्वयं हमें छोड़कर कहीं जानेवाले नहीं थे, और सुत दो हैं, व्रजेश वृषभानु बाबा और व्रजेश अवश्य किसी धूर्ताने ही उन्हें फँसाया है।' दूसरी नन्दबाबा, दोनोंके पुत्री और पुत्र श्रीराधा-कृष्णका कहती है- 'सखि! देखो, वे श्यामसुन्दर बड़े छलिया दर्शन अभिप्रेत है। मुखत्वसे मुखमें एकवचन कहा हैं, वास्तवमें वे किसीके नहीं। अपने सुन्दर शरीरको गया है। व्रजांगनाओंके भावमहावायुने गौर-श्याम दिखाकर उन्होंने केवल तुम्हारे नेत्रोंकी सुनिर्वृति, समुद्रको एक कर दिया और सम्मिलित दर्शन करके सानन्दता सम्पादित की है। इससे वे तुम्हें आकांक्षा कृतार्थ हो गयीं। भाव यह कि जिन्होंने सम्मिलित दर्शन या मोहमें डाल गये। उनके त्रिलोकमनोहर दर्शनसे किया, वे ही कृतार्थ हुए, शेष तो मोरपंखकी तरह तुम्हारे नेत्र अवश्य सफल हुए, उनमें उनकी वह व्यर्थ ही रहे। व्रजांगना कहती हैं- 'अतः हे एणपलि! त्रिभंग-ललित छवि अवश्य बस गयी, पर मन नहीं तुम्हारे नेत्रोंसे, तुम्हारे नेत्रोंमें छलक रही इस सुनिर्वृतिसे भरा, हृदय तरसता रह गया। सुन्दर वस्तुके दर्शनमात्रसे यह निश्चित है कि तुम्हें युगलसरकारका अवश्य दर्शन तृप्ति नहीं होती। दर्शनाभावमें उसके लिये उत्कट हुआ है, हम इस वस्तुको खूब समझती हैं, तुम हमसे उत्कण्ठा बनी रहती है। एक उग्र रुचि जागरित हो छिपा नहीं सकती। शीघ्र बताओ, वे श्रीश्यामाश्याम जाती है। कथंचित् दर्शनकी अभिलाषा पूरी होनेपर

४२६ भक्तिसुधा वे कहीं हृदयमें बस गये तो फिर उन प्रियतम प्राणनाथ मुरलीमनोहर श्यामसुन्दरके स्पर्श, परिरम्भणादिकी लालसा सुस्थिर हो जाती है और मन होता है—'इन्हें अन्तरात्मामें, रोम-रोममें बसायें।' क्षणभरमें व्रजांगनाएँ हरिणीकी ओर झुककर कहती हैं—'सखि मृगांगने! वे तुम्हारे नेत्रोंमें अपनी छवि बसाकर चले गये होंगे; क्योंकि तुम्हारे नेत्रोंमें उनकी श्यामलता आदि स्फुट ही प्रतीत हो रही है। उनका यही काम है। हम उन्हें खूब जानती हैं। वे कुलपति हैं, व्रजांगनायूथके पति हैं। वे कुलपति होकर भी एक प्रेयसीके रसवश होकर हम सबको छोड़कर उसीके साथ हो लिये। यह कुंकुममिश्रित कुन्दमालाकी सुगन्ध ही इसका प्रमाण है।' इस समय व्रजांगनाओंके प्रेम-पयोधिमें ईर्ष्याकी लहर उठ आयी। वे कहने लगीं—'यह देखो अन्याय, 'किं सैवैका कान्ता न वयम्' क्या वही एक उनकी कान्ता है, हम नहीं; जो हमें छोड़कर उसके साथ चले गये? जो उन्हें बहकाकर ले गयी वही प्रेयसी है, हम नहीं? तुम साक्षी हो हरिणी, देखो, यह कुलपतिका कैसा अन्याय है।' मानिनी व्रजांगनाओंकी ओरसे ये भाव हैं।' इसके अतिरिक्त जो श्रीवृषभानुनन्दिनीकी शुद्ध प्रेष्ठतम सखी हैं, उनके वे ही भाव हैं कि हे कृष्णसार सती! तुम धन्य हो, तुमने युगलसरकारके दर्शन किये हैं, उनके सम्मिलित स्वरूपदर्शनसे तुम्हारे इन नेत्रोंकी सुनिर्वृति हुई है—परमानन्दकी प्राप्ति हुई है। तुम प्रेष्ठसखी हो, श्रीवृषभानुनन्दिनीकी अन्तरंगा हो। तुम्हारे नेत्रोंकी प्रसन्नतासे मालूम पड़ता है, अवश्य तुमने उन श्रीराधामाधवके यहाँ कहीं अभी दर्शन किये हैं। सखि! हम तुम्हारी बड़ी कृतज्ञ होंगी, हमको भी उनका पता दो। प्रकृति पद्यान्तर्गत 'कान्ता' पदकी व्युत्पत्ति की जाती है कि 'कस्य सुखस्य अन्तः सिद्धान्तो यस्यां सा' अर्थात् जिसमें अनुरागात्मक या आनन्दात्मक सुखका अन्त है वह 'कान्ता' है। तात्पर्य यह कि व्रजेन्द्रनन्दिनी श्रीराधा ही सुख- सिद्धान्तरूपा हैं। सुख क्या है? तो यदि वादी- प्रतिवादीनिर्णीत सिद्धान्त ही सुख है, ब्रह्मानन्द सुख है अथवा स्वर्गादि सुख है, इसका अन्तिम सिद्धान्त श्रीवृषभानुनन्दिनी ही हैं, परमानन्दमें रहनेवाला माधुर्यसारसर्वस्व वही हैं अथवा 'कस्य सुखस्य अन्तःपर्यवसानम् यस्यां सा कान्ता' अर्थात् सुखकी बढ़ते-बढ़ते अन्तिमावस्था पराकाष्ठा जहाँ हो, वह तत्त्व कान्ता है और वही श्रीराधातत्त्व है। श्रीराधास्वामी मतवाले कहते हैं कि 'वैदिक, पौराणिक लोगोंको केवल १४ लोक मिले, पर हमारे स्वामी १८वें लोकमें विराजमान हैं।' कल्पना करनेमें क्या लगता है? एक राजाको कहानीका बड़ा शौक था, वह ऐसी कहानी सुनना चाहता था, जिसका अन्त न हो और इनाम भी उसे देना चाहता था, जो बे-अन्त कहानी कहे। बेचारे सब परेशान होकर चले जाते थे, आखिर कितनी लम्बी कहानी होती। एक ऐसा कहानीकार उसे मिल गया। उसने कहना शुरू किया— 'एक बड़ा भारी जंगल था। उसमें एक बहुत बड़ा वृक्ष था, उसमें बड़े-बड़े असंख्य पत्र थे, एक-एक पत्रपर कई-कई पक्षी रहते थे, उनमेंसे एक उड़ा फुर्र, दूसरा उड़ा फुर्र। राजा जब पूछता—'फिर क्या हुआ?' तो कहानीकार कह देता 'फुर्र'। इस तरह और 'फुर्र' के चक्करमें बहुत समय निकल गया। राजाने खीझकर कहा—'आगे क्या हुआ?' कहानीकारने कहा—'हुजूर, सब पक्षी उड़ लें तब तो आगे कहानी चले।' अतः हमारे दार्शनिक एक बातपर निर्णय करते हैं, वाचस्पतिकी मति भी सुखकी कल्पना करनेमें थक जाय, वह नित्य निरतिशय-सुखास्पदा नित्यनिकुंजेश्वरी श्रीराधा हैं। अतएव 'कस्य सुखस्य अन्तो यस्याम्' यह संगत व्युत्पत्ति है। इन कान्ता श्रीव्रजेन्द्रनन्दिनीके मंगलमय श्रीअंगके संगसे श्रीश्यामसुन्दरकी कुन्दमाला रँग गयी। वह कुंकुम था—केसर थी—जिससे वह रँग गयी। यह कुंकुम क्या है? भावुक कहते हैं— श्रीवृषभानुनन्दिनीके हृदयमें निवास करनेवाला श्रीकृष्णविषयक जो महाभावरूप अनुराग है, वही उनके कनककली-सदृश मनोहर स्तनमण्डलमें भी है अर्थात् कुंकुम-अनुराग स्थानीय है। यहाँ बिना समझे लोग सूखा कुतर्क करते हैं। वस्तुतः श्रीकृष्णमें— कृषिर्भूवाचकः शब्दः णश्च निर्वृत्तिवाचकः। तयोरेक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते॥

इसके द्वारा विनिर्दिष्ट परब्रह्मरूप श्रीकृष्णतत्त्वमें श्रीराधा और श्रीकृष्ण—दोनों आ जाते हैं। वह सत्ता, महासत्ता रूप है, जिसके बिना सब असत् है, उसी स्वप्रकाश सत्‌से सबकी सत्ता है, वही 'कृष्ण' हैं, इसमें णकार निर्वृति या आनन्दका द्योतक है तथा उनमें रहनेवाला आनन्द ही श्रीराधा हैं। आह्लादकी अन्तरात्मा आनन्द और आनन्दकी अन्तरात्मा आह्लाद दोनों एक तत्त्व हैं, भेद नहीं। इस प्रकार श्रीराधाकृष्ण उभय, उभयभावात्मा और उभय-उभय-रसात्मा हैं। यों कान्ताके हृदयह्रदमें जो पूर्णानुराग-महाभाव है, वहीं सुवर्णसदृश स्तनमण्डल और बाह्य कुंकुमके रूपमें अभिव्यक्त होकर शोभा बढ़ाता है। महाभाव ही कुंकुम है, उससे कुन्दमाला रँग गयी है। विशुद्ध अनुरागसे माला रँगी गयी है। उसीका सौगन्ध्य ब्रजमें फैला है। जिन्हें प्रभुकी अनुकम्पासे दिव्य घ्राण मिले, वे उसका अनुभव कर सकते हैं। पद्यमें 'वाति' वर्तमान काल है। आज भी ब्रजमें वही गन्ध विस्तीर्ण है, पर प्रभुकी कृपासे ही सूँघनेको मिलता है— 'कान्ताङ्गसङ्गकुचकुङ्कुमरञ्जितायाः कुन्दस्रजः कुलपतेरिह वाति गन्धः॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।११) हरिणीके प्रति ईर्ष्याभाव जो गोपांगनाएँ भगवान्‌के अन्तरंगस्वरूपसे परिचित हैं, वे विप्रयुक्ता नहीं हैं, पर जो अन्यान्य मध्या, मुग्धा, प्रगल्भा आदि हैं, उनका साथ देनेके लिये वे भी श्यामुसुन्दरको ढूँढ़ती हैं। हरिणीसे इन सबने बहुत पूछा, कितने ही अन्तरंग रहस्य उसे बतलाये, पर वह न पसीजी, उसने उन्हें कुछ नहीं बतलाया। तब उससे उन्हें निराशा उत्पन्न हो गयी और उसीमें ईर्ष्या भी। उनमेंसे एक कहती है— 'पहले तो यह कृष्णसारकी (कृष्ण ही है सार जिसका—'कृष्णः सारो यस्य सः') अर्थात् कृष्णभक्त हरिणकी पत्नी थी, फिर वह कृष्णपत्नी हो गयी। अब वह इससे सापत्न्यभाव रखती है। इसीलिये उनका पता नहीं बतलाती।' दूसरी कहती है—'सखि! यह बात नहीं है, उन मनमोहन श्यामसुन्दरने अपने भ्रुकुटीरूप कामकोदण्डको तानकर कटाक्षशरसे इसे विद्ध किया है। इसका हृदय उससे विह्वल हो गया है, केवल इसके नेत्रोंमें श्रीश्याम- छवि बसी है। अतः हृदयशून्या होनेसे यह बेचारी हमारे वचनोंको सुन नहीं रही है। चकितदृष्टि, विह्वलहृदया वह हमारे प्रश्नोंका क्या उत्तर देगी?' तीसरी कहती है—'अभी तो यह मनोहारिणी थी, पर अब सुखहारिणी है, इससे अपनी आशा पूर्ण न होगी। चलो, किसी औरसे पता लें।' इस प्रकार वे श्रीकृष्णविरहिणी व्रजदेवियाँ जड़, चेतन, पशु-पक्षी, लता, वृक्ष सभीसे अपने प्राणधन घनश्यामका पता पूछती फिरती हैं। इससे सूचित करती हैं कि प्रेमी किसीसे भी अपने प्रियतमको पूछ सकता है। उसे स्वभावसे ही यह आशा बनी रहती है कि कदाचित् इनमेंसे कोई बता ही दे। 'आनन्दवृन्दावनचम्पू' में इस भावका खूब वर्णन किया है। श्रीकृष्णान्वेषण करती गोपियोंको कहीं तमालका वृक्ष दीख पड़ा, उसके दर्शनसे उनकी श्रीकृष्णस्मृति नवीन हो गयी। उस श्यामल तमालको देखनेसे उन्हें तमालश्याम मंजुल मुरलीमनोहर स्मरण हो आया, वे उस तमालको अपने मोहनका सखा मानती हैं। अगाध प्रेमसे गद्गद होकर उससे कहती हैं—'सखे! मालूम पड़ता है कि हमारे हृदय और तुम्हारी कान्तिके चोर श्यामसुन्दरने अभी-अभी तुम्हारा आलिंगन किया है, तभी तो ये तुम्हारे कोमल पल्लव अपनी अरुणिमाके व्याजसे तुम्हारे अनुरक्त हृदयका पता दे रहे हैं। बताओ, तुमने उन्हें किधर जाते देखा है?' उसे अपने प्रश्नका उत्तर न देते देख व्रजांगनाएँ यह कहती हुई आगे बढ़ जाती हैं—'सखियो! इसकी वेदना तो श्रीश्यामसुन्दरके आलिंगनसे शान्त है, अतः यह दूसरेकी वेदनाको क्या जाने?' आगे जाति (चमेली)-की लता मिल गयी। उससे कहती हैं—'तुम स्वभावसरला हो, तुम्हारे मुकुलपर श्रीश्यामसुन्दरने यह नखक्षत किया है, अतएव वह अरुण है।' आगे वे आम्रके नवकोमल अरुण पल्लवको देखकर कहती हैं—'सहकार! अवश्य हमारे प्राणधनने अपने नखोंसे तुम्हारा लुंचन किया है, तभी तो दुग्धके

४२८ | भक्तिसुधा

रूपमें ये तुम्हारे आनन्दाश्रु बह रहे हैं। उनका पता देकर जरा हमें भी अपने आनन्दमें सम्मिलित करो।' गोपांगनाओंका मनमोहनके स्वरूपका वर्णन करके वृक्षोंसे प्रश्न करना बाहुं प्रियांस उपधाय गृहीतपद्मो रामानुजस्तुलसिकालिकुलैर्मदान्धैः। अन्वीयमान इव वस्तरवः प्रणामं किं वाभिनन्दति चरन् प्रणयावलोकैः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१२) व्रजांगनाओंका यहाँ बहुतोंसे प्रश्न है—'हे वृक्षो! क्या इस ओर मोहन पधारे हैं, तुमने उन्हें देखा है?' वे किस रूपमें इधर आये होंगे, इसपर कहती हैं—'अपना एक बाहु प्रियाके स्कन्धमें उपधान (तकिया)-के समान रखकर दूसरेमें कमलका पुष्प लिये इधर आये हैं अर्थात् वामांगमें श्रीवृषभानुनन्दिनी हैं, अतः वाम बाहुको उनके स्कन्धपर स्थापित किया है और दक्षिण हस्तमें नीलकमल ग्रहण कर रखा है। अपने कम्बुकण्ठमें उन्होंने तुलसीकी माला पहन रखी है। उसके मधुलोभसे मदान्ध भ्रमरवृन्द उन्हें घेरे हुए हैं। उनको हटानेके लिये ही उन्होंने हाथमें कमल ले रखा है अथवा तुलसीकी माला श्रीवृषभानुनन्दिनीने धारण कर रखी है, उसके पीछे भ्रमर दौड़े आ रहे हैं, उनको हटानेके लिये ही मानो श्रीनन्दनन्दनने कमल ग्रहण किया है। इस रूपमें वे इधर पधारे हैं। हे वृक्षो! क्या अपनी झुकी शाखाओंसे किये गये आपके प्रणामका अपने प्रेमावलोकनसे उन्होंने अभिनन्दन किया है?' व्रजांगनाएँ मानो देख रही हैं—वृक्ष अपने फूल, फल, पल्लवोंसे भूमिका स्पर्श कर रहे हैं— अहो अमी देववरामरार्चितं पादाम्बुजं ते सुमनःफलार्हणम्। नमन्त्युपादाय शिखाभिरात्मन- स्तमोऽपहत्यै तरुजन्म यत्कृतम्॥ (श्रीमद्भा० १०।१५।५) यह देखकर व्रजांगनाओंने कहा—'ये इसी अपने फूल-फलादिके उपहारको लेकर पल्लवों, उपशाखाओंसे श्रीकृष्ण परमात्माका अभिनन्दन कर रहे हैं, उनके पादरजको लेनेके लिये झुककर भूमिका स्पर्श कर रहे हैं।' व्रजांगनाएँ सोचती हैं—'ये प्रणाम कर रहे हैं। यदि प्रभुने इनका अभिनन्दन किया होता तो ये उठते, पर ये उठ नहीं रहे हैं, अपनी शाखाओंसे वैसे ही झुके हुए हैं, अतः मालूम होता है कि वे मुरलीमनोहर यहीं कहीं हैं। वे इनका जबतक अभिनन्दन नहीं करेंगे, तबतक ये ऐसे ही रहेंगे।' व्रजांगनाएँ कहती हैं—'परंतु हे तरुओ! क्या वे तुम्हारा अभिनन्दन कर रहे हैं? 'किं वाभिनन्दति' बात यह है कि उन्हें तुम्हारे प्रणामके उत्तर देनेका— कृपा करनेका अवकाश ही नहीं; क्योंकि वे कान्ताके संगमें पड़े हैं, उनकी तुम-सरीखे साधुओंपर दृष्टि ही कहाँ? वे तो कुन्दमालाके गन्धमें रमे हैं।' यदि वृक्ष कहें कि 'नहीं, इस ओर तो वे सदा आते हैं और हमारा अभिनन्दन करते हैं, फिर तुम ऐसा प्रश्न क्यों करती हो?' इसपर व्रजांगनाएँ कहती हैं—'तुम तो साधु हो, भोले हो और वे रामानुज हैं— ('रामस्य वारुणीपानमत्तस्य अनुजः') वारुणीका पान करके मतवाले रहनेवाले बलरामके छोटे भाई हैं। उनके साथी भी मत्त ही हैं—वे हैं तुलसीके मकरन्दपानसे मत्त हुए भौंरे। जो मत्तोंके अनुज हैं और जिनके साथीतक मत्त हैं, वे तुम-जैसे साधुओंके प्रणामका उत्तर दें, यह असम्भव है। फिर वे सम्भोगशृंगारवशात्, शैथिल्यात् प्रियाके स्कन्धपर हाथ धरकर, मुख-से- मुख मिलाकर चलते हैं, इसमें विघ्न पहुँचानेवाले भ्रमरोंको नीलकमलसे हटाकर वे प्रियाकी सेवामें लगे हैं। वृक्षो! तुम्हारा उन्हें ध्यान भी कहाँ?' इसपर मानो वृक्षोंने कहा—'नहीं, नहीं, गोपांगनाओ! बात ऐसी नहीं है, तुम भ्रममें पड़ी हो, वे अपनी प्रियाको हमारी शोभा दिखानेके लिये ही इधर पधारे हैं।' वृक्षोंके इस अनुकूल तर्कपर वे कहती हैं—'तुम जड हो, उनकी बातको समझ नहीं सकते, उनके इधर आनेका कारण हमसे सुनो, वे तो मदान्ध तुलसिकालिकुल (तुलसीपर मँडरानेवाले भौंरोंके झुण्ड)-से उद्विग्न हुई श्रीप्रियाजीके सान्त्वनार्थ नीलकमलसे उन्हें उड़ाते हुए इधर आये हैं। उन्होंने यह सोचा है कि ये भौंरे इन वृक्षोंमें भटक जायँगे अथवा इनके फूलोंमें रम जायँगे और प्रियाजीको

श्रीरासपञ्चाध्यायी ४२९ न सतायेंगे, इसलिये इधर पधारे हैं। अस्तु, हे तरुवरो! जाने दो इस विवादको। इससे यह तो निर्विवाद सिद्ध हो गया कि आपने श्रीश्यामसुन्दरको यहाँ देखा है, वे प्रियाजीके साथ विहार करते इधर पधारे हैं तो हमपर इतनी कृपा करो, बतलाओ, अब वे कहाँ हैं?' कुछ महानुभावोंका कहना है कि वे यह समझती हैं कि ये वृक्ष श्रीराधा-कृष्णसे लालित- पालित हैं। वे स्वयं अपने हाथसे इनका लालन करते हैं, इससे ये रोमाञ्चवान् हैं और ये अन्तरंग भी हैं। गोपांगनाओंको इनसे श्रीश्यामा-श्यामके दर्शनोंकी सम्भावना है, अतः पूछती हैं—'क्या आपके प्रणामका अभिनन्दन करते हुए श्रीश्यामाश्याम इस ओरसे निकले हैं?' श्रीव्रजदेवियोंने पहले एक-एक वृक्ष, लता, पशु, पक्षियोंसे श्रीश्यामसुन्दरकी स्थिति पूछी। अन्तमें उन्होंने समस्त तरुओंसे एक साथ पूछा। वे तरु सुमनफलभारसे विनम्र हो रहे थे, भूमिका स्पर्श कर रहे थे, उनकी शाखा-उपशाखाएँ झुकी हुई थीं। तरुओंकी उस मुद्रासे गोपांगनाओंने निश्चय किया कि वे श्रीनन्दनन्दनको उपहारसहित प्रणाम कर रहे हैं। साथ ही उनके मनमें इस कल्पनाने भी स्थान पाया कि श्रीमोहन यहीं हैं, कहीं गये नहीं; क्योंकि ये तरुवर प्रणामार्थ अभी झुके ही हुए हैं और श्रीप्रभुने अभी इनके प्रणामका उत्तर नहीं दिया, इनका अभी अभिनन्दन नहीं किया, अतएव ये झुके ही हैं। व्रजदेवियाँ इस स्थितिमें उनसे प्रश्न करती हैं— बाहुं प्रियांस उपधाय गृहीतपद्मो रामानुजस्तुलसिकालिकुलैर्मदान्धैः। अन्वीयमान इह वस्तरवः प्रणामं किं वाभिनन्दति चरन् प्रणयावलोकैः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१२) 'हे तरुओ! वे श्रीबलरामके भैया, जिन्होंने एक हाथमें कमल धारण कर रखा है और दूसरा हाथ अपनी प्रियाके कन्धेपर रखा है तथा तुलसीकी सुगन्धिके लोभसे कितने ही मदान्ध भौंरे जिनका पीछा कर रहे हैं, क्या प्रेमपूर्वक तुम्हारी ओर देखकर उन्होंने तुम्हारे प्रणामका अभिनन्दन किया? क्या तुम्हारे फल-पुष्पके उपहारकी ओर दृष्टि भी डाली? हम तो समझती हैं नहीं, क्योंकि उन्हें अपनी प्रियाकी ललित गतिके अवलोकनसे ही अवकाश कहाँ?' (इसीके पोषणार्थ श्रीकृष्णका साक्षात् नाम न लेकर व्रजांगनाओंने 'रामानुजः' नामसे यहाँ उनका संकेत किया है) 'तरुओ! वारुणीपान करके प्रमत्त रहनेवाले दाऊजीके ये छोटे भाई हैं, वे वारुणीपानसे मत्त हैं तो ये श्रीवृषभानुनन्दिनीकी रूप-लावण्यवारुणीका पान करके प्रमत्त हैं। तरुओ! इनके पीछे जो ये मतवाले भौंरे भागे आ रहे हैं, इससे यह भी स्पष्ट हो गया कि इनके साथी भी इन्हींकी तरह प्रमत्त हैं। ऐसी दशामें तुम्हारे-जैसे साधुओंका अभिनन्दन करनेके लिये उन्हें अवकाश कहाँ? इसके अतिरिक्त वे अपनी प्राणेश्वरीके कन्धेपर अपना वाम बाहु स्थापितकर अर्थात् उसे ही उपधान बनाकर दक्षिण हस्तगत नील कमलसे उन भौंरोंको हटा रहे हैं, जो श्रीराधामुखाम्भोज- माधुर्यके महालोभसे चारों ओर मँडरा रहे हैं। इस प्रकार वे अपनी प्राणेश्वरीकी सेवामें तत्पर हैं। उन्हें तुम्हारे प्रणामको देखनेका अवकाश ही नहीं है।' जैसे 'एणपत्नी' के प्रति परमप्रेष्ठ सखीकी उक्ति थी, उसी तरह यह भी उक्ति है। नित्यनिकुञ्जेश्वरी श्रीजीकी प्रेष्ठ सखियों और श्रुतिरूपा आदि सखियोंका भी इसमें ग्रहण है। ऐसी परिस्थितिमें वहाँ श्रीयुगलकिशोर ही अकेले नहीं हैं, किंतु ये सब दर्शन हुआ है। अतएव पूछती हैं—'हे तरुओ! तुम्हारे इस सोपहार प्रणामको, जो तुम इतनी देरसे कर रहे हो, क्या उन्होंने देखा और उसका अभिनन्दन किया? तरु यदि यह कहें कि 'सखियो! क्यों न वे हमारे प्रणामका अभिनन्दन करेंगे?' तो इसपर व्रजांगनाओंका कहना है कि 'इसीलिये कि वे अपनी श्रीप्राणेश्वरीकी सेवामें संलग्न हैं।' यहाँ 'तुलसिका' पद वृन्दादेवीका बोधक है और 'आली' से उनकी सखियोंका ग्रहण है। इसके अतिरिक्त नित्यनिकुञ्जेश्वरी श्रीजीकी प्रेष्ठ सखियों और श्रुतिरूपा आदि सखियोंका भी इसमें ग्रहण है। ऐसी परिस्थितिमें वहाँ श्रीयुगलकिशोर ही अकेले नहीं

४३० भक्तिसुधा हैं, अपितु ये सब सखियाँ भी सेवामें उपस्थित हैं। फिर भी स्वयं श्रीलालजी ही श्रीजीकी भ्रमर- निवारणादि सेवामें रत हैं. ऐसा क्यों ? इसका कारण यह है कि अलिकुलसहित वृन्दादेवी आदि श्रीप्रियाप्रियतमके प्रेमोन्मादमें स्वयं उन्मदान्ध हैं। जैसे प्रिया-प्रियतम परस्परके अपूर्व अनुरागरससिन्धुमें मग्न हैं, वैसे ही इनकी इस मधुर स्थितिके अवलोकनसे सखी-समूहसहित श्रीतुलसी आदि भी प्रिया-प्रियतमके अनुरागरससिन्धुमें निमग्न हैं। गोपांगनाएँ पूछती हैं- 'तरुओ! क्या इसी अवसरपर आपलोगोंको भी उनके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त हुआ है और उस प्रेममग्न अवस्थामें ही क्या आपलोग भी निस्तब्ध खड़े हैं?' इस 'बाहुं प्रियांस' पर कई महानुभावोंके कुछ और भी भाव हैं। उनके भावानुसार प्रिया-प्रियतमकी यह सुरतान्त स्थिति है। 'प्रियांसे' यह सामीप्यमें सप्तमी है। श्रीलालजी अत्यन्त सुकुमारी श्रीप्राणेश्वरीके शैथिल्यको सँभालनेके लिये अपने बाहुसे उनके बाहु-अंसको सहारा देते हुए चल रहे हैं तथा श्रीजीके मुखाम्भोजमधुलोभी भ्रमरोंको, जो उनके समीप मँडरा रहे हैं, अपने दक्षिणहस्तगत नील कमलसे हटा रहे हैं। 'रामानुजः' में 'रामानुगः' की अनुसारिणी व्युत्पत्ति करके एक भाव यह भी है कि 'रामा- मनुगच्छति रमयति या सा रामा श्रीवृषभानु- नन्दिनी।' रामा अन्य गोपी भी हैं, पर श्रुतिमुनिरूपा आदि स्वयं श्रीमदनमोहनमें रमण करती हैं। अतएव 'आत्मारामोऽप्यरीरमत्' कहा गया है। यहाँ प्रेरणामें 'णिच्' प्रत्यय है। 'स्वयं रमण किया' यह इसका अर्थ नहीं, अपितु 'रमण कराया' यह अर्थ है। इसी तरह प्राणसखी, प्रेष्ठसखी, नित्यसखी आदि भी श्रीकृष्णमें तो रमण नहीं करतीं, पर युगलमूर्तिमें रमण करती हैं। इन सखियोंमें उत्तरोत्तर तत्सुख-सुखित्वका ही भाव होता है, इनकी रमणवस्तु केवल प्रिया- प्रियतमका मिलन है। परंतु श्रीकृष्ण परमात्माको रमण करानेवाली तो वही 'रामा' हैं। इन्हींके साथ रमण करनेकी उत्कण्ठामें उन 'अमनाः' ने 'मनश्चक्रे'- मनका निर्माण किया। भगवानपि ता रात्रीः शरदोत्फुल्लमल्लिकाः । वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः ॥ (श्रीमद्भा० १०।२९।१) श्रीरासपंचाध्यायीके इस प्रथम पद्यमें 'योगमाया' का अर्थ 'श्रीवृषभानुनन्दिनी' है। 'योगाय इतरासां संयोगाय माया यस्याः सा योगमाया' यह योगमाया पदका विग्रह है। इस प्रकार श्रीकृष्ण परमात्माका सम्बन्ध अन्योंको प्राप्त करानेकी जिनके मनमें इच्छा हुई, वह योगमाया श्रीवृषभानुनन्दिनी हैं। यह उन समस्त सखियोंकी युग-युगान्तरोंकी तपस्याका, आराधनाका फल था, जिससे सन्तुष्ट होकर योगमाया श्रीवृषभानुजाके 'उप'=सामीप्यमें 'आश्रित' होकर भगवान्ने 'मन' बनाया-'रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाश्रितः।' यहाँ 'चक्रे' इस क्रियामें आत्मनेपद है, जिसका फल आत्मगामी होता है। दूसरी ओर 'अरीरमत्' में परस्मैपद है, जिसका फल परगामी होता है। इससे यही ध्वनित हुआ कि श्रीकृष्ण परमात्माको रमण करानेवाली श्रीरासेश्वरी राधा हैं और इसी अपने रमणके लिये भगवान्ने 'मन' बनाया तथा इन्हीं श्रीजीकी प्रेरणासे अन्योंको उनके आनन्दके लिये रमण कराया। श्रीकृष्ण परमात्माके प्रति जैसा-जैसा उत्कृष्ट भाव व्रजांगनाओंका देखा गया है, वैसा-ही-वैसा या उससे भी अधिक श्रीजीके प्रति भगवान्का है। जैसे व्रजांगनाओंको श्रीश्यामसुन्दरके वियोगमें एक-एक क्षण कल्पके समान प्रतीत होते थे, 'त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्' वही श्रीवृषभानु- नन्दिनीके बिना श्रीव्रजेन्द्रनन्दनका भी हाल था। व्रजांगनाएँ जब श्रीनन्दनन्दनको निहारने लगतीं, तब उनकी पलकें बलात् गिर जातीं और वे 'उच्चै- र्निरीक्ष्यमाणानां पक्ष्मनिर्माता विधाता जडः'- नेत्रोंपर पलकोंका निर्माण करनेवाले ब्रह्मा अज्ञ प्रतीत होते हैं, उन्हें इस रसका पता ही नहीं-इत्यादि रूपमें ब्रह्माजीको भरपेट कोसतीं। अटति यद् भवानह्नि काननं त्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम्। कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च ते जड उदीक्षतां पक्ष्मकृद् दृशाम्॥ (श्रीमद्भा० १०।३१।१५) श्रीश्यामसुन्दर भी सखियोंमें बैठकर सदा यही

उपालम्भ (शिकायत) करते। जब रसिकशेखर- चूड़ामणि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीजीका दर्शन करने लगते, सौगन्ध्यके लिये लालायित होते, तब अलकावली आँखोंके सामने आ जाती या और कोई विघ्न उपस्थित हो जाता, उस समय अपनी प्रियतमाकी रूपमाधुरीके पान, सौरूप्य, सौरभ्य आदिके सुमधुर अनुभवकालमें ऐसे प्रतिरोध उन्हें बहुत खलते। सभी व्रजसखियाँ जैसी-जैसी भावना, लालसा श्रीराधाकृष्णके मिलित या पृथक् स्वरूपमें करतीं, वे सब श्रीनन्दनन्दनको श्रीवृषभानुजाके प्रति होतीं। अतएव सखियोंकी तरह सेवा करनेकी लालसासे वे अपनी प्रियतमाकी सेवामें निरत हैं, अपनेको रमण करानेवाली, रामाओंको रमण करानेवाली 'रामा' श्रीव्रजेन्द्रनन्दिनीको बाहुके सहारेसे सँभालते हुए वे उनके पीछे चल रहे हैं। 'गृहीतपद्माः' से यहाँ यह भाव ध्वनित होता है कि सुरतश्रमशिथिला श्रीव्रजेश्वरीके चन्द्रमाको लजानेवाले निष्कलंक मुखचन्द्रपर श्रीश्यामसुन्दर अपना हृदयकमल वारते हैं, निर्मांछन करते हैं—न्योछावर करते हैं, जैसे कोई प्राणोंकी, तन-मनकी बलिहारी करता हो। इसी भावको जतानेके लिये मानो श्रीश्यामसुन्दरके हाथमें कमल है। भ्रमर 'तुलसिकालिकुलमदान्ध' क्यों हैं? स्पष्ट है कि श्रीयुगलकिशोरके अंग-अंगसे समुद्भूत परिमल ही इसका कारण है। इस पदमें 'आली' और 'अली'—सखी और भ्रमर—दोनोंका श्लेष है। तुलसिकाके भ्रमर पहले तो उसके सौरभमें मस्त थे, पर श्रीजीका आमोद पाकर अब वे उनके पीछे लग गये, तुलसीको छोड़ दिया। श्रीश्यामसुन्दरकी वनमालाका सौगन्ध्य पाकर भी वे उसे छोड़ आये। इस तरह वे 'अन्वीयमान' हैं—पीछेसे आये हैं और प्रिया-प्रियतमके पीछे-पीछे घूम रहे हैं। श्लेषसे ये भौंरे 'आलिकुल' ही हैं। बात यह है कि तुलसी जंगलमें है, भौंरे भी वहीं होने चाहिये। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भौंरोंकी तरह सखियाँ श्रीयुगलसरकारके पीछे-पीछे घूम रही हैं। परमप्रेष्ठ सखीके इसपर कुछ और भाव हैं, वह कहती है—'तरुओ! ये प्यारे श्यामसुन्दर एक अद्भुत घन हैं। भेद इतना ही है कि वे घन जलकी वर्षा करते हैं और ये प्यारे घनश्याम रसकी वर्षा करते हैं। वे श्यामघन दामिनीपरिवेष्टित होकर जलरूप जीवनकी वर्षाद्वारा तरु आदिको आप्यायित करते हैं और ये प्यारे घनश्याम अनन्तानन्त दीप्तिमती दामिनीको भी लज्जित करनेवाली प्रभासंवलितांगी श्रीप्रियतमाके श्रीअंगसे परिवेष्टित होकर अद्भुत, सरस श्रृंगारकी वर्षा करते हैं। अनेक सौरभमय पुष्पोंकी वनमाला ही उनका इन्द्रधनुष है। इन वस्तुओंसे युक्त पूर्णानुराग- रससारवर्षी प्यारे घनश्याम तुम्हारा आप्यायन करते हुए क्या इधर आये हैं? तरुओ! सच-सच बतलाओ, प्रणयावलोकनसे तुम्हारा अभिनन्दन करते हुए क्या वे इधर पधारे हैं? सभी व्रजांगनाएँ इस प्रकार श्रीवृन्दावनचन्द्रको ढूँढ़नेमें व्यग्र हैं। इनमें जो कान्तभाववती हैं, वे पहलेसे ही कुछ ईर्ष्यासे प्रश्न करती हैं और अन्यान्योंमें ईर्ष्याका उदय तब हुआ जब उन्हें प्राणेश्वरीके सामीप्यका अनुमान पुष्ट हुआ, पर इनका भी जीवन श्रीयुगलसरकारके दर्शन ही है। जब तरुओंसे पता नहीं मिला, तब व्रजांगनाओंने कुछ उड़ रहे और कुछ भूमिस्थ चकोरोंको देखकर कल्पना की कि श्रीश्यामाश्याम अवश्य यहीं होंगे; क्योंकि ये चकोर उनके पादांगुली-दलस्थ नखमणि- चन्द्रकी ज्योत्स्नाका पान करनेके लिये यहाँ मँडरा रहे हैं। चलो पूछें, परंतु जब उनसे भी पता नहीं मिला, तब वे वहीं उड़ रहे भ्रमरोंसे पूछने लगीं। उन्होंने सोचा कि वृन्दावनके विविध पुष्पोंमें व्यासक्त न होकर जो ये यहाँ अन्तरिक्षमें उड़ रहे हैं, उसके सन्तर्पक सौगन्ध्यको पाकर ये अन्य पुष्पोंको भूल गये हैं। उसी अष्टगन्धको हरनेके लिये यह गन्धवाह (वायु) भी चल रहा है, चलो इन्हींसे पूछें। इसके बाद ही व्रजांगनाओंको कोकिल देख पड़ी। वे उसीसे अपने प्राणधनका पता पूछने लगीं। पूछते हुए उन्हें उसमें पुँस्कोकिलकी भावना हो आयी। फिर तो ये उसे खरी-खोटी सुनाने लगीं— 'सखियो! पुरुष निष्करुण होते हैं। यह भी श्रीश्याम- सुन्दरहीकी तरह है। जैसे काले कृष्ण कामिनियोंको दुःख देते हैं, वैसे ही अपने कलकूजनसे यह भी दुःख

४३२ भक्तिसुधा देता है। अपने वर्ण, व्यवहार सब तरहसे यह उनके समान है, उनका सखा है।' इतनेहीमें व्रजांगनाओंकी दृष्टि चकवीपर पड़ जाती है और वे बड़ी आशासे उसीसे पूछने लगती हैं—'सखि चक्रवाकि! तुम विरहव्यथाको जानती हो; क्योंकि तुम स्वयं विरहिणी होती हो, विरहवेदनाका तुम्हें परिचय है, सारसकी स्त्री लक्ष्मणाको नहीं। सखि! हम आतुर हैं, हमें प्यारे मोहनसे मिला दो।' लताओंसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना इस प्रकार पक्षी, तरु, लता आदिसे पूछती हुई निराश होकर जब वे सामनेकी ओर देख रही थीं, तब सहसा उनकी दृष्टि एक लतापर गयी, जो एक मनोहर तरुका आलिंगन किये खड़ी थी। उसे देखकर गोपांगनाओंको उससे पूछनेका उत्साह हुआ, 'सखियो! इस लतासे पूछो'— पृच्छतेमा लता बाहूनप्याश्लिष्टा वनस्पतेः। नूनं तत्करजस्पृष्टा बिभ्रत्युत्पुलकान्यहो ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।१३) 'वनस्पतेर्बाहूना आश्लिष्टा अपि तत्करजस्पृष्टा अहो उत्पुलकानि बिभ्रति'। अहो, वनस्पतिके बाहुसे आलिंगित होकर भी श्रीश्यामसुन्दरके नखस्पर्शको प्राप्त करके यह अभी भी उत्पुलकित हो रही हैं, यह आश्चर्य ही है।' वृन्दावनमें ऐसी लताएँ बहुत हैं। इधर तो यह कि वृन्दावनधाम सच्चिदानन्दस्वरूप ही है, यहाँ जितने पशु, पक्षी, तरु, लता हैं, सब श्रीजीके श्रीअंगकी शोभावस्तु हैं, नित्यविहारकी ये वस्तुएँ रूपान्तरसे कही गयी हैं। वस्तुतः यहाँके सभी पदार्थ श्रीप्रिया-प्रियतमके विहारकी वस्तु हैं। यहाँका श्यामल तरुण तमाल श्रीश्यामसुन्दरका ही रूपान्तर है, उसके साथ आलिंगन करके स्थित जो सुवर्णवर्णा लता है, वह श्रीराधेश्वरीका ही रूपान्तर है। जैसे श्रीवृष- भानुजालिंगित श्रीव्रजेन्द्रनन्दन हैं, वैसे ही यह लतालिंगित तरुण तमाल है। ये ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो मूर्तिधारी शृंगार ही खड़ा हो। यहाँ महाभावरूपा श्रीराधेश्वरी ही सुवर्णवर्णा लता हैं। ये सब तरु-लता प्रिया-प्रियतमके ही भावका अवलोकन कराते हैं। 'द्विमिल' वनमें तो तरु-लताओंका यह भाव अत्यन्त स्पष्ट है। इनके देखनेसे श्रीराधा-माधवका स्वरूप झलक जाता है। श्रीराधा-माधव परस्परमें तो अत्यन्त अभिन्न होते हुए भी भिन्नसे प्रतीत होते हैं। जैसे प्रेमके सरोवरमें उत्पन्न हुए कमलके एक नालमें दो फूल लगें, उनमें एक श्याम और दूसरा गौर हो। यही भाव 'एक प्राण दो देह' आदि पदोंसे व्यक्त होता है। उनके अन्तःकरण, मन एक हैं, केवल देह दो हैं। उन दोमें भी सदा यही उत्कण्ठा रहती है कि ऐसे हम दोनों एक-दूसरेमें मिलकर एक हो जायँ। प्रेष्ठसखीके सामने श्रीव्रजेन्द्रनन्दनने कई बार अपनी इस लालसाको प्रकट किया है। अंजन, मृगमद, माला बनकर भी ऐक्य प्राप्तिकी लालसा उन्होंने प्रकट की है। यह उनकी साधना पूरी भी हुई है—'दोऊ मिलि एकै भये श्रीराधावल्लभलाल।' किसीने पंजाबमें एक मन्दिर बनवाकर उसमें अकेले श्रीकृष्णकी मूर्ति स्थापित की। प्रश्न उठा कि श्रीराधाकी मूर्ति क्यों नहीं स्थापित हुई ? गौरतेजके बिना श्यामतेजकी उपासना, अर्चना करनेवाला तो पातकी माना गया है। परंतु प्राचीन मन्दिरोंमें जहाँ एक विग्रह है, वहाँ एकमें दूसरेका अन्तर्भाव है, वह दो मिलकर एक हैं। श्रीकृष्णकी कुछ स्वयम्भू मूर्तियोंके प्रति भी भावुकोंके ऐसे ही भाव हैं। प्राकृतमें भी माना गया है— 'आलिङ्गितायां पुनरायताक्ष्यामाशास्महे विग्रहयो- रभेदम्।' प्राकृतमें तो यह भावनामात्र है; क्योंकि वहाँ सत्यसंकल्पता नहीं। यहाँ तो ईश्वरका संकल्प है, भावनाके साथ वैसा होता जाता है। यहाँ निमेषमात्रके व्यवधानमें व्याकुलता होती है। यहाँ दोनोंको समान— एक ही जैसे—आलिंगनादिकी उत्कण्ठा होती है। यहाँकी भावना फलपर्यवसायिनी होती है। देदीप्यमान सुवर्णवर्णा मंजूषा नीलमणिमंजूषामें प्रतिबिम्बित होनेसे जैसे एक विलक्षण चमक उत्पन्न हो अथवा गौरवर्णकी शीशीमें जैसे श्यामवर्णकी शीशीकी चमक पड़े और श्यामवर्णकी शीशीमें जैसे

  • अरी सखी! इन लताओंसे पूछो। ये अपने पति वृक्षोंको भुजपाशमें बाँधकर आलिंगन किये हुए हैं, इससे क्या हुआ ? इनके शरीरमें जो पुलक है, रोमांच है वह तो भगवान्के नखोंके स्पर्शसे ही है। अहो! इनका कैसा सौभाग्य है !

श्रीरासपञ्चाध्यायी ४३३ गौरवर्णकी चमक पड़े, उसी प्रकार श्रीश्यामसुन्दरमें गौरवर्णा श्रीराधाकी और श्रीराधामें श्यामवर्ण श्रीश्याम- सुन्दरकी परस्पर श्यामता और गौरता प्रतिबिम्बित होती रहती है। यदि श्यामसुन्दरकी श्यामता देखनी हो तो वह उनमें नहीं, अपितु श्रीराधामें दीख पड़ेगी और वैसे ही सुवर्णवर्णा श्रीराधाकी गौरता उनमें नहीं, अपितु श्रीश्यामसुन्दरमें मिलेगी। इन भावोंको ऊँची भावनाके लोग ही परख सकते हैं। प्रसंगमें इतना ही कहना है कि ऐसे ही भावोंके अभिव्यंजनार्थ ये लतामिलित तरु हैं। ब्रजांगनाओंके सामने लतामिलिततरूद्योत्य ऐसे अनेक भाव उपस्थित हुए। उन्होंने देखा कि कई लताएँ तरुको आलिंगित किये हैं, उनमें कुछ विकसित कुसुम, कुड्‌मल लगे हैं। तब गोपांगनाओंको भी उनसे पूछनेका मन हो आया—'पृच्छतेमा लताः।' परंतु ब्रजांगनाओंने क्या यह नहीं सोचा कि जब औरोंने नहीं बतलाया, तब ये रसपरिरम्भमग्ना हमें श्रीश्याम- सुन्दरको कैसे बतायेंगी? यह बात सही है, उन्होंने यह अवश्य सोचा, पर यह भी उनके मनमें विचार आया कि यद्यपि ये लताएँ अपने प्राणनाथसे समाश्लिष्ट हैं तथापि श्रीश्यामसुन्दरके नखसे भी संस्पृष्ट हैं— 'नूनं तत्करजस्पृष्टाः', जिसके फलस्वरूप पुलका- वलिस्थानीयसे कुसुम अभी भी विकसित हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि यह इनकी कुसुम-पुलकावली अरुणिमा साम्प्रतिक वनस्पतिपरिरम्भोत्थ नहीं, अपितु पूर्वतन तत्करजस्पृष्टतासे ही है। इसके साथ ही प्रस्फुटित प्रसून व्याजसे उन्होंने अपने हर्षविकसित हृदयको ही धारण किया है। 'पृच्छतेमा' पद्यमें 'अपि' पद इसीलिये है। यह ऊँचा भाव है। कोई नायिका नायकके अंकमें विराजमान हो, बाहुपाशसे आबद्ध हो, उस समय भी श्रीश्यामसुन्दरके संस्मरणसे रोमांचित हो, यह प्रगाढ़ प्रेमकी ही महिमा कही जा सकती है अथवा पूर्णतम पुरुषोत्तम आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र व्रजेन्द्रनन्दनके ही लोकोत्तर सम्पर्कका यह फल हो सकता है। 'देव्यो विमानगतयः स्मरनुन्नसारा भ्रश्यत्प्रसूनकबरा मुमुहुर्विनीव्यः ॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।१२) जब श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनकी वेणु बजी, इन्द्र, वरुण आदि सभी देवगण अपनी पत्नियोंके साथ विमानोंमें बैठकर वहाँ आये थे। उस समय इन्द्राणी, देवांगनाएँ अपने-अपने पतियोंके अंकमें विराजमान थीं, फिर भी— 'मुमुहुर्विनीव्यः ॥' मनोभाववेगसे उनकी मानसी गतिमें चंचलता आ गयी, सिरका केशपाश खुल गया, उसमें लगे फूल बिखर गये, नीवी शिथिल हो गयी। अपने- अपने कान्तोंसे वियुक्त-अवस्थामें श्रीश्यामसुन्दरके त्रैलोक्यमनोहर वेणुनिनादसे कदाचित् उनकी यह दशा सम्भव थी, पर कान्तांकमें विराजमान रहकर भी ऐसी विह्वलता, विकलता उन्हें हुई कि वे सब कुछ भूल गयीं। जो गति उनकी हुई, वही इन लताओंकी भी हुई है। फिर ये तो 'नूनं तत्करजस्पृष्टाः' हैं, अतः गोपांगना सोचती हैं—इनसे अवश्य पूछना चाहिये 'पृच्छतेमा लताः।' ब्रजवधूटियोंको यह निश्चय हो गया कि इन लताओंको अवश्य ही प्राणप्यारे श्रीवृन्दावनविहारीका पता ज्ञात है तथा इनकी यह हर्षोत्फुल्लता है। इसी धारणाके अनुसार वहाँ उपस्थित प्रत्येक लतासे अपने प्राणधनको पूछती हैं, उनके प्रत्येक पुष्पसे और पत्रसे पूछती हैं, लतालिंगित वृक्षोंसे भी पूछती हैं। एक अन्य भावकी सखी तरुवरसे कहती है—'आपका जीवन सफल है, आप सफलतरु हैं, आप इस लोकोत्तर फल-फूल-भारको ग्रहण करके सम्पत्तिशाली होकर भी विनम्र हैं, आपके पल्लव, स्तबक भूमितललग्न हैं। आपसे बढ़कर सफलजन्मा जगत्में दूसरा कौन होगा ! सर्वदा परोपकारमें रत हैं; तरुश्रेष्ठ ! आप धन्य हैं। आपने हमारे मोहनको फल-फूलकी सम्पत्ति भेंटकर, झुककर प्रणाम किया, पर क्या उन्होंने आपके प्रणामका अभिनन्दन किया—'किं वाऽभिनन्दति ?' यहाँ एक यह विकल्प है कि उन्हें तुम्हारी ओर आँख उठाकर देखनेका अवकाश ही नहीं, अतः उन्होंने तुम्हारा अभिनन्दन नहीं किया। दूसरा यह कि वे प्रणतवत्सल हैं, जो उनके प्रति विनम्र होता है, वे उसका अवश्य अभिनन्दन करते हैं, अतः अवश्य ही कोमल और सत्स्वभाववश उन्होंने तुम्हारा अभिनन्दन किया है। इसपर कदाचित् वृक्ष यह कहें कि 'सखि, तुम ऐसी बात कैसे कहती हो; क्योंकि तुमने अपना