भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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उपालम्भ (शिकायत) करते। जब रसिकशेखर- चूड़ामणि व्रजेन्द्रनन्दन श्रीजीका दर्शन करने लगते, सौगन्ध्यके लिये लालायित होते, तब अलकावली आँखोंके सामने आ जाती या और कोई विघ्न उपस्थित हो जाता, उस समय अपनी प्रियतमाकी रूपमाधुरीके पान, सौरूप्य, सौरभ्य आदिके सुमधुर अनुभवकालमें ऐसे प्रतिरोध उन्हें बहुत खलते। सभी व्रजसखियाँ जैसी-जैसी भावना, लालसा श्रीराधाकृष्णके मिलित या पृथक् स्वरूपमें करतीं, वे सब श्रीनन्दनन्दनको श्रीवृषभानुजाके प्रति होतीं। अतएव सखियोंकी तरह सेवा करनेकी लालसासे वे अपनी प्रियतमाकी सेवामें निरत हैं, अपनेको रमण करानेवाली, रामाओंको रमण करानेवाली 'रामा' श्रीव्रजेन्द्रनन्दिनीको बाहुके सहारेसे सँभालते हुए वे उनके पीछे चल रहे हैं। 'गृहीतपद्माः' से यहाँ यह भाव ध्वनित होता है कि सुरतश्रमशिथिला श्रीव्रजेश्वरीके चन्द्रमाको लजानेवाले निष्कलंक मुखचन्द्रपर श्रीश्यामसुन्दर अपना हृदयकमल वारते हैं, निर्मांछन करते हैं—न्योछावर करते हैं, जैसे कोई प्राणोंकी, तन-मनकी बलिहारी करता हो। इसी भावको जतानेके लिये मानो श्रीश्यामसुन्दरके हाथमें कमल है। भ्रमर 'तुलसिकालिकुलमदान्ध' क्यों हैं? स्पष्ट है कि श्रीयुगलकिशोरके अंग-अंगसे समुद्भूत परिमल ही इसका कारण है। इस पदमें 'आली' और 'अली'—सखी और भ्रमर—दोनोंका श्लेष है। तुलसिकाके भ्रमर पहले तो उसके सौरभमें मस्त थे, पर श्रीजीका आमोद पाकर अब वे उनके पीछे लग गये, तुलसीको छोड़ दिया। श्रीश्यामसुन्दरकी वनमालाका सौगन्ध्य पाकर भी वे उसे छोड़ आये। इस तरह वे 'अन्वीयमान' हैं—पीछेसे आये हैं और प्रिया-प्रियतमके पीछे-पीछे घूम रहे हैं। श्लेषसे ये भौंरे 'आलिकुल' ही हैं। बात यह है कि तुलसी जंगलमें है, भौंरे भी वहीं होने चाहिये। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भौंरोंकी तरह सखियाँ श्रीयुगलसरकारके पीछे-पीछे घूम रही हैं। परमप्रेष्ठ सखीके इसपर कुछ और भाव हैं, वह कहती है—'तरुओ! ये प्यारे श्यामसुन्दर एक अद्भुत घन हैं। भेद इतना ही है कि वे घन जलकी वर्षा करते हैं और ये प्यारे घनश्याम रसकी वर्षा करते हैं। वे श्यामघन दामिनीपरिवेष्टित होकर जलरूप जीवनकी वर्षाद्वारा तरु आदिको आप्यायित करते हैं और ये प्यारे घनश्याम अनन्तानन्त दीप्तिमती दामिनीको भी लज्जित करनेवाली प्रभासंवलितांगी श्रीप्रियतमाके श्रीअंगसे परिवेष्टित होकर अद्भुत, सरस श्रृंगारकी वर्षा करते हैं। अनेक सौरभमय पुष्पोंकी वनमाला ही उनका इन्द्रधनुष है। इन वस्तुओंसे युक्त पूर्णानुराग- रससारवर्षी प्यारे घनश्याम तुम्हारा आप्यायन करते हुए क्या इधर आये हैं? तरुओ! सच-सच बतलाओ, प्रणयावलोकनसे तुम्हारा अभिनन्दन करते हुए क्या वे इधर पधारे हैं? सभी व्रजांगनाएँ इस प्रकार श्रीवृन्दावनचन्द्रको ढूँढ़नेमें व्यग्र हैं। इनमें जो कान्तभाववती हैं, वे पहलेसे ही कुछ ईर्ष्यासे प्रश्न करती हैं और अन्यान्योंमें ईर्ष्याका उदय तब हुआ जब उन्हें प्राणेश्वरीके सामीप्यका अनुमान पुष्ट हुआ, पर इनका भी जीवन श्रीयुगलसरकारके दर्शन ही है। जब तरुओंसे पता नहीं मिला, तब व्रजांगनाओंने कुछ उड़ रहे और कुछ भूमिस्थ चकोरोंको देखकर कल्पना की कि श्रीश्यामाश्याम अवश्य यहीं होंगे; क्योंकि ये चकोर उनके पादांगुली-दलस्थ नखमणि- चन्द्रकी ज्योत्स्नाका पान करनेके लिये यहाँ मँडरा रहे हैं। चलो पूछें, परंतु जब उनसे भी पता नहीं मिला, तब वे वहीं उड़ रहे भ्रमरोंसे पूछने लगीं। उन्होंने सोचा कि वृन्दावनके विविध पुष्पोंमें व्यासक्त न होकर जो ये यहाँ अन्तरिक्षमें उड़ रहे हैं, उसके सन्तर्पक सौगन्ध्यको पाकर ये अन्य पुष्पोंको भूल गये हैं। उसी अष्टगन्धको हरनेके लिये यह गन्धवाह (वायु) भी चल रहा है, चलो इन्हींसे पूछें। इसके बाद ही व्रजांगनाओंको कोकिल देख पड़ी। वे उसीसे अपने प्राणधनका पता पूछने लगीं। पूछते हुए उन्हें उसमें पुँस्कोकिलकी भावना हो आयी। फिर तो ये उसे खरी-खोटी सुनाने लगीं— 'सखियो! पुरुष निष्करुण होते हैं। यह भी श्रीश्याम- सुन्दरहीकी तरह है। जैसे काले कृष्ण कामिनियोंको दुःख देते हैं, वैसे ही अपने कलकूजनसे यह भी दुःख