भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 442

४३२ भक्तिसुधा देता है। अपने वर्ण, व्यवहार सब तरहसे यह उनके समान है, उनका सखा है।' इतनेहीमें व्रजांगनाओंकी दृष्टि चकवीपर पड़ जाती है और वे बड़ी आशासे उसीसे पूछने लगती हैं—'सखि चक्रवाकि! तुम विरहव्यथाको जानती हो; क्योंकि तुम स्वयं विरहिणी होती हो, विरहवेदनाका तुम्हें परिचय है, सारसकी स्त्री लक्ष्मणाको नहीं। सखि! हम आतुर हैं, हमें प्यारे मोहनसे मिला दो।' लताओंसे श्यामसुन्दरके विषयमें पूछना इस प्रकार पक्षी, तरु, लता आदिसे पूछती हुई निराश होकर जब वे सामनेकी ओर देख रही थीं, तब सहसा उनकी दृष्टि एक लतापर गयी, जो एक मनोहर तरुका आलिंगन किये खड़ी थी। उसे देखकर गोपांगनाओंको उससे पूछनेका उत्साह हुआ, 'सखियो! इस लतासे पूछो'— पृच्छतेमा लता बाहूनप्याश्लिष्टा वनस्पतेः। नूनं तत्करजस्पृष्टा बिभ्रत्युत्पुलकान्यहो ॥* (श्रीमद्भा० १०।३०।१३) 'वनस्पतेर्बाहूना आश्लिष्टा अपि तत्करजस्पृष्टा अहो उत्पुलकानि बिभ्रति'। अहो, वनस्पतिके बाहुसे आलिंगित होकर भी श्रीश्यामसुन्दरके नखस्पर्शको प्राप्त करके यह अभी भी उत्पुलकित हो रही हैं, यह आश्चर्य ही है।' वृन्दावनमें ऐसी लताएँ बहुत हैं। इधर तो यह कि वृन्दावनधाम सच्चिदानन्दस्वरूप ही है, यहाँ जितने पशु, पक्षी, तरु, लता हैं, सब श्रीजीके श्रीअंगकी शोभावस्तु हैं, नित्यविहारकी ये वस्तुएँ रूपान्तरसे कही गयी हैं। वस्तुतः यहाँके सभी पदार्थ श्रीप्रिया-प्रियतमके विहारकी वस्तु हैं। यहाँका श्यामल तरुण तमाल श्रीश्यामसुन्दरका ही रूपान्तर है, उसके साथ आलिंगन करके स्थित जो सुवर्णवर्णा लता है, वह श्रीराधेश्वरीका ही रूपान्तर है। जैसे श्रीवृष- भानुजालिंगित श्रीव्रजेन्द्रनन्दन हैं, वैसे ही यह लतालिंगित तरुण तमाल है। ये ऐसे प्रतीत होते हैं, मानो मूर्तिधारी शृंगार ही खड़ा हो। यहाँ महाभावरूपा श्रीराधेश्वरी ही सुवर्णवर्णा लता हैं। ये सब तरु-लता प्रिया-प्रियतमके ही भावका अवलोकन कराते हैं। 'द्विमिल' वनमें तो तरु-लताओंका यह भाव अत्यन्त स्पष्ट है। इनके देखनेसे श्रीराधा-माधवका स्वरूप झलक जाता है। श्रीराधा-माधव परस्परमें तो अत्यन्त अभिन्न होते हुए भी भिन्नसे प्रतीत होते हैं। जैसे प्रेमके सरोवरमें उत्पन्न हुए कमलके एक नालमें दो फूल लगें, उनमें एक श्याम और दूसरा गौर हो। यही भाव 'एक प्राण दो देह' आदि पदोंसे व्यक्त होता है। उनके अन्तःकरण, मन एक हैं, केवल देह दो हैं। उन दोमें भी सदा यही उत्कण्ठा रहती है कि ऐसे हम दोनों एक-दूसरेमें मिलकर एक हो जायँ। प्रेष्ठसखीके सामने श्रीव्रजेन्द्रनन्दनने कई बार अपनी इस लालसाको प्रकट किया है। अंजन, मृगमद, माला बनकर भी ऐक्य प्राप्तिकी लालसा उन्होंने प्रकट की है। यह उनकी साधना पूरी भी हुई है—'दोऊ मिलि एकै भये श्रीराधावल्लभलाल।' किसीने पंजाबमें एक मन्दिर बनवाकर उसमें अकेले श्रीकृष्णकी मूर्ति स्थापित की। प्रश्न उठा कि श्रीराधाकी मूर्ति क्यों नहीं स्थापित हुई ? गौरतेजके बिना श्यामतेजकी उपासना, अर्चना करनेवाला तो पातकी माना गया है। परंतु प्राचीन मन्दिरोंमें जहाँ एक विग्रह है, वहाँ एकमें दूसरेका अन्तर्भाव है, वह दो मिलकर एक हैं। श्रीकृष्णकी कुछ स्वयम्भू मूर्तियोंके प्रति भी भावुकोंके ऐसे ही भाव हैं। प्राकृतमें भी माना गया है— 'आलिङ्गितायां पुनरायताक्ष्यामाशास्महे विग्रहयो- रभेदम्।' प्राकृतमें तो यह भावनामात्र है; क्योंकि वहाँ सत्यसंकल्पता नहीं। यहाँ तो ईश्वरका संकल्प है, भावनाके साथ वैसा होता जाता है। यहाँ निमेषमात्रके व्यवधानमें व्याकुलता होती है। यहाँ दोनोंको समान— एक ही जैसे—आलिंगनादिकी उत्कण्ठा होती है। यहाँकी भावना फलपर्यवसायिनी होती है। देदीप्यमान सुवर्णवर्णा मंजूषा नीलमणिमंजूषामें प्रतिबिम्बित होनेसे जैसे एक विलक्षण चमक उत्पन्न हो अथवा गौरवर्णकी शीशीमें जैसे श्यामवर्णकी शीशीकी चमक पड़े और श्यामवर्णकी शीशीमें जैसे

  • अरी सखी! इन लताओंसे पूछो। ये अपने पति वृक्षोंको भुजपाशमें बाँधकर आलिंगन किये हुए हैं, इससे क्या हुआ ? इनके शरीरमें जो पुलक है, रोमांच है वह तो भगवान्के नखोंके स्पर्शसे ही है। अहो! इनका कैसा सौभाग्य है !