भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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श्रीरासपञ्चाध्यायी ४३३ गौरवर्णकी चमक पड़े, उसी प्रकार श्रीश्यामसुन्दरमें गौरवर्णा श्रीराधाकी और श्रीराधामें श्यामवर्ण श्रीश्याम- सुन्दरकी परस्पर श्यामता और गौरता प्रतिबिम्बित होती रहती है। यदि श्यामसुन्दरकी श्यामता देखनी हो तो वह उनमें नहीं, अपितु श्रीराधामें दीख पड़ेगी और वैसे ही सुवर्णवर्णा श्रीराधाकी गौरता उनमें नहीं, अपितु श्रीश्यामसुन्दरमें मिलेगी। इन भावोंको ऊँची भावनाके लोग ही परख सकते हैं। प्रसंगमें इतना ही कहना है कि ऐसे ही भावोंके अभिव्यंजनार्थ ये लतामिलित तरु हैं। ब्रजांगनाओंके सामने लतामिलिततरूद्योत्य ऐसे अनेक भाव उपस्थित हुए। उन्होंने देखा कि कई लताएँ तरुको आलिंगित किये हैं, उनमें कुछ विकसित कुसुम, कुड्‌मल लगे हैं। तब गोपांगनाओंको भी उनसे पूछनेका मन हो आया—'पृच्छतेमा लताः।' परंतु ब्रजांगनाओंने क्या यह नहीं सोचा कि जब औरोंने नहीं बतलाया, तब ये रसपरिरम्भमग्ना हमें श्रीश्याम- सुन्दरको कैसे बतायेंगी? यह बात सही है, उन्होंने यह अवश्य सोचा, पर यह भी उनके मनमें विचार आया कि यद्यपि ये लताएँ अपने प्राणनाथसे समाश्लिष्ट हैं तथापि श्रीश्यामसुन्दरके नखसे भी संस्पृष्ट हैं— 'नूनं तत्करजस्पृष्टाः', जिसके फलस्वरूप पुलका- वलिस्थानीयसे कुसुम अभी भी विकसित हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि यह इनकी कुसुम-पुलकावली अरुणिमा साम्प्रतिक वनस्पतिपरिरम्भोत्थ नहीं, अपितु पूर्वतन तत्करजस्पृष्टतासे ही है। इसके साथ ही प्रस्फुटित प्रसून व्याजसे उन्होंने अपने हर्षविकसित हृदयको ही धारण किया है। 'पृच्छतेमा' पद्यमें 'अपि' पद इसीलिये है। यह ऊँचा भाव है। कोई नायिका नायकके अंकमें विराजमान हो, बाहुपाशसे आबद्ध हो, उस समय भी श्रीश्यामसुन्दरके संस्मरणसे रोमांचित हो, यह प्रगाढ़ प्रेमकी ही महिमा कही जा सकती है अथवा पूर्णतम पुरुषोत्तम आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र व्रजेन्द्रनन्दनके ही लोकोत्तर सम्पर्कका यह फल हो सकता है। 'देव्यो विमानगतयः स्मरनुन्नसारा भ्रश्यत्प्रसूनकबरा मुमुहुर्विनीव्यः ॥' (श्रीमद्भा० १०।२१।१२) जब श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनकी वेणु बजी, इन्द्र, वरुण आदि सभी देवगण अपनी पत्नियोंके साथ विमानोंमें बैठकर वहाँ आये थे। उस समय इन्द्राणी, देवांगनाएँ अपने-अपने पतियोंके अंकमें विराजमान थीं, फिर भी— 'मुमुहुर्विनीव्यः ॥' मनोभाववेगसे उनकी मानसी गतिमें चंचलता आ गयी, सिरका केशपाश खुल गया, उसमें लगे फूल बिखर गये, नीवी शिथिल हो गयी। अपने- अपने कान्तोंसे वियुक्त-अवस्थामें श्रीश्यामसुन्दरके त्रैलोक्यमनोहर वेणुनिनादसे कदाचित् उनकी यह दशा सम्भव थी, पर कान्तांकमें विराजमान रहकर भी ऐसी विह्वलता, विकलता उन्हें हुई कि वे सब कुछ भूल गयीं। जो गति उनकी हुई, वही इन लताओंकी भी हुई है। फिर ये तो 'नूनं तत्करजस्पृष्टाः' हैं, अतः गोपांगना सोचती हैं—इनसे अवश्य पूछना चाहिये 'पृच्छतेमा लताः।' ब्रजवधूटियोंको यह निश्चय हो गया कि इन लताओंको अवश्य ही प्राणप्यारे श्रीवृन्दावनविहारीका पता ज्ञात है तथा इनकी यह हर्षोत्फुल्लता है। इसी धारणाके अनुसार वहाँ उपस्थित प्रत्येक लतासे अपने प्राणधनको पूछती हैं, उनके प्रत्येक पुष्पसे और पत्रसे पूछती हैं, लतालिंगित वृक्षोंसे भी पूछती हैं। एक अन्य भावकी सखी तरुवरसे कहती है—'आपका जीवन सफल है, आप सफलतरु हैं, आप इस लोकोत्तर फल-फूल-भारको ग्रहण करके सम्पत्तिशाली होकर भी विनम्र हैं, आपके पल्लव, स्तबक भूमितललग्न हैं। आपसे बढ़कर सफलजन्मा जगत्में दूसरा कौन होगा ! सर्वदा परोपकारमें रत हैं; तरुश्रेष्ठ ! आप धन्य हैं। आपने हमारे मोहनको फल-फूलकी सम्पत्ति भेंटकर, झुककर प्रणाम किया, पर क्या उन्होंने आपके प्रणामका अभिनन्दन किया—'किं वाऽभिनन्दति ?' यहाँ एक यह विकल्प है कि उन्हें तुम्हारी ओर आँख उठाकर देखनेका अवकाश ही नहीं, अतः उन्होंने तुम्हारा अभिनन्दन नहीं किया। दूसरा यह कि वे प्रणतवत्सल हैं, जो उनके प्रति विनम्र होता है, वे उसका अवश्य अभिनन्दन करते हैं, अतः अवश्य ही कोमल और सत्स्वभाववश उन्होंने तुम्हारा अभिनन्दन किया है। इसपर कदाचित् वृक्ष यह कहें कि 'सखि, तुम ऐसी बात कैसे कहती हो; क्योंकि तुमने अपना