भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 444

४३४ भक्तिसुधा तन, मन सर्वस्व उनपर वार दिया, फिर भी वे तुमसे अन्तर्हित हैं? तुम वन-वनमें भटक रही हो, बिलख रही हो, पर वे तुम्हें तनिक-सा आश्वासनतक नहीं देते। क्या यही उनकी कोमलता, सत्स्वभावता है?' इसके उत्तरमें व्रजांगना कहती हैं—'वह सब तो हमारे दोषोंका फल है। हम गर्वीली हुईं, हमने मान किया, इसीसे दुःख पा रही हैं।' श्रीकृष्णने अवश्य ही वृक्षोंका अभिनन्दन किया, इसकी पुष्टिमें एक भाव और है— श्रीश्यामसुन्दरने गलेमें तुलसीकी माला पहनी है, हाथमें नीलकमल लिया है। इससे वे यह व्यक्त करते हैं कि हम तो वन्य वस्तुओंसे—अचेतनोंसे भी अनुराग करते हैं, यदि कोई चेतन सावधान प्राणी हमसे अनुराग करेगा तो हम उससे अवश्य ही अनुराग करेंगे। 'गृहीतपद्मः', 'तुलसिकालिकुलैः' आदि पद इसके द्योतक हैं। अतः प्रणत वृक्षोंका उन्होंने अवश्य ही अभिनन्दन किया। इस प्रसंगमें एक बात और भी है— श्रीश्यामसुन्दरके हस्तारविन्द, पादारविन्द प्राकृत अरविन्दोंको अपनी सुकोमलतासे लजानेवाले हैं, परंतु अपने हस्तकमलसे लज्जित भी नीलकमलको उन्होंने धारण किया है। एतावता श्रीप्रभुके यहाँ यह शर्त नहीं है कि गुणवान्‌को ही—अच्छी चीजको ही—वे ग्रहण करते हैं। नहीं, ये निर्गुण वस्तुको भी स्वीकार कर लेते हैं। कमल-ग्रहणसे यह भी सूचित हुआ। अतः अवश्य ही उन्होंने वृक्षोंका अभिनन्दन किया है। इस तरह अभिनन्दन पक्षका समर्थन करती हुई व्रजांगना कहती है—'तरुओ ! इतना ही नहीं, प्राणप्यारे श्रीश्यामसुन्दरने तो तुम्हारे स्वरूपका भी अनुकरण किया है। तुम श्याम हो, वे भी श्याम हैं, तुम सुवर्ण- यूथिरूपा लतासे आवेष्टित हो, वे सुवर्णवर्णा लतारूप श्रीवृषभानुनन्दिनीसे वेष्टित हैं। यों वे अभिनव- लतावेष्टित तरुण तमाल ही हैं। वृक्षो! तुम उन्हें अत्यन्त प्रिय हो, तभी तो उन्होंने तुम्हारा अनुकरण किया। अतएव तुम्हारे प्रणामका उन्होंने अवश्य अभिनन्दन किया है।' 'बाहुं प्रियांस उपधाय' (श्रीमद्भा० १०।३०।१२)—से भी यह स्पष्ट है कि उसी वाम बाहुको प्रियाके स्कन्धका उपधान बनाकर वे तुम्हारा ही अनुकरण कर रहे हैं। तुलसीकी माला भी इसीलिये धारण की है, यद्यपि उसपर मत्त मिलिन्द मँडरा रहे हैं, मार्गमें विघ्न-बाधा उपस्थित कर रहे हैं तथापि तुम्हारे प्रति अनुराग-प्रदर्शनार्थ उसे धारण कर रखा है। अतः अवश्य अभिनन्दन किया है। वृक्ष कदाचित् पूछ बैठें कि अरी व्रजांगनाओ, तुम क्यों कोरी कल्पनासे अभिनन्दनका समर्थन कर रही हो? यदि उन्होंने अभिनन्दन किया होता तो क्या तुम उसे न सुनतीं? इसपर व्रजांगनाका कहना है—'नहीं, क्योंकि वह शब्दोंसे नहीं किया गया। अपितु अनुरागभरे नयनोंसे ही किया गया, अतः समीपवर्ती ही उसे जान सके, हम नहीं।' अब विकल्पके अभाव-पक्षपर दूसरी व्रजांगनाकी वकालत सुनिये। वह कहती है—'अवश्य ही वृक्षो, प्यारे श्यामसुन्दरने तुम्हारे प्रणामका अभिनन्दन नहीं किया, यदि किया होता तो तुम इतने खिन्न न होते, हमारे प्रश्नोंका उत्तर देते, पर तुम बोल ही नहीं रहे हो, इसीसे स्पष्ट है कि उन्होंने तुम्हारे प्रणामका उत्तर नहीं दिया। कारण स्पष्ट है, वे अपनी प्राणेश्वरीके कण्ठमें वामहस्तको विन्यस्त करके 'गृहीतपद्मः' हैं। 'गृहीतपद्मः' में मध्यमपद 'मुख' का लोप हो गया है, विग्रह वाक्यमें वह 'गृहीतमुखपद्मः' ऐसा है, जिसका अर्थ है—दक्षिण हस्तकमलसे कपोल स्पर्श किये हैं। तात्पर्य यह कि ये प्रेममें, श्रीप्रियाकी सेवामें इतने तल्लीन हैं कि उन्हें पता ही नहीं कि उन्हें कोई प्रणाम कर रहा है। फिर ये 'रामानुजः' हैं, हलमूसलधारीके भाई हैं, कठोर किसीका भी अभिनन्दन नहीं करते अथवा 'रामानुजः' माने 'रामानुगः' रामाके पीछे लगे हैं। वैसी स्थितिमें कौन तुम्हारा अभिनन्दन करेगा? हैं तो वे सर्वज्ञ-शिरोमणि, इसमें सन्देह नहीं, पर श्रीरासेश्वरीके अंगसंगसे प्रमत्त हैं— 'तद् यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किञ्चन वेद नान्तरम्।' (बृहदारण्यक० ४।३।२१) जैसे अति प्रेयसीके परिष्वंगसे प्रेमामृतसमुद्रमें निमग्न होकर प्राणी सब कुछ भूल जाता है, वैसे ही प्राणाधिका श्रीराधिकाके सम्पर्कमें रसिकशेखर श्रीश्यामसुन्दरकी स्थिति हो रही है। फिर उनको कोई