भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयाद दिलानेवाला होता तो भी बात बन जाती, पर वहाँ तो सभी उन्मत्त हैं। 'तुलसिका' को ही लो, वह स्वयं 'अलिकुलैर्मदान्धैरन्वीयमाना' है। तुलसी स्वयं ही सकलमाला-मानमर्दिनी होनेसे अतिप्रमत्त, फिर उसके अनुरागी भ्रमर तो और भी उन्मदान्ध। ऐसी स्थितिमें याद कौन दिलाये कि महाराज, ये वृक्ष आपको प्रणाम कर रहे हैं, इनका अभिनन्दन कीजिये। तुलसिका, भ्रमर, कमल, प्रियाजी और स्वयं सभी तो एक-से- एक बढ़कर हैं। वहाँ मतवालोंका जमघट है। अतः वृक्षोंके प्रणामका उन्होंने अभिनन्दन किया ही नहीं।' ब्रज-तरुणियोंने यह कैसे कल्पना की कि यों वे त्रिभुवन-मनोहर श्रीश्यामसुन्दर तुलसी आदिकी माला पहने हैं, कमल लिये हैं और प्रियाजीके साथ हैं ? इसपर एक समाधान तो यह है कि ब्रजदेवियोंको अन्तरंग-लीलाका सदा साक्षात्कार होता है। दूसरे, उन्होंने मार्गमें प्रिया-प्रियतमके चरणचिह्न पहचाने। उनमें श्रीश्यामसुन्दरके चरणमें ध्वज, अंकुश, वज्र आदिके चिह्न हैं, उनके वामांगमें श्रीप्रियाजीके चरणचिह्न भी हैं। इन्हींके आधारपर गोपांगनाओंकी कल्पना है। फिर श्रीप्रियाजीके अंसपर श्रीप्रियतमकी वामभुजा विराज रही है, यह कल्पना कैसे ? तो श्रीप्रियाजीके चरण भूमिमें आधे गड़े हैं, ये भारसे ही गड़े हो सकते हैं। भ्रमरोंके अस्तित्वकी कल्पनाका मूल यह है कि श्रीप्रिया-प्रियतमकी गतिके समय उनके पादविन्यास आगे-पीछे हुए दीखे हैं। कहीं श्रीवृषभानुजाके पादारविन्द आगे दीख पड़े हैं तो कहीं पीछे। ऐसे ही श्रीनन्दनन्दनके, जिसका आशय यह है कि भ्रमरोंके सताये जानेके कारण श्रीजीके पादविन्यासमें यह अन्तर है। एक बात और भी। जहाँ-जहाँ युगल- सरकारके चरणचिह्न पड़े हैं, वहाँ-वहाँ मधुकर- मुख-निर्गत परागबिन्दु पड़े हैं। अतएव भ्रमरोंसे अन्वीयमानताकी कल्पना है। विशेष बात यह है कि व्रजांगनाएँ श्रीभगवान्के मुख, हस्त, पाद आदि प्रत्येक अंगके पृथक् सौगन्ध्यसे सुपरिचित हैं। वे यह जानती हैं कि यह दक्षिण हस्तका सौरभ है और यह वाम हस्तका। ऐसे ही श्रीजीके भी अंगसौगन्ध्यका भेद उनकी कुशल नासिकासे छिपा नहीं। लोकमें भी कोमल-प्रकृतिके पुरुषोंको गन्धादिका ऐसा सूक्ष्म ज्ञान होता है। कहते हैं-लखनऊके एक नवाबका रामनगरमें स्वागत हुआ। उनकी कोमलता, विलासिता प्रसिद्ध थी। परीक्षाके लिये लोगोंने उनके चलनेके मार्गमें बिछी नयी खसमें एक जगह थोड़ी-सी पुरानी खस मिला दी, उन्हें इसका तुरंत पता लग गया। फिर भगवल्लीला तो अलौकिक है। वे 'अशब्दमस्पर्श- मरूपमव्ययम्' (कठ० १।३।१५) ही लोक- कल्याणार्थ अवतरित हुए हैं। उनके लीलापात्रोंमें उक्त विशेषताका होना स्वाभाविक है। हाँ तो उन व्रजांगनाओंको युगलसरकारके समस्त सौगन्ध्योंका अनुभव था। तभी तो यह हस्तका, यह कमलका और वह मिलित सौगन्ध्य है, ऐसी उनकी कल्पना हुई। इसी विशेषताके कारण उन्हें यहाँतक ज्ञान हुआ कि श्रीप्रियाजीके मुखारविन्दकी ओर आ रहे मिलिन्दोंको श्रीप्रियतमने अपने करस्थ कमलसे हटाया। श्रीवृषभानुजाके वाम गलेमें श्रीनन्दनन्दन हस्त न्यस्त किये हुए हैं, ब्रजदेवियोंकी यह कल्पना इस बातका प्रमाण है कि वे पूर्णरूपसे मिलित तत्त्वकी उपासिका थीं। इसी प्रकार तुलसीके सौगन्ध्य तथा भ्रमरोन्नत तद्गन्धकी वे पारखी थीं। अतएव 'बाहुं प्रियांस उपधाय' आदि ब्रजदेवियोंकी कल्पना सकारण और सत्य थी। इसी बलपर गोपांगनाएँ कल्पना कर रही हैं कि इन वृक्षोंके प्रणामका अभिनन्दन हुआ या नहीं। एक और भाव। गोपीजनके मनमें यह बात उठी कि ये वृक्ष अपने मनमें कदाचित् ऐसा सोच रहे होंगे कि 'हमें दिखानेके लिये ही वे प्रियाजीके साथ इधर आये हैं, पर उनके (गोपांगनाओंके) विचारानुसार बात ऐसी नहीं, ये तो यह निश्चय कर रही हैं कि वे लीलारसिक श्रीश्यामसुन्दर निज-निह्नुत (गोपन) लीलामें ऐसा कर रहे हैं, पर वे भ्रमर-झंकृतिसे डरे कि कहीं गोपांगनाओंको ज्ञात न हो जाय, वे कहीं सुन न लें, अतः उन्हें हटाते हैं। उनके हटानेके लिये ही उन्होंने नीलकमल धारण किया है, अतएव वे महा-अरण्यमें भी आये हैं कि गोपांगनाओंको मालूम न हो तथा ये भौंरे महा-अरण्यस्थ विविध दूसरे कुसुमोंमें आसक्त हो जायें एवं हमारा अनुसरण छोड़