भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
याद दिलानेवाला होता तो भी बात बन जाती, पर वहाँ तो सभी उन्मत्त हैं। 'तुलसिका' को ही लो, वह स्वयं 'अलिकुलैर्मदान्धैरन्वीयमाना' है। तुलसी स्वयं ही सकलमाला-मानमर्दिनी होनेसे अतिप्रमत्त, फिर उसके अनुरागी भ्रमर तो और भी उन्मदान्ध। ऐसी स्थितिमें याद कौन दिलाये कि महाराज, ये वृक्ष आपको प्रणाम कर रहे हैं, इनका अभिनन्दन कीजिये। तुलसिका, भ्रमर, कमल, प्रियाजी और स्वयं सभी तो एक-से- एक बढ़कर हैं। वहाँ मतवालोंका जमघट है। अतः वृक्षोंके प्रणामका उन्होंने अभिनन्दन किया ही नहीं।' ब्रज-तरुणियोंने यह कैसे कल्पना की कि यों वे त्रिभुवन-मनोहर श्रीश्यामसुन्दर तुलसी आदिकी माला पहने हैं, कमल लिये हैं और प्रियाजीके साथ हैं ? इसपर एक समाधान तो यह है कि ब्रजदेवियोंको अन्तरंग-लीलाका सदा साक्षात्कार होता है। दूसरे, उन्होंने मार्गमें प्रिया-प्रियतमके चरणचिह्न पहचाने। उनमें श्रीश्यामसुन्दरके चरणमें ध्वज, अंकुश, वज्र आदिके चिह्न हैं, उनके वामांगमें श्रीप्रियाजीके चरणचिह्न भी हैं। इन्हींके आधारपर गोपांगनाओंकी कल्पना है। फिर श्रीप्रियाजीके अंसपर श्रीप्रियतमकी वामभुजा विराज रही है, यह कल्पना कैसे ? तो श्रीप्रियाजीके चरण भूमिमें आधे गड़े हैं, ये भारसे ही गड़े हो सकते हैं। भ्रमरोंके अस्तित्वकी कल्पनाका मूल यह है कि श्रीप्रिया-प्रियतमकी गतिके समय उनके पादविन्यास आगे-पीछे हुए दीखे हैं। कहीं श्रीवृषभानुजाके पादारविन्द आगे दीख पड़े हैं तो कहीं पीछे। ऐसे ही श्रीनन्दनन्दनके, जिसका आशय यह है कि भ्रमरोंके सताये जानेके कारण श्रीजीके पादविन्यासमें यह अन्तर है। एक बात और भी। जहाँ-जहाँ युगल- सरकारके चरणचिह्न पड़े हैं, वहाँ-वहाँ मधुकर- मुख-निर्गत परागबिन्दु पड़े हैं। अतएव भ्रमरोंसे अन्वीयमानताकी कल्पना है। विशेष बात यह है कि व्रजांगनाएँ श्रीभगवान्के मुख, हस्त, पाद आदि प्रत्येक अंगके पृथक् सौगन्ध्यसे सुपरिचित हैं। वे यह जानती हैं कि यह दक्षिण हस्तका सौरभ है और यह वाम हस्तका। ऐसे ही श्रीजीके भी अंगसौगन्ध्यका भेद उनकी कुशल नासिकासे छिपा नहीं। लोकमें भी कोमल-प्रकृतिके पुरुषोंको गन्धादिका ऐसा सूक्ष्म ज्ञान होता है। कहते हैं-लखनऊके एक नवाबका रामनगरमें स्वागत हुआ। उनकी कोमलता, विलासिता प्रसिद्ध थी। परीक्षाके लिये लोगोंने उनके चलनेके मार्गमें बिछी नयी खसमें एक जगह थोड़ी-सी पुरानी खस मिला दी, उन्हें इसका तुरंत पता लग गया। फिर भगवल्लीला तो अलौकिक है। वे 'अशब्दमस्पर्श- मरूपमव्ययम्' (कठ० १।३।१५) ही लोक- कल्याणार्थ अवतरित हुए हैं। उनके लीलापात्रोंमें उक्त विशेषताका होना स्वाभाविक है। हाँ तो उन व्रजांगनाओंको युगलसरकारके समस्त सौगन्ध्योंका अनुभव था। तभी तो यह हस्तका, यह कमलका और वह मिलित सौगन्ध्य है, ऐसी उनकी कल्पना हुई। इसी विशेषताके कारण उन्हें यहाँतक ज्ञान हुआ कि श्रीप्रियाजीके मुखारविन्दकी ओर आ रहे मिलिन्दोंको श्रीप्रियतमने अपने करस्थ कमलसे हटाया। श्रीवृषभानुजाके वाम गलेमें श्रीनन्दनन्दन हस्त न्यस्त किये हुए हैं, ब्रजदेवियोंकी यह कल्पना इस बातका प्रमाण है कि वे पूर्णरूपसे मिलित तत्त्वकी उपासिका थीं। इसी प्रकार तुलसीके सौगन्ध्य तथा भ्रमरोन्नत तद्गन्धकी वे पारखी थीं। अतएव 'बाहुं प्रियांस उपधाय' आदि ब्रजदेवियोंकी कल्पना सकारण और सत्य थी। इसी बलपर गोपांगनाएँ कल्पना कर रही हैं कि इन वृक्षोंके प्रणामका अभिनन्दन हुआ या नहीं। एक और भाव। गोपीजनके मनमें यह बात उठी कि ये वृक्ष अपने मनमें कदाचित् ऐसा सोच रहे होंगे कि 'हमें दिखानेके लिये ही वे प्रियाजीके साथ इधर आये हैं, पर उनके (गोपांगनाओंके) विचारानुसार बात ऐसी नहीं, ये तो यह निश्चय कर रही हैं कि वे लीलारसिक श्रीश्यामसुन्दर निज-निह्नुत (गोपन) लीलामें ऐसा कर रहे हैं, पर वे भ्रमर-झंकृतिसे डरे कि कहीं गोपांगनाओंको ज्ञात न हो जाय, वे कहीं सुन न लें, अतः उन्हें हटाते हैं। उनके हटानेके लिये ही उन्होंने नीलकमल धारण किया है, अतएव वे महा-अरण्यमें भी आये हैं कि गोपांगनाओंको मालूम न हो तथा ये भौंरे महा-अरण्यस्थ विविध दूसरे कुसुमोंमें आसक्त हो जायें एवं हमारा अनुसरण छोड़
दें। भोले या जड़ वृक्ष उनकी इस चतुराईको क्या जानें, उसे तो हम समझती हैं। अतएव वे प्रियाके कन्धेपर हाथ रखकर इस ओर निकल आये, उन्हें किसीके प्रणाम और अभिनन्दनसे प्रयोजन ही क्या— ‘बाहुं प्रियांस····?’ यह एक और ढंगसे वृक्षोंके निरभिनन्दन पक्षका समर्थन हुआ।' जब व्रज-बालाएँ अपनेमें दोष और श्रीश्याम- सुन्दरमें गुणानुसन्धान करती हैं, तब सोचती हैं कि श्रीश्यामसुन्दरने अवश्य वृक्षोंका अभिनन्दन किया होगा; क्योंकि वे बड़े सरल, उदार और कृपालु हैं। तभी तो यह उन्मदान्ध तुलसिकालिकुल भी उनका अनुसरण कर रहा है। तब तो हम मानवतियोंको भी क्यों न ऐसा करना चाहिये ? परंतु दोष-दृष्टिके आते ही व्रजांगनाओंका विचार तुरंत बदल जाता है। वे सोचती हैं—तुलसीका क्या, वह तो मदान्धोंसे अन्वीयमान है, कोई इज्जतदार उसका कैसे अनुगमन कर सकता है ? यदि गोपांगनाओंसे कहें कि तुम इतनी विह्वल क्यों हो रही हो, इन भ्रमरोंके पीछे-पीछे चली जाओ, तुम्हें तुम्हारे प्राणाधार मिल जायँगे—तो गोपांगनाओंका इसपर उत्तर होगा—हम ऐसा कभी न करेंगी; क्योंकि ये भौंर तो हमारी सौत तुलसीके पक्षपाती हैं, प्रमुख हैं, इनसे हमें कभी अपने कार्यमें सफलता न मिलेगी, भला मतवालोंका अनुसरण करके किसने श्रीश्यामसुन्दरको प्राप्त किया है ? गोपी जब तरुओंको स्तब्ध देखती हैं तो कहती हैं—'ये श्रीमन्मोहनसे अभिनन्दित नहीं हुए, इसलिये अथवा पुरुष हैं—कठोर हैं, इसलिये हमें इनसे कोई आशा न रखनी चाहिये। अतः चलो, सखियो, इन लताओंसे पूछेंगी।' विशेष भाव यह है कि यहाँ भी मधुर-विहारका वर्णन है। सुरतान्तश्रमशिथिल दोनों श्रीप्रिया-प्रियतम निकुंजान्तरकी ओर जा रहे हैं। गलबॉही किये श्रीयुगल-सरकार एक-दूसरेको निहारते हुए मन्दगतिसे पादन्यास कर रहे हैं। निर्मल-निष्कलंक अनन्तानन्त- तारापति-पाथोधि-निर्मन्थन-समुद्भूत श्रीश्यामसुन्दरके मुखचन्द्रको, जिसपर कोटि-कोटि चन्द्र न्योछावर हो रहे हैं और जो मकराकार कुण्डलोंसे देदीप्यमान हो रहा है, श्रीप्रियाजी अतृप्त नेत्रोंसे निहार रही हैं। यही दशा श्रीव्रजकिशोरकी है। फिर प्रथम मिलनमें सम्पन्न दन्तक्षत, नेत्रांजन आदिको मन्दस्मितपूर्वक देखते हुए नित्य निकुंजमें पधारते हैं। इस रहस्यको जाननेवाली वे लता श्रीलाड़िली-लालके इस मधुर मिलनका संकेत प्रेष्ठ सखीको दे रही हैं। वे लता अन्तश्चेतन, किंतु बाह्य जड़ हैं। श्रीयुगलमूर्तिके मुखमण्डल इतने प्रभापुंजपूर्ण हैं, ऐसे देदीप्यमान हैं कि बड़ों-बड़ोंके नेत्र वहाँ नहीं ठहर पाते। इन्हीं सबका संकेत लताओंने प्रेष्ठ सखीको किया। अतएव व्रजांगना आपसमें मन्त्रणा करती हैं—सखियो, इन लताओंसे पूछो— पृच्छतेमा लता बाहूनप्याश्लिष्टा वनस्पतेः। नूनं तत्करजस्पृष्टा बिभ्रत्युत्पुलकान्यहो॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१३) ये सुवर्ण-यूथिका लताएँ अपने मुकुलित पुष्पविकाससे श्रीराधा-कृष्णके मधुर मिलनका अनुभव और हमें संकेत कर रही हैं। इसीसे ये ‘नूनं तत्करजस्पृष्टाः’ हैं और तभी इनमें मधुधारा आदि दीख पड़ रही हैं। केवल श्रीव्रजाधिपने ही नहीं, अपितु श्रीव्रजेश्वरीने भी, दोनोंहीने अपने वेश-विशेषकी रचनाके लिये इनसे पुष्प लिये हैं। तभी तो अपने पति तरुओंसे श्लिष्ट होकर भी ये विशेष पुलकित हैं। यह प्राकृत पतिके मिलनकी पुलकावली नहीं। यह मधुधारा, अश्रुधारा आदि तो उस परब्रह्म पूर्णतम-पुरुषोत्तम श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्दके संस्पर्शसे ही सम्भव है। उसी सम्मिलनका यह सुवर्ण-यूथिका लता हमें संकेत कर रही हैं, आओ सखियो, उन्हींसे पूछें। श्रीव्रजदेवियाँ प्राणप्यारे श्यामसुन्दरको ढूँढ़तीं, विभिन्न तरुओंसे पूछतीं, अन्तमें कहती हैं—‘इन लताओंसे पूछो, ये अपने पति वनस्पतियोंका आलिंगन किये रहनेपर भी पुलकित हो रही हैं। इनमें यह उत्पुलकितता प्रिय श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनसे ही उत्पन्न है।’ यह महानुभाव है। सर्वरसोपमर्दी श्रीकृष्ण हैं, नहीं तो रसान्तराविष्टमें रसान्तरावेश नहीं बनता। कोई भी प्राकृत कामिनी अपने कान्तके परिरम्भमें स्थित रहकर ही रसान्तरका अनुभव नहीं कर सकती। उस
श्रीरासपंचाध्यायी ४३७ समय उसमें रसान्तरका आवेश असम्भव है। यदि किसी दूसरे रसका आवेश हो सकता है तो केवल श्रीकृष्णरसका ही। यह दिव्यातिदिव्य विशुद्ध रस है। अतएव अन्यत्र कहा गया है—विभिन्न लोक-रसों (रागों)-में विरसता अति कठिनतासे होती है। उत्कृष्ट वैराग्य यदि कोई है तो यही श्रीकृष्णरस है। यह कोटिशः प्रयत्न करनेपर भी मिलता नहीं। संसारके राग शब्द, स्पर्श आदि ऐसे हैं, जो छूटते ही नहीं। परंतु उनके बीच यदि यह श्रीकृष्ण-राग समाविष्ट हो जाय तो सब छूट जाते हैं। गोस्वामीजीका वचन है— ‘रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी॥’ (रा०च०मा० २।३२४।८) यह विश्वविलास, साम्राज्य आदि सब रमाविलास है, इसमें सच्ची विरसता-वैराग्य होना कठिन है। पर इसमें कहीं श्रीकृष्णरस समाविष्ट हो जाय तो वे समस्त लोकरस (राग) तुरंत फीके पड़ जायँ। यही सच्चा वैराग्य है। श्रीरासपंचाध्यायीके पठन, श्रवण एवं मननका फल—हृद्रोग—कामका सर्वथा विनाश रासपंचाध्यायीके श्रवण, पठन, मननका यही फल है कि जगरस विरस हो जायँ। यह परमहंसोंकी संहिता है। इसे अन्य श्रोता भी श्रद्धासे सुने तो उसे परमहंसोंकी ही तरह जगसे विराग हो जाय। इसके अन्तमें फलश्रुति है— विक्रीडितं व्रजवधूर्भिरिदं च विष्णोः श्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः। भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः॥ (श्रीमद्भा० १०।३३।४०) जो इस रासलीलाको श्रद्धासे सुनते हैं, पढ़ते हैं, कणभर भी यदि इसका रस उन्हें मिल गया तो उनका हृद्रोग—काम, जो सबसे अधिक पापी है, अवश्य मिट जायगा। भगवल्लीलानुसन्धानमें यही महाबाधक है, जरा-सा भी काम होनेसे यहाँ काम न चलेगा। सिंहिनीके दूधकी तरह बिगड़ जायगा। इस कामका नाश इसके सुननेसे होता है, पर श्रोताको धीर होना चाहिये। फिर तो कामबाधानिवृत्तिकी पराकाष्ठा हो जायगी। देखो, ये लताएँ अपने पतियोंके अंकमें हैं, फिर भी श्रीश्यामसुन्दरके नखस्पर्शसे इनका हृदयकमल खिल रहा है, आनन्दाश्रु रुक नहीं रहे हैं। इस दशामें भी यह प्रेम है। किसी योगीसे कोई सुन्दरी लिपटी हो, उस समय भी यदि वह श्रीकृष्णचन्द्र आनन्दकन्द पूर्णतम पुरुषोत्तमकी लीलाका, उनके चन्द्रशत-तिरस्कारी मुखचन्द्रका ध्यान कर रहा है तो वह सुन्दरी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। जैसे बड़े-बड़े जापक हों परंतु कामिनी-दर्शन, ध्यानसे उनका चित्त विकल हो जायगा, किंतु श्रीश्याममूर्तिकी वह परम रमणीय आभा जब हृदयमन्दिरमें विराज जायगी, अनुभवमें आ जायगी तो वे कामिनीकी गोदमें रहकर भी निर्विकार ही रहेंगे। यही भाव लताओंके सम्बन्धमें है। वे चाहे पति—वनस्पतियोंसे लिपटी हैं, पर उनके मनमें तो वह श्रीमोहनमूर्ति बसी है। यही व्रजदेवियोंका आशय है, इसीलिये उनसे पूछती हैं—‘पृच्छतेमा लता।’ स्त्रीमें काम शतगुणित है, पर देखो, इन लताओंको कामोद्रेक नहीं। ये पति-अंकमें रहकर भी श्रीश्यामसुन्दरके नखस्पर्शसे उत्पन्न आनन्दका अनुभव कर रही हैं, यह इनका प्रफुल्ल भाव ही इसका पोषण कर रहा है। ये ऊँची कृष्णप्रणयिनी हैं। इनसे पूछो, ये बतायेंगी—‘पृच्छतेमा लता…।’ श्रीश्यामरसका आस्वादन होते ही अन्य रस नीरस हो जाते हैं इससे स्पष्ट है कि यह श्रीकृष्णरस सर्वरसोपमर्दी है। सब रस सड़ जाते हैं—नीरस हो जाते हैं, परंतु यह सदा नवनवायमान, उत्तरोत्तर वृद्धयभिमुख रहता है। तभी तो श्रीव्रजदेवियोंके लिये अथवा वैसे भावुक जनके लिये—जब वे श्रीश्यामरसका आस्वादन करने लगते हैं, उनके लिये समस्त विषय-रस नीरस हो जाते हैं। यही श्रीकृष्णरसोपासकोंकी कसौटी है। सूर्यके सामने चन्द्रादि फीके पड़ जाते हैं। अतएव उनका ऊपरका जीवन सर्वदा रूखा, बनावटी मण्डनसे दूर होता है। वे उन रूखे-सूखे टुकड़ोंसे भी उदरज्वाला शान्त कर देते हैं, जिन्हें शायद कुत्ते भी न खायें। ये फटे चिथड़ों, मृत्पात्रोंसे ही जीवन-निर्वाह
४३८ भक्तिसुधा कर लेते हैं; क्योंकि सर्वरसोपमर्दी श्रीराधाकृष्णके दिव्य दर्शन, रसपानसे वे सर्वदा छके रहते हैं। ब्रह्मास्वादपरायण योगीन्द्र-मुनीन्द्रोंकी भी यही स्थिति होती है। वे लटे तन, फटे कपड़े रखते हुए भी परमैश्वर्यसम्पन्न सम्राट्दुर्लभ प्रसन्नतामें मग्न रहते हैं। श्रीराधाकृष्ण-तत्त्वकी ब्रह्मतामें यह भी एक प्रमाण है। जिसके कारण उनको वह ऊँची प्रसन्नता है, वह तत्त्व श्रीराधाकृष्ण ही है। ऐसे पुरुषोंको बाहरके दुःखोंकी, सुखोंकी कुछ परवाह ही नहीं होती। ये लता उसी स्थितिमें हैं, लौकिक पति—वनस्पतियोंके अंकमें रहकर भी उनको उसका कोई लौकिक सौख्य या उसके अभावमें दुःख नहीं है, वे तो श्रीश्यामसुन्दरके करस्पर्शानन्द-समुद्रमें मग्न हैं। अतः उन्हींसे पूछती हैं—‘पृच्छतेमा लता''''।’ श्रीयुगलबिहारीकी प्रेष्ठसखीरूपा व्रजांगनाओंको तो उन लताओंका दर्शन करके ही आश्वासन और एक प्रसन्नता मिली। कारण, वे जानती हैं कि वे लता विशुद्ध सख्यभाववती हैं। यही समझकर उन्होंने उनसे प्रश्न भी किया। इन व्रजांगनाओंके मनमें लताओंकी उस स्थितिसे यह भाव उत्पन्न हुआ कि 'सुवर्णयूथिका लताएँ श्रीयुगलबिहारीकी लीलासे प्रेरित होकर उस भावको हमें इंगित करनेके लिये ही मानो तरुण तमालके साथ समालिंगित हुई हैं। अतएव 'तत्करजस्पृष्टाः' ( 'तयोः करजैः स्पृष्टा') हैं। दोनोंने एक-दूसरेका श्रृंगार करनेके लिये अर्थात् श्रीवृषभानुकिशोरीने प्यारे श्रीश्यामसुन्दरके अपने- जैसे स्त्रीवेशकी रचनाके लिये और श्रीनन्दसूनूने श्रीगौरसुन्दरीके अपने जैसे पुरुष वेशकी रचनाके लिये लताओंसे सुमन-स्तवक और सुमनोंका चयन किया है। उन्हींके संस्पर्शसे इनमें यह पुलकभाव है।' इन सखियोंकी स्थिति बहुत ऊँची है, ये श्रीयुगलबिहारीकी उपासना सख्यभावसे करती हैं। जो सुख इन परमप्रेष्ठ सखियोंको प्राप्त है, उसके लिये श्रीबिहारीलाल भी लालायित रहते हैं। वे जानते हैं कि हम दोनोंके समुदित आह्लाद-आनन्दका यथावत् अनुभव इन्हींको होता है अर्थात् श्रीश्यामसुन्दरको केवल श्रीगौरसुन्दरीके और उन्हें केवल श्रीश्यामसुन्दरके प्रणय-सौख्यका अनुभव होता है, परंतु ये सखियाँ दोनोंके विभिन्न और समुदित लोकोत्तर स्नेहसौख्यको प्राप्त करती हैं। लता पतिस्थानीय वनस्पतियोंसे समाश्लिष्ट रहकर भी श्रीश्यामसुन्दरके मुखदर्शनसे मुग्ध हैं, उनपर फूल बिखेरती हैं। लताओंकी कौन कहे, देवांगनाएँ जो सौन्दर्यकी सीमा गिनी जाती हैं, अपने परम विदग्ध पतिदेवोंके अंकमें विराजमान होकर भी गँवारे ग्वालबालोंसे श्रृंगारित श्रीनन्दनन्दनके मयूरचन्द्रिकाचित, वन्य कुसुमकल्पित कुण्डलाद्यलंकृत आननपर सकृद्दर्शनसे ही सदाके लिये बलिहार हो जाती हैं, उनकी नीवी शिथिल पड़ जाती हैं, अकस्मात् उत्पन्न रोमांचकी तीव्रतासे उनके केशपाश विशीर्ण हो जाते हैं और उनमें ग्रथित शत-शत कुसुमगुच्छ युगपत् विकीर्ण हो जाते हैं। दूसरी ओर श्रीवृषभानुनन्दिनीका वह सौन्दर्य- माधुर्य है, जिसकी कमनीयता, लोकोत्तरतापर पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म श्रीकृष्णभगवान्ने अपनेको न्योछावर कर दिया। साधारण व्रजरमणी लक्ष्मी हैं, गोपीजन लक्ष्मीतम हैं। अतिशयमें तमप् है। उनकी भी सिरमौर श्रीचन्द्रावली हैं, ये अनन्तानन्त गोपीयूथकी प्रभु हैं। श्रीश्यामसुन्दरका अभिसार दो ही स्थानपर होता था—या तो श्रीवृषभानुनन्दिनीके यहाँ या चन्द्रावलीके यहाँ। उन श्रीचन्द्रावलीके दिव्यप्रासादमें श्रीकृष्ण एक बार पधारे। रसरीतिके अनुसार परिरम्भबद्ध होकर वे श्रीचन्द्रावलीके अंकमें विराज रहे थे। पर श्रीवृषभानु-नन्दिनीका अनुस्मरण होते ही श्रीचन्द्रावलीके सौन्दर्य, लावण्य, प्रणयपाश उन्हें भूल गये, श्रीराधोद्देश्यक कम्प, हर्ष, रोमांचादि होने लगा और वे 'श्रीराधे श्रीराधे' बरबस कहने लग पड़े। यह इनकी वही स्थिति हुई जो देवांगनाओंकी अपने पतिदेवोंके अंकमें स्थित रहते भी श्रीकृष्णदर्शनसे हुई थी। वे श्रीचन्द्रावलीकी गोदमें श्रीराधाके लिये विह्वल हो गये; जो माधुर्यामृतसिन्धुकी लहर श्रीराधांकमें विराजमान होकर उठती थी, उसके लिये वे लालायित हो गये। यस्याः कदापि वसनाञ्चलखेलनोत्थ- धन्यातिधन्यपवनेन कृतार्थमानी।
श्रीरामपंचाध्यायी ४३१ योगीन्द्रदुर्गमगतिर्मधुसूदनोऽपि तस्यै नमोऽस्तु वृषभानुभुवोदिशेऽपि॥ अर्थात् श्रीवृषभानुनन्दिनीके वसनांचल खेलसे समुत्पन्न, अतएव अपनेको परमधन्य समझनेवाला वायु भी जब कभी श्रीनन्दनन्दनके स्पर्शका विषय होता है तो वे उतनेमात्रसे भी अपनेको परम कृतार्थ मानते हैं, यह स्थिति उन मधुसूदनभगवान्की है, जिनकी प्राप्तिके लिये बड़े-बड़े योगीन्द्र-मुनीन्द्र तरसते रहते हैं। वह तो दिशा भी वन्दनीय है, जहाँ श्रीवृषभानुभूपतनयाका चरण-संचार होता है। तात्पर्य यह है कि उन श्रीवृषभानुनन्दिनीके संग परम उमंगमें श्रीश्यामसुन्दर इधरसे निकले हैं, इन लताओंने उन्हें देखा है, श्रीराधाकृष्णका सम्मिलन इनके सामने हुआ है, इसीसे ये रोमांचित हो रही हैं, ये उनकी परम अन्तरंगा हैं, इन्हींसे पूछो— पृच्छतेमा लता बाहूनप्याश्लिष्टा वनस्पतेः। नूनं तत्करजस्पृष्टा बिभ्रत्युत्पुलकान्यहो ॥ इत्युन्मत्तवचोगोप्यः कृष्णान्वेषणकातराः। लीला भगवतस्तास्ता ह्यनुचक्रुस्तदात्मिकाः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१३-१४) यों पागलोंकी तरह गोपबालाएँ पूछती फिरती हैं—कारण्डव, भ्रमर, लता, तुलसी, वृक्षोंसे। यह प्रेमकी परिस्थिति है। जो वस्तुतः व्यग्र हैं, उन्हें किसीसे भी पूछनेमें संकोच नहीं। 'तस्यै नमोऽस्तु वृषभानुभुवोदिशेऽपि ॥' फिर उधरसे बयार (वायु) भी आये तो उसे प्रणाम क्यों नहीं? वह तो बरसानेका बयार है, बड़ा प्रिय है। यों उन्मत्त हैं, किसीसे भी बोलने लगती हैं, कुछ भी बोलने लगती हैं। 'उन्मत्तवचः' का यह भी अर्थ है कि 'उत्कृष्टा- नाम्=योगीन्द्रमुनीन्द्राणामपि, मोहो यस्माद् वचसः' अर्थात् जिन व्रजांगनाओंकी बात सुनकर बड़े-बड़े योगियोंको भी भ्रम, मोह उत्पन्न हो जाय, जिनके वचनोंसे वे गोपियाँ अथवा 'उत्कृष्टस्य पूर्णतम- पुरुषोत्तमस्य श्रीकृष्णस्य सर्वज्ञस्यापि मोहो यस्माद् वचसः' अर्थात् श्रीकृष्ण भी जिनकी, गम्भीर, ऊँचे भावकी वाणीको सुनकर विस्मित हो जाते हैं। अहो गोपियो! धन्य है तुम्हारा प्रेम-बन्धन, कितना ऊँचा है तुम्हारा भाव! रात्रिका समय, श्रीश्यामसुन्दरका मुरलीके द्वारा आह्वान ! उस समयके आनन्दको पाकर उसे ही अब ये ढूँढ़ती फिरती हैं। इनके वचनोंका स्पष्ट अर्थ तो श्रीकृष्ण परमात्माको ही लगा है। इनके सामने उस सर्वज्ञकी सर्वज्ञता भुला गयी। 'गोप्यः गाः=वाचः भगवद्गुणगानेन पान्तीति गोप्यः' अपने प्रिया-प्रियतम श्रीराधाकृष्णके गुणगानसे वाणीका पालन-रक्षण करनेवाली ये गोपियाँ हैं। इसके अतिरिक्त अन्य वाणी तो वन्ध्या है— '····वन्ध्यां गिरं तां बिभृयान्न धीरः ॥' (श्रीमद्भा० ११।११।२०) व्रजांगनाओंने इसका पूर्ण पालन किया। वे श्रीश्यामसुन्दर प्राणधनके अन्वेषणमें व्यग्र हैं, उन्मत्त हैं। गोपांगनाओंद्वारा श्यामसुन्दरकी मधुर लीलाओंका अनुकरण गोपियोंने सबसे पूछा, पर किसीने भी उन्हें समुचित उत्तर नहीं दिया, उन्हें पागल जानकर उनकी ठिठोली की। हताश उन्होंने भगवल्लीलाका आश्रय लिया—'लीला भगवतस्तास्ता ह्यनुचक्रुस्तदा- त्मिकाः ॥'* वे '····पूतनासुपयः पानम्····' (श्रीमद्भा० १२।१२।२८) आदि लीलाओंका अनुकरण करने लगीं। व्रजांगना पहले ही सन्तप्त हैं, फिर भगवल्लीला- नुकरणरूप घृतसंयोगसे वाडवाग्निके जैसा उनका विरहानल और भी अधिक उद्दीप्त हुआ होगा। वैसी परिस्थितिमें तो वे जीवित भी कैसे रह सकेंगी? इसलिये कहा है—'तदात्मिकाः' ('स कृष्णः आत्मनि यासां ताः') अर्थात् श्रीश्यामसुन्दरके वाचक 'कृष्ण' नामके 'क' में, जो सुशीतल अमृतवर्ण है, उनका चित्त आसक्त था, उसीने उनकी रक्षाकर भस्म हो जानेसे बचा लिया। अथवा 'तदात्मिकाः' पदसे लीलाका ही परिग्रह
- इत्युन्मत्तवचोगोप्यः कृष्णान्वेषणकातराः। लीला भगवतस्तास्ता ह्यनुचक्रुस्तदात्मिकाः ॥ परीक्षित् ! इस प्रकार मतवाली गोपियाँ प्रलाप करती हुई भगवान् श्रीकृष्णको ढूँढ़ते-ढूँढ़ते कातर हो रही थीं। अब और भी गाढ़ आवेश हो जानेके कारण वे भगवन्मय होकर भगवान्की विभिन्न लीलाओंका अनुकरण करने लगीं। (श्रीमद्भा० १०।३०।१४)
४४० भक्तिसुधा है। भगवान्की लीलाशक्तिने जब देखा कि अब इन व्रजांगनाओंको इनका यह जीवन भार हो रहा है तो वह स्वयं ही इनकी रक्षाके लिये प्रकट हुए। वैसे श्रीश्यामसुन्दर कहीं बाहर नहीं चले गये थे, वे तो आन्तर-रमणके निमित्त व्रजांगनाओंके अन्तरमें प्रविष्ट हुए थे। जब उन्होंने देखा कि अब ये बाहर मुझे न देखकर अतिसन्तप्त हो रही हैं तो उनके आश्वासनके लिये अपनी लीलाओंको उन्होंने भेजा। 'आनन्द- वृन्दावनचम्पू' में इसपर एक गम्भीर भाव व्यक्त हुआ है। उसका आशय है कि जैसे दीपादिकी ज्योत्स्ना प्रकोष्ठके मध्यमें होनेपर वह बाहर नहीं दीखे, जैसे घनमें विद्युत् होती है, पर उसके मध्यमें होनेसे वह बाहर सदा नहीं दीखे, वैसे ही श्रीश्यामसुन्दरकी स्थिति यहाँ है। एक बात और भी कि यदि ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो कि विद्युत्की ज्योत्स्नासे प्रकाशमान गौरवर्ण घनमें श्याम घन छिप जाय, विद्युत्के प्रकाशातिशयसे उसके होनेपर भी वह न दीखे। यदि ऐसी स्थिति कदाचित् बन सके तो श्रीश्यामसुन्दरके अन्तर्हित भावका वर्णन हो सकता है। ऐसे स्थलोंमें 'अभूतोपमा' होती है, जैसा कि श्रीमद्भगवद्गीता (११।१२)-में है— दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ ऐसा हो तब अन्तर्हितताकी उपमा बने। कल्पना कीजिये—एक प्रेमानन्द परिपूर्णहित सरोवर है, उसमें सुवर्णवर्णा कमलिनी खिली है, उनमें मिलिन्द छिपा है। इनके मध्यमें एक कमलनाल है, जिसमें सुवर्णवर्णा कमलिनी और श्यामवर्ण कमल दोनों खिले हैं, जैसे अकस्मात् वे तरुण कमल- कमलिनी अन्य सुवर्णवर्णा कमलिनियोंसे हटकर भीतर छिप जायँ, ऐसे ही श्रीराधा-कृष्ण उस समय योगमायासे अन्तर्हित हुए हैं, गोपांगनाओंसे अलग नहीं हुए हैं। जैसे मनोहर अमृतवर्षी घन विद्युत्से अलग न हो, वैसे ही यहाँकी परिस्थिति है। उन व्रजदेवियोंके संवित्में, ज्ञानमें, चित्तमें श्रीकृष्णतत्त्व और श्रीकृष्णतत्त्वमें उनका चित्त, ज्ञान, संवित् सब ओत-प्रोत हैं, दोनों एकमेक हो रहे हैं। इस परिस्थितिमें लीलानुकरण आरम्भ हुआ है— 'लीला भगवतस्तास्ता ह्यानुचक्रुस्तदात्मिकाः ॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।१४) पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णको ढूँढ़ते- ढूँढ़ते व्रजदेवियाँ बेहाल हो गयीं। तरु, लता, पशु, पक्षी—सभीसे उन्होंने पूछा, पर कहीं भी उनकी पृच्छा पूर्ण नहीं हुई, इससे और भी अधिक व्यग्र हो उठीं। उस समय उनका श्रीकृष्ण-प्रेमोन्माद, श्रीकृष्ण-विरह पूर्ण परिपाक-अवस्थाको प्राप्त हो चुका था। तब उनमें कुछ धैर्य रखनेवाली हितैषिणी व्रजांगनाओंने अपनी सखियोंके साथ अपनेको अति आतुर देखकर सोचा—अब कोई चित्त-सान्त्वनाका और उपाय होना चाहिये, नहीं तो प्रेमकी अन्तिम दशा आ जायगी, हम सबका जीवन ही न रह सकेगा। यह वियोगजन्य तीव्रतापसे अतिसन्तप्तता न जाने क्या करा दे। अतः प्राणधन श्रीश्यामसुन्दरकी मधुर लीलाओंका अनुकरण करना चाहिये। सम्भव है, उनके श्रवण, मनन और दर्शनसे हमलोगोंको कुछ शान्ति मिले अथवा भगवल्लीलाशक्ति ही उनकी विह्वलता देखकर अनुकम्पासे स्वयं प्रकट हुई; क्योंकि लीलाके साथ ही श्रीकृष्ण परमात्मा पहले उनमें अन्तर्हित थे। अतः अन्तर्निविष्ट श्रीकृष्ण परमात्माने ही व्रजदेवियोंकी सान्त्वनाके लिये लीलाओंका प्राकट्य किया अर्थात् गोपांगनाओंको अब स्वलीलामय बनाकर उन्होंने प्रकट किया। अतः उन्मत्तवचना गोपांगनाओंने अब भगवान्की उन-उन लीलाओंका अनुकरण आरम्भ किया— इत्युन्मत्तवचोगोप्यः कृष्णान्वेषणकातराः । लीला भगवतस्तास्ता ह्यानुचक्रुस्तदात्मिकाः ॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१४) गोपांगनाओंके इस 'उन्मत्तवचः' विशेषणसे यह अभिप्राय नहीं है कि जैसे लोकमें पागलोंकी बात या क्रिया उपहास्य और उपेक्षणीय होती है, वैसे इनकी भी ये बातें अथवा प्रस्तुत भगवल्लीलानुकरण उपेक्षणीय हैं। प्रत्युत इनके इस उन्मत्तवचस्त्वपर कोटि-कोटि सावधानोंके वचन न्योछावर कर दिये जाते हैं। ऐसा उन्मत्तवचस्त्व किसी परमसुकृतीको ही मिल सकता है। अतः 'उन्मत्तवचः' का अर्थ है—
'उत्कृष्टानां सनकादिशुकादिमुनीनामपि मदः सञ्जायते यासां वचसा ता उन्मत्तवचः' अर्थात् सनकादि-शुकादि परम वीतराग महामुनियोंको भी जिन व्रजदेवियोंकी बातें सुनकर, तन्मयता देखकर मद—आनन्दविभोरता होती है अथवा इन मुनियोंकी कौन कहे, इनसे भी उत्कृष्ट इनके भी उपास्य साक्षात् श्रीकृष्ण परमात्मा भी जिनके प्रेम-लपेटे अटपटे वचनोंको सुनकर मोदमग्न हो उठते हैं, उन उन्मत्तवचनाओंको धन्य है—'उत्कृष्टस्य श्रीकृष्णस्य परमात्मनोऽपि उन्मादकरो वचो यासां ता उन्मत्तवचः।' ऐसी हैं वे उन्मत्तवचना, कोई सामान्य नहीं। उन्होंने लीला आरम्भ की। प्रश्न हो सकता है कि जब वे भगवान्की लीलाके स्मरणसे ही इस दशाको पहुँची हैं—परम सन्तप्त हो रही हैं, तब उसीसे उन्हें सान्त्वना कैसे मिल सकती है? क्या लीलानुकरणरूप घृतसे समुद्दीप्त वह विरह-वाडवाग्नि अबकी बार उन्हें भस्म ही न कर देगा? हाँ, यह सम्भव है, परंतु वे तो 'तदात्मिकाः' ('तस्मिन् श्रीकृष्णे एव आत्मा मनो यासां ताः') हैं। उनका मन शैत्यसुधापाथोधिसदृश श्रीकृष्ण परमात्मामें समासक्त था, अतः भस्म नहीं हुईं, जीवित ही रहीं। बात ठीक भी है—'को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद् यदेष....।' (तैत्तिरीय० २।७) कौन उन पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म श्रीकृष्णके बिना जीवित रहता, सत्तावान् होता, यदि उनमें वे विराजमान न होते। अतएव उनके अन्तर्हित होते ही 'अतप्यंस्तमचक्षाणाः' (श्रीमद्भा० १०।३०।१) आदि गोपदेवियोंकी स्थिति बतलायी गयी है और अब उन्हींके लिये 'लीला भगवतस्तास्ता ह्यनुचक्रुस्तदात्मिकाः' कहा जा रहा है। भाव यह है कि श्रीकृष्ण ही उनमें विराजमान थे और उनकी लीलाने ही उन्हें लीलानुकरणमें प्रवृत्त किया। लीलानुकरण आरम्भ हुआ— कस्याश्चित् पूतनायन्त्याः कृष्णायन्त्यपिबत् स्तनम्। तोकायित्वा रुदत्यन्या पदाहञ्छकटायतीम्॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१५) किसीने पूतनाके जैसा आचरण किया, कोई गोपी उसके स्तनपानार्थ श्रीबालमुकुन्द बन गयी। पूतनाभाव प्रकृत उज्ज्वल रसके विरुद्ध है, गोपीभावसे इसमें बहुत अन्तर है। पूतना श्रीकृष्ण-जिघांसा (मारनेकी इच्छा)-से आयी थी, उसने अपने स्तनोंमें कालकूटका लेप किया था, वही स्तन उसने यशोदोत्संगललित श्रीबालमुकुन्दको पिलाया था। इससे भी अवश्य उसकी दिव्यगति हुई, धात्रीके जैसी गति उसने पायी— अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी। लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥ (श्रीमद्भा० ३।२।२३) परंतु इस पद्यमें 'जिघांसया' से इस कार्यका अनौचित्य निर्दिष्ट हुआ है, ऐसे ही 'अपि' से भी अर्थात् जो प्रभु समस्त निरुपाधिक कल्याण-गुणगणोंके आस्पद थे, जिनकी समस्त प्रकारसे अर्हणा उचित थी, जिनके मंगलमय श्रीविग्रहपर अपनेको न्योछावर कर देना चाहिये था, उन्हें विषपान कराया; उनके प्रति जिघांसा प्रकट की, धिक्-धिक्! यह दूसरी बात थी कि इस दुष्कृत्यसे भी पूतनाको धात्र्युचित उत्तमगतिका लाभ हुआ। यह तो श्रीकृष्ण परमात्माके सम्बन्धकी विशेषताका महत्त्व है। उत्तम आश्रय और विषय आदिकी महिमासे अनुचित भी उचित हो जाता है। चोरी बुरी, परंतु श्रीकृष्णकी माखन-चोरी इसका अपवाद है, वह भावुकजनमानसोल्लासिनी है। काम बुरा, पर विषय-महिमासे (कृष्णविषयक होनेसे) कान्तभाववती व्रजांगनाओंके लिये वह अत्युत्तम हो गया। अस्थि-मांसादियुक्त शरीरादि विषयकी अपवित्रतासे काम बुरा, बहुत बुरा, पर श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनके सम्बन्धसे वह भूषण बन जाता है। इसलिये जिघांसा बुरी—जो प्रभु पूजा, प्रेम, भक्ति करनेके योग्य हैं, उनके हननकी चेष्टा करना बुरा, पर उसके श्रीकृष्ण परमात्मविषयक होनेसे वह भी उत्तम हो गया— '....सद्गतिभवाय....।' परंतु गोपांगनाओंमें यह पूतना- भावना नहीं थी, वे अत्यन्त शुद्ध भाववती थीं, तो उनमें यह पूतनाका भाव कैसे हो गया ? इसका समाधान यही कि यह लीलासाधनार्थ
४४२ भक्तिसुधा अनुकरणमात्र था। दूसरे अपने प्रेमीको कष्ट पहुँचानेवाला सभीको बुरा लगता है। पूतनाने श्रीगोपीजनवल्लभ भगवान्को मृत्युकष्ट पहुँचानेकी चेष्टा की, अतः गोपियोंको वह सदा खटकती और अपकारकरूपमें सदा उन्हें उसका स्मरण रहता था—'हाय, पूतनाने प्यारे श्यामसुन्दरको विषपान कराया!' प्रेमाभिनिवेशमें अनिष्ट या अपकारककी चिन्ता बनी रहती है। किसीका टोना न लग जाय, इसलिये माता अपने लालके भालमें काजरका डिठौना लगा देती है। किसीका कोई प्रेमी बाहर जाता है, तो उसे शंका होने लगती है—'किसीने लाठी तो नहीं मार दी, शेर तो नहीं खा गया, कहीं ठोकर तो नहीं लग गयी?' ब्रजदेवियोंके सर्वस्व तो श्रीकृष्ण परमात्मा ही थे और श्रीकृष्णको व्रजांगनाओंकी दृष्टिमें पूतनासे सदा भय था। अतः अनिच्छ्यापि इन्हें पूतनाका स्मरण रहता था। किसी कीड़ेको भौंरा पकड़ लाता है, उसे अपनी गुंजार सुनाता है, वह संरम्भ भय योगसे भौंरा हो जाता है। गोपांगनाओंको अपनेसे भी अधिक प्रिय श्रीश्यामसुन्दर थे। इस नाते उसमेंसे एक 'पूतनायन्ती' हो गयी। प्रेमीके विघातकका स्मरण और प्रेमातिशयवश प्रेमीके साथ ऐक्यभावापत्ति के कारण प्रेमीके भय- हेतुको अपना भय-हेतु मानकर भयरूपापत्ति आदि विवेक ही, 'पूतनायन्ती' का कारण बन गया। 'कृष्णायन्ती' होनेमें तो कुछ भी प्रयास नहीं, पर 'पूतनायन्ती' होनेमें इतना चक्कर है। अथवा कोई भी व्रजांगना पूतना नहीं बनी, किंतु श्रीकृष्णविरहसन्तप्त व्रजांगनाओंकी पदे-पदे दृष्ट्वा- दृष्ट्वा रक्षार्थविनियुक्त, सर्वोपद्रवदूरीकारार्थ भगवान्की योगमाया उनके पीछे-पीछे घूम रही थी, वही लीलासाद्गुण्यार्थ गोपीभावापन्न होकर पूतना बनी। कहा जा सकता है कि इतना प्रपंच करनेकी अपेक्षा पूतना- लीला ही न की जाती; तो यह ठीक नहीं; क्योंकि भगवदवतारोंमें यह क्रम है कि जब-जब कृष्णावतार हो, तब-तब 'पूतनासुपयःपानम्' (श्रीमद्भा० १२।१२।२८) होना ही चाहिये, होता ही है। अतः यहाँ भी यह लीला की ही गयी अथवा एक भाव यह भी है कि वस्तुतः गोपांगनाओंमें ही एक पूतना बन गयी। असली पूतना जिघांसाके अशुद्ध भावको लेकर आयी थी और उदात्त अनुरागवती गोपांगनामें उसकी गन्धतक नहीं थी, वह अशुद्ध भावका अनुसन्धान किये बिना ही लीलानुकरण-साफल्यके लिये पूतना बनी। पीछे आ चुका है— 'गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्।' (श्रीमद्भा० १०।३०।४) व्रजांगनाएँ भगवान्को ही गाती हुई अर्थात् उनके चरित्रों, लीलाओंको गाती हुई उन्हें ढूँढ़ रही थीं। गाते-गाते ब्रजलीलाका भी गान हुआ, उसमें पूतनाकी कथा भी आयी। वहाँ पूतनाके सौभाग्यकी महिमा उन्होंने गायी—'अहो हमारे प्राणधन व्रजेन्द्रनन्दने कमलकी पाँखुरीसे भी अधिक सुकोमल, भक्तोंके मानसमन्दिरमें निवास करनेवाले, ब्रह्मादि देवोंसे वन्दित अपने पादोंको वक्षःस्थलपर निक्षेप करके स्तनपान किया, वह धन्य है'— पद्भ्यां भक्तहृदिस्थाभ्यां वन्द्याभ्यां लोकवन्दितैः। अङ्गं यस्याः समाक्रम्य भगवानपिबत् स्तनम्॥ (श्रीमद्भा० १०।६।३७) ये गोपांगनाएँ विरहिणी हैं। ये सोचती हैं— 'हमसे तो भाग्यशालिनी पूतना ही थी, जिसके उर-स्थलपर प्राणनाथ श्रीश्यामसुन्दरने विहार किया, कहीं पूतना बननेपर ही प्रभु हमारे उर-स्थलपर विहार करने पधारेंगे तो हम धन्य-धन्य हो जायँगी।' इसीलिये मानो वे पूतना भी बनीं। उन ब्रजदेवियोंकी दृष्टिमें तो दूषण वही है, जो प्रियतम प्राणधन श्रीमोहनके सम्मिलनमें बाधक है और भूषण वही है, जो कैसे भी उनसे सम्मिलन करा देनेमें साधक है। चाहे वह तृष्णा आदि ही क्यों न हो। वे गुण भूषण किस कामके, जिनके कारण प्रभुके दर्शनोंसे वंचित रहना पड़े, वियोग-वह्निमें सदा जलते रहना पड़े। 'अंजन कहा आँखि जेहि फूटै....' (विनय- पत्रिका १७४) वैराग्य बहुत उत्तम वस्तु है, पर वह कहीं श्रीकृष्ण परमात्माके प्रति हो जाय तो कौड़ी-कामका भी नहीं, वहाँ तो राग-अनुराग होना चाहिये, उनके प्रति विषयोंसे कभी पराङ्मुख न
श्रीरासपंचाध्यायी ४४३
होनेवाली अविवेकियोंकी जैसी गाढ़ प्रीति होनी चाहिये। वैराग्य गुण है, पर यहाँ दूषण है। यों 'पूतना' कोई अच्छी चीज नहीं, वह तो—'पूतना लोकबालघ्नी राक्षसी रुधिराशना....।' (श्रीमद्भा० १०।६।३५) है, कितनी ही दुष्टा है। सुतरां पूतनाभाव चाहकी चीज नहीं। चाहकी चीज तो उन व्रजदेवियोंकी श्रीकृष्णभावना है, जो उन्हें पूतनाभावमें भी दीख पड़ रही है। यदि पूतना बननेसे भी उरःस्थलमें श्रीश्यामसुन्दरका विहार प्राप्त होता है तो वे उसका भी स्वागत करती हैं—'लो, हम पूतना ही बनती हैं, प्राणप्यारे मिलें तो !' अथवा व्रजांगनाएँ सोचती हैं—'क्या करें, कहाँ जायँ, इसकी अपेक्षा तो हमारे प्राण निकल जाते, वही अच्छा होता। हाय, इस उग्रतापमें भी हमारा मरण नहीं होता। क्यों ये हमारे प्राण अपने प्यारेकी प्रतीक्षामें नहीं निकल रहे हैं ? संसारमें मनुष्यकी सर्वोपरि वस्तु प्राण है, पर प्राणधन श्रीश्यामसुन्दर तो इनके भी प्राण हैं— 'श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचः स उ प्राणस्य प्राणः। चक्षुषश्चक्षुः....।' (केन० १।२) हमें ऐसा लगता है कि ये उन्हीं प्राणोंके भी प्राण श्रीश्यामसुन्दरके मिलनकी व्याकुलतामें हमारी देहसे निकलना भूल गये हैं। फिर उनके बिना कोई रह ही कैसे सकता है'— न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन। इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ॥ (कठ० २।२।५) 'तो फिर आओ सखि ! पूतना ही बनें, जिससे अपने आश्रित और प्रतीक्षापरायण इन प्राणोंकी ये स्वयं समाप्ति कर दें। सखियो ! श्रीश्यामसुन्दरको स्त्रियोंसे प्रेम नहीं है। देखो, जन्मते ही उन्होंने पूतनापर हाथ साफ किया। अपने पहले अवतारमें भी उन्होंने 'ताड़का' का निःसंकोच वध किया। फिर अब प्राणप्यारे श्रीमोहनके विप्रयोगमें जीवन रखना तो लोकनिन्दा है। अतः प्राणोंके भी प्राण श्रीश्यामसुन्दरके वियोगजन्य इस तीव्रतापमें प्राणोंका विसर्जन कर देना ही सर्वोत्तम है और इसका सुगम साधन पूतना बनना है। पूतना बनी कि श्रीबालमुकुन्द श्यामसुन्दरने हमारा काम तमाम किया।' यहाँ ऐश्वर्य और माधुर्यभाव साथ-साथ चल रहे हैं, इस जगह ऐश्वर्य माधुर्यसे दब गया है। व्रजदेवियोंने सोचा कि 'सबसे अधिक आनन्दकी बात तो पूतना बननेमें यह है कि उरःस्थलपर श्रीव्रजेन्द्रनन्दनका विहार प्राप्त होगा और वह भी उन्हींका गान करते हुए; 'गायन्त्य उच्चैरमुमेव।' तथा च सदाके लिये वियोग-दुःखसे मुक्त हो जायँगी एवं सद्गति तो मुफ्तमें ही मिलेगी। प्रसिद्ध है—विष देनेवाली पूतनाको भी भगवान्ने सद्गति प्रदान की।' सत्यलोकपति ब्रह्माजी, जिन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके भगवत्त्वकी परीक्षाके लिये वत्सापहरण किया और अन्तमें भगवान्की अतुल महिमाको देखकर मुग्ध रह गये तथा व्रजवासियोंके लोकोत्तर सौभाग्य और निःस्वार्थ श्रीकृष्ण प्रेमको देखकर आश्चर्यचकित रह गये, उनको यह सन्देह हुआ कि जब अघासुर- बकासुर आदि समस्त कुलके साथ भगवान्ने पूतनाको आत्मपद-जैसा ऊँचा पद प्रदान किया, तब इन निरुपम-निःस्वार्थ-स्नेही व्रजवासियोंको इनसे आनृण्य प्राप्त करनेके लिये वे क्या देंगे ? विश्वका कोई और ऊँचा फल इन्हें देनेकी भगवान्ने यदि सोच रखी है तो उनसे निजसे बढ़कर विश्वमें कोई ऊँचा फल नहीं है। पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म जिनके साथ नाचें, गायें, खायें, पीयें, विविध क्रीड़ा करें इससे बढ़कर जगत्में और दूसरा उत्तम फल हो ही क्या सकता है ? जिन्होंने अपना तन, मन, धन, देह, नेह, गेह, पुत्र, कलत्र, मित्र सब कुछ भगवान्पर न्योछावर कर दिया और जिन्होंने वैर किया, दोनोंको समान फल कैसे दिया जा सकता है ? अतः मेरी समझमें तो भगवान् सदा इनके ऋणी रहेंगे। भगवान् विश्वफलात्मा हैं, पूर्णानन्दसिन्धु हैं, उसके बिन्दुके समान इन्द्रादि लोक सौख्य हैं—'....एतस्य मात्रामुपजीवन्ति।' जब स्वयं आनन्दसिन्धु ही जिनके घरोंमें क्रीड़ाकी लहरें ले रहा है, तब वे बिन्दुसे कैसे तृप्त होंगे ? सुतरां इन्द्रादि-पद देकर भी प्रभु इनसे अनृण नहीं हो सकते— एषां घोषनिवासिनामुत भवान् किं देव रातेति न- श्चेतो विश्वफलात् फलं त्वदपरं कुत्राप्ययन् मुह्यति।
सद्वेषादिव पूतनापि सकुला त्वामेव देवापिता यद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते ॥* (श्रीमद्भा० १०।१४।३५) गोपियोंने समझा कि हम तो श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनोंके लिये ही उत्कण्ठित हैं, सो पूतना बननेसे कभी तो सम्भव होगा ही। फिर विप्रयोग भी न होगा। अतः पूतना बनी—'कस्याश्चित् पूतनायन्त्याः कृष्णा- यन्त्यपिबत् स्तनम्।' (श्रीमद्भा० १०।३०।१५) 'त्वामेव देवापिता' आदिसे द्योत्य भगवत्सायुज्य आदिकी प्राप्तिपर अन्य लोगोंके कुछ और भी भाव हैं। जैसे कुछ भगवद्भक्त भगवच्चरणारविन्दमें, कुछ भगवन्मुखारविन्द आदिमें लीन होते हैं। यही भेद है। श्रीभगवान्का सर्वांग ही फल है। विधि-निषेध साधनमें होता है, फलमें नहीं। सुरापान न करना आदिसे समुत्पन्न फल और अग्निहोत्रादिसे समुत्पन्न स्वर्गादि फलमें कोई अन्तर नहीं। श्रीभगवान् तो भक्ति-उपासनाके फल हैं, उनके पादारविन्द, हस्तारविन्द आदि सब फल हैं। 'आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादि····' ही उनका स्वरूप है। इसको सभी मानते हैं। मिठाईके खिलौनेके हाथ-पाँव सब मिठाई ही होंगे। वैसे ही भगवान्का समग्र विग्रह आनन्दमयमात्र है— सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषददृशाम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१३।५४) यह बात श्रीमद्भागवतसे भी सिद्ध है। भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माजीको अपने जो स्वरूप बतलाये, वे सत्य, ज्ञान, अनन्त, आनन्दमात्र थे। बीचमें असत्य आदिके निवेशनिवारणार्थ 'मात्र' पद है। अतएव 'मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्—' वेणु-रेणु, गौ-वत्स सब मधुर, निज देहसे लेकर उसके सम्पर्कपर्यन्त सब मधुर-ही-मधुर। यों भगवद्विग्रह फलस्वरूप ही है। कहीं उसकी कुछ साधनता भी है, जैसे—अघासुर- संहार, भक्ताह्वान आदि। ऐसे ही परिरम्भमें पादस्पर्शमें फलता है और चलनमें साधनता। विवेक यह कि लीलामें ही साधनता है, प्राकृत (स्वभाव या स्वरूप)- में नहीं। भगवान् श्रीकृष्णके मुखमें केवल फलात्मता ही है, ऐसे ही उनके दर्शनमें, अधरामृतमें, वंशी-निनादमें, चुम्बनमें सर्वत्र फलात्मता है। अतः 'सद्वेषादिव पूतनापि सकुला त्वामेव देवापिता' से आत्मदानरूप जो-जो लीनता हुई, वह हुई अवश्य भगवद्विग्रहमें ही, परंतु उनके पादारविन्दमें अथवा श्रीभगवन्मुखारविन्दमें फलात्मताके साथ क्वचित् साधनात्मता भी है, वहाँ देवभोग्या, सर्वभोग्या, भगवद्भोग्या सुधाका निवास है। देवभोग्या सुधा वंशी-छिद्रोंसे निर्गत होकर वृक्ष, लता, मयूरोंको प्राप्त होती है। ये वृक्षादि वृन्दावनके देवता हैं, प्राकृत देवता नहीं, किंतु भगवत्स्वरूपभूत भगवदंशभूत देव हैं। वृन्दावनकी लता-पता, पशु- पक्षी, जड़-जंगम आदि सब श्रीकृष्ण परमात्माके रमणकी सामग्री हैं और ये उनके रमणकी सामग्री तभी बन सकते हैं, जब इनमें उनका प्रवेश हो। श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनका रमण श्रीब्रजेन्द्रनन्दिनीके ही संगमें सम्भव है, सुधाकररूपमें विराजमान हैं, वे ही देवभोग्यारूपमें फैलती हैं, फलतः सब श्रीराधामय हो जाता है, वहीं उनका रमण होता है। अतएव वे श्रीराधारमण हैं। गोपांगनाओंमें उनका रमण नहीं, अपितु जहाँ श्रीराधा वहीं उनका रमण होता है। आत्मारामका रमण आत्माहीमें—अपनेहीमें होता है। यों देवभोग्या सुधामें भी साधनता आयी। जैसे प्रत्येक काष्ठखण्डमें अग्नि है, पर वह अव्यक्त है, व्यक्तका सम्बन्ध हो जानेपर वह (अग्नि) व्यक्त-प्रकट हो सकता है। ऐसे ही 'वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं व्यञ्जयन्त्य इव पुष्पफलाढ्याः।' (श्रीमद्भा० १०।३५।९) अर्थात् वनके लता, तरु अपनेमें भगवान् विष्णुको मानो प्रकट करते हुए, पुष्प-फल भारसे समाच्छन्न थे। आशय यह कि व्यापक होनेसे भगवान् विष्णु तो उनमें पहले भी थे, पर प्रकट नहीं थे, अब प्रकट हो गये। फलतः प्रकट
- देवताओंके भी आराध्यदेव प्रभो ! इन व्रजवासियोंको इनकी सेवाके बदलेमें आप क्या फल देंगे ? सम्पूर्ण फलोंके फलस्वरूप ! आपसे बढ़कर और कोई फल तो है ही नहीं, यह सोचकर मेरा चित्त मोहित हो रहा है। आप उन्हें अपना स्वरूप भी देकर उऋण नहीं हो सकते; क्योंकि आपके स्वरूपको तो उस पूतनाने भी अपने सम्बन्धियों-अघासुर, बकासुर आदिके साथ प्राप्त कर लिया, जिसका केवल वेष ही साध्वी स्त्रीका था, पर जो हृदयसे महान् क्रूर थी। फिर, जिन्होंने अपने घर, धन, स्वजन, प्रिय, शरीर, पुत्र, प्राण और मन—सब कुछ आपके ही चरणोंमें समर्पित कर दिया है, जिनका सब कुछ आपके ही लिये है, उन व्रजवासियोंको भी वही फल देकर आप कैसे उऋण हो सकते हैं ?
स्वस्वरूपमें ही रमण होता है। अधर-सुधामें दोनों प्रकट हैं। जहाँ इसका सम्बन्ध है, वहीं श्रीराधाका प्राकट्य है। भगवद्भोग्या सुधा भी अधरसुधाका साधन बनती है। इस प्रकार पूतना आदि और व्रजांगनाओंके श्रीकृष्ण-सायुज्यमें भेद है। लीलाके अनन्त होनेसे यहाँ सर्वदा सायुज्य नहीं। प्रेमपीड़ावश गोपांगना पूतनाको बड़ी मानकर उसके भावसे पूतना बनना चाहती हैं। वे चाहती हैं—किसी भी प्रकार हमें भी प्राण-धन श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहन राधाविहारीका सम्बन्ध मिल जाय। इसीलिये पूतना भी बननेको तैयार हैं— ‘कस्याश्चित् पूतनायन्त्याः कृष्णायन्त्यपिबत् स्तनम्।’ गोपांगनाएँ सोचती हैं—‘अहो ! पूतना धन्य है, जिसके उरःस्थलपर प्राणप्यारे श्रीश्यामसुन्दरने विहार किया, हाय, हम कहीं पूतना भी बनी होतीं तो हमारा भाग्योदय हो जाता।' इन भावोंमें मग्न व्रजांगनाएँ पूतना बनीं। अथवा गोपांगनाएँ सायुज्यप्राप्ति ही चाहती हैं। यद्यपि अन्तःकरणसे उन्हें यह इष्ट नहीं है तथापि वियोगकी असह्यतामें वे इसे ही अच्छा समझती हैं। सोचती हैं, चलो पूतना बननेसे प्राणधनका उरःस्थानपर विहार तो मिलेगा ही, जो हमें इष्ट है, फिर सायुज्य ही सही, रात-दिन विरहवह्निमें जलते रहनेसे वही क्या बुरा है। पहले सायुज्यमें भेद बतलाया गया है—अघासुर, बकासुर आदिको सायुज्य प्राप्त हुआ, वे भगवत्पादारविन्दमें लीन हुए और गोपांगनाएँ श्रीमुखमें। दैत्यवध, भक्तसंकेत आदिमें साधनता है और परिरम्भण आदिमें फलता है, परंतु मुखमें तो सदा ही फलरूपता है। हाँ, उसकी सुधामें भेद अवश्य है, जैसे देवभोग्या सुधा साधन होती है, लता-वृक्ष आदिमें भगवदुपयोग्यता-सम्पादनार्थ उसका प्रयोग किया जाता है। वेणुगीतपीयूषसे लतादिमें, परिकरोंमें भगवद्भोग्यता सम्पादित की जाती है; क्योंकि वहाँ श्रीवृषभानुनन्दिनीका संचार हुआ है। मुख अग्नि माना गया है—‘मुखादग्निरजायत।’ कौन अग्नि प्राकृत नहीं ? जब पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण प्राकृत नहीं, अपितु अचिन्त्य, अनन्त, अद्भुत रससुधासिन्धु हैं, तब उनकी मुखाग्नि भी प्राकृत नहीं, अपितु वह अप्राकृत विरहवैश्वानर है। यह अग्नि मुखमें ही क्यों ? तो प्राधान्यात् मुखमें व्यपदेश है, वैसे तो वह सर्वावयव-अधिष्ठित है। विप्रलम्भ-सम्भोगात्मक उभयविध शृंगार भी उनमें है। भगवान् सकल- विरुद्धधर्माश्रय हैं, अतः उनमें दोनों ही शृंगार एक साथ हैं, वहाँ भी उद्बुद्ध और उद्वेलित रूपमें यहाँ उभयविधता भी श्रीभगवान्के सर्वांगहीमें है। ‘मुखम्’ का अन्यत्र प्राधान्य अर्थ है। यहाँ भी ‘मुखमिव मुखम्’ के रूपसे मुखकी प्रधानता है। उसमें प्रधानता विरहकी है। सर्वांगमें मुख प्रधान है, शृंगारमें विरहाग्नि प्रधान है। इस प्रकार दोनों प्राधान्य है। श्रीमद्वल्लभाचार्य ‘विरहवैश्वानरावतार’ माने गये हैं। वह विप्रलम्भशृंगार ‘अग्नि’ होनेपर भी ‘रस’ है और वह भी है सर्वोत्कृष्ट। इस प्रकार श्रीकृष्ण परमात्माके मुखमें लय होना मानो वियोगरसमें लय होना है। मुख विप्रयोग रस है, व्रजांगनाओंका उसीमें लय होना है। अतः यही विशेषता है, यह लय स्थायी नहीं। जैसे अपार समुद्रकी उसीकी वस्तुका उसीमें निमज्जन-उन्मज्जन हो। वस्तुतस्तु श्रीकृष्णके उभयविध उद्बुद्ध शृंगारमें पुनः- पुनः भावुकोंका आविर्भाव-तिरोधान भाव होता है। मुखमें भी सर्वातिशायी अधरसुधाका पान होता है। अस्तु, देवभोग्या सुधा तो समझमें आयी, पर भगवद्भोग्या क्या ? तो यही विलक्षणता है। केवल श्रीकृष्णभोग्या ही भगवद्भोग्या सुधा है। परंतु अपने ही रसका अपनेको पान कैसे हो ? नायिकाधरका रसास्वाद होता है। यह रसरीतिके विरुद्ध है। इसके बहुत भेद हैं। लोभ ही अधर है (यह भगवद्विभूति है), वही अध्यक्ष है। मायाशक्तिसे लोभी कोषाध्यक्ष बना है। पात्रापात्रविचारपूर्वक दान ही अध्यक्षता है। अतः उसे अपनी अधरसुधाका अध्यक्ष वह देवभोग्या देवोंको देता है और गोपांगनाभोग्याको उनके हृदयोंमें वंशीद्वारा भेजता है। वेणु बहुत ऊँचे अधिकारवाली है, पर उसे कुछ नहीं मिला। ‘दर्वी पाकरसं यथा’— जैसे कलछुल दाल-साग आदिके खट्टे-मीठे स्वादको नहीं जानती, वैसी ही वंशीकी दशा है। चषक (पानपात्र)-को कुछ नहीं मिलता। श्रीश्यामसुन्दर भगवान्ने भगवद्भोग्या सुधाको गोपांगनाओंके अन्तरमें पहुँचानेके लिये वंशीको रखा है। वह दर्वीकी तरह
है, उसे कुछ स्वाद नहीं मिला। तभी तो वेणुगीतपीयूषके निनादसे जड़-चेतन सबको सुधास्वाद मिला, पत्थर बह चले, यमुना जम गयी, ठूँठोंमें पत्ते फूट निकले, पर वह सूखी-की-सूखी ही, सच्छिद्र ही, पल्लवविहीन ही रही; क्योंकि उसे कुछ मिला नहीं। वह देवोंको, गोपियोंको निर्देशानुसार दे आयी। परंतु उस वस्तुकी महिमा ऐसी है, जो उसके स्पर्शमात्रसे ही उसे बहुत कुछ मिल गया। ब्रह्मा, इन्द्र आदि देव, अधिदेव उन- उन इन्द्रियादिकी अधिष्ठानतासे ही अपनेको कृतकृत्य मानते हैं—'एतद् हृषीकचषकैरसकृत् पिबामः। शर्वादयोऽङ्ग्यृयुदजमध्वमृतासवन्ते···।' ऐसा है वह वेणुपरिवेषित पीयूष। वेणुको वह पीयूष साक्षात् मिला ही, पर उसे पाकर वह औरोंकी तरह उन्मद नहीं हुई, क्योंकि उसने सोचा कि यदि मैं रूपान्तरको प्राप्त हो गयी, हरी-भरी हो गयी तो कहीं प्यारे श्रीश्यामसुन्दर मुझे छोड़ न दें। अतः बड़ी सावधानीसे वह उस रसको अपने अन्तरमें छिपाये रही। लोकमें ख्यात होनेसे नजर-टोना लग जाता है, वेणु इसे खूब जानती थी। अस्तु, भगवद्भोग्या सुधा जब गोपांगनाओंके मानसदेशमें पहुँची, तब उन्होंने उसका आस्वाद किया। इस रसकी यह विशेषता है कि वह जितना ही आस्वादित होगा, उतना ही अधिकाधिक बढ़ेगा। फिर उसकी यह भी विशेषता है कि यह जहाँ पहुँचता है, वहाँ पहलेसे भी विद्यमान होता है—'ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥' (गीता १३।१७) श्रीराधाकृष्ण और तद्विषयक रस पहले ही प्राणियोंमें है, पर व्यक्त नहीं, रसिकोंकी संगतिसे वह व्यक्त हो जाता है। यहाँ निरावरण कर्णकुहरोंसे यह भगवद्भोग्या सुधा गोपीमानस- पटलमें प्रविष्ट हुई। गुरु एक मन्त्र देता है, साधक रसिक एकान्तमें बैठकर उसका अनुसन्धान करके अपार रसका आस्वाद करता है। 'गोपालचम्पू' आदिका यों ही आविर्भाव हुआ। यह श्रीजीवगोस्वामीका ग्रन्थ है। वे उद्भट विद्वान् और भावुक थे। प्रसंगात् वे एक बार किसी जंगलकी गुफामें जा बैठे। वहाँ केवल आटा घोलकर पीते रहे, इससे उनका भौतिक शरीर दुर्बल हो गया, रसमय शरीर पुष्ट हो गया। वहाँ 'क्रमसन्दर्भ' आदि ग्रन्थ भी उन्होंने लिखे। इस प्रकार सबमें 'ज्ञान-ज्ञेय' अधिष्ठित हैं। यहाँ तो प्रत्यक्ष ही वेणुद्वारा गोपांगनाओंमें वह रस प्रसृत हुआ, वृद्धिको प्राप्त हुआ, अन्तःकरणादिमें भरपूर हुआ और वही वागिन्द्रियसे सम्पृक्त हुआ। उसका जब वर्णन करने लगीं, तब वही उनके अधरोंमें आ गया। वही भगवद्भोग्या सुधा सम्भोगसमयमें श्रीश्यामसुन्दरसम्भोग्या बन गयी। इस प्रकार परम्परया दान, वर्णन, भावनाद्वारा वह भगवद्भोग्या बनी। गोपांगनाओंने उसे—'बर्हापीडं नटवरवपुः····' के रूपमें गाया। यह सुधा भी सर्वाभोग्या सुधाका साधन है। जब परमप्रेयसीका रसपान रसलम्पट श्रीश्यामसुन्दर करते हैं और प्रेयसीवर्गका भी; उस समय श्रीश्यामसुन्दर गोपांगनाभावापन्न और गोपांगनाएँ श्यामसुन्दरभावापन्न हो जाती हैं। यह सब 'सर्वाभोग्या' के लिये है। इस प्रकारसे संसारका सार उभयविध उद्बुद्ध शृंगारस्वरूप श्रीश्यामसुन्दर नटनागर, उनमें भी प्रधानतया उनका मुखसार, उसमें भी सुधा-रस उसका सार है। उसमें व्रजांगनाओंका लय, सायुज्य हुआ। यह वस्तु पूतना बेचारीको कहाँ मिले। वह तो बहुत स्थूल दृष्टिसे श्रीभगवत्सायुज्यको प्राप्त हुई। नहीं
विरुद्ध भाव, जो प्राणत्यागरूप है, नहीं हुआ; क्योंकि यहाँ विशुद्ध भावना थी, अतः इसका फल तो हुआ, पर जिघांसा न होनेसे प्राणत्याग नहीं हुआ। गोपियोंद्वारा शकटासुर-तृणावर्त-उद्धार आदि लीलाओंका अनुकरण 'तोकायित्वा रुदत्यन्या पदाहञ्छकटायतीम्॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।१५) पूतनालीलाका अनुकरण समाप्त हुआ। अब दूसरी शकटासुर-लीलाका अनुकरण आरम्भ हुआ। 'तोकवत् आचरन्ती तोकायन्ती'—एक मासके छोटे बच्चेके जैसा आचरण करनेवाली एक दूसरी गोपी बन गयी। इसमें उन्हें भगवान्की बाललीलाकी स्फूर्ति हुई। भगवान् बालकृष्ण जबतक मैयाको नहीं देखते, तबतक इधर- उधर क्रीड़ासक्त रहते हैं, परंतु ज्यों ही मैयाको देखा कि दूध पीनेके लिये पाँव पटक-पटककर रोने लगते, मचलने लगते हैं। वैसे ही यह गोपी बालचापल्यके अनुकरणको सफल बनाती है—पाँव पटकती है; मानो रूप-सरोवरमें समुद्भूत कमल विरह पवनसे विधूनित हो रहा हो। यहाँ उसका रूप ही सरोवर, पाद ही कमल और उनका प्रताड़न ही विधूनन है। विरुद्ध भावका गोपांगनाओंको स्पर्श भी नहीं करना है। यहाँ श्रीव्रजेन्द्रचन्द्र नन्दनन्दनकी अधरसुधाके पानकी ही इन्हें उत्कण्ठा है। जैसे श्रीश्यामसुन्दर यशोदाके पयःपानार्थ पादप्रताड़न करते हैं, वैसे सुधापानार्थ गोपांगनाओंका यह अनुकरण है। यों बालकके अनुकरणमें रोती हुई एक गोपीने शकटासुरका आचरण करनेवाली दूसरी गोपीको पाँवसे गिरा दिया— 'पदाहञ्छकटायतीम्॥' वास्तविक परिस्थितिका स्मरण करके वियोगतप्त गोपांगना परस्पर कहती हैं—'हाय सखि, यदि हम शकटासुर भी बनी होतीं तो श्रीप्राणप्यारेका यह सुकोमल चरणतल तो मिला होता।' लीलानुकरणमें शकटकी तरह गोपी बनी, उसे श्रीकृष्णपादस्पर्शका सुख नहीं मिला। दूसरीने कहा—'सखि ! तृणावर्त अच्छा था, हम लालसा करती हैं, कब प्यारे श्यामसुन्दर हमारे हार बनें। इन हीरक हारोंमें आनन्द नहीं, वह हार हमें नहीं, तृणासुरको मिला। प्यारे मोहन उसके गलेसे लिपटे और हार बन गये। सखि ! इस जन्ममें तो वे हमारे हार बनेंगे नहीं, आओ तब राक्षस ही बनें, राक्षस ही सही, प्राणप्यारे तो मिलेंगे।' गोपांगनाओंका तुरंत भाव बदल जाता है और वे प्रार्थना करने लगती हैं—'प्यारे मनमोहन, हमारे हृदयहार बननेमें आपको लज्जा लगती है और उन क्रूर राक्षसोंके गलेसे लगे रहते हो, क्या हम इतनी बुरी हैं?' गोपांगनाओंके समूहमें कोई एक गोपी बाललीलानुकणार्थ श्रीकृष्णस्वरूप बनी। यह योगमायाका प्रभाव है, वह परमानुरागवती गोपीसे जो
४४८ भक्तिसुधा रोकते हैं, शम, दम, उपरति, तितिक्षा आदि साधनोंमें अपने जीवनको मिटा देते हैं, आश्चर्य है कि आप उनके मालिक भी नहीं बनना चाहते, स्वामी बननेसे भी घृणा करते हो। आपके इन चरित्रोंको देखकर यही निश्चय करना पड़ता है कि आपकी पदप्राप्ति केवल प्रेमसाध्य है, एकमात्र रागानुगा भक्ति ही सर्वतोभावेन आपको वशमें कर सकती है। वहाँ रुचि किस चीजकी थी, यह बात दूसरी है। गायने हुंकार किया, बछड़ेने बुलाया, हम्मारव करते ही चट बोल पड़े। उधर गोपांगनाओंके पुंश्चली भावपर भी रीझ गये। यहाँ सब बात उलटी। जितनी ऊँची चीज सब नीची कर दी गयी। महाराजाधिराजका वह स्वरूप इतने महत्त्वका नहीं हुआ, जितना पार्थसारथिका। सखा अर्जुनके घोड़ोंके सहीस बने। महाभारत-युद्धमें अर्जुनके घोड़े जलके बिना क्लान्त हो गये, उनके लिये उन्होंने पाताल-गंगा निकाली। पार्थसारथिने रथसे घोड़ोंको खोलकर जल पिलाया, स्नान कराया, घोड़ोंकी लगाम अपने मुखमें पकड़ी, तोत्र (चाबुक)-को मुकुटमें खोंसा और चार हाथोंसे उनको धोया-पोंछा। उस समयकी उनकी झाँकी देखते ही बनती थी। राजा-महाराजा भी जिसको नहीं कर सकते, उसे प्रेमके बन्धनमें बँधकर उनके अधिराजराजने किया। परंतु यह भी गोपांगणकर्दम- क्रीड़ाके आगे तो फीका पड़ जाता है। तभी तो एक महात्माने कहा— 'परमिममुपदेशमाद्रियध्वं, निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः। विचिनुत भवनेषु वल्लवीनामुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥' अर्थात् वेदशास्त्रोंके उपदेशारण्यमें—कर्मोपासना एवं ज्ञानकी भूलभुलैयामें भटक रहे और अभिलषितको न प्राप्त करके दुःखी हो रहे प्राणियो, हमारी नेक सलाह मानो, वह उपनिषदोंका सार अरण्योंमें या आरण्यकोंमें न मिलेगा, वह तो गँवारी ग्वालिनोंके घरोंमें माखन- चोरी करते हुए अथवा यशोदाके आँगनमें ऊखलसे बाँधा मिलेगा, वहाँ उसे ढूँढ़ो। यहाँ प्रेमकी रसमयी लीलाओंमें गुंजाओंके समक्ष कौस्तुभ- मणिका कोई सम्मान या महत्त्व नहीं। यहाँ लक्ष्मीपति और रुक्मिणीपतित्व भी पुंश्चलीपतित्व या गोपीजनवल्लभताके सामने मन्थर पड़ जाता है। 'उज्ज्वलनीलमणि' में समर्थन किया गया है कि अरुन्धती, अनसूया आदि बड़े-बड़े सतीवृन्द भी इन पुंश्चलियोंकी पादधूलिके लिये लालायित हैं—व्याकुल हैं; क्योंकि ये ही सती परम सती हैं, जिन्होंने अपर पुरुषका संग त्यागकर 'परपुरुष' का संग किया। अनन्त अखण्ड महामहिम श्रीकृष्ण ही परम पुरुष हैं, परमात्मा हैं, ब्रह्म हैं। वसिष्ठ, अत्रि आदि पुरुष हैं, जीव हैं, पातिव्रत्यधर्मपूर्वक इनकी सेवासे फलरूपमें परम पुरुषकी प्राप्ति होती है, ये साधन हैं, वे साध्य; अरुन्धती आदि सतियाँ अभी आराधना करती हैं, पीछे हैं और गोपांगनाओंने फल प्राप्त कर लिया, उन्हें 'परपुरुष' की प्राप्ति हो गयी, वे कृतकृत्य हो गयीं। अतएव मन, बुद्धि, रोम-रोममें प्रविष्ट श्रीकृष्णकी शकटायती आदि अनुकृति-लीलाद्वारा गोपांगना परानन्दमें विलीन हुईं। दैत्यायित्वा जहारान्यामेका कृष्णार्भभावनाम्। रिङ्गयामास काप्यङ्घ्री कर्षन्ती घोषनिःस्वनैः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१६) इसी लीलानुकरणमें एक गोपांगना श्रीश्यामसुन्दरकी भावनासे बालकृष्ण बन गयी। पाँवोंमें नूपुर पहन लिये, घुटनोंके बल चलने लगी। नूपुरके छोटे-छोटे घुँघुरूके घोषसे वह साशंक हो गयी। बालवत् किलकारी मारकर भाग उठी। अपनी ही पादस्थ नूपुर ध्वनिसे वह चकित हो गयी। नूपुरके रुचिर घोषसे स्तब्ध होकर वह पीछेकी ओर मुँह घुमाकर देखने लगी, यों भगवान् बालमुकुन्दके अनुकरणमें मग्न हो गयी। इसका अभिप्राय यह कि इस प्रकारकी तल्लीनतासे— तीव्रसंवेगवान् प्रेमसे निम्नकोटिके भी लोग उन पूर्ण पुरुषको प्राप्त कर सकते हैं। 'गोपालाङ्गणकर्दमेषु विहरन्' आदिसे भी यही ध्वनित होता है। यहाँकी लीला ही अद्भुत है। राजाधिराजस्वरूपकी अपेक्षा पार्थसारथिका भाव ही दूसरा है और इसकी अपेक्षा भी गोपालांगणकर्दम-विहारीका स्वरूप और भी उच्च है। कहीं ज्ञानवैराग्योदीप्त शान्त रस ही उत्कृष्ट माना जाता है, शृंगार रस उसके सामने निकृष्ट है। कहीं दाम्पत्यप्रेममें शृंगार रस ही उत्कृष्ट हो जाता है। इसके विपरीत औपपत्यमें वह रसाभास हो जाता है, परंतु
श्रीरामपञ्चाध्यायी ४४९ कहींपर यही औपपत्यादि आलम्बनादिके उत्कृष्ट अतएव अरुन्धती आदि सतियाँ इनकी पादपांसु चाहती होनेसे उत्कृष्ट माना जाता है, जैसे यही गोपांगनाओंका हैं। इनके अतिरिक्त कौन ऐसी युवति होगी, जो श्रीकृष्णविषयक प्रणयौत्कण्ठ्य, जिसके फलस्वरूप साक्षात् नारायणके दर्शन करके उनपर मुग्ध न हो। यह अनसूया, अरुन्धती-जैसी भी उनकी पादधूलिके लिये तो गोपांगनाओंकी ही विशेषता थी कि जो श्रीमन्नारायणके लालायित रहती हैं। गोपांगना यद्यपि पुंश्चली गिनी भी साक्षात् दर्शन करके उनसे भी श्रीश्यामसुन्दर- गयीं, पर वे थीं श्रीकृष्णकी - परम पुरुषकी संगिनी या सम्मिलनकी ही प्रार्थना की, यहाँ यह दिखाया गया कि पुंश्चली, अतएव उनका यह उत्कर्ष है, तभी तो जैसे महासम्राट के समक्ष इतरोंका ऐश्वर्य अभिव्यक्त श्रीकृष्ण परमात्मा भी उनके दास्यकी प्रार्थना करते हैं। नहीं होता, जैसे सूर्यके सामने चन्द्रनक्षत्रादि फीके पड़ कोई कितनी भी साध्वी-पतिव्रता होगी, वह भी जाते हैं, दीखते ही नहीं, वैसे ही महामहामाधुर्यके सामने भगवान्के ऐश्वर्य-माधुर्यपूर्ण नारायणस्वरूपपर मुग्ध समस्त ऐश्वर्य अस्त हो जाते हैं, प्रकट ही नहीं होते। हुए बिना नहीं रह सकती। अनसूया-जैसी भी भगवान् श्रीराधिकाजीमें पूर्णतम माधुर्यका प्रकाश नारायणके स्वरूपपर आसक्त हो गयी- यह भूषण ही प्रेमकी स्थिति प्राणिमात्रमें अणु-परिमाणमें, है, कोई दूषण नहीं। परंतु एक कथासे ज्ञात होता है कि पार्षदादिमें मध्यम परिमाणमें और महत्परिमाणमें कृष्णप्रणयिनी गोपांगना उसपर भी मुग्ध न हुईं। गोपांगनाओंमें थी। इसके अतिरिक्त श्रीराधिकाजीमें ऐश्वर्यभावसे भी अधिक माधुर्यभावकी वही प्रेम परममहत्परिमाणपरिमित था। पूर्णतम माधुर्यका महत्ता - लीलाका एक दृष्टान्त प्रकाश वहीं हुआ। वहींकी यह कथा प्रसिद्ध है कि एक बार श्रीश्यामसुन्दर गोपांगनाओंके साथ उसी निकुंजमें जहाँ गोपांगनाओंके सामने श्रीकृष्ण वासन्तिक रासोत्सव मना रहे थे। उसी समय सहसा नारायणरूपमें छिप गये, श्रीराधाजीके आते ही उनकी धोखा देकर वे एक कुंजमें छिप गये। गोपांगना ढूँढ़ती वह ऐश्वरी माया नहीं टिक सकी। उनका वह हुई वहीं जा पहुँचीं; क्योंकि वे अपने सौगन्ध्य- चतुर्भुजस्वरूप द्विभुज श्यामसुन्दरके रूपमें तुरंत प्रकट माधुर्यादिपूरको न छिपा सके, उसके लोभी भौंरे, मयूर हो गया। अतः यहाँ जितना-जितना लोकदृष्टिमें तथा हरिणांगनाओंका ताँता उधर ही बँध गया। अपकर्ष, उतना-ही-उतना प्रणय-पथमें उत्कर्ष सिद्ध श्रीश्यामसुन्दरने सोचा- 'ये तो आयी, अब क्या करें, होता है। इसी दृष्टिसे औपपत्यका भी उत्कर्ष है। अपनी तो यह निह्नुति-लीला (गोपन-लीला) ही जैसे जल और तरंगमें अन्य सम्बन्धकी कल्पना बिगड़ी।' दासीके समान पीछे-पीछे घूम रही ऐश्वर्यशक्तिकी नहीं- '....तरङ्गन वारि ज्यों....' वैसे ही बाहर- सहायतासे वे झटपट चतुर्भुजधारी नारायण बन गये ! भीतर गोपांगनाओंमें श्रीकृष्णतत्त्व विराजमान है। अन्वेषणक्रम-प्राप्त उन नारायणका गोपांगनाओंने दर्शन जलका और तरंगका अखण्ड सम्बन्ध है। इनमें किया, पर वह आकर्षण, वह औत्कण्ठ्य, वह आनन्द श्रीवृषभानुनन्दिनी राधारानी तो और भी अन्तरंग हैं, उन्हें नहीं प्राप्त हुआ, जो श्रीकृष्ण-सम्मिलनमें प्राप्त वे जलमें माधुर्यस्थानीया हैं। फिर वहाँ कैसा औपपत्य ? होता। परंतु फिर भी उन्होंने नम्रतासे प्रणाम किया। अतः औत्कण्ठ्यवृद्ध्यर्थ इनकी कल्पना है। ऐसे ही उन्हें वरदानोन्मुख देखकर वर माँगा- 'श्रीश्यामसुन्दर 'गोपालाङ्गणकर्दमेषु विहरन्' की कल्पना है। इन हमें शीघ्र मिल जायँ।' क्या श्रीनारायणमें भूषण- भगवल्लीलाओंकी अति साधारणतासे प्राणियोंको वसन-सौन्दर्यकी कमी थी ? पर उनके मनमें-हृदयमें विश्वास, आशा बँधती है कि हम दीनोंको भी उस विराजमान अद्भुत छवि श्रीश्यामसुन्दरकी मूर्तिके आगे तत्त्वका स्वरूपदर्शन सम्भव है। तथा च इन्हीं वह सब कुछ नहीं जँचा। इस दृष्टान्तसे इनकी दृष्टियोंसे 'पूतनायन्ती, कृष्णायन्ती', 'दैत्यायित्वा' अटलता, अनन्यता तथा प्रणयातिशय व्यक्त होता है। आदि श्रीब्रजसुन्दरीयोंकी सफल लीला-प्रकृति है।
द्वितीय खण्ड—देवोपासनातत्त्व गणपति-तत्त्व गणपति ब्रह्म ही हैं सर्वजगन्नियन्ता पूर्ण परमतत्त्व ही गणपति-तत्त्व है; क्योंकि 'गणानां पतिः गणपतिः।' 'गण' शब्द समूहका वाचक होता है—'गणशब्दः समूहस्य वाचकः परिकीर्तितः।' समूहोंका पालन करनेवाले परमात्माको गणपति कहते हैं। देवादिकोंके पतिको भी गणपति कहते हैं। अथवा 'महत्तत्त्वादितत्त्वगणानां पतिः गणपतिः।' अथवा 'निर्गुणसगुणब्रह्मगणानां पतिः गणपतिः', अथवा 'सर्वविध गणोंको सत्ता- स्फूर्ति देनेवाला जो परमात्मा है, वही गणपति है।' अभिप्राय यह कि 'आकाशस्तल्लिङ्गात्' इस न्यायसे जिसमें ब्रह्मतत्त्वके जगदुत्पत्तिस्थितिलयत्व, जगन्निय- न्तृत्व, सर्वपालकत्वादि गुण पाये जायें, वही ब्रह्म होता है। जैसे आकाशका जगदुत्पत्तिस्थितिकारणलीलत्व 'आकाशादेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते' इस श्रुतिसे जाना जाता है, इसलिये वह भी आकाशपदवाच्य परमात्मा माना जाता है, वैसे ही 'ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। त्वमेव केवलं कर्तासि। त्वमेव केवलं धर्तासि। त्वमेव केवलं हर्तासि। त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।' इत्यादि 'श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष' वचनसे गणपति ब्रह्म ही हैं। अतीन्द्रिय, सूक्ष्मातिसूक्ष्म वस्तुतत्त्वका निर्णय केवल शास्त्रके ही आधारपर किया जा सकता है। जैसे शब्दकी अवगति श्रोत्रसे ही होती है, वैसे ही पूर्ण परमतत्त्वकी अवगति भी शास्त्रसे ही होती है। इसलिये 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' 'शास्त्रयोनित्वात्' इत्यादि श्रुतिसूत्र तथा अनेकविध युक्तियोंसे भी यही सिद्ध होता है कि सर्वजगतकारण ब्रह्म शास्त्रैकसमधिगम्य है। यदि शास्त्रातिरिक्त अन्य प्रमाणोंसे वस्तुतत्त्वकी अवगति हो जाय तो शास्त्रके अनुवादकमात्र होनेसे उनका नैरर्थक्य-प्रसंग भी दुर्वार होगा, इसलिये गणपतितत्त्वकी अवगतिमें मुख्यतया शास्त्र ही प्रमाण है। शास्त्रानुसार यही जाना जाता है कि सर्वदृश्यजगत्का पति ही गणपति है; क्योंकि 'गण्यन्ते बुद्धयन्ते ते गणाः' इस व्युत्पत्तिसे सर्वदृश्यमात्र ही गण है और उसका जो अधिष्ठान है, वही गणपति है। कल्पितकी स्थिति, प्रवृत्ति अधिष्ठानसे ही होती है, अतः कल्पितका पति अधिष्ठान ही युक्त है। यद्यपि कहा जा सकता है कि तब तो भिन्न-भिन्न पुराणोंमें शिव, विष्णु, सूर्य, शक्ति आदि सभी ब्रह्मरूपसे विवक्षित हैं। जब कि ब्रह्मतत्त्व एक ही है तो उसके नाना रूप भिन्न-भिन्न पुराणोंमें कैसे पाये जाते हैं? इसका उत्तर यही है कि एक ही परमतत्त्व भिन्न-भिन्न उपासकोंकी भिन्न- भिन्न अभिलषित सिद्धिके लिये अपनी अचिन्त्य लीला-शक्तिसे भिन्न-भिन्न गुणगणसम्पन्न एवं नामरूपवान् होकर अभिव्यक्त होता है। जैसे भामनीत्व, सर्वकामत्व, सर्वरसत्व, सत्यसंकल्पत्वादिगुण-विशिष्ट ब्रह्मतत्त्वकी उपासना करनेसे उपासकोंको उपास्यविशेषण गुण ही फलरूपमें प्राप्त होते हैं, ठीक वैसे ही प्राधान्येन विघ्नविनाशकत्वादिगुणगणविशिष्ट गणपति- रूपमें वही परमतत्त्व आविर्भूत होता है। शास्त्रद्वारा ही गणपतिके ब्रह्मत्वका परिज्ञान यदि कहा जाय कि फिर इसी तरहसे बाह्याभिमत भिन्न-भिन्न देव भी ब्रह्मतत्त्व ही होंगे तथा इतना ही क्यों, जबकि सारा ही प्रपंच ब्रह्मतत्त्व है, तब गणपति ही क्यों विशेषरूपसे ब्रह्म कहे जायें? इसका उत्तर यही है कि यद्यपि अधिष्ठानरूपसे बाह्याभिमत देव तथा तत्तद्वस्तु सकल ब्रह्मरूप कहे जा सकते हैं तथापि तत्तद्गुणगणविशिष्टरूपसे ब्रह्मत्व तो केवल शास्त्रसे ही जाना जा सकता है; अर्थात् शास्त्र ही जिन-जिन नामरूपगुणयुक्त तत्त्वोंको ब्रह्म बतलाते हैं, वे ही ब्रह्म हो सकते हैं; क्योंकि यह कहा जा चुका है कि 1982 Bhaktisudha_Section_16_1_Back
गणपति-तत्त्व ४५१ अतीन्द्रिय वस्तुका ज्ञान करानेमें एकमात्र शास्त्र ही प्रमाण हो सकता है। शास्त्र मुख्यरूपसे वेद और वेदानुसारी स्मृतीतिहासपुराणादि ही हैं, यह बात आगे पूर्णरूपसे विवेचित की जायगी। शास्त्र गणपतिको पूर्ण परब्रह्म बतलाते हैं। पूर्वोक्त 'श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष' श्रुतिमें गणपतिको 'त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि'—ऐसा कहा गया है। उसका अभिप्राय यह है कि गणपतिके स्वरूपमें नर तथा गज—इन दोनोंका ही सामंजस्य पाया जाता है। यह मानो प्रत्यक्ष ही परस्परविरुद्धसे प्रतीयमान 'तत्पदार्थ' तथा 'त्वं पदार्थ' के अभेदको सूचित करता है; क्योंकि तत्पदार्थ सर्वजगत्कारण सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमात्मा होता है एवं त्वं पदार्थ अल्पज्ञ अल्पशक्तिमान् जीव होता है। उन दोनोंका ऐक्य यद्यपि आपात-विरुद्ध है तथापि लक्षणासे विरुद्धांश-द्वयका त्यागकर एकता सुसम्पन्न होती है। तद्वत् लोकमें यद्यपि नर और गजका ऐक्य असम्मत है तथापि लक्षणासे विरुद्धधर्माश्रय भगवान्में उसका सामंजस्य है अथवा जैसे तत्पद-लक्ष्यार्थ सर्वोपाधि- निष्कृष्ट 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' एवं लक्षणालक्षित ब्रह्म है, वैसे ही त्वं पदार्थ जगन्मय सोपाधिक ब्रह्म है। इन दोनोंका अखण्डैकरस, 'असि' पदार्थमें सामंजस्य है। इसी तरह नर और गजस्वरूपका सामंजस्य गणपतिस्वरूपमें है। 'त्वं'-पदार्थ नर-स्वरूप है तथा 'तत्'-पदार्थ गजस्वरूप है एवं अखण्डैकरस गणपतिरूप 'असि' पदार्थमें इन दोनोंका सामंजस्य है। गणेशजीके विविध नामों तथा आयुधों आदिका स्वरूप शास्त्रोंमें नरपदसे प्रणवात्मक सोपाधिक ब्रह्म कहा गया है—'नराज्जातानि तत्त्वानि नाराणीति विदुर्बुधाः'। गजशब्दार्थका विवेचन शास्त्रोंमें ऐसा किया गया है—'समाधिना योगिनो गच्छन्ति यत्र इति गः, यस्माद् बिम्बप्रतिबिम्बवत्तया प्रणवात्मकं जगज्जायते इति जः।' समाधिसे योगी लोग जिस परमतत्त्वको प्राप्त करते हैं, वह 'ग' है और
'वर' है। भगवान् गणपतिका वाहन 'मूषक' है। 'मूषक' सर्वान्तर्यामी, सर्वप्राणियोंके हृदयरूप बिलमें रहनेवाला, सर्वजन्तुओंके भोगोंको भोगनेवाला ही है। वह चोर भी है; क्योंकि जन्तुओंके अज्ञात सर्वस्वको हरनेवाला है। उसको कोई जानता नहीं; क्योंकि मायासे गूढ़रूप अन्तर्यामी ही समस्त भोगोंको भोगता है। इसीलिये उसे 'भोक्तारं यज्ञतपसाम्' कहा गया है। 'मुष् स्तेये' इस धातुसे मूषक शब्द बनता है। जैसे मूषक प्राणियोंकी सर्वभोग्य वस्तुओंको चुराकर भी पुण्य-पापोंसे विवर्जित ही रहता है, वैसे ही मायागूढ़ सर्वान्तर्यामी भी सर्वभोग्यको भोगता हुआ पुण्य-पापोंसे विवर्जित है। वह सर्वान्तर्यामी गणपतिकी सेवाके लिये मूषकका रूप धारणकर वाहन बना— मूषकं वाहनाख्यं च पश्यन्ति वाहनं परम्। तेन मूषकवाहोऽयं वेदेषु कथितोऽभवत्॥ मुष् स्तेये तथा धातुः ज्ञातव्यः स्तेयब्रह्माधुक्। नामरूपात्मकं सर्वं तत्रासद् ब्रह्म वर्तते॥ भोगेषु भोगभोक्ता च ब्रह्माकारेण वर्तते। अहङ्कारयुतास्तं वै न जानन्ति विमोहिताः॥ ईश्वरः सर्वभोक्ता च चोरवत्तत्र संस्थितः। स एव मूषकः प्रोक्तो मनुजानां प्रचालकः॥ भगवान् गणेश 'लम्बोदर' हैं; क्योंकि उनके उदरमें ही समस्त प्रपंच प्रतिष्ठित है और वे स्वयं किसीके उदरमें नहीं हैं। तथा च—'तस्योदरात्समुत्पन्नं नाना विश्वं न संशयः।' भगवान् 'शूर्पकर्ण' हैं; क्योंकि योगीन्द्र- मुखसे वर्ण्यमान तथा उत्तम जिज्ञासुओंसे श्रूयमाण, अतः हृद्गत होकर शूर्पके समान पाप-पुण्यरूप रजको दूर करके ब्रह्मप्राप्ति सम्पादित कर देते हैं— रजोयुक्तं यथा धान्यं रजोहीनं करोति च। शूर्पं सर्वनराणां वै योग्यं भोजनकाम्यया॥ तथा मायाविकारेण युतं ब्रह्म न लभ्यते। त्यक्तोपासनकं तस्य शूर्पकर्णस्य सुन्दरि॥ शूर्पकर्णं समाश्रित्य त्यक्त्वा मलविकारकम्। ब्रह्मैव नरजातिस्थो भवेत्तेन तथा स्मृतः॥ गणेशजी 'ज्येष्ठराज' हैं। सर्व-ज्येष्ठों (बड़ों)- के अधिपति या सर्व-ज्येष्ठ जो ब्रह्मादि हैं, उनके बीचमें वे विराजमान हैं। वे ही गणेशजी शिव-पार्वतीके तपसे प्रसन्न होकर पार्वती-पुत्रके रूपमें प्रादुर्भूत हुए हैं। गणपति, श्रीकृष्ण, शिव आदि एक ही तत्त्व हैं श्रीरामचन्द्र और श्रीकृष्णचन्द्र जैसे दशरथ एवं वसुदेवके पुत्ररूपमें प्रादुर्भूत होकर भी उनसे अपकृष्ट नहीं हैं, वैसे ही भगवान् गणेश शिव-पार्वतीसे उत्पन्न होकर भी उनसे अपकृष्ट नहीं हैं, अतएव उनकी शिव-विवाहमें विद्यमानता और पूज्यता होना कोई आश्चर्य नहीं है। 'ब्रह्मवैवर्तपुराण' में लिखा है कि पार्वतीके तपसे गोलोक-निवासी पूर्ण परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण ही गणपतिरूपसे प्रादुर्भूत हुए हैं। अतः गणपति, श्रीकृष्ण, शिव आदि एक ही तत्त्व हैं। इसी गणपति-तत्त्वको सूचित करनेवाला ऋग्वेद (२।२३।१)-का यह मन्त्र है— 'गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपम- श्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्॥' इससे मिलता-जुलता ही गणपति-स्तावक मन्त्र यजुर्वेद (२३।१९)-में भी है। 'गणानां त्वा गणपतिँ हवामहे' इत्यादि। ऋग्वेदके मन्त्रका सर्वथा गणपतिस्तुतिमें ही तात्पर्य है। यजुर्वेदगत मन्त्रका विनियोग यद्यपि अश्वस्तवनमें है तथापि केवल अश्वमें मन्त्रोक्त-गुण अनुपपन्न होनेसे अश्वमुखेन गणपतिकी ही स्तुति इस मन्त्रसे होती है। मन्त्रार्थ इस तरह है—'हे वसो! वसति सर्वेषु भूतेषु व्यापकत्वादिति, तत्सम्बुद्धौ। गणानां महदादीनां, ब्रह्मादीनाम् अन्येषां वा समूहानाम्। गणीरूपेण, साक्षिरूपेण, ज्ञेयाधिष्ठान- रूपेण वा। 'गण' संख्याने इत्यस्माद् गण्यते बुद्ध्यते, योगिभिः साक्षात्क्रियते यः स गणस्तद्रूपेण वा पालकम्, एतादृशं त्वां आवाहयामहे। तथा प्रियाणां वल्लभानां, प्रियपतिं प्रियस्य पालकम्। तच्छेषतयैव सर्वस्य प्रेमास्पदत्वात्। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवतीति' श्रुतेः। निधीनां सुखनिधीनां,
सुखनिधेः पालकं त्वां हवामहे आवाहयामहे। मदन्तःकरणे प्रादुर्भूय स्वस्वरूपानन्दसमर्पणेन ममापि पतिर्भूयाः। पुनः हे देव! अहन्ते गर्भधम् अजायां प्रकृतौ चैतन्य-प्रतिबिम्बात्मकं गर्भं दधातीति गर्भधं बिम्बात्मकं चैतन्यम्, (तथा च—'मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहमिति' भगवत्स्मरणात्) आ-आकृष्य योगबलेन, अजानि- स्वहृदि स्थाप्यानि, त्वं च मम हृदि अजासि-क्षिपसि स्वस्वरूपं स्थापयसि।' अधिकारी उपासक गणपतिकी प्रार्थना करता है—हे सर्वान्तर्यामिन्! देवादिसमूहोंके अधिष्ठान तथा साक्षीरूपसे, प्रियोंको प्रियरूपसे, लौकिक प्रेमास्पदोंको परमप्रेमास्पद-रूपसे, लौकिक सुखराशियोंको अलौकिक परमानन्दसे पालन करनेवाले अर्थात् अपने अंशसे सम्पादन करनेवाले आपका मैं पतिरूपसे आवाहन करता हूँ। आप मेरा भी स्वरूपानन्द-समर्पणद्वारा पालन करें। जगदुत्पादनार्थ प्रकृतिरूप योनिमें स्वकीय चैतन्यप्रतिबिम्बात्मकरूप गर्भको धारण करनेवाले बिम्बचैतन्यरूपको मैं अपने हृदयमें विशुद्धान्तःकरणसे धारण करूँ, एतदनुकूल अनुग्रह करें। ऐसी प्रार्थना है। सर्वविघ्नोंके विनाशक गणेशकी आदिपूज्यता इस तरह मन्त्र-प्रतिपाद्य गणपतितत्त्व सर्वविघ्नोंका विनाशक है। अतएव 'श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष' के एक मन्त्रमें 'विघ्नविनाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमो नमः' ऐसा आया है। सायणाचार्यने इसका व्याख्यान करते हुए कहा है—'समयकालात्मक- भयहारिणे, अमृतात्मकपदप्रदत्वात्' अर्थात् गणेशजी कालात्मक भयको हरण करनेवाले हैं; क्योंकि वे अमृतात्मकपदप्रद हैं। 'स्कन्द' तथा 'मौद्गल पुराण' में विनायक-माहात्म्य-विषयक एक ऐसी गाथा है— किसी समय राजा अभिनन्दनने इन्द्रभागशून्य एक यज्ञ आरम्भ किया। यह जानकर इन्द्र कुपित हुआ। उसने कालको बुलाकर यज्ञ-भंगकी आज्ञा दी। कालपुरुष यज्ञको भंग करनेके लिये विघ्नासुररूपमें प्रादुर्भूत हुआ। जन्ममृत्युमय जगत् कालके अधीन है। काल तीनों लोकोंको भ्रमण कराता है। ब्रह्मज्ञानी पुरुष कालको जीतकर अमृतमय हो जाते हैं। ब्रह्मज्ञानका साधन वैदिक स्मार्त सत्कर्म है। 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥' सत्कर्मसे विशुद्धान्तःकरण पुरुषको भगवत्तत्त्व-साक्षात्कार होता है और उससे ही कालकी पराजय होती है। यह जानकर काल उस सत्कर्मके नाशके लिये विघ्नरूप होकर प्रादुर्भूत हुआ। सत्कर्महीन जगत् सदा ही कालके अधीन रहता है। इसीलिये कालस्वरूप विघ्नासुर राजा अभिनन्दनको मारकर जहाँ- तहाँ दृश्यादृश्यरूपसे सत्कर्मका खण्डन करने लगा, उस समय वसिष्ठादि मुनि भ्रान्त हो ब्रह्माकी शरणमें गये और उनकी आज्ञासे भगवान् गणपतिकी स्तुति की; क्योंकि गणपतिको छोड़कर किसी भी देवतामें कालनाश- सामर्थ्य नहीं है। गणेशजी असाधारण विघ्नविनाशकत्व गुणसे सम्पन्न हैं, यह बात श्रुति, स्मृति, शिष्टाचार तद्वाक्य एवं श्रुतार्थापत्तिसे अवगत है। श्रीगणेशजीसे विघ्नासुर पराजित होकर उनकी शरणमें गया और उनका आज्ञावशवर्ती हुआ। अतएव गणेशजीका नाम विघ्नराज भी है। उसी समयसे गणेशपूजन-स्मरणरहित जो भी सत्कर्म होता है, उसमें विघ्नका प्रादुर्भाव अवश्य होता है। इसी नियमसे विघ्न भगवान्के आश्रित रहने लगा। विघ्न भी कालरूप होनेसे भगवत्स्वरूप है। 'विशेषेण जगत्सामर्थ्यं हन्तीति विघ्नः।' ब्रह्मादिकोंमें भी जगत्सर्जनादि-सामर्थ्यको हनन करनेवालेको विघ्न कहते हैं। अभिप्राय यह है कि ब्रह्मादि त्रिदेव कार्यब्रह्म कोटिके जब मान्य हैं, तब सृष्टि-सर्जन, रक्षण और संहरणरूप उनके कार्य विघ्नसे अभिभूत होते हैं; अतः वे जगत्सर्जनादिमें पूर्ण स्वतन्त्र सिद्ध नहीं होते। किंतु गणेशके अनुग्रहसे ही विघ्नविरहित होकर कार्यकारणक्षम होते हैं। विघ्न और विनायक—ये दोनों ही भगवान् होनेके कारण स्तुत्य हैं। अतएव 'भगवन्तौ विघ्न- विनायकौ प्रीयेताम्' ऐसा पुण्याहवाचनमें लिखा है। विघ्न गणेशके अतिरिक्त और किसीके वशमें नहीं है, जैसा कि 'योगवासिष्ठ' में शाप देनेको उद्यत भृगुके प्रति विघ्नरूप कालने कहा है—
४५४ भक्तिसुधा
मा तपः क्षपयाबुद्धे कल्पकालमहानलैः। यो न दग्धोऽस्मि मे तस्य किं त्वं शापेन धक्ष्यसि ॥ संसारावलयो ग्रस्ता निगीर्णा रुद्रकोटयः। भुक्तानि विष्णुवृन्दानि क्व न शक्ता वयं मुने ॥ इससे सिद्ध हुआ कि गणेश-स्मरणहीन सभी निःश्रेयस-साधन सत्कर्मोंमें कालरूप विघ्नका प्रादुर्भाव होना अनिवार्य है। अतः विघ्नोंके निवारणके लिये गणेश-स्मरण सभी सत्कर्मोंमें आवश्यक है। यदि कहा जाय कि ओंकार ही सर्वमंगलमय है, वेदोक्त समस्त कर्म-उपासनाओंके आदिमें ओंकारका ही स्मरण किया जाता है, इसलिये गणेश-स्मरण निरर्थक है। तो यह ठीक नहीं, क्योंकि ओंकार भी सगुण गणेश- स्वरूप ही है। 'मौद्गलपुराण' में भी कहा है— 'गणेशस्यादिपूजनं चतुर्विधं चतुर्मूर्तिधारकत्वात्।' ब्रह्माके चारों मुखोंसे अष्टलक्ष श्लोकात्मक पुराणोंका प्रादुर्भाव हुआ। उसके पश्चात् द्वापरान्तमें व्यासदेवने कलियुगीय मन्दमति प्राणियोंके बोधार्थ अष्टादश पुराणोपपुराणोंका निर्माण किया। उनमें पहला 'ब्रह्मपुराण' है, उसमें निर्गुण एवं बुद्धितत्त्वसे परे गणेश- तत्त्वका वर्णन है। अन्तिम 'ब्रह्माण्डपुराण' है, उसमें सगुण गणेशका माहात्म्य प्रतिपादित है; क्योंकि वह विशेषरूपसे प्रणवात्मक प्रपंचका प्रतिपादन करनेवाला है। उपपुराणोंमें भी पहला 'गणेशपुराण' है, जो कि सगुण-निर्गुण गणेशकी एकताका प्रतिपादन करनेवाला है और गजवदनादिमूर्तिधर गणेशका भी प्रतिपादन करता है। यहाँपर जो यह कहा जाता है कि उपपुराण अपकृष्ट हैं, यह ठीक नहीं है; क्योंकि जैसे उपेन्द्र इन्द्रसे अपकृष्ट नहीं, वैसे ही पुराणापेक्षया उपपुराण अपकृष्ट नहीं। 'मौद्गल' अन्तिम उपपुराण है। उसमें योगमय गणेशका माहात्म्य प्रतिपादित है। इस तरह वेद, पुराण, उपपुराण आदिके भी आदिमें, मध्यमें और अन्तमें गणेश-तत्त्वका प्रतिपादन मिलता है। इतना ही क्यों, ब्रह्म-विष्णु आदि भी गणेशांश होनेसे ही शास्त्र-प्रतिपाद्य हैं। कोई लोग बुद्धिस्थ चिदात्मरूप गणेशका स्मरण करके सत्कर्म करते हैं, कोई प्रणवस्मरणपूर्वक सत्कर्म करते हैं, कोई गज-वदनाद्यवयव-मूर्तिधर गणेशका स्मरण करते हैं एवं कोई योगमय गणपतिका स्मरण करते हैं। इस तरह सभी शुभकार्योंके आरम्भमें येन-केनचिद्रूपेण (किसी न किसी रूपमें) गणेशस्मरण देखा जाता है। मरणासन्नावस्था तथा श्राद्ध आदिमें भी गणेश-स्मरण आवश्यक कोई कहते हैं कि प्राण-प्रयाणके समय एवं पितृ-यज्ञादिमें गणेश-स्मरण प्रसिद्ध नहीं है, यह ठीक नहीं; क्योंकि गया-स्थित गणेश-पद पितृ-मुक्ति देनेवाला है। वेदोक्त पितृ-यज्ञारम्भमें गणेश-पूजनका निषेध नहीं है। अतः वहाँ भी गणेश-पूजन होता है और होना युक्त है, इसीलिये श्रुति गणाधिपतिको ज्येष्ठराज पदसे सम्बोधित करती है। 'गणेशपुराण' में त्रिपुर-वधके समय शिवजीने कहा है— शैवैस्त्वदीयैरथ वैष्णवैश्च शाक्तैश्च सौरैरथ सर्वकार्ये। शुभाशुभे लौकिकवैदिके च त्वमर्चनीयः प्रथमं प्रयत्नात्॥ 'गणेश-गीता' में मरण-कालमें भी गणेश- स्मरण कहा है— यः स्मृत्वा त्यजति प्राणमन्ते मां श्रद्धयान्वितः। स यात्यपुनरावृत्तिं प्रसादान्मम भूभुज॥ 'गणेशोत्तरातापिनी' में भी कहा है— ॐ गणेशो वै ब्रह्म तद्विद्यात्। यदिदं किञ्च सर्वं भूतं भव्यं जायमान च तत् सर्वमित्याचक्षते॥ इस तरह यह सिद्ध हुआ कि पूर्ण परब्रह्म परमात्मा ही निर्गुण एवं विघ्नविनाशकत्वादि-गुणगणविशिष्ट, गजवदनादि-अवयव-मूर्तिधरके रूपमें श्रीगणेश हैं। क्या गणेशजी अनार्योंके देव हैं ? आजकल कुछ ग्रन्थचुम्बक पण्डितम्मन्य पाश्चात्योंके शिष्य होकर बाह्य कुसंस्कार-दूषितान्तः- करण सुधारक श्रीगणेशतत्त्वपर ऊटपटाँग विचार करनेका साहस कर बैठते हैं। वे अपने गुरुओंके विपरीत भला कितना विचार कर सकते हैं? उनका