भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४२ भक्तिसुधा अनुकरणमात्र था। दूसरे अपने प्रेमीको कष्ट पहुँचानेवाला सभीको बुरा लगता है। पूतनाने श्रीगोपीजनवल्लभ भगवान्को मृत्युकष्ट पहुँचानेकी चेष्टा की, अतः गोपियोंको वह सदा खटकती और अपकारकरूपमें सदा उन्हें उसका स्मरण रहता था—'हाय, पूतनाने प्यारे श्यामसुन्दरको विषपान कराया!' प्रेमाभिनिवेशमें अनिष्ट या अपकारककी चिन्ता बनी रहती है। किसीका टोना न लग जाय, इसलिये माता अपने लालके भालमें काजरका डिठौना लगा देती है। किसीका कोई प्रेमी बाहर जाता है, तो उसे शंका होने लगती है—'किसीने लाठी तो नहीं मार दी, शेर तो नहीं खा गया, कहीं ठोकर तो नहीं लग गयी?' ब्रजदेवियोंके सर्वस्व तो श्रीकृष्ण परमात्मा ही थे और श्रीकृष्णको व्रजांगनाओंकी दृष्टिमें पूतनासे सदा भय था। अतः अनिच्छ्यापि इन्हें पूतनाका स्मरण रहता था। किसी कीड़ेको भौंरा पकड़ लाता है, उसे अपनी गुंजार सुनाता है, वह संरम्भ भय योगसे भौंरा हो जाता है। गोपांगनाओंको अपनेसे भी अधिक प्रिय श्रीश्यामसुन्दर थे। इस नाते उसमेंसे एक 'पूतनायन्ती' हो गयी। प्रेमीके विघातकका स्मरण और प्रेमातिशयवश प्रेमीके साथ ऐक्यभावापत्ति के कारण प्रेमीके भय- हेतुको अपना भय-हेतु मानकर भयरूपापत्ति आदि विवेक ही, 'पूतनायन्ती' का कारण बन गया। 'कृष्णायन्ती' होनेमें तो कुछ भी प्रयास नहीं, पर 'पूतनायन्ती' होनेमें इतना चक्कर है। अथवा कोई भी व्रजांगना पूतना नहीं बनी, किंतु श्रीकृष्णविरहसन्तप्त व्रजांगनाओंकी पदे-पदे दृष्ट्वा- दृष्ट्वा रक्षार्थविनियुक्त, सर्वोपद्रवदूरीकारार्थ भगवान्की योगमाया उनके पीछे-पीछे घूम रही थी, वही लीलासाद्गुण्यार्थ गोपीभावापन्न होकर पूतना बनी। कहा जा सकता है कि इतना प्रपंच करनेकी अपेक्षा पूतना- लीला ही न की जाती; तो यह ठीक नहीं; क्योंकि भगवदवतारोंमें यह क्रम है कि जब-जब कृष्णावतार हो, तब-तब 'पूतनासुपयःपानम्' (श्रीमद्भा० १२।१२।२८) होना ही चाहिये, होता ही है। अतः यहाँ भी यह लीला की ही गयी अथवा एक भाव यह भी है कि वस्तुतः गोपांगनाओंमें ही एक पूतना बन गयी। असली पूतना जिघांसाके अशुद्ध भावको लेकर आयी थी और उदात्त अनुरागवती गोपांगनामें उसकी गन्धतक नहीं थी, वह अशुद्ध भावका अनुसन्धान किये बिना ही लीलानुकरण-साफल्यके लिये पूतना बनी। पीछे आ चुका है— 'गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहता विचिक्युरुन्मत्तकवद् वनाद् वनम्।' (श्रीमद्भा० १०।३०।४) व्रजांगनाएँ भगवान्को ही गाती हुई अर्थात् उनके चरित्रों, लीलाओंको गाती हुई उन्हें ढूँढ़ रही थीं। गाते-गाते ब्रजलीलाका भी गान हुआ, उसमें पूतनाकी कथा भी आयी। वहाँ पूतनाके सौभाग्यकी महिमा उन्होंने गायी—'अहो हमारे प्राणधन व्रजेन्द्रनन्दने कमलकी पाँखुरीसे भी अधिक सुकोमल, भक्तोंके मानसमन्दिरमें निवास करनेवाले, ब्रह्मादि देवोंसे वन्दित अपने पादोंको वक्षःस्थलपर निक्षेप करके स्तनपान किया, वह धन्य है'— पद्भ्यां भक्तहृदिस्थाभ्यां वन्द्याभ्यां लोकवन्दितैः। अङ्गं यस्याः समाक्रम्य भगवानपिबत् स्तनम्॥ (श्रीमद्भा० १०।६।३७) ये गोपांगनाएँ विरहिणी हैं। ये सोचती हैं— 'हमसे तो भाग्यशालिनी पूतना ही थी, जिसके उर-स्थलपर प्राणनाथ श्रीश्यामसुन्दरने विहार किया, कहीं पूतना बननेपर ही प्रभु हमारे उर-स्थलपर विहार करने पधारेंगे तो हम धन्य-धन्य हो जायँगी।' इसीलिये मानो वे पूतना भी बनीं। उन ब्रजदेवियोंकी दृष्टिमें तो दूषण वही है, जो प्रियतम प्राणधन श्रीमोहनके सम्मिलनमें बाधक है और भूषण वही है, जो कैसे भी उनसे सम्मिलन करा देनेमें साधक है। चाहे वह तृष्णा आदि ही क्यों न हो। वे गुण भूषण किस कामके, जिनके कारण प्रभुके दर्शनोंसे वंचित रहना पड़े, वियोग-वह्निमें सदा जलते रहना पड़े। 'अंजन कहा आँखि जेहि फूटै....' (विनय- पत्रिका १७४) वैराग्य बहुत उत्तम वस्तु है, पर वह कहीं श्रीकृष्ण परमात्माके प्रति हो जाय तो कौड़ी-कामका भी नहीं, वहाँ तो राग-अनुराग होना चाहिये, उनके प्रति विषयोंसे कभी पराङ्मुख न