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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 453

श्रीरासपंचाध्यायी ४४३

होनेवाली अविवेकियोंकी जैसी गाढ़ प्रीति होनी चाहिये। वैराग्य गुण है, पर यहाँ दूषण है। यों 'पूतना' कोई अच्छी चीज नहीं, वह तो—'पूतना लोकबालघ्नी राक्षसी रुधिराशना....।' (श्रीमद्भा० १०।६।३५) है, कितनी ही दुष्टा है। सुतरां पूतनाभाव चाहकी चीज नहीं। चाहकी चीज तो उन व्रजदेवियोंकी श्रीकृष्णभावना है, जो उन्हें पूतनाभावमें भी दीख पड़ रही है। यदि पूतना बननेसे भी उरःस्थलमें श्रीश्यामसुन्दरका विहार प्राप्त होता है तो वे उसका भी स्वागत करती हैं—'लो, हम पूतना ही बनती हैं, प्राणप्यारे मिलें तो !' अथवा व्रजांगनाएँ सोचती हैं—'क्या करें, कहाँ जायँ, इसकी अपेक्षा तो हमारे प्राण निकल जाते, वही अच्छा होता। हाय, इस उग्रतापमें भी हमारा मरण नहीं होता। क्यों ये हमारे प्राण अपने प्यारेकी प्रतीक्षामें नहीं निकल रहे हैं ? संसारमें मनुष्यकी सर्वोपरि वस्तु प्राण है, पर प्राणधन श्रीश्यामसुन्दर तो इनके भी प्राण हैं— 'श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचः स उ प्राणस्य प्राणः। चक्षुषश्चक्षुः....।' (केन० १।२) हमें ऐसा लगता है कि ये उन्हीं प्राणोंके भी प्राण श्रीश्यामसुन्दरके मिलनकी व्याकुलतामें हमारी देहसे निकलना भूल गये हैं। फिर उनके बिना कोई रह ही कैसे सकता है'— न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन। इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ॥ (कठ० २।२।५) 'तो फिर आओ सखि ! पूतना ही बनें, जिससे अपने आश्रित और प्रतीक्षापरायण इन प्राणोंकी ये स्वयं समाप्ति कर दें। सखियो ! श्रीश्यामसुन्दरको स्त्रियोंसे प्रेम नहीं है। देखो, जन्मते ही उन्होंने पूतनापर हाथ साफ किया। अपने पहले अवतारमें भी उन्होंने 'ताड़का' का निःसंकोच वध किया। फिर अब प्राणप्यारे श्रीमोहनके विप्रयोगमें जीवन रखना तो लोकनिन्दा है। अतः प्राणोंके भी प्राण श्रीश्यामसुन्दरके वियोगजन्य इस तीव्रतापमें प्राणोंका विसर्जन कर देना ही सर्वोत्तम है और इसका सुगम साधन पूतना बनना है। पूतना बनी कि श्रीबालमुकुन्द श्यामसुन्दरने हमारा काम तमाम किया।' यहाँ ऐश्वर्य और माधुर्यभाव साथ-साथ चल रहे हैं, इस जगह ऐश्वर्य माधुर्यसे दब गया है। व्रजदेवियोंने सोचा कि 'सबसे अधिक आनन्दकी बात तो पूतना बननेमें यह है कि उरःस्थलपर श्रीव्रजेन्द्रनन्दनका विहार प्राप्त होगा और वह भी उन्हींका गान करते हुए; 'गायन्त्य उच्चैरमुमेव।' तथा च सदाके लिये वियोग-दुःखसे मुक्त हो जायँगी एवं सद्गति तो मुफ्तमें ही मिलेगी। प्रसिद्ध है—विष देनेवाली पूतनाको भी भगवान्ने सद्गति प्रदान की।' सत्यलोकपति ब्रह्माजी, जिन्होंने भगवान् श्रीकृष्णके भगवत्त्वकी परीक्षाके लिये वत्सापहरण किया और अन्तमें भगवान्की अतुल महिमाको देखकर मुग्ध रह गये तथा व्रजवासियोंके लोकोत्तर सौभाग्य और निःस्वार्थ श्रीकृष्ण प्रेमको देखकर आश्चर्यचकित रह गये, उनको यह सन्देह हुआ कि जब अघासुर- बकासुर आदि समस्त कुलके साथ भगवान्ने पूतनाको आत्मपद-जैसा ऊँचा पद प्रदान किया, तब इन निरुपम-निःस्वार्थ-स्नेही व्रजवासियोंको इनसे आनृण्य प्राप्त करनेके लिये वे क्या देंगे ? विश्वका कोई और ऊँचा फल इन्हें देनेकी भगवान्ने यदि सोच रखी है तो उनसे निजसे बढ़कर विश्वमें कोई ऊँचा फल नहीं है। पूर्णतम पुरुषोत्तम परब्रह्म जिनके साथ नाचें, गायें, खायें, पीयें, विविध क्रीड़ा करें इससे बढ़कर जगत्में और दूसरा उत्तम फल हो ही क्या सकता है ? जिन्होंने अपना तन, मन, धन, देह, नेह, गेह, पुत्र, कलत्र, मित्र सब कुछ भगवान्पर न्योछावर कर दिया और जिन्होंने वैर किया, दोनोंको समान फल कैसे दिया जा सकता है ? अतः मेरी समझमें तो भगवान् सदा इनके ऋणी रहेंगे। भगवान् विश्वफलात्मा हैं, पूर्णानन्दसिन्धु हैं, उसके बिन्दुके समान इन्द्रादि लोक सौख्य हैं—'....एतस्य मात्रामुपजीवन्ति।' जब स्वयं आनन्दसिन्धु ही जिनके घरोंमें क्रीड़ाकी लहरें ले रहा है, तब वे बिन्दुसे कैसे तृप्त होंगे ? सुतरां इन्द्रादि-पद देकर भी प्रभु इनसे अनृण नहीं हो सकते— एषां घोषनिवासिनामुत भवान् किं देव रातेति न- श्चेतो विश्वफलात् फलं त्वदपरं कुत्राप्ययन् मुह्यति।

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