भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसद्वेषादिव पूतनापि सकुला त्वामेव देवापिता यद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते ॥* (श्रीमद्भा० १०।१४।३५) गोपियोंने समझा कि हम तो श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनोंके लिये ही उत्कण्ठित हैं, सो पूतना बननेसे कभी तो सम्भव होगा ही। फिर विप्रयोग भी न होगा। अतः पूतना बनी—'कस्याश्चित् पूतनायन्त्याः कृष्णा- यन्त्यपिबत् स्तनम्।' (श्रीमद्भा० १०।३०।१५) 'त्वामेव देवापिता' आदिसे द्योत्य भगवत्सायुज्य आदिकी प्राप्तिपर अन्य लोगोंके कुछ और भी भाव हैं। जैसे कुछ भगवद्भक्त भगवच्चरणारविन्दमें, कुछ भगवन्मुखारविन्द आदिमें लीन होते हैं। यही भेद है। श्रीभगवान्का सर्वांग ही फल है। विधि-निषेध साधनमें होता है, फलमें नहीं। सुरापान न करना आदिसे समुत्पन्न फल और अग्निहोत्रादिसे समुत्पन्न स्वर्गादि फलमें कोई अन्तर नहीं। श्रीभगवान् तो भक्ति-उपासनाके फल हैं, उनके पादारविन्द, हस्तारविन्द आदि सब फल हैं। 'आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादि····' ही उनका स्वरूप है। इसको सभी मानते हैं। मिठाईके खिलौनेके हाथ-पाँव सब मिठाई ही होंगे। वैसे ही भगवान्का समग्र विग्रह आनन्दमयमात्र है— सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषददृशाम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१३।५४) यह बात श्रीमद्भागवतसे भी सिद्ध है। भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माजीको अपने जो स्वरूप बतलाये, वे सत्य, ज्ञान, अनन्त, आनन्दमात्र थे। बीचमें असत्य आदिके निवेशनिवारणार्थ 'मात्र' पद है। अतएव 'मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्—' वेणु-रेणु, गौ-वत्स सब मधुर, निज देहसे लेकर उसके सम्पर्कपर्यन्त सब मधुर-ही-मधुर। यों भगवद्विग्रह फलस्वरूप ही है। कहीं उसकी कुछ साधनता भी है, जैसे—अघासुर- संहार, भक्ताह्वान आदि। ऐसे ही परिरम्भमें पादस्पर्शमें फलता है और चलनमें साधनता। विवेक यह कि लीलामें ही साधनता है, प्राकृत (स्वभाव या स्वरूप)- में नहीं। भगवान् श्रीकृष्णके मुखमें केवल फलात्मता ही है, ऐसे ही उनके दर्शनमें, अधरामृतमें, वंशी-निनादमें, चुम्बनमें सर्वत्र फलात्मता है। अतः 'सद्वेषादिव पूतनापि सकुला त्वामेव देवापिता' से आत्मदानरूप जो-जो लीनता हुई, वह हुई अवश्य भगवद्विग्रहमें ही, परंतु उनके पादारविन्दमें अथवा श्रीभगवन्मुखारविन्दमें फलात्मताके साथ क्वचित् साधनात्मता भी है, वहाँ देवभोग्या, सर्वभोग्या, भगवद्भोग्या सुधाका निवास है। देवभोग्या सुधा वंशी-छिद्रोंसे निर्गत होकर वृक्ष, लता, मयूरोंको प्राप्त होती है। ये वृक्षादि वृन्दावनके देवता हैं, प्राकृत देवता नहीं, किंतु भगवत्स्वरूपभूत भगवदंशभूत देव हैं। वृन्दावनकी लता-पता, पशु- पक्षी, जड़-जंगम आदि सब श्रीकृष्ण परमात्माके रमणकी सामग्री हैं और ये उनके रमणकी सामग्री तभी बन सकते हैं, जब इनमें उनका प्रवेश हो। श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनका रमण श्रीब्रजेन्द्रनन्दिनीके ही संगमें सम्भव है, सुधाकररूपमें विराजमान हैं, वे ही देवभोग्यारूपमें फैलती हैं, फलतः सब श्रीराधामय हो जाता है, वहीं उनका रमण होता है। अतएव वे श्रीराधारमण हैं। गोपांगनाओंमें उनका रमण नहीं, अपितु जहाँ श्रीराधा वहीं उनका रमण होता है। आत्मारामका रमण आत्माहीमें—अपनेहीमें होता है। यों देवभोग्या सुधामें भी साधनता आयी। जैसे प्रत्येक काष्ठखण्डमें अग्नि है, पर वह अव्यक्त है, व्यक्तका सम्बन्ध हो जानेपर वह (अग्नि) व्यक्त-प्रकट हो सकता है। ऐसे ही 'वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं व्यञ्जयन्त्य इव पुष्पफलाढ्याः।' (श्रीमद्भा० १०।३५।९) अर्थात् वनके लता, तरु अपनेमें भगवान् विष्णुको मानो प्रकट करते हुए, पुष्प-फल भारसे समाच्छन्न थे। आशय यह कि व्यापक होनेसे भगवान् विष्णु तो उनमें पहले भी थे, पर प्रकट नहीं थे, अब प्रकट हो गये। फलतः प्रकट
- देवताओंके भी आराध्यदेव प्रभो ! इन व्रजवासियोंको इनकी सेवाके बदलेमें आप क्या फल देंगे ? सम्पूर्ण फलोंके फलस्वरूप ! आपसे बढ़कर और कोई फल तो है ही नहीं, यह सोचकर मेरा चित्त मोहित हो रहा है। आप उन्हें अपना स्वरूप भी देकर उऋण नहीं हो सकते; क्योंकि आपके स्वरूपको तो उस पूतनाने भी अपने सम्बन्धियों-अघासुर, बकासुर आदिके साथ प्राप्त कर लिया, जिसका केवल वेष ही साध्वी स्त्रीका था, पर जो हृदयसे महान् क्रूर थी। फिर, जिन्होंने अपने घर, धन, स्वजन, प्रिय, शरीर, पुत्र, प्राण और मन—सब कुछ आपके ही चरणोंमें समर्पित कर दिया है, जिनका सब कुछ आपके ही लिये है, उन व्रजवासियोंको भी वही फल देकर आप कैसे उऋण हो सकते हैं ?