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भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

सद्वेषादिव पूतनापि सकुला त्वामेव देवापिता यद्धामार्थसुहृत्प्रियात्मतनयप्राणाशयास्त्वत्कृते ॥* (श्रीमद्भा० १०।१४।३५) गोपियोंने समझा कि हम तो श्रीश्यामसुन्दरके दर्शनोंके लिये ही उत्कण्ठित हैं, सो पूतना बननेसे कभी तो सम्भव होगा ही। फिर विप्रयोग भी न होगा। अतः पूतना बनी—'कस्याश्चित् पूतनायन्त्याः कृष्णा- यन्त्यपिबत् स्तनम्।' (श्रीमद्भा० १०।३०।१५) 'त्वामेव देवापिता' आदिसे द्योत्य भगवत्सायुज्य आदिकी प्राप्तिपर अन्य लोगोंके कुछ और भी भाव हैं। जैसे कुछ भगवद्भक्त भगवच्चरणारविन्दमें, कुछ भगवन्मुखारविन्द आदिमें लीन होते हैं। यही भेद है। श्रीभगवान्‌का सर्वांग ही फल है। विधि-निषेध साधनमें होता है, फलमें नहीं। सुरापान न करना आदिसे समुत्पन्न फल और अग्निहोत्रादिसे समुत्पन्न स्वर्गादि फलमें कोई अन्तर नहीं। श्रीभगवान् तो भक्ति-उपासनाके फल हैं, उनके पादारविन्द, हस्तारविन्द आदि सब फल हैं। 'आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादि····' ही उनका स्वरूप है। इसको सभी मानते हैं। मिठाईके खिलौनेके हाथ-पाँव सब मिठाई ही होंगे। वैसे ही भगवान्‌का समग्र विग्रह आनन्दमयमात्र है— सत्यज्ञानानन्तानन्दमात्रैकरसमूर्तयः । अस्पृष्टभूरिमाहात्म्या अपि ह्युपनिषददृशाम् ॥ (श्रीमद्भा० १०।१३।५४) यह बात श्रीमद्भागवतसे भी सिद्ध है। भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माजीको अपने जो स्वरूप बतलाये, वे सत्य, ज्ञान, अनन्त, आनन्दमात्र थे। बीचमें असत्य आदिके निवेशनिवारणार्थ 'मात्र' पद है। अतएव 'मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्—' वेणु-रेणु, गौ-वत्स सब मधुर, निज देहसे लेकर उसके सम्पर्कपर्यन्त सब मधुर-ही-मधुर। यों भगवद्विग्रह फलस्वरूप ही है। कहीं उसकी कुछ साधनता भी है, जैसे—अघासुर- संहार, भक्ताह्वान आदि। ऐसे ही परिरम्भमें पादस्पर्शमें फलता है और चलनमें साधनता। विवेक यह कि लीलामें ही साधनता है, प्राकृत (स्वभाव या स्वरूप)- में नहीं। भगवान् श्रीकृष्णके मुखमें केवल फलात्मता ही है, ऐसे ही उनके दर्शनमें, अधरामृतमें, वंशी-निनादमें, चुम्बनमें सर्वत्र फलात्मता है। अतः 'सद्वेषादिव पूतनापि सकुला त्वामेव देवापिता' से आत्मदानरूप जो-जो लीनता हुई, वह हुई अवश्य भगवद्विग्रहमें ही, परंतु उनके पादारविन्दमें अथवा श्रीभगवन्मुखारविन्दमें फलात्मताके साथ क्वचित् साधनात्मता भी है, वहाँ देवभोग्या, सर्वभोग्या, भगवद्भोग्या सुधाका निवास है। देवभोग्या सुधा वंशी-छिद्रोंसे निर्गत होकर वृक्ष, लता, मयूरोंको प्राप्त होती है। ये वृक्षादि वृन्दावनके देवता हैं, प्राकृत देवता नहीं, किंतु भगवत्स्वरूपभूत भगवदंशभूत देव हैं। वृन्दावनकी लता-पता, पशु- पक्षी, जड़-जंगम आदि सब श्रीकृष्ण परमात्माके रमणकी सामग्री हैं और ये उनके रमणकी सामग्री तभी बन सकते हैं, जब इनमें उनका प्रवेश हो। श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहनका रमण श्रीब्रजेन्द्रनन्दिनीके ही संगमें सम्भव है, सुधाकररूपमें विराजमान हैं, वे ही देवभोग्यारूपमें फैलती हैं, फलतः सब श्रीराधामय हो जाता है, वहीं उनका रमण होता है। अतएव वे श्रीराधारमण हैं। गोपांगनाओंमें उनका रमण नहीं, अपितु जहाँ श्रीराधा वहीं उनका रमण होता है। आत्मारामका रमण आत्माहीमें—अपनेहीमें होता है। यों देवभोग्या सुधामें भी साधनता आयी। जैसे प्रत्येक काष्ठखण्डमें अग्नि है, पर वह अव्यक्त है, व्यक्तका सम्बन्ध हो जानेपर वह (अग्नि) व्यक्त-प्रकट हो सकता है। ऐसे ही 'वनलतास्तरव आत्मनि विष्णुं व्यञ्जयन्त्य इव पुष्पफलाढ्याः।' (श्रीमद्भा० १०।३५।९) अर्थात् वनके लता, तरु अपनेमें भगवान् विष्णुको मानो प्रकट करते हुए, पुष्प-फल भारसे समाच्छन्न थे। आशय यह कि व्यापक होनेसे भगवान् विष्णु तो उनमें पहले भी थे, पर प्रकट नहीं थे, अब प्रकट हो गये। फलतः प्रकट

  • देवताओंके भी आराध्यदेव प्रभो ! इन व्रजवासियोंको इनकी सेवाके बदलेमें आप क्या फल देंगे ? सम्पूर्ण फलोंके फलस्वरूप ! आपसे बढ़कर और कोई फल तो है ही नहीं, यह सोचकर मेरा चित्त मोहित हो रहा है। आप उन्हें अपना स्वरूप भी देकर उऋण नहीं हो सकते; क्योंकि आपके स्वरूपको तो उस पूतनाने भी अपने सम्बन्धियों-अघासुर, बकासुर आदिके साथ प्राप्त कर लिया, जिसका केवल वेष ही साध्वी स्त्रीका था, पर जो हृदयसे महान् क्रूर थी। फिर, जिन्होंने अपने घर, धन, स्वजन, प्रिय, शरीर, पुत्र, प्राण और मन—सब कुछ आपके ही चरणोंमें समर्पित कर दिया है, जिनका सब कुछ आपके ही लिये है, उन व्रजवासियोंको भी वही फल देकर आप कैसे उऋण हो सकते हैं ?

स्वस्वरूपमें ही रमण होता है। अधर-सुधामें दोनों प्रकट हैं। जहाँ इसका सम्बन्ध है, वहीं श्रीराधाका प्राकट्य है। भगवद्भोग्या सुधा भी अधरसुधाका साधन बनती है। इस प्रकार पूतना आदि और व्रजांगनाओंके श्रीकृष्ण-सायुज्यमें भेद है। लीलाके अनन्त होनेसे यहाँ सर्वदा सायुज्य नहीं। प्रेमपीड़ावश गोपांगना पूतनाको बड़ी मानकर उसके भावसे पूतना बनना चाहती हैं। वे चाहती हैं—किसी भी प्रकार हमें भी प्राण-धन श्रीश्यामसुन्दर मदनमोहन राधाविहारीका सम्बन्ध मिल जाय। इसीलिये पूतना भी बननेको तैयार हैं— ‘कस्याश्चित् पूतनायन्त्याः कृष्णायन्त्यपिबत् स्तनम्।’ गोपांगनाएँ सोचती हैं—‘अहो ! पूतना धन्य है, जिसके उरःस्थलपर प्राणप्यारे श्रीश्यामसुन्दरने विहार किया, हाय, हम कहीं पूतना भी बनी होतीं तो हमारा भाग्योदय हो जाता।' इन भावोंमें मग्न व्रजांगनाएँ पूतना बनीं। अथवा गोपांगनाएँ सायुज्यप्राप्ति ही चाहती हैं। यद्यपि अन्तःकरणसे उन्हें यह इष्ट नहीं है तथापि वियोगकी असह्यतामें वे इसे ही अच्छा समझती हैं। सोचती हैं, चलो पूतना बननेसे प्राणधनका उरःस्थानपर विहार तो मिलेगा ही, जो हमें इष्ट है, फिर सायुज्य ही सही, रात-दिन विरहवह्निमें जलते रहनेसे वही क्या बुरा है। पहले सायुज्यमें भेद बतलाया गया है—अघासुर, बकासुर आदिको सायुज्य प्राप्त हुआ, वे भगवत्पादारविन्दमें लीन हुए और गोपांगनाएँ श्रीमुखमें। दैत्यवध, भक्तसंकेत आदिमें साधनता है और परिरम्भण आदिमें फलता है, परंतु मुखमें तो सदा ही फलरूपता है। हाँ, उसकी सुधामें भेद अवश्य है, जैसे देवभोग्या सुधा साधन होती है, लता-वृक्ष आदिमें भगवदुपयोग्यता-सम्पादनार्थ उसका प्रयोग किया जाता है। वेणुगीतपीयूषसे लतादिमें, परिकरोंमें भगवद्भोग्यता सम्पादित की जाती है; क्योंकि वहाँ श्रीवृषभानुनन्दिनीका संचार हुआ है। मुख अग्नि माना गया है—‘मुखादग्निरजायत।’ कौन अग्नि प्राकृत नहीं ? जब पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण प्राकृत नहीं, अपितु अचिन्त्य, अनन्त, अद्भुत रससुधासिन्धु हैं, तब उनकी मुखाग्नि भी प्राकृत नहीं, अपितु वह अप्राकृत विरहवैश्वानर है। यह अग्नि मुखमें ही क्यों ? तो प्राधान्यात् मुखमें व्यपदेश है, वैसे तो वह सर्वावयव-अधिष्ठित है। विप्रलम्भ-सम्भोगात्मक उभयविध शृंगार भी उनमें है। भगवान् सकल- विरुद्धधर्माश्रय हैं, अतः उनमें दोनों ही शृंगार एक साथ हैं, वहाँ भी उद्बुद्ध और उद्वेलित रूपमें यहाँ उभयविधता भी श्रीभगवान्के सर्वांगहीमें है। ‘मुखम्’ का अन्यत्र प्राधान्य अर्थ है। यहाँ भी ‘मुखमिव मुखम्’ के रूपसे मुखकी प्रधानता है। उसमें प्रधानता विरहकी है। सर्वांगमें मुख प्रधान है, शृंगारमें विरहाग्नि प्रधान है। इस प्रकार दोनों प्राधान्य है। श्रीमद्वल्लभाचार्य ‘विरहवैश्वानरावतार’ माने गये हैं। वह विप्रलम्भशृंगार ‘अग्नि’ होनेपर भी ‘रस’ है और वह भी है सर्वोत्कृष्ट। इस प्रकार श्रीकृष्ण परमात्माके मुखमें लय होना मानो वियोगरसमें लय होना है। मुख विप्रयोग रस है, व्रजांगनाओंका उसीमें लय होना है। अतः यही विशेषता है, यह लय स्थायी नहीं। जैसे अपार समुद्रकी उसीकी वस्तुका उसीमें निमज्जन-उन्मज्जन हो। वस्तुतस्तु श्रीकृष्णके उभयविध उद्बुद्ध शृंगारमें पुनः- पुनः भावुकोंका आविर्भाव-तिरोधान भाव होता है। मुखमें भी सर्वातिशायी अधरसुधाका पान होता है। अस्तु, देवभोग्या सुधा तो समझमें आयी, पर भगवद्भोग्या क्या ? तो यही विलक्षणता है। केवल श्रीकृष्णभोग्या ही भगवद्भोग्या सुधा है। परंतु अपने ही रसका अपनेको पान कैसे हो ? नायिकाधरका रसास्वाद होता है। यह रसरीतिके विरुद्ध है। इसके बहुत भेद हैं। लोभ ही अधर है (यह भगवद्विभूति है), वही अध्यक्ष है। मायाशक्तिसे लोभी कोषाध्यक्ष बना है। पात्रापात्रविचारपूर्वक दान ही अध्यक्षता है। अतः उसे अपनी अधरसुधाका अध्यक्ष वह देवभोग्या देवोंको देता है और गोपांगनाभोग्याको उनके हृदयोंमें वंशीद्वारा भेजता है। वेणु बहुत ऊँचे अधिकारवाली है, पर उसे कुछ नहीं मिला। ‘दर्वी पाकरसं यथा’— जैसे कलछुल दाल-साग आदिके खट्टे-मीठे स्वादको नहीं जानती, वैसी ही वंशीकी दशा है। चषक (पानपात्र)-को कुछ नहीं मिलता। श्रीश्यामसुन्दर भगवान्ने भगवद्भोग्या सुधाको गोपांगनाओंके अन्तरमें पहुँचानेके लिये वंशीको रखा है। वह दर्वीकी तरह

है, उसे कुछ स्वाद नहीं मिला। तभी तो वेणुगीतपीयूषके निनादसे जड़-चेतन सबको सुधास्वाद मिला, पत्थर बह चले, यमुना जम गयी, ठूँठोंमें पत्ते फूट निकले, पर वह सूखी-की-सूखी ही, सच्छिद्र ही, पल्लवविहीन ही रही; क्योंकि उसे कुछ मिला नहीं। वह देवोंको, गोपियोंको निर्देशानुसार दे आयी। परंतु उस वस्तुकी महिमा ऐसी है, जो उसके स्पर्शमात्रसे ही उसे बहुत कुछ मिल गया। ब्रह्मा, इन्द्र आदि देव, अधिदेव उन- उन इन्द्रियादिकी अधिष्ठानतासे ही अपनेको कृतकृत्य मानते हैं—'एतद् हृषीकचषकैरसकृत् पिबामः। शर्वादयोऽङ्ग्यृयुदजमध्वमृतासवन्ते···।' ऐसा है वह वेणुपरिवेषित पीयूष। वेणुको वह पीयूष साक्षात् मिला ही, पर उसे पाकर वह औरोंकी तरह उन्मद नहीं हुई, क्योंकि उसने सोचा कि यदि मैं रूपान्तरको प्राप्त हो गयी, हरी-भरी हो गयी तो कहीं प्यारे श्रीश्यामसुन्दर मुझे छोड़ न दें। अतः बड़ी सावधानीसे वह उस रसको अपने अन्तरमें छिपाये रही। लोकमें ख्यात होनेसे नजर-टोना लग जाता है, वेणु इसे खूब जानती थी। अस्तु, भगवद्भोग्या सुधा जब गोपांगनाओंके मानसदेशमें पहुँची, तब उन्होंने उसका आस्वाद किया। इस रसकी यह विशेषता है कि वह जितना ही आस्वादित होगा, उतना ही अधिकाधिक बढ़ेगा। फिर उसकी यह भी विशेषता है कि यह जहाँ पहुँचता है, वहाँ पहलेसे भी विद्यमान होता है—'ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥' (गीता १३।१७) श्रीराधाकृष्ण और तद्विषयक रस पहले ही प्राणियोंमें है, पर व्यक्त नहीं, रसिकोंकी संगतिसे वह व्यक्त हो जाता है। यहाँ निरावरण कर्णकुहरोंसे यह भगवद्भोग्या सुधा गोपीमानस- पटलमें प्रविष्ट हुई। गुरु एक मन्त्र देता है, साधक रसिक एकान्तमें बैठकर उसका अनुसन्धान करके अपार रसका आस्वाद करता है। 'गोपालचम्पू' आदिका यों ही आविर्भाव हुआ। यह श्रीजीवगोस्वामीका ग्रन्थ है। वे उद्भट विद्वान् और भावुक थे। प्रसंगात् वे एक बार किसी जंगलकी गुफामें जा बैठे। वहाँ केवल आटा घोलकर पीते रहे, इससे उनका भौतिक शरीर दुर्बल हो गया, रसमय शरीर पुष्ट हो गया। वहाँ 'क्रमसन्दर्भ' आदि ग्रन्थ भी उन्होंने लिखे। इस प्रकार सबमें 'ज्ञान-ज्ञेय' अधिष्ठित हैं। यहाँ तो प्रत्यक्ष ही वेणुद्वारा गोपांगनाओंमें वह रस प्रसृत हुआ, वृद्धिको प्राप्त हुआ, अन्तःकरणादिमें भरपूर हुआ और वही वागिन्द्रियसे सम्पृक्त हुआ। उसका जब वर्णन करने लगीं, तब वही उनके अधरोंमें आ गया। वही भगवद्भोग्या सुधा सम्भोगसमयमें श्रीश्यामसुन्दरसम्भोग्या बन गयी। इस प्रकार परम्परया दान, वर्णन, भावनाद्वारा वह भगवद्भोग्या बनी। गोपांगनाओंने उसे—'बर्हापीडं नटवरवपुः····' के रूपमें गाया। यह सुधा भी सर्वाभोग्या सुधाका साधन है। जब परमप्रेयसीका रसपान रसलम्पट श्रीश्यामसुन्दर करते हैं और प्रेयसीवर्गका भी; उस समय श्रीश्यामसुन्दर गोपांगनाभावापन्न और गोपांगनाएँ श्यामसुन्दरभावापन्न हो जाती हैं। यह सब 'सर्वाभोग्या' के लिये है। इस प्रकारसे संसारका सार उभयविध उद्बुद्ध शृंगारस्वरूप श्रीश्यामसुन्दर नटनागर, उनमें भी प्रधानतया उनका मुखसार, उसमें भी सुधा-रस उसका सार है। उसमें व्रजांगनाओंका लय, सायुज्य हुआ। यह वस्तु पूतना बेचारीको कहाँ मिले। वह तो बहुत स्थूल दृष्टिसे श्रीभगवत्सायुज्यको प्राप्त हुई। नहीं

विरुद्ध भाव, जो प्राणत्यागरूप है, नहीं हुआ; क्योंकि यहाँ विशुद्ध भावना थी, अतः इसका फल तो हुआ, पर जिघांसा न होनेसे प्राणत्याग नहीं हुआ। गोपियोंद्वारा शकटासुर-तृणावर्त-उद्धार आदि लीलाओंका अनुकरण 'तोकायित्वा रुदत्यन्या पदाहञ्छकटायतीम्॥' (श्रीमद्भा० १०।३०।१५) पूतनालीलाका अनुकरण समाप्त हुआ। अब दूसरी शकटासुर-लीलाका अनुकरण आरम्भ हुआ। 'तोकवत् आचरन्ती तोकायन्ती'—एक मासके छोटे बच्चेके जैसा आचरण करनेवाली एक दूसरी गोपी बन गयी। इसमें उन्हें भगवान्की बाललीलाकी स्फूर्ति हुई। भगवान् बालकृष्ण जबतक मैयाको नहीं देखते, तबतक इधर- उधर क्रीड़ासक्त रहते हैं, परंतु ज्यों ही मैयाको देखा कि दूध पीनेके लिये पाँव पटक-पटककर रोने लगते, मचलने लगते हैं। वैसे ही यह गोपी बालचापल्यके अनुकरणको सफल बनाती है—पाँव पटकती है; मानो रूप-सरोवरमें समुद्भूत कमल विरह पवनसे विधूनित हो रहा हो। यहाँ उसका रूप ही सरोवर, पाद ही कमल और उनका प्रताड़न ही विधूनन है। विरुद्ध भावका गोपांगनाओंको स्पर्श भी नहीं करना है। यहाँ श्रीव्रजेन्द्रचन्द्र नन्दनन्दनकी अधरसुधाके पानकी ही इन्हें उत्कण्ठा है। जैसे श्रीश्यामसुन्दर यशोदाके पयःपानार्थ पादप्रताड़न करते हैं, वैसे सुधापानार्थ गोपांगनाओंका यह अनुकरण है। यों बालकके अनुकरणमें रोती हुई एक गोपीने शकटासुरका आचरण करनेवाली दूसरी गोपीको पाँवसे गिरा दिया— 'पदाहञ्छकटायतीम्॥' वास्तविक परिस्थितिका स्मरण करके वियोगतप्त गोपांगना परस्पर कहती हैं—'हाय सखि, यदि हम शकटासुर भी बनी होतीं तो श्रीप्राणप्यारेका यह सुकोमल चरणतल तो मिला होता।' लीलानुकरणमें शकटकी तरह गोपी बनी, उसे श्रीकृष्णपादस्पर्शका सुख नहीं मिला। दूसरीने कहा—'सखि ! तृणावर्त अच्छा था, हम लालसा करती हैं, कब प्यारे श्यामसुन्दर हमारे हार बनें। इन हीरक हारोंमें आनन्द नहीं, वह हार हमें नहीं, तृणासुरको मिला। प्यारे मोहन उसके गलेसे लिपटे और हार बन गये। सखि ! इस जन्ममें तो वे हमारे हार बनेंगे नहीं, आओ तब राक्षस ही बनें, राक्षस ही सही, प्राणप्यारे तो मिलेंगे।' गोपांगनाओंका तुरंत भाव बदल जाता है और वे प्रार्थना करने लगती हैं—'प्यारे मनमोहन, हमारे हृदयहार बननेमें आपको लज्जा लगती है और उन क्रूर राक्षसोंके गलेसे लगे रहते हो, क्या हम इतनी बुरी हैं?' गोपांगनाओंके समूहमें कोई एक गोपी बाललीलानुकणार्थ श्रीकृष्णस्वरूप बनी। यह योगमायाका प्रभाव है, वह परमानुरागवती गोपीसे जो

४४८ भक्तिसुधा रोकते हैं, शम, दम, उपरति, तितिक्षा आदि साधनोंमें अपने जीवनको मिटा देते हैं, आश्चर्य है कि आप उनके मालिक भी नहीं बनना चाहते, स्वामी बननेसे भी घृणा करते हो। आपके इन चरित्रोंको देखकर यही निश्चय करना पड़ता है कि आपकी पदप्राप्ति केवल प्रेमसाध्य है, एकमात्र रागानुगा भक्ति ही सर्वतोभावेन आपको वशमें कर सकती है। वहाँ रुचि किस चीजकी थी, यह बात दूसरी है। गायने हुंकार किया, बछड़ेने बुलाया, हम्मारव करते ही चट बोल पड़े। उधर गोपांगनाओंके पुंश्चली भावपर भी रीझ गये। यहाँ सब बात उलटी। जितनी ऊँची चीज सब नीची कर दी गयी। महाराजाधिराजका वह स्वरूप इतने महत्त्वका नहीं हुआ, जितना पार्थसारथिका। सखा अर्जुनके घोड़ोंके सहीस बने। महाभारत-युद्धमें अर्जुनके घोड़े जलके बिना क्लान्त हो गये, उनके लिये उन्होंने पाताल-गंगा निकाली। पार्थसारथिने रथसे घोड़ोंको खोलकर जल पिलाया, स्नान कराया, घोड़ोंकी लगाम अपने मुखमें पकड़ी, तोत्र (चाबुक)-को मुकुटमें खोंसा और चार हाथोंसे उनको धोया-पोंछा। उस समयकी उनकी झाँकी देखते ही बनती थी। राजा-महाराजा भी जिसको नहीं कर सकते, उसे प्रेमके बन्धनमें बँधकर उनके अधिराजराजने किया। परंतु यह भी गोपांगणकर्दम- क्रीड़ाके आगे तो फीका पड़ जाता है। तभी तो एक महात्माने कहा— 'परमिममुपदेशमाद्रियध्वं, निगमवनेषु नितान्तखेदखिन्नाः। विचिनुत भवनेषु वल्लवीनामुपनिषदर्थमुलूखले निबद्धम्॥' अर्थात् वेदशास्त्रोंके उपदेशारण्यमें—कर्मोपासना एवं ज्ञानकी भूलभुलैयामें भटक रहे और अभिलषितको न प्राप्त करके दुःखी हो रहे प्राणियो, हमारी नेक सलाह मानो, वह उपनिषदोंका सार अरण्योंमें या आरण्यकोंमें न मिलेगा, वह तो गँवारी ग्वालिनोंके घरोंमें माखन- चोरी करते हुए अथवा यशोदाके आँगनमें ऊखलसे बाँधा मिलेगा, वहाँ उसे ढूँढ़ो। यहाँ प्रेमकी रसमयी लीलाओंमें गुंजाओंके समक्ष कौस्तुभ- मणिका कोई सम्मान या महत्त्व नहीं। यहाँ लक्ष्मीपति और रुक्मिणीपतित्व भी पुंश्चलीपतित्व या गोपीजनवल्लभताके सामने मन्थर पड़ जाता है। 'उज्ज्वलनीलमणि' में समर्थन किया गया है कि अरुन्धती, अनसूया आदि बड़े-बड़े सतीवृन्द भी इन पुंश्चलियोंकी पादधूलिके लिये लालायित हैं—व्याकुल हैं; क्योंकि ये ही सती परम सती हैं, जिन्होंने अपर पुरुषका संग त्यागकर 'परपुरुष' का संग किया। अनन्त अखण्ड महामहिम श्रीकृष्ण ही परम पुरुष हैं, परमात्मा हैं, ब्रह्म हैं। वसिष्ठ, अत्रि आदि पुरुष हैं, जीव हैं, पातिव्रत्यधर्मपूर्वक इनकी सेवासे फलरूपमें परम पुरुषकी प्राप्ति होती है, ये साधन हैं, वे साध्य; अरुन्धती आदि सतियाँ अभी आराधना करती हैं, पीछे हैं और गोपांगनाओंने फल प्राप्त कर लिया, उन्हें 'परपुरुष' की प्राप्ति हो गयी, वे कृतकृत्य हो गयीं। अतएव मन, बुद्धि, रोम-रोममें प्रविष्ट श्रीकृष्णकी शकटायती आदि अनुकृति-लीलाद्वारा गोपांगना परानन्दमें विलीन हुईं। दैत्यायित्वा जहारान्यामेका कृष्णार्भभावनाम्। रिङ्गयामास काप्यङ्घ्री कर्षन्ती घोषनिःस्वनैः॥ (श्रीमद्भा० १०।३०।१६) इसी लीलानुकरणमें एक गोपांगना श्रीश्यामसुन्दरकी भावनासे बालकृष्ण बन गयी। पाँवोंमें नूपुर पहन लिये, घुटनोंके बल चलने लगी। नूपुरके छोटे-छोटे घुँघुरूके घोषसे वह साशंक हो गयी। बालवत् किलकारी मारकर भाग उठी। अपनी ही पादस्थ नूपुर ध्वनिसे वह चकित हो गयी। नूपुरके रुचिर घोषसे स्तब्ध होकर वह पीछेकी ओर मुँह घुमाकर देखने लगी, यों भगवान् बालमुकुन्दके अनुकरणमें मग्न हो गयी। इसका अभिप्राय यह कि इस प्रकारकी तल्लीनतासे— तीव्रसंवेगवान् प्रेमसे निम्नकोटिके भी लोग उन पूर्ण पुरुषको प्राप्त कर सकते हैं। 'गोपालाङ्गणकर्दमेषु विहरन्' आदिसे भी यही ध्वनित होता है। यहाँकी लीला ही अद्भुत है। राजाधिराजस्वरूपकी अपेक्षा पार्थसारथिका भाव ही दूसरा है और इसकी अपेक्षा भी गोपालांगणकर्दम-विहारीका स्वरूप और भी उच्च है। कहीं ज्ञानवैराग्योदीप्त शान्त रस ही उत्कृष्ट माना जाता है, शृंगार रस उसके सामने निकृष्ट है। कहीं दाम्पत्यप्रेममें शृंगार रस ही उत्कृष्ट हो जाता है। इसके विपरीत औपपत्यमें वह रसाभास हो जाता है, परंतु

श्रीरामपञ्चाध्यायी ४४९ कहींपर यही औपपत्यादि आलम्बनादिके उत्कृष्ट अतएव अरुन्धती आदि सतियाँ इनकी पादपांसु चाहती होनेसे उत्कृष्ट माना जाता है, जैसे यही गोपांगनाओंका हैं। इनके अतिरिक्त कौन ऐसी युवति होगी, जो श्रीकृष्णविषयक प्रणयौत्कण्ठ्य, जिसके फलस्वरूप साक्षात् नारायणके दर्शन करके उनपर मुग्ध न हो। यह अनसूया, अरुन्धती-जैसी भी उनकी पादधूलिके लिये तो गोपांगनाओंकी ही विशेषता थी कि जो श्रीमन्नारायणके लालायित रहती हैं। गोपांगना यद्यपि पुंश्चली गिनी भी साक्षात् दर्शन करके उनसे भी श्रीश्यामसुन्दर- गयीं, पर वे थीं श्रीकृष्णकी - परम पुरुषकी संगिनी या सम्मिलनकी ही प्रार्थना की, यहाँ यह दिखाया गया कि पुंश्चली, अतएव उनका यह उत्कर्ष है, तभी तो जैसे महासम्राट के समक्ष इतरोंका ऐश्वर्य अभिव्यक्त श्रीकृष्ण परमात्मा भी उनके दास्यकी प्रार्थना करते हैं। नहीं होता, जैसे सूर्यके सामने चन्द्रनक्षत्रादि फीके पड़ कोई कितनी भी साध्वी-पतिव्रता होगी, वह भी जाते हैं, दीखते ही नहीं, वैसे ही महामहामाधुर्यके सामने भगवान्‌के ऐश्वर्य-माधुर्यपूर्ण नारायणस्वरूपपर मुग्ध समस्त ऐश्वर्य अस्त हो जाते हैं, प्रकट ही नहीं होते। हुए बिना नहीं रह सकती। अनसूया-जैसी भी भगवान् श्रीराधिकाजीमें पूर्णतम माधुर्यका प्रकाश नारायणके स्वरूपपर आसक्त हो गयी- यह भूषण ही प्रेमकी स्थिति प्राणिमात्रमें अणु-परिमाणमें, है, कोई दूषण नहीं। परंतु एक कथासे ज्ञात होता है कि पार्षदादिमें मध्यम परिमाणमें और महत्परिमाणमें कृष्णप्रणयिनी गोपांगना उसपर भी मुग्ध न हुईं। गोपांगनाओंमें थी। इसके अतिरिक्त श्रीराधिकाजीमें ऐश्वर्यभावसे भी अधिक माधुर्यभावकी वही प्रेम परममहत्परिमाणपरिमित था। पूर्णतम माधुर्यका महत्ता - लीलाका एक दृष्टान्त प्रकाश वहीं हुआ। वहींकी यह कथा प्रसिद्ध है कि एक बार श्रीश्यामसुन्दर गोपांगनाओंके साथ उसी निकुंजमें जहाँ गोपांगनाओंके सामने श्रीकृष्ण वासन्तिक रासोत्सव मना रहे थे। उसी समय सहसा नारायणरूपमें छिप गये, श्रीराधाजीके आते ही उनकी धोखा देकर वे एक कुंजमें छिप गये। गोपांगना ढूँढ़ती वह ऐश्वरी माया नहीं टिक सकी। उनका वह हुई वहीं जा पहुँचीं; क्योंकि वे अपने सौगन्ध्य- चतुर्भुजस्वरूप द्विभुज श्यामसुन्दरके रूपमें तुरंत प्रकट माधुर्यादिपूरको न छिपा सके, उसके लोभी भौंरे, मयूर हो गया। अतः यहाँ जितना-जितना लोकदृष्टिमें तथा हरिणांगनाओंका ताँता उधर ही बँध गया। अपकर्ष, उतना-ही-उतना प्रणय-पथमें उत्कर्ष सिद्ध श्रीश्यामसुन्दरने सोचा- 'ये तो आयी, अब क्या करें, होता है। इसी दृष्टिसे औपपत्यका भी उत्कर्ष है। अपनी तो यह निह्नुति-लीला (गोपन-लीला) ही जैसे जल और तरंगमें अन्य सम्बन्धकी कल्पना बिगड़ी।' दासीके समान पीछे-पीछे घूम रही ऐश्वर्यशक्तिकी नहीं- '....तरङ्गन वारि ज्यों....' वैसे ही बाहर- सहायतासे वे झटपट चतुर्भुजधारी नारायण बन गये ! भीतर गोपांगनाओंमें श्रीकृष्णतत्त्व विराजमान है। अन्वेषणक्रम-प्राप्त उन नारायणका गोपांगनाओंने दर्शन जलका और तरंगका अखण्ड सम्बन्ध है। इनमें किया, पर वह आकर्षण, वह औत्कण्ठ्य, वह आनन्द श्रीवृषभानुनन्दिनी राधारानी तो और भी अन्तरंग हैं, उन्हें नहीं प्राप्त हुआ, जो श्रीकृष्ण-सम्मिलनमें प्राप्त वे जलमें माधुर्यस्थानीया हैं। फिर वहाँ कैसा औपपत्य ? होता। परंतु फिर भी उन्होंने नम्रतासे प्रणाम किया। अतः औत्कण्ठ्यवृद्ध्यर्थ इनकी कल्पना है। ऐसे ही उन्हें वरदानोन्मुख देखकर वर माँगा- 'श्रीश्यामसुन्दर 'गोपालाङ्गणकर्दमेषु विहरन्' की कल्पना है। इन हमें शीघ्र मिल जायँ।' क्या श्रीनारायणमें भूषण- भगवल्लीलाओंकी अति साधारणतासे प्राणियोंको वसन-सौन्दर्यकी कमी थी ? पर उनके मनमें-हृदयमें विश्वास, आशा बँधती है कि हम दीनोंको भी उस विराजमान अद्भुत छवि श्रीश्यामसुन्दरकी मूर्तिके आगे तत्त्वका स्वरूपदर्शन सम्भव है। तथा च इन्हीं वह सब कुछ नहीं जँचा। इस दृष्टान्तसे इनकी दृष्टियोंसे 'पूतनायन्ती, कृष्णायन्ती', 'दैत्यायित्वा' अटलता, अनन्यता तथा प्रणयातिशय व्यक्त होता है। आदि श्रीब्रजसुन्दरीयोंकी सफल लीला-प्रकृति है।

द्वितीय खण्ड—देवोपासनातत्त्व गणपति-तत्त्व गणपति ब्रह्म ही हैं सर्वजगन्नियन्ता पूर्ण परमतत्त्व ही गणपति-तत्त्व है; क्योंकि 'गणानां पतिः गणपतिः।' 'गण' शब्द समूहका वाचक होता है—'गणशब्दः समूहस्य वाचकः परिकीर्तितः।' समूहोंका पालन करनेवाले परमात्माको गणपति कहते हैं। देवादिकोंके पतिको भी गणपति कहते हैं। अथवा 'महत्तत्त्वादितत्त्वगणानां पतिः गणपतिः।' अथवा 'निर्गुणसगुणब्रह्मगणानां पतिः गणपतिः', अथवा 'सर्वविध गणोंको सत्ता- स्फूर्ति देनेवाला जो परमात्मा है, वही गणपति है।' अभिप्राय यह कि 'आकाशस्तल्लिङ्गात्' इस न्यायसे जिसमें ब्रह्मतत्त्वके जगदुत्पत्तिस्थितिलयत्व, जगन्निय- न्तृत्व, सर्वपालकत्वादि गुण पाये जायें, वही ब्रह्म होता है। जैसे आकाशका जगदुत्पत्तिस्थितिकारणलीलत्व 'आकाशादेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते' इस श्रुतिसे जाना जाता है, इसलिये वह भी आकाशपदवाच्य परमात्मा माना जाता है, वैसे ही 'ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि। त्वमेव केवलं कर्तासि। त्वमेव केवलं धर्तासि। त्वमेव केवलं हर्तासि। त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।' इत्यादि 'श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष' वचनसे गणपति ब्रह्म ही हैं। अतीन्द्रिय, सूक्ष्मातिसूक्ष्म वस्तुतत्त्वका निर्णय केवल शास्त्रके ही आधारपर किया जा सकता है। जैसे शब्दकी अवगति श्रोत्रसे ही होती है, वैसे ही पूर्ण परमतत्त्वकी अवगति भी शास्त्रसे ही होती है। इसलिये 'तं त्वौपनिषदं पुरुषं पृच्छामि' 'शास्त्रयोनित्वात्' इत्यादि श्रुतिसूत्र तथा अनेकविध युक्तियोंसे भी यही सिद्ध होता है कि सर्वजगतकारण ब्रह्म शास्त्रैकसमधिगम्य है। यदि शास्त्रातिरिक्त अन्य प्रमाणोंसे वस्तुतत्त्वकी अवगति हो जाय तो शास्त्रके अनुवादकमात्र होनेसे उनका नैरर्थक्य-प्रसंग भी दुर्वार होगा, इसलिये गणपतितत्त्वकी अवगतिमें मुख्यतया शास्त्र ही प्रमाण है। शास्त्रानुसार यही जाना जाता है कि सर्वदृश्यजगत्का पति ही गणपति है; क्योंकि 'गण्यन्ते बुद्धयन्ते ते गणाः' इस व्युत्पत्तिसे सर्वदृश्यमात्र ही गण है और उसका जो अधिष्ठान है, वही गणपति है। कल्पितकी स्थिति, प्रवृत्ति अधिष्ठानसे ही होती है, अतः कल्पितका पति अधिष्ठान ही युक्त है। यद्यपि कहा जा सकता है कि तब तो भिन्न-भिन्न पुराणोंमें शिव, विष्णु, सूर्य, शक्ति आदि सभी ब्रह्मरूपसे विवक्षित हैं। जब कि ब्रह्मतत्त्व एक ही है तो उसके नाना रूप भिन्न-भिन्न पुराणोंमें कैसे पाये जाते हैं? इसका उत्तर यही है कि एक ही परमतत्त्व भिन्न-भिन्न उपासकोंकी भिन्न- भिन्न अभिलषित सिद्धिके लिये अपनी अचिन्त्य लीला-शक्तिसे भिन्न-भिन्न गुणगणसम्पन्न एवं नामरूपवान् होकर अभिव्यक्त होता है। जैसे भामनीत्व, सर्वकामत्व, सर्वरसत्व, सत्यसंकल्पत्वादिगुण-विशिष्ट ब्रह्मतत्त्वकी उपासना करनेसे उपासकोंको उपास्यविशेषण गुण ही फलरूपमें प्राप्त होते हैं, ठीक वैसे ही प्राधान्येन विघ्नविनाशकत्वादिगुणगणविशिष्ट गणपति- रूपमें वही परमतत्त्व आविर्भूत होता है। शास्त्रद्वारा ही गणपतिके ब्रह्मत्वका परिज्ञान यदि कहा जाय कि फिर इसी तरहसे बाह्याभिमत भिन्न-भिन्न देव भी ब्रह्मतत्त्व ही होंगे तथा इतना ही क्यों, जबकि सारा ही प्रपंच ब्रह्मतत्त्व है, तब गणपति ही क्यों विशेषरूपसे ब्रह्म कहे जायें? इसका उत्तर यही है कि यद्यपि अधिष्ठानरूपसे बाह्याभिमत देव तथा तत्तद्वस्तु सकल ब्रह्मरूप कहे जा सकते हैं तथापि तत्तद्गुणगणविशिष्टरूपसे ब्रह्मत्व तो केवल शास्त्रसे ही जाना जा सकता है; अर्थात् शास्त्र ही जिन-जिन नामरूपगुणयुक्त तत्त्वोंको ब्रह्म बतलाते हैं, वे ही ब्रह्म हो सकते हैं; क्योंकि यह कहा जा चुका है कि 1982 Bhaktisudha_Section_16_1_Back

गणपति-तत्त्व ४५१ अतीन्द्रिय वस्तुका ज्ञान करानेमें एकमात्र शास्त्र ही प्रमाण हो सकता है। शास्त्र मुख्यरूपसे वेद और वेदानुसारी स्मृतीतिहासपुराणादि ही हैं, यह बात आगे पूर्णरूपसे विवेचित की जायगी। शास्त्र गणपतिको पूर्ण परब्रह्म बतलाते हैं। पूर्वोक्त 'श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष' श्रुतिमें गणपतिको 'त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि'—ऐसा कहा गया है। उसका अभिप्राय यह है कि गणपतिके स्वरूपमें नर तथा गज—इन दोनोंका ही सामंजस्य पाया जाता है। यह मानो प्रत्यक्ष ही परस्परविरुद्धसे प्रतीयमान 'तत्पदार्थ' तथा 'त्वं पदार्थ' के अभेदको सूचित करता है; क्योंकि तत्पदार्थ सर्वजगत्कारण सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमात्मा होता है एवं त्वं पदार्थ अल्पज्ञ अल्पशक्तिमान् जीव होता है। उन दोनोंका ऐक्य यद्यपि आपात-विरुद्ध है तथापि लक्षणासे विरुद्धांश-द्वयका त्यागकर एकता सुसम्पन्न होती है। तद्वत् लोकमें यद्यपि नर और गजका ऐक्य असम्मत है तथापि लक्षणासे विरुद्धधर्माश्रय भगवान्‌में उसका सामंजस्य है अथवा जैसे तत्पद-लक्ष्यार्थ सर्वोपाधि- निष्कृष्ट 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' एवं लक्षणालक्षित ब्रह्म है, वैसे ही त्वं पदार्थ जगन्मय सोपाधिक ब्रह्म है। इन दोनोंका अखण्डैकरस, 'असि' पदार्थमें सामंजस्य है। इसी तरह नर और गजस्वरूपका सामंजस्य गणपतिस्वरूपमें है। 'त्वं'-पदार्थ नर-स्वरूप है तथा 'तत्'-पदार्थ गजस्वरूप है एवं अखण्डैकरस गणपतिरूप 'असि' पदार्थमें इन दोनोंका सामंजस्य है। गणेशजीके विविध नामों तथा आयुधों आदिका स्वरूप शास्त्रोंमें नरपदसे प्रणवात्मक सोपाधिक ब्रह्म कहा गया है—'नराज्जातानि तत्त्वानि नाराणीति विदुर्बुधाः'। गजशब्दार्थका विवेचन शास्त्रोंमें ऐसा किया गया है—'समाधिना योगिनो गच्छन्ति यत्र इति गः, यस्माद् बिम्बप्रतिबिम्बवत्तया प्रणवात्मकं जगज्जायते इति जः।' समाधिसे योगी लोग जिस परमतत्त्वको प्राप्त करते हैं, वह 'ग' है और

'वर' है। भगवान् गणपतिका वाहन 'मूषक' है। 'मूषक' सर्वान्तर्यामी, सर्वप्राणियोंके हृदयरूप बिलमें रहनेवाला, सर्वजन्तुओंके भोगोंको भोगनेवाला ही है। वह चोर भी है; क्योंकि जन्तुओंके अज्ञात सर्वस्वको हरनेवाला है। उसको कोई जानता नहीं; क्योंकि मायासे गूढ़रूप अन्तर्यामी ही समस्त भोगोंको भोगता है। इसीलिये उसे 'भोक्तारं यज्ञतपसाम्' कहा गया है। 'मुष् स्तेये' इस धातुसे मूषक शब्द बनता है। जैसे मूषक प्राणियोंकी सर्वभोग्य वस्तुओंको चुराकर भी पुण्य-पापोंसे विवर्जित ही रहता है, वैसे ही मायागूढ़ सर्वान्तर्यामी भी सर्वभोग्यको भोगता हुआ पुण्य-पापोंसे विवर्जित है। वह सर्वान्तर्यामी गणपतिकी सेवाके लिये मूषकका रूप धारणकर वाहन बना— मूषकं वाहनाख्यं च पश्यन्ति वाहनं परम्। तेन मूषकवाहोऽयं वेदेषु कथितोऽभवत्॥ मुष् स्तेये तथा धातुः ज्ञातव्यः स्तेयब्रह्माधुक्। नामरूपात्मकं सर्वं तत्रासद् ब्रह्म वर्तते॥ भोगेषु भोगभोक्ता च ब्रह्माकारेण वर्तते। अहङ्कारयुतास्तं वै न जानन्ति विमोहिताः॥ ईश्वरः सर्वभोक्ता च चोरवत्तत्र संस्थितः। स एव मूषकः प्रोक्तो मनुजानां प्रचालकः॥ भगवान् गणेश 'लम्बोदर' हैं; क्योंकि उनके उदरमें ही समस्त प्रपंच प्रतिष्ठित है और वे स्वयं किसीके उदरमें नहीं हैं। तथा च—'तस्योदरात्समुत्पन्नं नाना विश्वं न संशयः।' भगवान् 'शूर्पकर्ण' हैं; क्योंकि योगीन्द्र- मुखसे वर्ण्यमान तथा उत्तम जिज्ञासुओंसे श्रूयमाण, अतः हृद्गत होकर शूर्पके समान पाप-पुण्यरूप रजको दूर करके ब्रह्मप्राप्ति सम्पादित कर देते हैं— रजोयुक्तं यथा धान्यं रजोहीनं करोति च। शूर्पं सर्वनराणां वै योग्यं भोजनकाम्यया॥ तथा मायाविकारेण युतं ब्रह्म न लभ्यते। त्यक्तोपासनकं तस्य शूर्पकर्णस्य सुन्दरि॥ शूर्पकर्णं समाश्रित्य त्यक्त्वा मलविकारकम्। ब्रह्मैव नरजातिस्थो भवेत्तेन तथा स्मृतः॥ गणेशजी 'ज्येष्ठराज' हैं। सर्व-ज्येष्ठों (बड़ों)- के अधिपति या सर्व-ज्येष्ठ जो ब्रह्मादि हैं, उनके बीचमें वे विराजमान हैं। वे ही गणेशजी शिव-पार्वतीके तपसे प्रसन्न होकर पार्वती-पुत्रके रूपमें प्रादुर्भूत हुए हैं। गणपति, श्रीकृष्ण, शिव आदि एक ही तत्त्व हैं श्रीरामचन्द्र और श्रीकृष्णचन्द्र जैसे दशरथ एवं वसुदेवके पुत्ररूपमें प्रादुर्भूत होकर भी उनसे अपकृष्ट नहीं हैं, वैसे ही भगवान् गणेश शिव-पार्वतीसे उत्पन्न होकर भी उनसे अपकृष्ट नहीं हैं, अतएव उनकी शिव-विवाहमें विद्यमानता और पूज्यता होना कोई आश्चर्य नहीं है। 'ब्रह्मवैवर्तपुराण' में लिखा है कि पार्वतीके तपसे गोलोक-निवासी पूर्ण परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्ण ही गणपतिरूपसे प्रादुर्भूत हुए हैं। अतः गणपति, श्रीकृष्ण, शिव आदि एक ही तत्त्व हैं। इसी गणपति-तत्त्वको सूचित करनेवाला ऋग्वेद (२।२३।१)-का यह मन्त्र है— 'गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपम- श्रवस्तमम्। ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम्॥' इससे मिलता-जुलता ही गणपति-स्तावक मन्त्र यजुर्वेद (२३।१९)-में भी है। 'गणानां त्वा गणपतिँ हवामहे' इत्यादि। ऋग्वेदके मन्त्रका सर्वथा गणपतिस्तुतिमें ही तात्पर्य है। यजुर्वेदगत मन्त्रका विनियोग यद्यपि अश्वस्तवनमें है तथापि केवल अश्वमें मन्त्रोक्त-गुण अनुपपन्न होनेसे अश्वमुखेन गणपतिकी ही स्तुति इस मन्त्रसे होती है। मन्त्रार्थ इस तरह है—'हे वसो! वसति सर्वेषु भूतेषु व्यापकत्वादिति, तत्सम्बुद्धौ। गणानां महदादीनां, ब्रह्मादीनाम् अन्येषां वा समूहानाम्। गणीरूपेण, साक्षिरूपेण, ज्ञेयाधिष्ठान- रूपेण वा। 'गण' संख्याने इत्यस्माद् गण्यते बुद्ध्यते, योगिभिः साक्षात्क्रियते यः स गणस्तद्रूपेण वा पालकम्, एतादृशं त्वां आवाहयामहे। तथा प्रियाणां वल्लभानां, प्रियपतिं प्रियस्य पालकम्। तच्छेषतयैव सर्वस्य प्रेमास्पदत्वात्। 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवतीति' श्रुतेः। निधीनां सुखनिधीनां,

सुखनिधेः पालकं त्वां हवामहे आवाहयामहे। मदन्तःकरणे प्रादुर्भूय स्वस्वरूपानन्दसमर्पणेन ममापि पतिर्भूयाः। पुनः हे देव! अहन्ते गर्भधम् अजायां प्रकृतौ चैतन्य-प्रतिबिम्बात्मकं गर्भं दधातीति गर्भधं बिम्बात्मकं चैतन्यम्, (तथा च—'मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भं दधाम्यहमिति' भगवत्स्मरणात्) आ-आकृष्य योगबलेन, अजानि- स्वहृदि स्थाप्यानि, त्वं च मम हृदि अजासि-क्षिपसि स्वस्वरूपं स्थापयसि।' अधिकारी उपासक गणपतिकी प्रार्थना करता है—हे सर्वान्तर्यामिन्! देवादिसमूहोंके अधिष्ठान तथा साक्षीरूपसे, प्रियोंको प्रियरूपसे, लौकिक प्रेमास्पदोंको परमप्रेमास्पद-रूपसे, लौकिक सुखराशियोंको अलौकिक परमानन्दसे पालन करनेवाले अर्थात् अपने अंशसे सम्पादन करनेवाले आपका मैं पतिरूपसे आवाहन करता हूँ। आप मेरा भी स्वरूपानन्द-समर्पणद्वारा पालन करें। जगदुत्पादनार्थ प्रकृतिरूप योनिमें स्वकीय चैतन्यप्रतिबिम्बात्मकरूप गर्भको धारण करनेवाले बिम्बचैतन्यरूपको मैं अपने हृदयमें विशुद्धान्तःकरणसे धारण करूँ, एतदनुकूल अनुग्रह करें। ऐसी प्रार्थना है। सर्वविघ्नोंके विनाशक गणेशकी आदिपूज्यता इस तरह मन्त्र-प्रतिपाद्य गणपतितत्त्व सर्वविघ्नोंका विनाशक है। अतएव 'श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष' के एक मन्त्रमें 'विघ्नविनाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमो नमः' ऐसा आया है। सायणाचार्यने इसका व्याख्यान करते हुए कहा है—'समयकालात्मक- भयहारिणे, अमृतात्मकपदप्रदत्वात्' अर्थात् गणेशजी कालात्मक भयको हरण करनेवाले हैं; क्योंकि वे अमृतात्मकपदप्रद हैं। 'स्कन्द' तथा 'मौद्गल पुराण' में विनायक-माहात्म्य-विषयक एक ऐसी गाथा है— किसी समय राजा अभिनन्दनने इन्द्रभागशून्य एक यज्ञ आरम्भ किया। यह जानकर इन्द्र कुपित हुआ। उसने कालको बुलाकर यज्ञ-भंगकी आज्ञा दी। कालपुरुष यज्ञको भंग करनेके लिये विघ्नासुररूपमें प्रादुर्भूत हुआ। जन्ममृत्युमय जगत् कालके अधीन है। काल तीनों लोकोंको भ्रमण कराता है। ब्रह्मज्ञानी पुरुष कालको जीतकर अमृतमय हो जाते हैं। ब्रह्मज्ञानका साधन वैदिक स्मार्त सत्कर्म है। 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥' सत्कर्मसे विशुद्धान्तःकरण पुरुषको भगवत्तत्त्व-साक्षात्कार होता है और उससे ही कालकी पराजय होती है। यह जानकर काल उस सत्कर्मके नाशके लिये विघ्नरूप होकर प्रादुर्भूत हुआ। सत्कर्महीन जगत् सदा ही कालके अधीन रहता है। इसीलिये कालस्वरूप विघ्नासुर राजा अभिनन्दनको मारकर जहाँ- तहाँ दृश्यादृश्यरूपसे सत्कर्मका खण्डन करने लगा, उस समय वसिष्ठादि मुनि भ्रान्त हो ब्रह्माकी शरणमें गये और उनकी आज्ञासे भगवान् गणपतिकी स्तुति की; क्योंकि गणपतिको छोड़कर किसी भी देवतामें कालनाश- सामर्थ्य नहीं है। गणेशजी असाधारण विघ्नविनाशकत्व गुणसे सम्पन्न हैं, यह बात श्रुति, स्मृति, शिष्टाचार तद्वाक्य एवं श्रुतार्थापत्तिसे अवगत है। श्रीगणेशजीसे विघ्नासुर पराजित होकर उनकी शरणमें गया और उनका आज्ञावशवर्ती हुआ। अतएव गणेशजीका नाम विघ्नराज भी है। उसी समयसे गणेशपूजन-स्मरणरहित जो भी सत्कर्म होता है, उसमें विघ्नका प्रादुर्भाव अवश्य होता है। इसी नियमसे विघ्न भगवान्के आश्रित रहने लगा। विघ्न भी कालरूप होनेसे भगवत्स्वरूप है। 'विशेषेण जगत्सामर्थ्यं हन्तीति विघ्नः।' ब्रह्मादिकोंमें भी जगत्सर्जनादि-सामर्थ्यको हनन करनेवालेको विघ्न कहते हैं। अभिप्राय यह है कि ब्रह्मादि त्रिदेव कार्यब्रह्म कोटिके जब मान्य हैं, तब सृष्टि-सर्जन, रक्षण और संहरणरूप उनके कार्य विघ्नसे अभिभूत होते हैं; अतः वे जगत्सर्जनादिमें पूर्ण स्वतन्त्र सिद्ध नहीं होते। किंतु गणेशके अनुग्रहसे ही विघ्नविरहित होकर कार्यकारणक्षम होते हैं। विघ्न और विनायक—ये दोनों ही भगवान् होनेके कारण स्तुत्य हैं। अतएव 'भगवन्तौ विघ्न- विनायकौ प्रीयेताम्' ऐसा पुण्याहवाचनमें लिखा है। विघ्न गणेशके अतिरिक्त और किसीके वशमें नहीं है, जैसा कि 'योगवासिष्ठ' में शाप देनेको उद्यत भृगुके प्रति विघ्नरूप कालने कहा है—

४५४ भक्तिसुधा


मा तपः क्षपयाबुद्धे कल्पकालमहानलैः। यो न दग्धोऽस्मि मे तस्य किं त्वं शापेन धक्ष्यसि ॥ संसारावलयो ग्रस्ता निगीर्णा रुद्रकोटयः। भुक्तानि विष्णुवृन्दानि क्व न शक्ता वयं मुने ॥ इससे सिद्ध हुआ कि गणेश-स्मरणहीन सभी निःश्रेयस-साधन सत्कर्मोंमें कालरूप विघ्नका प्रादुर्भाव होना अनिवार्य है। अतः विघ्नोंके निवारणके लिये गणेश-स्मरण सभी सत्कर्मोंमें आवश्यक है। यदि कहा जाय कि ओंकार ही सर्वमंगलमय है, वेदोक्त समस्त कर्म-उपासनाओंके आदिमें ओंकारका ही स्मरण किया जाता है, इसलिये गणेश-स्मरण निरर्थक है। तो यह ठीक नहीं, क्योंकि ओंकार भी सगुण गणेश- स्वरूप ही है। 'मौद्गलपुराण' में भी कहा है— 'गणेशस्यादिपूजनं चतुर्विधं चतुर्मूर्तिधारकत्वात्।' ब्रह्माके चारों मुखोंसे अष्टलक्ष श्लोकात्मक पुराणोंका प्रादुर्भाव हुआ। उसके पश्चात् द्वापरान्तमें व्यासदेवने कलियुगीय मन्दमति प्राणियोंके बोधार्थ अष्टादश पुराणोपपुराणोंका निर्माण किया। उनमें पहला 'ब्रह्मपुराण' है, उसमें निर्गुण एवं बुद्धितत्त्वसे परे गणेश- तत्त्वका वर्णन है। अन्तिम 'ब्रह्माण्डपुराण' है, उसमें सगुण गणेशका माहात्म्य प्रतिपादित है; क्योंकि वह विशेषरूपसे प्रणवात्मक प्रपंचका प्रतिपादन करनेवाला है। उपपुराणोंमें भी पहला 'गणेशपुराण' है, जो कि सगुण-निर्गुण गणेशकी एकताका प्रतिपादन करनेवाला है और गजवदनादिमूर्तिधर गणेशका भी प्रतिपादन करता है। यहाँपर जो यह कहा जाता है कि उपपुराण अपकृष्ट हैं, यह ठीक नहीं है; क्योंकि जैसे उपेन्द्र इन्द्रसे अपकृष्ट नहीं, वैसे ही पुराणापेक्षया उपपुराण अपकृष्ट नहीं। 'मौद्गल' अन्तिम उपपुराण है। उसमें योगमय गणेशका माहात्म्य प्रतिपादित है। इस तरह वेद, पुराण, उपपुराण आदिके भी आदिमें, मध्यमें और अन्तमें गणेश-तत्त्वका प्रतिपादन मिलता है। इतना ही क्यों, ब्रह्म-विष्णु आदि भी गणेशांश होनेसे ही शास्त्र-प्रतिपाद्य हैं। कोई लोग बुद्धिस्थ चिदात्मरूप गणेशका स्मरण करके सत्कर्म करते हैं, कोई प्रणवस्मरणपूर्वक सत्कर्म करते हैं, कोई गज-वदनाद्यवयव-मूर्तिधर गणेशका स्मरण करते हैं एवं कोई योगमय गणपतिका स्मरण करते हैं। इस तरह सभी शुभकार्योंके आरम्भमें येन-केनचिद्रूपेण (किसी न किसी रूपमें) गणेशस्मरण देखा जाता है। मरणासन्नावस्था तथा श्राद्ध आदिमें भी गणेश-स्मरण आवश्यक कोई कहते हैं कि प्राण-प्रयाणके समय एवं पितृ-यज्ञादिमें गणेश-स्मरण प्रसिद्ध नहीं है, यह ठीक नहीं; क्योंकि गया-स्थित गणेश-पद पितृ-मुक्ति देनेवाला है। वेदोक्त पितृ-यज्ञारम्भमें गणेश-पूजनका निषेध नहीं है। अतः वहाँ भी गणेश-पूजन होता है और होना युक्त है, इसीलिये श्रुति गणाधिपतिको ज्येष्ठराज पदसे सम्बोधित करती है। 'गणेशपुराण' में त्रिपुर-वधके समय शिवजीने कहा है— शैवैस्त्वदीयैरथ वैष्णवैश्च शाक्तैश्च सौरैरथ सर्वकार्ये। शुभाशुभे लौकिकवैदिके च त्वमर्चनीयः प्रथमं प्रयत्नात्॥ 'गणेश-गीता' में मरण-कालमें भी गणेश- स्मरण कहा है— यः स्मृत्वा त्यजति प्राणमन्ते मां श्रद्धयान्वितः। स यात्यपुनरावृत्तिं प्रसादान्मम भूभुज॥ 'गणेशोत्तरातापिनी' में भी कहा है— ॐ गणेशो वै ब्रह्म तद्विद्यात्। यदिदं किञ्च सर्वं भूतं भव्यं जायमान च तत् सर्वमित्याचक्षते॥ इस तरह यह सिद्ध हुआ कि पूर्ण परब्रह्म परमात्मा ही निर्गुण एवं विघ्नविनाशकत्वादि-गुणगणविशिष्ट, गजवदनादि-अवयव-मूर्तिधरके रूपमें श्रीगणेश हैं। क्या गणेशजी अनार्योंके देव हैं ? आजकल कुछ ग्रन्थचुम्बक पण्डितम्मन्य पाश्चात्योंके शिष्य होकर बाह्य कुसंस्कार-दूषितान्तः- करण सुधारक श्रीगणेशतत्त्वपर ऊटपटाँग विचार करनेका साहस कर बैठते हैं। वे अपने गुरुओंके विपरीत भला कितना विचार कर सकते हैं? उनका

गणपति-तत्त्व ४५५ कहना है कि पहले गणेशजी आर्योंके देवता नहीं थे। किंतु एतद्देशीय अनार्योंको पराजित करनेपर उनके सान्त्वनार्थ गणेशको आर्योंने अपने देवताओंमें मिला लिया है। इस ढंगके विद्वान् कुछ पुराण, कुछ वेदमन्त्र, कुछ चौपाइयोंका संग्रहकर अपनी अनभिज्ञताका परिचय देते हुए ऐसे गणपतिस्वरूपका वर्णन करते हैं कि जिससे शास्त्रीय गणपति-स्वरूप समाच्छन्न हो जाता है। यद्यपि थोड़ा-सा भी तत्त्वज्ञान रखनेवाले पुरुषके लिये ऐसे असम्बद्धप्रलाप हेय ही हैं तथापि मूर्खोंको तो उनसे व्यामोह होना स्वाभाविक ही है। कोई इन महानुभावोंसे पूछे कि गणेश नामका कोई तत्त्व है, यह आपने कैसे जाना? पुराणादि शास्त्रोंद्वारा या यत्र-तत्र गणपतिकी मूर्तियोंको देखकर? यदि शास्त्रोंसे ही गणेश-तत्त्व समझा जाय, तो फिर गणेशको अनार्योंके देव कैसे कहा जाय; क्योंकि शास्त्रोंसे तो वे ब्रह्मादिके पूज्य पाये जाते हैं। रही दूसरी बात मूर्तियोंको देखकर जाननेकी तो फिर प्रश्न होगा कि 'ये मूर्तियाँ किस आधारपर बनीं?' वे तो शास्त्रोक्त ध्यानानुकूल ही बनी हैं। यदि इसे उचित न मानें तो गणपतिको देवता या पूज्य समझना केवल मूर्खता ही है। कारण यह है कि केवल काष्ठमृत्पाषाणादिको कौन अभिज्ञजन पूज्य समझेगा? यदि कहा जाय कि अदृश्य शक्तिविशेषका उस मूर्तिमें आवाहनकर उसका पूजन किया गया है, तो भी वह विशिष्ट देवशक्ति किस प्रमाणसे पहचानी या आहूत की गयी है? इसके उत्तरमें यदि यह कहा जाय कि यह बात शास्त्रोंसे ही जानी गयी तो फिर शास्त्रोंने तो गणेश-तत्त्वको अनादि ईश्वर कहा ही है। अतः वे अनार्योंके देवता कैसे हुए? एक दूसरी विलक्षण बात यह है कि शास्त्रोंके ही आधारपर गणेशको अनार्याभिमत देव समझना और आर्योंका कहीं बाहरसे यहाँ आना, भारतवर्षमें प्राथमिक अनार्योंका निवास और अनार्योंके देवता गणेशका आर्योंद्वारा ग्रहण! भला, ऐसी बेसिर-पैरकी बातें अनार्य शिष्योंके सिवा और किसको सूझ सकती हैं? भला, कोई भी सहृदय पुरुष वेद-पुराणादि शास्त्रोंको मानता हुआ भी क्या गणेशका अनार्यदेवत्व स्वीकार कर सकता है? वस्तुतः यह सब दूषित संस्कारों एवं आचार-शून्य मनमाने शास्त्रोंके पुस्तकीय ज्ञानका ही कुफल है। इसीलिये वे ज्ञानलवदुर्विदग्ध अनभिज्ञोंसे भी शोचनीय समझे जाते हैं। इसी कारणसे अपने यहाँ किसी भी सच्छास्त्रके अध्ययनका यही नियम है कि आचार्य-परम्परासे शास्त्रीय गूढ़ रहस्योंको समझना चाहिये और परस्परविरोधी प्रतीत होनेवाले वाक्योंका समन्वय करना चाहिये। ऐसा न होनेसे ही श्रीगणपतिकी भिन्न-भिन्न लीलाएँ प्राणियोंको मोहित करनेवाली होती हैं। जैसे उनका नित्यत्व, पार्वती-पुत्रत्व, शनिके दृष्टिपातसे शिरश्छेद और गजवदनका सन्धान आदि। ये सब बातें केवल गणपतिके ही विषयमें नहीं, अपितु श्रीरामचन्द्र आदिके विषयमें भी हैं। जैसे अजत्व और जायमानत्व, नित्यमुक्तत्व और सीता- विरहमें रोदनादि। इसीलिये गोस्वामी श्रीतुलसीदासजीने कहा है— राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे॥ वस्तुतः जिन्होंने भगवान्‌की अघटनघटनापटीयसी मायाका महत्त्व नहीं समझा, उन्हें अचिन्त्यमहामहिम वैभवशाली भगवान्‌की निर्गुण तथा सगुण लीलाओंका ज्ञान कैसे हो? 'अन्तरजायमानो बहुधा वि जायते।' (यजु० ३१।१९) 'मत्स्थानि सर्वभूतानि' (गीता ९।४) 'न च मत्स्थानि भूतानि' (गीता ९।५) —इत्यादिका अभिप्राय कैसे विदित हो? सगुण लीला तो निर्गुणकी अपेक्षा भी भावुकोंकी दृष्टिमें दुरवगाह्य है— निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ। सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ॥ (रा०च०मा० ७।७३ (ख))

४५६ भक्तिसुधा इसलिये गोस्वामीजीने कहा है कि अनादि देवता समझकर गणेशादिके रूपभेद, शिवपूज्यता आदि अंशोंमें संशय न करें—'कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥' फिर जब बड़े-से- बड़े तार्किकोंका तर्क भौतिक भावोंमें ही कुण्ठित हो जाता है, तब व्याप्ति या हेतु तथा हेत्वाभासके ज्ञानसे शून्य आधुनिक विद्वानोंको देवता या ईश्वरके विषयमें तर्क करनेका क्या अधिकार है? वे महानुभाव यदि तर्कके स्वरूपका भी ठीक-ठीक निरूपण कर सकें, तो उन्हें यह पता लग सकेगा कि धर्म तथा देवतापर तर्क कुछ काम कर सकता है या नहीं? भला यदि इनसे कोई पूछे कि यह आपने कैसे अनुमान किया कि गणेश अनार्योंके देवता हैं और आदि भारतवासी अनार्य ही हैं? क्या कोई अव्यभिचरित-हेतु इसका आपके पास है? तो ये लोग सिवा अटकलपच्चू कल्पित मिथ्या इतिहासके और क्या बतला सकते हैं? परंतु यदि इनके भ्रमपूर्ण निराधार आधुनिक इतिहास मान्य हैं तो प्राचीन आध्यात्मिक गम्भीर भावपूर्ण हमारे इतिहास क्यों मान्य नहीं? अस्तु, आस्तिकोंको पूर्वोक्त प्रमाणोंसे निर्धारित गणपति-तत्त्वका श्रद्धासहित समस्त कर्मोंमें आराधन अवश्य करना चाहिये। पारलौकिक तत्त्व-निर्धारणमें एकमात्र शास्त्र ही आदरणीय है। इसीलिये भगवान्‌ने गीता (१६।२४)-में कहा है— तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ भगवान् सूर्य—हमारे प्रत्यक्ष देवता सभी प्राणियोंको जन्मसे ही भगवान् सूर्यके दर्शन होते हैं। ये सर्वप्रसिद्ध देवता हैं। अन्य किसी देवताकी स्थितिमें कुछ सन्देह भी हो सकता है, किंतु भगवान् सूर्यकी सत्तामें किसीको सन्देहके लिये कोई अवसर ही नहीं है। सभी लोग इनका प्रत्यक्ष (साक्षात्कार) प्राप्त करते हैं। 'सृ गतौ' अथवा 'षू प्रेरणे' से क्यप् प्रत्यय होनेपर 'सूर्य' शब्द निष्पन्न होता है। 'सरति आकाशे— इति सूर्यः'—जो आकाशमें निराधार भ्रमण करता है अथवा 'सुवति कर्मणि लोकं प्रेरयति'—जो (उदयमात्रसे) अखिल विश्वको अपने-अपने कर्ममें प्रवृत्त कराता है, वह सूर्य है। व्याकरण-शास्त्रमें इसी अर्थमें—'राजसूयसूर्यमृषोद्यरुच्यकुप्यकृष्टपच्या- व्यथ्याः' (पा० सू० ३।१।११४) इस पाणिनि- सूत्रसे निपातन होकर भी सूर्य शब्द बनता है। अखिल विश्वमें प्रकाश देनेवाला, अनन्त तेजका भण्डार-मण्डल ही सूर्य शब्दका वाच्यार्थ है और इसका लक्ष्यार्थ है—मण्डलाभिमानी पुरुष—चेतन- आत्मा तथा उसका अन्तर्यामी। ऋग्वेदसंहिता कहती है— 'सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च' (१।११५।१) अर्थात्—'भगवान् सूर्य सभी स्थावर-जंगमात्मक विश्वके अन्तरात्मा हैं।' 'कालात्मा पुरुष भी सूर्य ही हैं।' ऋग्वेदसंहिताका वचन है— सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्र- मेको अश्वो वहति सप्तनामा। त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वा भुवनाधि तस्थुः ॥ (१।१६४।२) अर्थात् इस कालात्मा पुरुषका रथ बहुत ही विलक्षण है। रंहणस्वभाव (गमनशील) होनेके कारण उसे रथ कहा जाता है। वह अनवरत (सतत) गमन किया करता है। उस रथमें संवत्सरात्मा एक ही चक्र है। अहोरात्रके निर्वाहके लिये (अहोरात्रके स्वरूप- निर्माणके लिये) उसमें सात अश्व जोड़े जाते हैं— 'रथस्यैकं चक्रं भुजगयमिताः सप्त तुरगाः।' ये सात अश्व ही सात दिन हैं। वस्तुतः अश्व एक ही

भगवान् सूर्य—हमारे प्रत्यक्ष देवता ४५७ है, किंतु सात नाम होनेके कारण सात अश्व कहे जाते हैं। उस एक चक्रमें ही (भूत, भविष्य और वर्तमान) ये तीन नाभियाँ हैं। वह रथ अजर-अमर (जरा- मरणसे रहित) अर्थात् अविनाशी है एवं अनर्व अर्थात् अत्यन्त दृढ़ है अर्थात् कभी शिथिल नहीं होता। इसी कालात्मा पुरुषके सहारे पिण्डज, अण्डज, स्थावर, ऊष्मज सभी प्रकारके प्राणी टिके हुए हैं। ऐसे रथपर स्थित इन भुवनभास्करको देखकर (समझकर) मनुष्य पुनर्जन्म नहीं पाता—मुक्त हो जाता है— 'रथस्थं भास्करं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते।' शतपथब्राह्मणमें भगवान् सूर्यको त्रयीमय कहा गया है—'यदेतन्मण्डलं तपति तन्महदुक्थं ता ऋचः स ऋचां लोकोऽथ यदेतदर्चिर्दीप्यते तन्महाव्रतं तानि सामानि स साम्नां लोकोऽथ य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः सोऽग्निस्तानि यजूंषि स यजुषां लोकः ॥' (१०।५।२।१) इस श्रुतिमें भगवान् सूर्यके दिव्य गृहस्थानीय मण्डलकी स्तुति की गयी है। मण्डलकी स्तुतिसे मण्डलाभिमानी पुरुष और उसकी स्तुतिसे अन्तर्यामीकी स्तुति स्वभावतः सिद्ध है। यह जो सर्वप्राणिनेत्रगोचर आकाशका भूषण वर्तुलाकार मण्डल है, वह महदुक्थ (बृहती सहस्र नामसे प्रसिद्ध होत्रमें शस्त्रविशेष) है तथा वही ऋक् है। जो इस मण्डलमें अर्चि (सर्वजगत्- प्रकाशक तेज) है, वह 'महाव्रत' नामक क्रतु (यज्ञकर्म) विशेष है और बृहत्-रथन्तर आदि साम भी वही है तथा जो मण्डलाभिमानी पुरुष है, वह अग्नि (अर्थात् अग्न्युपलक्षित सर्वदेव) है तथा यजुष् भी वही पुरुष है। अपने तेजसे तीनों लोकोंको पूरित करनेके कारण वह पुरुष है—'आ प्रा द्यावा पृथिवी अन्तरिक्षम्' अथवा सभी प्राणियोंके शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण वह पुरुष है—'सर्वासु पूर्षु शेषे' (श० ब्रा० १४।२।५।१८) अथवा सभी पापोंको भस्म कर देनेके कारण वह पुरुष है—'सर्वान् पाप्मन औषत्त- स्मात्पुरुषः' (श० ब्रा० १४।१।२।२)। छान्दोग्य- उपनिषद्में इस पुरुषका वर्णन किया गया है— 'य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ।... स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद (छा० उ० १।६।६- ७)। श्रुति भी आदित्यरूपमें इसी अन्तर्यामी पुरुषका वर्णन कर रही है। 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' (ब्र० सू० १।१।२०)—इस ब्रह्मसूत्रमें भी यह निर्णय किया गया है कि इस छान्दोग्यश्रुतिमें प्रतिपादित पुरुष अन्तर्यामी है। इस प्रकार भगवान् सूर्य सर्वदेवमय हैं—'तस्मा- त्परमेश्वर एवेहोपदिश्यते इत्यादि' (शांकरभाष्य) गायत्री-उपासना सर्वदेवमय आदित्यकी उपासना है श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणके युद्धकाण्डमें आदित्य- हृदयस्तोत्रके द्वारा इन्हीं भगवान् सूर्यकी स्तुति की गयी है। उसमें कहा गया है कि ये ही भगवान् सूर्य ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द और प्रजापति हैं। महेन्द्र, कुबेर, वरुण, काल, यम, सोम आदि भी ये ही हैं— एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः। महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपाम्पतिः ॥ आपत्तिके समयमें, भयंकर विषम परिस्थितिमें, जनशून्य अरण्यमें, अत्यन्त भयदायी घोर समयमें अथवा महासमुद्रमें इनका स्मरण, कीर्तन और स्तुति करनेसे प्राणी सभी विपत्तियोंसे छुटकारा पा जाता है— एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च। कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥ तीनों सन्ध्याओंमें गायत्री-मन्त्रद्वारा इन्हींकी उपासना की जाती है। इनकी अर्चनासे सबकी मनःकामनाएँ पूर्ण होती हैं। भगवान् श्रीरामने युद्धक्षेत्रमें इनकी आराधना करके रावणपर विजय प्राप्त की थी। इनका स्तोत्र 'आदित्यहृदय' वरदानी है, अमोघ है। उसके द्वारा इनकी स्तुति करनेसे सभी आपदाओंसे छुटकारा पाकर प्राणी अन्तमें परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है।

४५८ भक्तिसुधा श्रीशिव-तत्त्व भगवान् शिव—समस्त प्राणियोंके विश्रामस्थान शिव वही तत्त्व है, जो समस्त प्राणियोंके विश्रामका स्थान है। 'शीङ् स्वप्ने' धातुसे 'शिव' शब्दकी सिद्धि है। 'शेरते प्राणिनो यत्र स शिवः'— अनन्त पाप-तापोंसे उद्विग्न होकर विश्रामके लिये प्राणी जहाँ शयन करें, बस उसी सर्वाधिष्ठान, सर्वाश्रयको शिव कहा जाता है। वैसे तो— 'शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥' (माण्डूक्योपनिषद् ७) —इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—तीनों अवस्थासे रहित, सर्वदृश्यविवर्जित, स्वप्रकाश, सच्चिदानन्दघन परब्रह्म ही शिवतत्त्व है, फिर भी वही परमतत्त्व अपनी दिव्य शक्तियोंसे युक्त होकर अनन्त ब्रह्माण्डोंका उत्पादन, पालन एवं संहार करते हुए ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि संज्ञाओंको धारण करते हैं। यद्यपि कहीं ब्रह्मा जीव भी कहा जाता है, 'सोऽबिभेत् एकाकी न रेमे जाया मे स्यादथ कर्म कुर्वीय' इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार भय, अरमण आदिसे युक्त होनेसे हिरण्यगर्भ एवं विराट्को जीव ही कहा गया है तथापि वह एक-एक ब्रह्माण्डके उत्पादक मुख्य ब्रह्मादिके साथ तादात्म्याभिमानी जीव ब्रह्मा कहा जाता है। वास्तवमें तो जैसे किसान ही क्षेत्रमें बीजको बोकर अंकुरादिरूपमें उत्पादक होता है, वही सिंचनादिद्वारा पालक और अन्तमें वही काटनेवाला होता है, वैसे ही एक ही अनन्त- अचिन्त्य-शक्तिसम्पन्न भगवान् विश्वके उत्पादक, पालक और संहारक होते हैं। सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥ (गीता १४।४) भगवान्‌का कहना है कि समस्त भूतोंमें जितनी भी मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उन सबकी महद् ब्रह्म (प्रकृति) योनि (माता) है और बीज प्रदान करनेवाला पिता मैं हूँ। 'पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः' (गीता ९।१७)—मैं ही समस्त जगत्‌का पिता—उत्पादक हूँ। मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥ (गीता १४।३) अर्थात् प्रकृतिरूप योनिमें जब मैं गर्भाधान करता हूँ, तब उससे समस्त विश्वकी उत्पत्ति होती है। इस तरह ब्रह्माण्डोत्पादक ब्रह्मा भी परमेश्वर ही है, अतएव— 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।' (तैत्तिरीयोपनिषद् ३।१) विश्वका उत्पादक, पालक, संहारक— एक या अनेक ? इस श्रुतिसे जो ब्रह्मका लक्षण कहा गया है, उससे विश्वके उत्पादक, पालक एवं संहारकको परमेश्वर समझना चाहिये। यदि यह तीनों पृथक्- पृथक् हों, तब तो कोई भी परमेश्वर नहीं सिद्ध हो सकेगा; क्योंकि निरतिशय ऐश्वर्य और सार्वज्ञ-गुण- सम्पन्नको परमेश्वर कहा जाता है। यदि ये तीनों ही सर्वशक्तिसम्पन्न परमेश्वर हैं तो यह प्रश्न होगा कि ये तीनों मिलकर सलाहसे कार्य करते हैं या स्वतन्त्रतासे अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार ? यदि सलाहसे ही करते हैं यह माना जाय, तब तो इनमें परमेश्वर कोई भी न हुआ। किंतु इन तीनोंकी पर्षद् या पंचायत ही परमेश्वर है; क्योंकि अकेले कोई भी कार्य करनेमें स्वतन्त्र नहीं है। यदि तीनोंकी इच्छा समान ही होती है और तीनोंके इच्छानुसार ही उनकी शक्तियाँ कार्यमें प्रवृत्त होती हैं, तब भी तीनका मानना ही व्यर्थ है। फिर तो एकसे भी वह सब कार्य सम्पन्न हो ही सकता है। यदि द्वितीय पक्ष स्वीकार किया जाय

श्रीशिव-तत्त्व ४५९ अर्थात् स्वतन्त्रतासे भी तीनों कार्य कर सकते हैं, तब भी इनमें कोई भी परमेश्वर नहीं सिद्ध होगा; क्योंकि स्वतन्त्रतासे यदि इच्छा उत्पन्न होगी तो सम्भव है कि जिस समय एकको जगत्पालनकी रुचि हुई, उसी समय दूसरेको संहारकी रुचि उत्पन्न हो। अब यहाँ जिसकी इच्छा सफल होगी, उसीका निरंकुश ऐश्वर्य समझा जायगा। जिसका मनोरथ भग्न हुआ, उसकी ईश्वरता औपचारिक ही रहेगी। एक विषयमें विरुद्ध दो प्रकारकी इच्छाओंका सफल होना असम्भव ही है। इस तरह अनेक ईश्वरका होना किसीके भी मतमें कथमपि सम्भव नहीं, अतः एकेश्वरवाद ही सबको मानना पड़ता है। इसीलिये महानुभावोंने एकहीमें अवस्थाभेदसे उत्पादकत्व, पालकत्व और संहारकत्व माना है। निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्चभूतानि। स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः॥ (भामती १।२) एक तत्त्वका अनेक नाम-रूपोंमें परिणमन भगवान्के निःश्वाससे ही वेदोंका प्रादुर्भाव हो जाता है। वीक्षण (देखने)-से आकाशादि अपंचीकृत पंच महाभूतकी सृष्टि होती है। स्मित (मन्दहास, मुसकराहट)-से भौतिक अनन्त ब्रह्माण्ड बन जाते हैं और सुप्तिसे ही निखिल ब्रह्माण्डका प्रलय हो जाता है। इस दृष्टिसे एक ब्रह्माण्डके उत्पादक, पालक, संहारक ब्रह्मा, विष्णु, शिवके अतिरिक्त निखिल ब्रह्माण्डोंके उत्पादक, पालक, संहारक ब्रह्मा, विष्णु और शिवमें किंचिन्मात्र भी भेद नहीं है। जैसे एक ही गगनस्थ सूर्य अनन्त घटोदकों और तड़ागोदकोंमें प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही एक ही अखण्ड, अनन्त, निर्विकार चिदानन्द परमात्मतत्त्व अनन्त अन्तःकरणों और मायाभेदोंमें प्रतिबिम्बित होते हैं। अन्तःकरणगत प्रतिबिम्ब ही जीव कहलाते हैं। मायागत प्रतिबिम्ब ही ईश्वर कहलाते हैं। जैसे अन्तःकरणके स्वच्छत्वादि- तारतम्यसे जीवोंमें काल्पनिक भेद होता है, वैसे ही मायाकी उत्पादकत्व, पालकत्व, संहारकत्व शक्तिके भेदसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रमें काल्पनिक भेद होता है। अनन्त ब्रह्माण्डकी कल्पनामें अनन्त ब्रह्माण्डकी उत्पादिनी शक्तियाँ भी अनन्त हैं। उन एक-एक शक्तियों, अनन्त अन्तःकरण और उत्पादकत्व, पालकत्व, संहारकत्व शक्तिसे युक्त माया है। इस तरह एक-एक शक्तिसे ब्रह्माण्ड और उसके अन्तर्गत अनन्त जीव एवं उत्पादक, पालक, संहारक ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र व्यक्त होते हैं। परंतु इन सभी प्रतिबिम्बोंका मूलभूत जो बिम्ब है, वह तो सर्वथा एक ही है। वही विष्णुभक्तोंको विष्णुरूपसे, रामभक्तोंको रामरूपसे, शिवभक्तोंको शिव- स्वरूपसे दृष्टिगोचर होता है। जैसे एक ही गगनस्थ सूर्य नीले चश्मेसे नीला, पीलेसे पीला दिखलायी देता है, वैसे ही विष्णुभावनासे भावित अन्तःकरण विष्णुभक्त उसी परमतत्त्वको विष्णु कहते हैं, शिवभावनासे भावितमनस्क उसी परमतत्त्वको शिव कहते हैं और वही श्रीकृष्ण, श्रीराम आदि रूपमें उपलब्ध होता है। वही गगनस्थ सूर्यस्थानीय परमतत्त्व 'शिव-स्कन्दादि' पुराणका शिव है, वही 'विष्णुपुराण', 'रामायण', 'भागवत' आदि सद्ग्रन्थोंमें विष्णु, राम, कृष्णरूपसे गाया गया है। भक्तके भावनानुसार ही उस परमतत्त्वकी ही विशुद्ध सत्त्वमयी दिव्य शक्तिके योगसे मधुर मनोहर मूर्ति भी व्यक्त होती है। इस तरह मूलतः शिव एवं विष्णु एक ही हैं, फिर भी उनके अपर रूपमें सत्त्वके योगसे विष्णुको सात्त्विक और तमस्के योगसे रुद्रको तामस कहा जाता है। वस्तुतः सत्त्वनियन्ता विष्णु और तमनियन्ता रुद्र हैं। तमस् ही मृत्यु है, काल है, अतः उसके नियन्ता महामृत्युंजय महाकालेश्वर भगवान् रुद्र हैं। दूसरी दृष्टिसे भी जैसे तमःप्रधान सुषुप्तिसे ही जागर-स्वप्नकी सृष्टि होती है, वैसे ही तमःप्रधान प्रलयावस्थासे ही सर्वप्रपंचकी सृष्टि होती है। श्रीकृष्णके अनन्य प्रेमी भक्तगण तमस्को बहुत ऊँचा किंवा सबसे उत्कृष्ट मानते हैं। प्रेममयी आसक्ति मोह, मूर्च्छा, सात्त्विक विवेक, प्रकाशसे कहीं अधिक महत्त्वकी होती है। वास्तवमें किसी भी कार्यमें अवष्टम्भ (रुकावट), प्रकाश और प्रवृत्ति

४६० भक्तिसुधा (हलचल)-की अपेक्षा होती है। तीनोंमेंसे एकके बिना भी कार्य नहीं होता। प्राकृत या अप्राकृत दिव्य- से-दिव्य कार्योंमें भी अवष्टम्भकी अपेक्षा होती है, वही दिव्य अवष्टम्भ तम है। इसी तामस एवं तामस भावनाका अत्यन्त महत्त्व माना जाता है। श्रीभागवतका तामसफल (रासलीला)-प्रकरण सर्वापेक्षया अपना अधिक महत्त्व रखता है। वैसे भी विश्रामके लिये तामस सुषुप्तिकी ऐसी महिमा है कि इन्द्रादि दिव्य भोग-सामग्री-सम्पन्न होकर भी उसे छोड़कर सुषुप्ति चाहते हैं। चिन्तन, मनन सात्त्विक होनेपर भी सुषुप्तिका प्रतिबन्धक होनेसे उद्वेजक समझा जाता है। जब जाग्रदादि अवस्थामें द्वैत-दर्शनसे जीव उद्विग्न हो उठता है, तब उसे विश्रामके लिये सुषुप्तिका आश्रयण अनिवार्य हो जाता है। वैसे ही जब सृष्टिकालके उपद्रवोंसे जीव व्याकुल हो जाता है, तब उसकी दीर्घ सुषुप्तिमें विश्रामके लिये भगवान् सर्वसंहार करके प्रलयावस्था व्यक्त करते हैं। संहारमें भी भगवत्कृपा यह संहार भी भगवान्की कृपा ही है, जैसे दुश्चिकित्स्य व्रणसे व्याकुलको देखकर चिकित्सक करुणासे ही व्रण-छेदनके लिये तीक्ष्ण शस्त्रको ग्रहण करता है, वैसे ही दुर्निवार्य पाप-तापके बढ़ जानेपर करुणासे ही भगवान् विश्वका संहार करते हैं— जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाईं। मातु चिराव कठिन की नाईं॥ (रा०च०मा० ७।७४।८) कार्यावस्थासे कारणावस्थाका महत्त्व स्पष्ट ही है। तमः प्रधानावस्था है, उसीसे उत्पादनावस्था और पालनावस्था व्यक्त होती है। अन्तमें फिर भी सबको प्रलयावस्थामें जाना पड़ता है— 'भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।' (गीता ८।१९) अर्थात् यह समस्त भूतग्राम अनन्त कालसे उत्पन्न हो-होकर पुनः-पुनः प्रलयावस्थाको प्राप्त होता है। कारणसे ही सबकी उत्पत्ति और उसीमें पालन और पुनः उसीमें सबका संहार होता है। निःस्तब्ध समुद्रसे ही तरंगकी उत्पत्ति, उसीमें उसका पालन, अन्तमें फिर उसीमें संहार भी होता है। उत्पादनावस्थाके नियामक ब्रह्मा, पालनावस्थाके नियामक विष्णु और संहारावस्था एवं कारणावस्थाके नियामक शिव हैं। पहले भी कारणावस्था रहती है, अन्तमें भी वही रहती है। इस तरह प्रारम्भमें भी शिव और अन्तमें भी शिव ही तत्त्व अवशिष्ट रहता है— अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥ तत्त्वज्ञ लोग उसीमें आत्मभाव करते हैं, जो चराचर प्रपंचकी उत्पत्तिके पहले होता है, उसकी महिमा और वीर्यवत्ता प्रसिद्ध ही है। अतः वही मुख्य निरुपचरित ईश्वर या महेश्वर होता है। शिव सर्वाराध्य परम दैवत हैं शिवजी ही केवल ईश्वर शब्दसे कहे जाते हैं— 'ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानाम्।' 'महेश्वरस्त्र्यम्बक एव नापरः।' 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।' अर्थात् ईशान ही सर्व विद्याओं एवं भूतोंके ईश्वर हैं, वे ही महेश्वर हैं, वे ही सर्व प्राणियोंके हृदयमें रहते हैं। हृदयमें ही सुषुप्ति होती है, वहीं कारणावस्थाके अधिपतिका होना युक्त भी है। कहीं उपनिषदोंमें एकादश प्राणोंको 'रुद्र' कहा गया है। वे निकलनेपर प्राणियोंको रुलाते हैं, इसलिये रुद्र कहे जाते हैं। अतः दस इन्द्रियाँ और मन ही एकादश रुद्र हैं। परंतु ये आध्यात्मिक रुद्र हैं। आधिदैविक एवं सर्वोपाधिविनिर्मुक्त रुद्र इनसे पृथक् हैं। जैसे विष्णु (उपेन्द्र) पाद (पाँव)-के अधिष्ठाता हैं, वैसे ही रुद्र अहंकारके अधिष्ठाता हैं। 'एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे।' अर्थात् एक रुद्र ही तत्त्व था, द्वित्वसंख्यापूर्त्यर्थ कोई दूसरा तत्त्व ही न था। इन श्रुतियोंसे प्रोक्त रुद्र तो महाकारण या कार्यकारणातीत शुद्ध ब्रह्म ही है। यह भी 'रोदनात् रुद्र' है, प्रलयकालमें सबको रुलानेवाले ये ही हैं।

श्रीशिव-तत्त्व ४६१ यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः। समान महाभयानक है। उसीके भयसे सूर्य, चन्द्र, मृत्यर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ अग्नि, वायु, इन्द्र नियमसे अपने-अपने काममें लगे (कठोपनिषद् १।२।२५) हैं। उसीके भयसे मृत्यु भी दौड़ रही है— अर्थात् ब्रह्मक्षत्रोपलक्षित समस्त प्रपंच जिसका भीषास्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। ओदन (भात) है, मृत्यु जिसका उपसेचन (दूध, दही, भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ दाल या कढ़ी) है, उसे कौन, कैसे, कहाँ जाने? जैसे (तैत्तिरीयोपनिषद् २।८।१) प्राणी कढ़ी, भात मिलाकर खा लेता है, बस यही प्रचण्ड कोपरूप भी है, कोपका कार्य मृत्यु विश्वसंहारक काल और समस्त प्रपंचको मिलाकर है। फिर जो मृत्युका भी मृत्यु है, उसकी कोपरूपतामें खानेवाला परमात्मा मृत्युका भी मृत्यु है, अतः क्या सन्देह है? सर्वसंहारक प्रचण्ड उग्र शासक महामृत्युंजय है, कालका भी काल है, अतः काल- परमात्मा ही ईश्वर, ईशान, भीम, उग्र, रुद्र, चण्ड एवं काल या महाकालेश्वर है। यदि कोई भी बच जाय, चण्डिका आदि शब्दोंसे व्यवहृत होता है। तब तो उसकी सर्वसंहारकतामें बाधा उपस्थित होती वेदान्तकी दृष्टिसे अज्ञानी लोग सर्वविधभेदशून्य, है, अतएव 'योऽवशिष्येत' वही एक ब्रह्म है। स्वप्रकाश, अद्वैत ब्रह्मसे डरते हैं— इसीलिये विष्णु भी वही है, यदि वे शिव या रुद्रसे 'योगिनो बिभ्यति ह्यस्माद्भये भयदर्शिनः।' पृथक् होंगे, तब महामृत्युंजय, महाकालेश्वर, सर्वसंहारकसे (माण्डूक्यकारिका ३।३९) संहृत हो जायँगे अन्यथा एकको छोड़कर सर्वकी जैसे नीमके कीड़ेको सिता शर्करासे उद्वेग होता संहारकता ही शिवमें समझी जायगी। सर्वसंहर्ताके है, वैसे ही सप्रपंच द्वैतसुखके कीट अज्ञानियोंको सामने दूसरी जो भी चीज उपस्थित होगी, वह उसका निष्प्रपंच अद्वैतसुखसे भय होता है; क्योंकि उनके अवश्य संहार करेगा। अतः यदि कोई बचेगा तो अभिलषित वादित्र, नृत्य-गीतादि द्वैतसुखका वहाँ उसका आत्मा ही बचेगा; क्योंकि अपनेमें संहार्य- अत्यन्ताभाव होता है। परंतु ज्ञानियोंको तो वही संहारकभाव नहीं बनता। इसीलिये शिवकी आत्मा परमानन्दरसरूप है। इस तरह अज्ञानियोंको उद्वेजक विष्णु और विष्णुकी आत्मा शिव हैं। वहाँ भिन्नता होता हुआ भी वह तत्त्वज्ञानियोंको परमरसामृतरूप है ही नहीं, जिससे परसमवेत-क्रियाशालित्वरूप कर्मत्वका होकर प्रकट होता है। योग हो। सर्वसंहारकमें ही निरतिशय प्राबल्य एवं विवेकियोंकी दृष्टिमें प्रमाद ही मृत्यु है— परमेश्वरत्व, सर्वोत्कृष्टत्व सिद्ध होता है। शेष जो भी 'प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमि।' उससे भिन्न अवशिष्ट होते हैं, उन सबका संहार हो (सनत्सुजातीय १।४) जाता है। अतः उनका अनीश्वरत्व, निकृष्टत्व, उन समस्त प्रमादोंकी जड़ मोहमूल अज्ञान ही विधेयत्व, तद्वशवर्तित्व सुतरां सिद्ध होता है। है और उसका अन्त करनेवाला ब्रह्माकारा चरम जो परमेश्वर भक्तों, प्रेमियों और ज्ञानियोंके वृत्तिपर आरूढ़ शुद्ध ब्रह्म ही है। इस तरह मृत्युरूप निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमके आस्पद होते हैं और अज्ञानका नाशक होनेसे सर्वसंहारक महामृत्युंजय परमानन्दरसरूप होते हैं, वही अभक्तोंके लिये प्रचण्ड महाकालेश्वर परम-तत्त्व शिव ही हैं। वे ही लीलया मृत्युरूप होकर उपलब्ध होते हैं और उनसे सब दिव्यमंगलमयी मूर्ति धारण करते हैं, भक्तोंकी अपनी भयभीत होते हैं। संहारक और शासकसे सबको भय उपासनामें चावपूर्वक प्रवृत्ति देख कुतूहलवशात् स्वयं होना स्वाभाविक है। इसीलिये कहा गया है कि भी भक्तिरसका आस्वादन करनेके लिये अपने- 'महद्भयं वज्रमुद्यतम्।' अर्थात् परमेश्वर उद्यत वज्रके आपको उपास्य-उपासक दो रूपमें व्यक्त करते हैं।

बाल रामचन्द्र, बाल मुकुन्द-रूपसे निज हस्तारविन्दके अंगुष्ठको मुखारविन्दमें विनिवेशितकर चरणारविन्द- मकरन्द-लुब्ध भावुक मनोमिलिन्दोंके लोकोत्तर सौभाग्यको समझकर स्वयं भी भक्त होकर श्रीशिवकी उपासना करते हैं और शिवजीके रूपसे विष्णुरूपकी उपासना करते हैं। शिवके हृदयमें राम, रामके हृदयमें शिव हैं। साम्राज्यसिंहासनसमासीन भगवान् रामके हृदयकमलमें अभिव्यक्त श्रीशिवका प्रत्यक्ष दर्शन महर्षियोंने किया और शिवके हृदयमें रामके प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। इस तरह ‘सेवक स्वामि सखा सिय पी के’ (रा०च०मा० १।१५।४) शिव सर्वाराध्य परम दैवत हैं। शिव-विष्णुका सर्वथा अभेद श्रीकृष्णने उपमन्यु महर्षिसे दीक्षित होकर भगवान् अम्बासहित श्रीशिवकी आराधना करके दिव्य वर प्राप्त किया था। धर्मराज युधिष्ठिरने जब भीष्मजीसे शिवतत्त्वके सम्बन्धमें प्रश्न किया, तब उन्होंने अपनी असमर्थता प्रकट करके कहा कि 'श्रीकृष्ण उनकी कृपाके पात्र हैं, उनकी महिमाको जानते हैं और वे ही कुछ वर्णन भी कर सकते हैं।' युधिष्ठिरके प्रश्नसे श्रीकृष्णने शान्त, समाहित होकर यही कहा कि 'भगवान्‌की महिमा तो अनन्त है तथापि उन्हींकी कृपासे उनकी महिमाको अति संक्षेपमें कहता हूँ।' यह कहकर बड़ी ही श्रद्धासे उन्होंने शिव-महिमाका गायन किया। विष्णुभगवान्‌ने तो अपने नेत्रकमलसे भगवान्‌की पूजा की है। उसी भक्त्युद्रेकसे उन्हें सुदर्शन चक्र मिला है। शिव-विष्णुका तो परस्परमें ऐसा उपास्योपासक-सम्बन्ध है कि जो अन्यत्र हो ही नहीं सकता। तम काला होता है और सत्त्व शुक्ल, इस दृष्टिसे सत्त्वोपाधिक विष्णुको शुक्लवर्ण होना था और तम-उपाधिक रुद्रको कृष्णवर्ण होना था और सम्भवतः हैं भी वे वैसे ही, परंतु परस्पर एक-दूसरेकी ध्यानजनित तन्मयतासे दोनोंके ही स्वरूपमें परिवर्तन हो गया अर्थात् विष्णु कृष्णवर्ण और रुद्र शुक्लवर्ण हो गये। मुरलीरूपसे कृष्णके अधरामृतपानका अधिकार शिवको ही हुआ। श्रीकृष्ण अपने अमृतमय मुखचन्द्रपर, सुमधुर अधरपल्लवपर वंशीको पधराकर अपनी कोमलांगुलियोंसे उनके पादसंवाहन करते, अधरामृतका भोग धरते, किरीट-मुकुटका छत्र धरते और कुण्डलसे नीराजन करते हैं। श्रीराधारूपसे श्रीशिवका प्राकट्य होता है तो कृष्णरूपसे विष्णुका, कालीरूपसे विष्णुका तो शंकररूपसे शिवका। इस तरह ये दोनों उभय- उभयात्मा, उभय-उभयभावात्मा हैं। शिवके सगुणस्वरूपकी मनोहरता एवं मंगलमयता श्रीशिवका सगुण स्वरूप भी इतना अद्भुत, मधुर, मनोहर और मोहक है कि उसपर सभी मोहित हैं। भगवान्‌की तेजोमयी, दिव्य, मधुर, मनोहर, विशुद्ध सत्त्वमयी, मंगलमयी मूर्तिको देखकर स्फटिक, शंख, कुन्द, दुग्ध, कर्पूरखण्ड, श्वेताद्रि, चन्द्रमा सभी लज्जित होते हैं। अनन्तकोटि चन्द्रसागरके मन्थनसे समुद्भूत, अद्भुत, अमृतमय, निष्कलंक पूर्णचन्द्र भी उनके मनोहर मुखचन्द्रकी आभासे लज्जित हो उठता है। मनोहर त्रिनयन, बालचन्द्र एवं जटामुकुटपर दुग्धधवल स्वच्छाकृति गंगाकी धारा हठात् मनको मोहती है। हस्ति-शुण्डके समान विशाल, भूतिभूषित सुडौल, गोल, तेजोमय अंगद-कंकण-शोभित भुजा, मुक्ता-मोतियोंके हार, नागेन्द्रहार, व्याघ्रचर्म, मनोहर चरणारविन्द और उनमें सुशोभित नखमणिचन्द्रिकाएँ भावुकोंको अपार आनन्द प्रदान करती हैं। हिमाद्रिके समान धवलवर्ण स्वच्छ नन्दीगणपर विराजमान सदाशक्तिरूपा श्रीउमाके संग श्रीशिव ठीक वैसे ही शोभित होते हैं, जैसे धर्मतत्त्वके ऊपर ब्रह्मविद्यासहित ब्रह्म विराजमान हों, किंवा माधुर्याधिष्ठात्री महा- शक्तिके साथ मूर्तिमान् होकर परमानन्दरसामृतसिन्धु विराजमान हो। भगवान्‌की ऐसी सर्वमनोहारिता है कि सभी उनके उपासक हैं। कालकूट विष और शेषनागको गलेमें धारण करनेसे भगवान्‌की मृत्युंजयरूपता स्पष्ट है। उन्होंने जटामुकुटमें श्रीगंगाको धारणकर विश्वमुक्ति-

मूलको स्वाधीन कर लिया। अग्निमय तृतीय नेत्रके समीपमें ही चन्द्रकलाको धारणकर अपने संहारकत्व- पोषकत्वरूप विरुद्ध धर्माश्रयत्वको दिखलाया। सर्वलोकाधिपति होकर भी विभूति और व्याघ्रचर्मको ही अपना भूषण-वसन बनाकर संसारमें वैराग्यको ही सर्वापेक्षया श्रेष्ठ बतलाया। आपका वाहन नन्दी तो उमाका वाहन सिंह, गणपतिका वाहन मूषक तो स्वामी कार्तिकेयका वाहन मयूर है। मूर्तिमान् त्रिशूल और भैरवादिगण आपकी सेवामें सदा संलग्न हैं। ब्रह्मा, विष्णु, राम, कृष्णादि भी उनकी उपासना करते हैं। नर, नाग, गन्धर्व, किन्नर, सुर, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापतिप्रभृति भी शिवकी उपासनामें तल्लीन हैं। इधर तामससे तामस असुर, दैत्य, यक्ष, भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल, डाकिनी, शाकिनी, वृश्चिक, सर्प, सिंह सभी आपकी सेवामें तत्पर हैं। वस्तुतः परमेश्वरका लक्षण भी यही है कि उसे सभी पूजें। पार्वतीके विवाहमें जब भगवान् शंकर प्रसन्न हुए, तब अपनी सौन्दर्य-माधुर्य-सुधामयी दिव्य मूर्त्तिका दर्शन दिया। बरातमें पहले लोग इन्द्रका ऐश्वर्य, माधुर्य देखकर मुग्ध हो गये, समझा कि ये ही शंकर हैं और उन्हींकी आरतीके लिये प्रवृत्त हुए। जब इन्द्रने कहा कि 'हम तो श्रीशंकरके उपासकोंके भी उपासकोंमें निम्नतम हैं,' तब उन लोगोंने प्रजापति ब्रह्मा आदिका अद्भुत ऐश्वर्य देखकर उन्हें परमेश्वर समझा। जब उन्होंने भी अपनेको भगवान्का निम्नतम उपासक कहा, तब वे लोग विष्णुकी ओर प्रवृत्त हुए और उन्हें ही अद्भुत ऐश्वर्य-माधुर्य-सौन्दर्यसम्पन्न देखकर शंकर समझा। जब श्रीविष्णुने भी अपनेको शंकरका उपासक बतलाया, तब तो सब आश्चर्यसिन्धुमें डूबने लगे। सचमुच भगवान् श्रीकृष्णके श्रीअंगका सौन्दर्य, माधुर्य अद्भुत है। औरकी कौन कहे, उसपर वे स्वयं मुग्ध हो जाते हैं। मणिमय स्तम्भों या मणिमय प्रांगणमें प्रतिबिम्बित अपनी ही मधुर, मनोहर, मंगलमयी मूर्तिको देख, उसके ही सम्मिलन और परिरम्भणके लिये वे स्वयं विभोर हो उठते हैं। श्रीमूर्तिके प्रत्येक अंगभूषणोंको भी भूषित करते हैं। कौस्तुभादि मणिगणोंने अनन्त आराधनाओंके अनन्तर अपनी शोभा बढ़ानेके लिये उनके श्रीकण्ठको प्राप्त किया है, किं बहुना अनन्त गुणगणोंने भी अनन्त तपस्याओंके अनन्तर अपनी गुणत्वसिद्धिके लिये जिन निर्गुण, निरपेक्षका आश्रयण किया है, वे स्वयं श्रीकृष्ण जिसकी उपासना करें, जिसपर मुग्ध रहें, उसकी महिमा, मधुरिमाका कहना ही क्या? राधारूपसे जिसे प्रतिक्षण हृदय एवं रोम-रोममें रखें, वंशीरूपसे अधरपल्लवपर रखें, जिनके स्वरूपका निरन्तर ध्यान करें, उनकी महिमाको कौन कह सकता है? शब्द, स्पर्श, रस, गन्धके माधुर्यमें प्राणियोंका चित्त आसक्त होता है। चित्तमें अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय ब्रह्मका आरोहण कठिन होता है। इसीलिये भगवान् ऐसी मधुर, मनोहर, मंगलमयी मूर्तिरूपमें अपने- आपको व्यक्त करते हैं, जिसके शब्द-स्पर्शादिके माधुर्यका पारावार नहीं, जिसके लावण्य, सौन्दर्य, सौगन्ध्य, सौकुमार्यकी तुलना कहीं है ही नहीं। मानो भगवान्की सौन्दर्य-सुधाजलनिधि मंगलमूर्तिसे ही, किंवा उसके सौन्दर्यादि-सुधासिन्धुके एक बिन्दुसे ही अनन्त ब्रह्माण्डमें सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्य, सौगन्ध्य, सौकुमार्य आदि वितत हैं। जब प्राणीका मन प्राकृत कान्ताके सौन्दर्य, माधुर्यादिमें आसक्त हो जाता है, तब अनन्तब्रह्माण्डगत सौन्दर्य, माधुर्यादि बिन्दुओंके उद्गमस्थान सौन्दर्यादि सुधाजलनिधि भगवान्के मधुर स्वरूपमें क्यों न आसक्त होगा? भगवान् शिव आशुतोष हैं भगवान्का हृदय भास्वती भगवती अनुकम्पा देवीके परतन्त्र है। संसारमें माँगनेवाला किसीको अच्छा नहीं लगता, उससे सभी घृणा करते हैं। परंतु, भगवान् शंकर तो आक, धतूर, अक्षत, बिल्वपत्र, जलमात्र चढ़ाने अथवा गाल बजानेसे ही सन्तुष्ट होकर सब कुछ देनेको प्रस्तुत हो जाते हैं। ब्रह्माजी पार्वतीसे अपना दुखड़ा रोते हुए कहते हैं—