भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५८ भक्तिसुधा श्रीशिव-तत्त्व भगवान् शिव—समस्त प्राणियोंके विश्रामस्थान शिव वही तत्त्व है, जो समस्त प्राणियोंके विश्रामका स्थान है। 'शीङ् स्वप्ने' धातुसे 'शिव' शब्दकी सिद्धि है। 'शेरते प्राणिनो यत्र स शिवः'— अनन्त पाप-तापोंसे उद्विग्न होकर विश्रामके लिये प्राणी जहाँ शयन करें, बस उसी सर्वाधिष्ठान, सर्वाश्रयको शिव कहा जाता है। वैसे तो— 'शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥' (माण्डूक्योपनिषद् ७) —इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—तीनों अवस्थासे रहित, सर्वदृश्यविवर्जित, स्वप्रकाश, सच्चिदानन्दघन परब्रह्म ही शिवतत्त्व है, फिर भी वही परमतत्त्व अपनी दिव्य शक्तियोंसे युक्त होकर अनन्त ब्रह्माण्डोंका उत्पादन, पालन एवं संहार करते हुए ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि संज्ञाओंको धारण करते हैं। यद्यपि कहीं ब्रह्मा जीव भी कहा जाता है, 'सोऽबिभेत् एकाकी न रेमे जाया मे स्यादथ कर्म कुर्वीय' इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार भय, अरमण आदिसे युक्त होनेसे हिरण्यगर्भ एवं विराट्को जीव ही कहा गया है तथापि वह एक-एक ब्रह्माण्डके उत्पादक मुख्य ब्रह्मादिके साथ तादात्म्याभिमानी जीव ब्रह्मा कहा जाता है। वास्तवमें तो जैसे किसान ही क्षेत्रमें बीजको बोकर अंकुरादिरूपमें उत्पादक होता है, वही सिंचनादिद्वारा पालक और अन्तमें वही काटनेवाला होता है, वैसे ही एक ही अनन्त- अचिन्त्य-शक्तिसम्पन्न भगवान् विश्वके उत्पादक, पालक और संहारक होते हैं। सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः। तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥ (गीता १४।४) भगवान्का कहना है कि समस्त भूतोंमें जितनी भी मूर्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उन सबकी महद् ब्रह्म (प्रकृति) योनि (माता) है और बीज प्रदान करनेवाला पिता मैं हूँ। 'पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः' (गीता ९।१७)—मैं ही समस्त जगत्का पिता—उत्पादक हूँ। मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥ (गीता १४।३) अर्थात् प्रकृतिरूप योनिमें जब मैं गर्भाधान करता हूँ, तब उससे समस्त विश्वकी उत्पत्ति होती है। इस तरह ब्रह्माण्डोत्पादक ब्रह्मा भी परमेश्वर ही है, अतएव— 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति।' (तैत्तिरीयोपनिषद् ३।१) विश्वका उत्पादक, पालक, संहारक— एक या अनेक ? इस श्रुतिसे जो ब्रह्मका लक्षण कहा गया है, उससे विश्वके उत्पादक, पालक एवं संहारकको परमेश्वर समझना चाहिये। यदि यह तीनों पृथक्- पृथक् हों, तब तो कोई भी परमेश्वर नहीं सिद्ध हो सकेगा; क्योंकि निरतिशय ऐश्वर्य और सार्वज्ञ-गुण- सम्पन्नको परमेश्वर कहा जाता है। यदि ये तीनों ही सर्वशक्तिसम्पन्न परमेश्वर हैं तो यह प्रश्न होगा कि ये तीनों मिलकर सलाहसे कार्य करते हैं या स्वतन्त्रतासे अपनी-अपनी इच्छाके अनुसार ? यदि सलाहसे ही करते हैं यह माना जाय, तब तो इनमें परमेश्वर कोई भी न हुआ। किंतु इन तीनोंकी पर्षद् या पंचायत ही परमेश्वर है; क्योंकि अकेले कोई भी कार्य करनेमें स्वतन्त्र नहीं है। यदि तीनोंकी इच्छा समान ही होती है और तीनोंके इच्छानुसार ही उनकी शक्तियाँ कार्यमें प्रवृत्त होती हैं, तब भी तीनका मानना ही व्यर्थ है। फिर तो एकसे भी वह सब कार्य सम्पन्न हो ही सकता है। यदि द्वितीय पक्ष स्वीकार किया जाय