भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीशिव-तत्त्व ४५९ अर्थात् स्वतन्त्रतासे भी तीनों कार्य कर सकते हैं, तब भी इनमें कोई भी परमेश्वर नहीं सिद्ध होगा; क्योंकि स्वतन्त्रतासे यदि इच्छा उत्पन्न होगी तो सम्भव है कि जिस समय एकको जगत्पालनकी रुचि हुई, उसी समय दूसरेको संहारकी रुचि उत्पन्न हो। अब यहाँ जिसकी इच्छा सफल होगी, उसीका निरंकुश ऐश्वर्य समझा जायगा। जिसका मनोरथ भग्न हुआ, उसकी ईश्वरता औपचारिक ही रहेगी। एक विषयमें विरुद्ध दो प्रकारकी इच्छाओंका सफल होना असम्भव ही है। इस तरह अनेक ईश्वरका होना किसीके भी मतमें कथमपि सम्भव नहीं, अतः एकेश्वरवाद ही सबको मानना पड़ता है। इसीलिये महानुभावोंने एकहीमें अवस्थाभेदसे उत्पादकत्व, पालकत्व और संहारकत्व माना है। निःश्वसितमस्य वेदा वीक्षितमेतस्य पञ्चभूतानि। स्मितमेतस्य चराचरमस्य च सुप्तं महाप्रलयः॥ (भामती १।२) एक तत्त्वका अनेक नाम-रूपोंमें परिणमन भगवान्के निःश्वाससे ही वेदोंका प्रादुर्भाव हो जाता है। वीक्षण (देखने)-से आकाशादि अपंचीकृत पंच महाभूतकी सृष्टि होती है। स्मित (मन्दहास, मुसकराहट)-से भौतिक अनन्त ब्रह्माण्ड बन जाते हैं और सुप्तिसे ही निखिल ब्रह्माण्डका प्रलय हो जाता है। इस दृष्टिसे एक ब्रह्माण्डके उत्पादक, पालक, संहारक ब्रह्मा, विष्णु, शिवके अतिरिक्त निखिल ब्रह्माण्डोंके उत्पादक, पालक, संहारक ब्रह्मा, विष्णु और शिवमें किंचिन्मात्र भी भेद नहीं है। जैसे एक ही गगनस्थ सूर्य अनन्त घटोदकों और तड़ागोदकोंमें प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही एक ही अखण्ड, अनन्त, निर्विकार चिदानन्द परमात्मतत्त्व अनन्त अन्तःकरणों और मायाभेदोंमें प्रतिबिम्बित होते हैं। अन्तःकरणगत प्रतिबिम्ब ही जीव कहलाते हैं। मायागत प्रतिबिम्ब ही ईश्वर कहलाते हैं। जैसे अन्तःकरणके स्वच्छत्वादि- तारतम्यसे जीवोंमें काल्पनिक भेद होता है, वैसे ही मायाकी उत्पादकत्व, पालकत्व, संहारकत्व शक्तिके भेदसे ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रमें काल्पनिक भेद होता है। अनन्त ब्रह्माण्डकी कल्पनामें अनन्त ब्रह्माण्डकी उत्पादिनी शक्तियाँ भी अनन्त हैं। उन एक-एक शक्तियों, अनन्त अन्तःकरण और उत्पादकत्व, पालकत्व, संहारकत्व शक्तिसे युक्त माया है। इस तरह एक-एक शक्तिसे ब्रह्माण्ड और उसके अन्तर्गत अनन्त जीव एवं उत्पादक, पालक, संहारक ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र व्यक्त होते हैं। परंतु इन सभी प्रतिबिम्बोंका मूलभूत जो बिम्ब है, वह तो सर्वथा एक ही है। वही विष्णुभक्तोंको विष्णुरूपसे, रामभक्तोंको रामरूपसे, शिवभक्तोंको शिव- स्वरूपसे दृष्टिगोचर होता है। जैसे एक ही गगनस्थ सूर्य नीले चश्मेसे नीला, पीलेसे पीला दिखलायी देता है, वैसे ही विष्णुभावनासे भावित अन्तःकरण विष्णुभक्त उसी परमतत्त्वको विष्णु कहते हैं, शिवभावनासे भावितमनस्क उसी परमतत्त्वको शिव कहते हैं और वही श्रीकृष्ण, श्रीराम आदि रूपमें उपलब्ध होता है। वही गगनस्थ सूर्यस्थानीय परमतत्त्व 'शिव-स्कन्दादि' पुराणका शिव है, वही 'विष्णुपुराण', 'रामायण', 'भागवत' आदि सद्ग्रन्थोंमें विष्णु, राम, कृष्णरूपसे गाया गया है। भक्तके भावनानुसार ही उस परमतत्त्वकी ही विशुद्ध सत्त्वमयी दिव्य शक्तिके योगसे मधुर मनोहर मूर्ति भी व्यक्त होती है। इस तरह मूलतः शिव एवं विष्णु एक ही हैं, फिर भी उनके अपर रूपमें सत्त्वके योगसे विष्णुको सात्त्विक और तमस्के योगसे रुद्रको तामस कहा जाता है। वस्तुतः सत्त्वनियन्ता विष्णु और तमनियन्ता रुद्र हैं। तमस् ही मृत्यु है, काल है, अतः उसके नियन्ता महामृत्युंजय महाकालेश्वर भगवान् रुद्र हैं। दूसरी दृष्टिसे भी जैसे तमःप्रधान सुषुप्तिसे ही जागर-स्वप्नकी सृष्टि होती है, वैसे ही तमःप्रधान प्रलयावस्थासे ही सर्वप्रपंचकी सृष्टि होती है। श्रीकृष्णके अनन्य प्रेमी भक्तगण तमस्को बहुत ऊँचा किंवा सबसे उत्कृष्ट मानते हैं। प्रेममयी आसक्ति मोह, मूर्च्छा, सात्त्विक विवेक, प्रकाशसे कहीं अधिक महत्त्वकी होती है। वास्तवमें किसी भी कार्यमें अवष्टम्भ (रुकावट), प्रकाश और प्रवृत्ति