भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 470

४६० भक्तिसुधा (हलचल)-की अपेक्षा होती है। तीनोंमेंसे एकके बिना भी कार्य नहीं होता। प्राकृत या अप्राकृत दिव्य- से-दिव्य कार्योंमें भी अवष्टम्भकी अपेक्षा होती है, वही दिव्य अवष्टम्भ तम है। इसी तामस एवं तामस भावनाका अत्यन्त महत्त्व माना जाता है। श्रीभागवतका तामसफल (रासलीला)-प्रकरण सर्वापेक्षया अपना अधिक महत्त्व रखता है। वैसे भी विश्रामके लिये तामस सुषुप्तिकी ऐसी महिमा है कि इन्द्रादि दिव्य भोग-सामग्री-सम्पन्न होकर भी उसे छोड़कर सुषुप्ति चाहते हैं। चिन्तन, मनन सात्त्विक होनेपर भी सुषुप्तिका प्रतिबन्धक होनेसे उद्वेजक समझा जाता है। जब जाग्रदादि अवस्थामें द्वैत-दर्शनसे जीव उद्विग्न हो उठता है, तब उसे विश्रामके लिये सुषुप्तिका आश्रयण अनिवार्य हो जाता है। वैसे ही जब सृष्टिकालके उपद्रवोंसे जीव व्याकुल हो जाता है, तब उसकी दीर्घ सुषुप्तिमें विश्रामके लिये भगवान् सर्वसंहार करके प्रलयावस्था व्यक्त करते हैं। संहारमें भी भगवत्कृपा यह संहार भी भगवान्की कृपा ही है, जैसे दुश्चिकित्स्य व्रणसे व्याकुलको देखकर चिकित्सक करुणासे ही व्रण-छेदनके लिये तीक्ष्ण शस्त्रको ग्रहण करता है, वैसे ही दुर्निवार्य पाप-तापके बढ़ जानेपर करुणासे ही भगवान् विश्वका संहार करते हैं— जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाईं। मातु चिराव कठिन की नाईं॥ (रा०च०मा० ७।७४।८) कार्यावस्थासे कारणावस्थाका महत्त्व स्पष्ट ही है। तमः प्रधानावस्था है, उसीसे उत्पादनावस्था और पालनावस्था व्यक्त होती है। अन्तमें फिर भी सबको प्रलयावस्थामें जाना पड़ता है— 'भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।' (गीता ८।१९) अर्थात् यह समस्त भूतग्राम अनन्त कालसे उत्पन्न हो-होकर पुनः-पुनः प्रलयावस्थाको प्राप्त होता है। कारणसे ही सबकी उत्पत्ति और उसीमें पालन और पुनः उसीमें सबका संहार होता है। निःस्तब्ध समुद्रसे ही तरंगकी उत्पत्ति, उसीमें उसका पालन, अन्तमें फिर उसीमें संहार भी होता है। उत्पादनावस्थाके नियामक ब्रह्मा, पालनावस्थाके नियामक विष्णु और संहारावस्था एवं कारणावस्थाके नियामक शिव हैं। पहले भी कारणावस्था रहती है, अन्तमें भी वही रहती है। इस तरह प्रारम्भमें भी शिव और अन्तमें भी शिव ही तत्त्व अवशिष्ट रहता है— अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥ तत्त्वज्ञ लोग उसीमें आत्मभाव करते हैं, जो चराचर प्रपंचकी उत्पत्तिके पहले होता है, उसकी महिमा और वीर्यवत्ता प्रसिद्ध ही है। अतः वही मुख्य निरुपचरित ईश्वर या महेश्वर होता है। शिव सर्वाराध्य परम दैवत हैं शिवजी ही केवल ईश्वर शब्दसे कहे जाते हैं— 'ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानाम्।' 'महेश्वरस्त्र्यम्बक एव नापरः।' 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।' अर्थात् ईशान ही सर्व विद्याओं एवं भूतोंके ईश्वर हैं, वे ही महेश्वर हैं, वे ही सर्व प्राणियोंके हृदयमें रहते हैं। हृदयमें ही सुषुप्ति होती है, वहीं कारणावस्थाके अधिपतिका होना युक्त भी है। कहीं उपनिषदोंमें एकादश प्राणोंको 'रुद्र' कहा गया है। वे निकलनेपर प्राणियोंको रुलाते हैं, इसलिये रुद्र कहे जाते हैं। अतः दस इन्द्रियाँ और मन ही एकादश रुद्र हैं। परंतु ये आध्यात्मिक रुद्र हैं। आधिदैविक एवं सर्वोपाधिविनिर्मुक्त रुद्र इनसे पृथक् हैं। जैसे विष्णु (उपेन्द्र) पाद (पाँव)-के अधिष्ठाता हैं, वैसे ही रुद्र अहंकारके अधिष्ठाता हैं। 'एको रुद्रो न द्वितीयोऽवतस्थे।' अर्थात् एक रुद्र ही तत्त्व था, द्वित्वसंख्यापूर्त्यर्थ कोई दूसरा तत्त्व ही न था। इन श्रुतियोंसे प्रोक्त रुद्र तो महाकारण या कार्यकारणातीत शुद्ध ब्रह्म ही है। यह भी 'रोदनात् रुद्र' है, प्रलयकालमें सबको रुलानेवाले ये ही हैं।