भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 471

श्रीशिव-तत्त्व ४६१ यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः। समान महाभयानक है। उसीके भयसे सूर्य, चन्द्र, मृत्यर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ अग्नि, वायु, इन्द्र नियमसे अपने-अपने काममें लगे (कठोपनिषद् १।२।२५) हैं। उसीके भयसे मृत्यु भी दौड़ रही है— अर्थात् ब्रह्मक्षत्रोपलक्षित समस्त प्रपंच जिसका भीषास्माद्वातः पवते। भीषोदेति सूर्यः। ओदन (भात) है, मृत्यु जिसका उपसेचन (दूध, दही, भीषास्मादग्निश्चेन्द्रश्च। मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ दाल या कढ़ी) है, उसे कौन, कैसे, कहाँ जाने? जैसे (तैत्तिरीयोपनिषद् २।८।१) प्राणी कढ़ी, भात मिलाकर खा लेता है, बस यही प्रचण्ड कोपरूप भी है, कोपका कार्य मृत्यु विश्वसंहारक काल और समस्त प्रपंचको मिलाकर है। फिर जो मृत्युका भी मृत्यु है, उसकी कोपरूपतामें खानेवाला परमात्मा मृत्युका भी मृत्यु है, अतः क्या सन्देह है? सर्वसंहारक प्रचण्ड उग्र शासक महामृत्युंजय है, कालका भी काल है, अतः काल- परमात्मा ही ईश्वर, ईशान, भीम, उग्र, रुद्र, चण्ड एवं काल या महाकालेश्वर है। यदि कोई भी बच जाय, चण्डिका आदि शब्दोंसे व्यवहृत होता है। तब तो उसकी सर्वसंहारकतामें बाधा उपस्थित होती वेदान्तकी दृष्टिसे अज्ञानी लोग सर्वविधभेदशून्य, है, अतएव 'योऽवशिष्येत' वही एक ब्रह्म है। स्वप्रकाश, अद्वैत ब्रह्मसे डरते हैं— इसीलिये विष्णु भी वही है, यदि वे शिव या रुद्रसे 'योगिनो बिभ्यति ह्यस्माद्भये भयदर्शिनः।' पृथक् होंगे, तब महामृत्युंजय, महाकालेश्वर, सर्वसंहारकसे (माण्डूक्यकारिका ३।३९) संहृत हो जायँगे अन्यथा एकको छोड़कर सर्वकी जैसे नीमके कीड़ेको सिता शर्करासे उद्वेग होता संहारकता ही शिवमें समझी जायगी। सर्वसंहर्ताके है, वैसे ही सप्रपंच द्वैतसुखके कीट अज्ञानियोंको सामने दूसरी जो भी चीज उपस्थित होगी, वह उसका निष्प्रपंच अद्वैतसुखसे भय होता है; क्योंकि उनके अवश्य संहार करेगा। अतः यदि कोई बचेगा तो अभिलषित वादित्र, नृत्य-गीतादि द्वैतसुखका वहाँ उसका आत्मा ही बचेगा; क्योंकि अपनेमें संहार्य- अत्यन्ताभाव होता है। परंतु ज्ञानियोंको तो वही संहारकभाव नहीं बनता। इसीलिये शिवकी आत्मा परमानन्दरसरूप है। इस तरह अज्ञानियोंको उद्वेजक विष्णु और विष्णुकी आत्मा शिव हैं। वहाँ भिन्नता होता हुआ भी वह तत्त्वज्ञानियोंको परमरसामृतरूप है ही नहीं, जिससे परसमवेत-क्रियाशालित्वरूप कर्मत्वका होकर प्रकट होता है। योग हो। सर्वसंहारकमें ही निरतिशय प्राबल्य एवं विवेकियोंकी दृष्टिमें प्रमाद ही मृत्यु है— परमेश्वरत्व, सर्वोत्कृष्टत्व सिद्ध होता है। शेष जो भी 'प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमि।' उससे भिन्न अवशिष्ट होते हैं, उन सबका संहार हो (सनत्सुजातीय १।४) जाता है। अतः उनका अनीश्वरत्व, निकृष्टत्व, उन समस्त प्रमादोंकी जड़ मोहमूल अज्ञान ही विधेयत्व, तद्वशवर्तित्व सुतरां सिद्ध होता है। है और उसका अन्त करनेवाला ब्रह्माकारा चरम जो परमेश्वर भक्तों, प्रेमियों और ज्ञानियोंके वृत्तिपर आरूढ़ शुद्ध ब्रह्म ही है। इस तरह मृत्युरूप निरतिशय, निरुपाधिक परप्रेमके आस्पद होते हैं और अज्ञानका नाशक होनेसे सर्वसंहारक महामृत्युंजय परमानन्दरसरूप होते हैं, वही अभक्तोंके लिये प्रचण्ड महाकालेश्वर परम-तत्त्व शिव ही हैं। वे ही लीलया मृत्युरूप होकर उपलब्ध होते हैं और उनसे सब दिव्यमंगलमयी मूर्ति धारण करते हैं, भक्तोंकी अपनी भयभीत होते हैं। संहारक और शासकसे सबको भय उपासनामें चावपूर्वक प्रवृत्ति देख कुतूहलवशात् स्वयं होना स्वाभाविक है। इसीलिये कहा गया है कि भी भक्तिरसका आस्वादन करनेके लिये अपने- 'महद्भयं वज्रमुद्यतम्।' अर्थात् परमेश्वर उद्यत वज्रके आपको उपास्य-उपासक दो रूपमें व्यक्त करते हैं।