भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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बाल रामचन्द्र, बाल मुकुन्द-रूपसे निज हस्तारविन्दके अंगुष्ठको मुखारविन्दमें विनिवेशितकर चरणारविन्द- मकरन्द-लुब्ध भावुक मनोमिलिन्दोंके लोकोत्तर सौभाग्यको समझकर स्वयं भी भक्त होकर श्रीशिवकी उपासना करते हैं और शिवजीके रूपसे विष्णुरूपकी उपासना करते हैं। शिवके हृदयमें राम, रामके हृदयमें शिव हैं। साम्राज्यसिंहासनसमासीन भगवान् रामके हृदयकमलमें अभिव्यक्त श्रीशिवका प्रत्यक्ष दर्शन महर्षियोंने किया और शिवके हृदयमें रामके प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं। इस तरह ‘सेवक स्वामि सखा सिय पी के’ (रा०च०मा० १।१५।४) शिव सर्वाराध्य परम दैवत हैं। शिव-विष्णुका सर्वथा अभेद श्रीकृष्णने उपमन्यु महर्षिसे दीक्षित होकर भगवान् अम्बासहित श्रीशिवकी आराधना करके दिव्य वर प्राप्त किया था। धर्मराज युधिष्ठिरने जब भीष्मजीसे शिवतत्त्वके सम्बन्धमें प्रश्न किया, तब उन्होंने अपनी असमर्थता प्रकट करके कहा कि 'श्रीकृष्ण उनकी कृपाके पात्र हैं, उनकी महिमाको जानते हैं और वे ही कुछ वर्णन भी कर सकते हैं।' युधिष्ठिरके प्रश्नसे श्रीकृष्णने शान्त, समाहित होकर यही कहा कि 'भगवान्‌की महिमा तो अनन्त है तथापि उन्हींकी कृपासे उनकी महिमाको अति संक्षेपमें कहता हूँ।' यह कहकर बड़ी ही श्रद्धासे उन्होंने शिव-महिमाका गायन किया। विष्णुभगवान्‌ने तो अपने नेत्रकमलसे भगवान्‌की पूजा की है। उसी भक्त्युद्रेकसे उन्हें सुदर्शन चक्र मिला है। शिव-विष्णुका तो परस्परमें ऐसा उपास्योपासक-सम्बन्ध है कि जो अन्यत्र हो ही नहीं सकता। तम काला होता है और सत्त्व शुक्ल, इस दृष्टिसे सत्त्वोपाधिक विष्णुको शुक्लवर्ण होना था और तम-उपाधिक रुद्रको कृष्णवर्ण होना था और सम्भवतः हैं भी वे वैसे ही, परंतु परस्पर एक-दूसरेकी ध्यानजनित तन्मयतासे दोनोंके ही स्वरूपमें परिवर्तन हो गया अर्थात् विष्णु कृष्णवर्ण और रुद्र शुक्लवर्ण हो गये। मुरलीरूपसे कृष्णके अधरामृतपानका अधिकार शिवको ही हुआ। श्रीकृष्ण अपने अमृतमय मुखचन्द्रपर, सुमधुर अधरपल्लवपर वंशीको पधराकर अपनी कोमलांगुलियोंसे उनके पादसंवाहन करते, अधरामृतका भोग धरते, किरीट-मुकुटका छत्र धरते और कुण्डलसे नीराजन करते हैं। श्रीराधारूपसे श्रीशिवका प्राकट्य होता है तो कृष्णरूपसे विष्णुका, कालीरूपसे विष्णुका तो शंकररूपसे शिवका। इस तरह ये दोनों उभय- उभयात्मा, उभय-उभयभावात्मा हैं। शिवके सगुणस्वरूपकी मनोहरता एवं मंगलमयता श्रीशिवका सगुण स्वरूप भी इतना अद्भुत, मधुर, मनोहर और मोहक है कि उसपर सभी मोहित हैं। भगवान्‌की तेजोमयी, दिव्य, मधुर, मनोहर, विशुद्ध सत्त्वमयी, मंगलमयी मूर्तिको देखकर स्फटिक, शंख, कुन्द, दुग्ध, कर्पूरखण्ड, श्वेताद्रि, चन्द्रमा सभी लज्जित होते हैं। अनन्तकोटि चन्द्रसागरके मन्थनसे समुद्भूत, अद्भुत, अमृतमय, निष्कलंक पूर्णचन्द्र भी उनके मनोहर मुखचन्द्रकी आभासे लज्जित हो उठता है। मनोहर त्रिनयन, बालचन्द्र एवं जटामुकुटपर दुग्धधवल स्वच्छाकृति गंगाकी धारा हठात् मनको मोहती है। हस्ति-शुण्डके समान विशाल, भूतिभूषित सुडौल, गोल, तेजोमय अंगद-कंकण-शोभित भुजा, मुक्ता-मोतियोंके हार, नागेन्द्रहार, व्याघ्रचर्म, मनोहर चरणारविन्द और उनमें सुशोभित नखमणिचन्द्रिकाएँ भावुकोंको अपार आनन्द प्रदान करती हैं। हिमाद्रिके समान धवलवर्ण स्वच्छ नन्दीगणपर विराजमान सदाशक्तिरूपा श्रीउमाके संग श्रीशिव ठीक वैसे ही शोभित होते हैं, जैसे धर्मतत्त्वके ऊपर ब्रह्मविद्यासहित ब्रह्म विराजमान हों, किंवा माधुर्याधिष्ठात्री महा- शक्तिके साथ मूर्तिमान् होकर परमानन्दरसामृतसिन्धु विराजमान हो। भगवान्‌की ऐसी सर्वमनोहारिता है कि सभी उनके उपासक हैं। कालकूट विष और शेषनागको गलेमें धारण करनेसे भगवान्‌की मृत्युंजयरूपता स्पष्ट है। उन्होंने जटामुकुटमें श्रीगंगाको धारणकर विश्वमुक्ति-