भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमूलको स्वाधीन कर लिया। अग्निमय तृतीय नेत्रके समीपमें ही चन्द्रकलाको धारणकर अपने संहारकत्व- पोषकत्वरूप विरुद्ध धर्माश्रयत्वको दिखलाया। सर्वलोकाधिपति होकर भी विभूति और व्याघ्रचर्मको ही अपना भूषण-वसन बनाकर संसारमें वैराग्यको ही सर्वापेक्षया श्रेष्ठ बतलाया। आपका वाहन नन्दी तो उमाका वाहन सिंह, गणपतिका वाहन मूषक तो स्वामी कार्तिकेयका वाहन मयूर है। मूर्तिमान् त्रिशूल और भैरवादिगण आपकी सेवामें सदा संलग्न हैं। ब्रह्मा, विष्णु, राम, कृष्णादि भी उनकी उपासना करते हैं। नर, नाग, गन्धर्व, किन्नर, सुर, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापतिप्रभृति भी शिवकी उपासनामें तल्लीन हैं। इधर तामससे तामस असुर, दैत्य, यक्ष, भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल, डाकिनी, शाकिनी, वृश्चिक, सर्प, सिंह सभी आपकी सेवामें तत्पर हैं। वस्तुतः परमेश्वरका लक्षण भी यही है कि उसे सभी पूजें। पार्वतीके विवाहमें जब भगवान् शंकर प्रसन्न हुए, तब अपनी सौन्दर्य-माधुर्य-सुधामयी दिव्य मूर्त्तिका दर्शन दिया। बरातमें पहले लोग इन्द्रका ऐश्वर्य, माधुर्य देखकर मुग्ध हो गये, समझा कि ये ही शंकर हैं और उन्हींकी आरतीके लिये प्रवृत्त हुए। जब इन्द्रने कहा कि 'हम तो श्रीशंकरके उपासकोंके भी उपासकोंमें निम्नतम हैं,' तब उन लोगोंने प्रजापति ब्रह्मा आदिका अद्भुत ऐश्वर्य देखकर उन्हें परमेश्वर समझा। जब उन्होंने भी अपनेको भगवान्का निम्नतम उपासक कहा, तब वे लोग विष्णुकी ओर प्रवृत्त हुए और उन्हें ही अद्भुत ऐश्वर्य-माधुर्य-सौन्दर्यसम्पन्न देखकर शंकर समझा। जब श्रीविष्णुने भी अपनेको शंकरका उपासक बतलाया, तब तो सब आश्चर्यसिन्धुमें डूबने लगे। सचमुच भगवान् श्रीकृष्णके श्रीअंगका सौन्दर्य, माधुर्य अद्भुत है। औरकी कौन कहे, उसपर वे स्वयं मुग्ध हो जाते हैं। मणिमय स्तम्भों या मणिमय प्रांगणमें प्रतिबिम्बित अपनी ही मधुर, मनोहर, मंगलमयी मूर्तिको देख, उसके ही सम्मिलन और परिरम्भणके लिये वे स्वयं विभोर हो उठते हैं। श्रीमूर्तिके प्रत्येक अंगभूषणोंको भी भूषित करते हैं। कौस्तुभादि मणिगणोंने अनन्त आराधनाओंके अनन्तर अपनी शोभा बढ़ानेके लिये उनके श्रीकण्ठको प्राप्त किया है, किं बहुना अनन्त गुणगणोंने भी अनन्त तपस्याओंके अनन्तर अपनी गुणत्वसिद्धिके लिये जिन निर्गुण, निरपेक्षका आश्रयण किया है, वे स्वयं श्रीकृष्ण जिसकी उपासना करें, जिसपर मुग्ध रहें, उसकी महिमा, मधुरिमाका कहना ही क्या? राधारूपसे जिसे प्रतिक्षण हृदय एवं रोम-रोममें रखें, वंशीरूपसे अधरपल्लवपर रखें, जिनके स्वरूपका निरन्तर ध्यान करें, उनकी महिमाको कौन कह सकता है? शब्द, स्पर्श, रस, गन्धके माधुर्यमें प्राणियोंका चित्त आसक्त होता है। चित्तमें अशब्द, अस्पर्श, अरूप, अव्यय ब्रह्मका आरोहण कठिन होता है। इसीलिये भगवान् ऐसी मधुर, मनोहर, मंगलमयी मूर्तिरूपमें अपने- आपको व्यक्त करते हैं, जिसके शब्द-स्पर्शादिके माधुर्यका पारावार नहीं, जिसके लावण्य, सौन्दर्य, सौगन्ध्य, सौकुमार्यकी तुलना कहीं है ही नहीं। मानो भगवान्की सौन्दर्य-सुधाजलनिधि मंगलमूर्तिसे ही, किंवा उसके सौन्दर्यादि-सुधासिन्धुके एक बिन्दुसे ही अनन्त ब्रह्माण्डमें सौन्दर्य, माधुर्य, लावण्य, सौगन्ध्य, सौकुमार्य आदि वितत हैं। जब प्राणीका मन प्राकृत कान्ताके सौन्दर्य, माधुर्यादिमें आसक्त हो जाता है, तब अनन्तब्रह्माण्डगत सौन्दर्य, माधुर्यादि बिन्दुओंके उद्गमस्थान सौन्दर्यादि सुधाजलनिधि भगवान्के मधुर स्वरूपमें क्यों न आसक्त होगा? भगवान् शिव आशुतोष हैं भगवान्का हृदय भास्वती भगवती अनुकम्पा देवीके परतन्त्र है। संसारमें माँगनेवाला किसीको अच्छा नहीं लगता, उससे सभी घृणा करते हैं। परंतु, भगवान् शंकर तो आक, धतूर, अक्षत, बिल्वपत्र, जलमात्र चढ़ाने अथवा गाल बजानेसे ही सन्तुष्ट होकर सब कुछ देनेको प्रस्तुत हो जाते हैं। ब्रह्माजी पार्वतीसे अपना दुखड़ा रोते हुए कहते हैं—