भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६४ भक्तिसुधा बावरो रावरो नाह भवानी। * सिवकी दई संपदा देखत, श्री-सारदा सिहानी। जिनके भाल लिखी लिपि मेरी, सुखकी नहीं निसानी। तिन रंकनकी नाक संवारत, हौं आयो नकबानी॥ (विनय-पत्रिका ५) दीन-दयालु दिबोई भावै, जाचक सदा सोहाहीं॥ (विनय-पत्रिका ४) उनका भक्त एक ही बार प्रणाम करनेसे अपनेको मुक्त मानता है। भगवान् भी 'महादेव' ऐसे नाम उच्चारण करनेवालेके प्रति ऐसे दौड़ते हैं, जैसे वत्सला गौ अपने बछड़ेके प्रति— महादेव महादेव महादेवेति वादिनम्। वत्सं गौरिव गौरीशो धावन्तमनुधावति॥ जो पुरुष तीन बार 'महादेव, महादेव, महादेव' इस तरह भगवान्का नाम उच्चारण करता है, भगवान् एक नामसे मुक्ति देकर शेष दो नामसे उसके ऋणी हो जाते हैं— महादेव महादेव महादेवेति यो वदेत्। एकेन मुक्तिमाप्नोति द्वाभ्यां शम्भू ऋणी भवेत्॥ ठीक ही है, वेदान्त-सिद्धान्तानुसार शब्दसे ही तत्त्वका साक्षात्कार होता है। उपनिषदों, महावाक्यों एवं भगवत्स्वरूप-बोधक प्रणवादि नामोंसे तत्त्वसाक्षात्कार होता है। तत्त्वसाक्षात्कार होते ही कल्पित संसार मिट जाता है। स्वाभाविक पारमार्थिक ब्रह्मानन्दरसामृत मुक्ति मिल जाती है। जैसे अमृतसागरमें क्षारसागरकी कल्पना भ्रान्तिसे होती है, वैसे ही परमानन्दरसामृतमूर्ति शिवतत्त्वमें भवसागरकी भ्रान्ति होती है। अधिष्ठानके साक्षात्कारसे कल्पना मिट जाती है। यह 'नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं' (रा०च०मा० १।२५।४) का आशय है। दूसरी दृष्टिसे जैसे तृण, वीरुध, औषधोंके विचित्र सम्प्रयोग-विप्रयोगसे विचित्र गुणों और दोषोंका उद्भव-अभिभव होता है, वैसे ही वर्णोंके विचित्र सम्प्रयोग-विप्रयोगमें विचित्र शक्तियाँ होती हैं। 'क' 'ख' 'ग' 'घ' आदि वर्णोंके ही जोड़-तोड़से विचित्र वाङ्मय शास्त्र बने हैं। 'राजा', 'जारा'; 'नदी', 'दीन' ये सब अर्थ-विपरिणाम वर्णोंके आनुपूर्वी भेदसे ही होते हैं। उन्हीं वर्णोंके ऐसे भी जोड़-तोड़ होते हैं, जिनसे घोर-से-घोर शत्रु वशमें हो जाते हैं। सर्प, वृश्चिक, पिशाच, राक्षस, देवता वशमें हो जाते हैं। ऐसे विचित्र वर्णविन्यास होते हैं, जिनका मूल संसारमें कुछ भी नहीं है। विद्वानों, कवियों, तार्किकोंके वर्ण-विन्यास- विशेषमें ही विशेषता (खूबी) है, किन्हीं वर्णविन्यासोंसे परम मित्र भी शत्रु हो जाते हैं। इस तरह अदृष्टविधया भी भगवान्के शिव, महादेव आदि नामोंमें विचित्र शक्ति है, जिससे प्राणी निष्पाप होकर परमतत्त्वका साक्षात्कारकर कृतकृत्य हो जाता है।
शिवसे शिक्षा
भगवान् भूतभावन श्रीविश्वनाथके चरित्रोंसे प्राणियोंको नैतिक, सामाजिक, कौटुम्बिक—अनेक प्रकारकी शिक्षा मिलती है। समुद्र-मन्थनमें निकलनेवाले कालकूट विषका भगवान् शंकरने पान किया और अमृत देवताओंको दिया। राष्ट्रके नेता और समाज एवं कुटुम्बके स्वामीका यही कर्तव्य है, उत्तम वस्तु राष्ट्रके अन्यान्य लोगोंको देनी चाहिये और अपने लिये परिश्रम, त्याग तथा तरह-तरहकी कठिनाइयोंको ही रखना चाहिये। विषका भाग राष्ट्र या बच्चोंको देनेसे वैमनस्य और उससे सर्वनाश हो जायगा। शिवजीने न विषको हृदय (पेट)-में उतारा और न उसका वमन ही किया, अपितु कण्ठमें ही रोक रखा। इसीलिये विष और कालिमा भी उनके भूषण हो गये। जो संसारके हितके लिये विषपानसे भी नहीं हिचकते, वे ही राष्ट्र या जगत्के ईश्वर हो सकते हैं। समाज या राष्ट्रकी कटुताको पी जानेसे ही नेता राष्ट्रका कल्याण कर सकता है। परंतु फिर भी उस कटुताका विष वमन करनेसे फूट और उपद्रव ही होगा।