भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)
Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभगवान् सूर्य—हमारे प्रत्यक्ष देवता ४५७ है, किंतु सात नाम होनेके कारण सात अश्व कहे जाते हैं। उस एक चक्रमें ही (भूत, भविष्य और वर्तमान) ये तीन नाभियाँ हैं। वह रथ अजर-अमर (जरा- मरणसे रहित) अर्थात् अविनाशी है एवं अनर्व अर्थात् अत्यन्त दृढ़ है अर्थात् कभी शिथिल नहीं होता। इसी कालात्मा पुरुषके सहारे पिण्डज, अण्डज, स्थावर, ऊष्मज सभी प्रकारके प्राणी टिके हुए हैं। ऐसे रथपर स्थित इन भुवनभास्करको देखकर (समझकर) मनुष्य पुनर्जन्म नहीं पाता—मुक्त हो जाता है— 'रथस्थं भास्करं दृष्ट्वा पुनर्जन्म न विद्यते।' शतपथब्राह्मणमें भगवान् सूर्यको त्रयीमय कहा गया है—'यदेतन्मण्डलं तपति तन्महदुक्थं ता ऋचः स ऋचां लोकोऽथ यदेतदर्चिर्दीप्यते तन्महाव्रतं तानि सामानि स साम्नां लोकोऽथ य एष एतस्मिन् मण्डले पुरुषः सोऽग्निस्तानि यजूंषि स यजुषां लोकः ॥' (१०।५।२।१) इस श्रुतिमें भगवान् सूर्यके दिव्य गृहस्थानीय मण्डलकी स्तुति की गयी है। मण्डलकी स्तुतिसे मण्डलाभिमानी पुरुष और उसकी स्तुतिसे अन्तर्यामीकी स्तुति स्वभावतः सिद्ध है। यह जो सर्वप्राणिनेत्रगोचर आकाशका भूषण वर्तुलाकार मण्डल है, वह महदुक्थ (बृहती सहस्र नामसे प्रसिद्ध होत्रमें शस्त्रविशेष) है तथा वही ऋक् है। जो इस मण्डलमें अर्चि (सर्वजगत्- प्रकाशक तेज) है, वह 'महाव्रत' नामक क्रतु (यज्ञकर्म) विशेष है और बृहत्-रथन्तर आदि साम भी वही है तथा जो मण्डलाभिमानी पुरुष है, वह अग्नि (अर्थात् अग्न्युपलक्षित सर्वदेव) है तथा यजुष् भी वही पुरुष है। अपने तेजसे तीनों लोकोंको पूरित करनेके कारण वह पुरुष है—'आ प्रा द्यावा पृथिवी अन्तरिक्षम्' अथवा सभी प्राणियोंके शरीररूप पुरमें शयन करनेके कारण वह पुरुष है—'सर्वासु पूर्षु शेषे' (श० ब्रा० १४।२।५।१८) अथवा सभी पापोंको भस्म कर देनेके कारण वह पुरुष है—'सर्वान् पाप्मन औषत्त- स्मात्पुरुषः' (श० ब्रा० १४।१।२।२)। छान्दोग्य- उपनिषद्में इस पुरुषका वर्णन किया गया है— 'य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णः ।... स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदित उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद (छा० उ० १।६।६- ७)। श्रुति भी आदित्यरूपमें इसी अन्तर्यामी पुरुषका वर्णन कर रही है। 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' (ब्र० सू० १।१।२०)—इस ब्रह्मसूत्रमें भी यह निर्णय किया गया है कि इस छान्दोग्यश्रुतिमें प्रतिपादित पुरुष अन्तर्यामी है। इस प्रकार भगवान् सूर्य सर्वदेवमय हैं—'तस्मा- त्परमेश्वर एवेहोपदिश्यते इत्यादि' (शांकरभाष्य) गायत्री-उपासना सर्वदेवमय आदित्यकी उपासना है श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणके युद्धकाण्डमें आदित्य- हृदयस्तोत्रके द्वारा इन्हीं भगवान् सूर्यकी स्तुति की गयी है। उसमें कहा गया है कि ये ही भगवान् सूर्य ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द और प्रजापति हैं। महेन्द्र, कुबेर, वरुण, काल, यम, सोम आदि भी ये ही हैं— एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः। महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपाम्पतिः ॥ आपत्तिके समयमें, भयंकर विषम परिस्थितिमें, जनशून्य अरण्यमें, अत्यन्त भयदायी घोर समयमें अथवा महासमुद्रमें इनका स्मरण, कीर्तन और स्तुति करनेसे प्राणी सभी विपत्तियोंसे छुटकारा पा जाता है— एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च। कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥ तीनों सन्ध्याओंमें गायत्री-मन्त्रद्वारा इन्हींकी उपासना की जाती है। इनकी अर्चनासे सबकी मनःकामनाएँ पूर्ण होती हैं। भगवान् श्रीरामने युद्धक्षेत्रमें इनकी आराधना करके रावणपर विजय प्राप्त की थी। इनका स्तोत्र 'आदित्यहृदय' वरदानी है, अमोघ है। उसके द्वारा इनकी स्तुति करनेसे सभी आपदाओंसे छुटकारा पाकर प्राणी अन्तमें परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है।