भारतकोश
भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

भक्ति सुधा (स्वामी करपात्री जी महाराज - पराभक्ति, रस-मीमांसा एवं प्रेम-तत्त्व दार्शनिक महाग्रन्थ)

Bhakti Sudha of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished778 पृष्ठ

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पृष्ठ 466

४५६ भक्तिसुधा इसलिये गोस्वामीजीने कहा है कि अनादि देवता समझकर गणेशादिके रूपभेद, शिवपूज्यता आदि अंशोंमें संशय न करें—'कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥' फिर जब बड़े-से- बड़े तार्किकोंका तर्क भौतिक भावोंमें ही कुण्ठित हो जाता है, तब व्याप्ति या हेतु तथा हेत्वाभासके ज्ञानसे शून्य आधुनिक विद्वानोंको देवता या ईश्वरके विषयमें तर्क करनेका क्या अधिकार है? वे महानुभाव यदि तर्कके स्वरूपका भी ठीक-ठीक निरूपण कर सकें, तो उन्हें यह पता लग सकेगा कि धर्म तथा देवतापर तर्क कुछ काम कर सकता है या नहीं? भला यदि इनसे कोई पूछे कि यह आपने कैसे अनुमान किया कि गणेश अनार्योंके देवता हैं और आदि भारतवासी अनार्य ही हैं? क्या कोई अव्यभिचरित-हेतु इसका आपके पास है? तो ये लोग सिवा अटकलपच्चू कल्पित मिथ्या इतिहासके और क्या बतला सकते हैं? परंतु यदि इनके भ्रमपूर्ण निराधार आधुनिक इतिहास मान्य हैं तो प्राचीन आध्यात्मिक गम्भीर भावपूर्ण हमारे इतिहास क्यों मान्य नहीं? अस्तु, आस्तिकोंको पूर्वोक्त प्रमाणोंसे निर्धारित गणपति-तत्त्वका श्रद्धासहित समस्त कर्मोंमें आराधन अवश्य करना चाहिये। पारलौकिक तत्त्व-निर्धारणमें एकमात्र शास्त्र ही आदरणीय है। इसीलिये भगवान्‌ने गीता (१६।२४)-में कहा है— तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ भगवान् सूर्य—हमारे प्रत्यक्ष देवता सभी प्राणियोंको जन्मसे ही भगवान् सूर्यके दर्शन होते हैं। ये सर्वप्रसिद्ध देवता हैं। अन्य किसी देवताकी स्थितिमें कुछ सन्देह भी हो सकता है, किंतु भगवान् सूर्यकी सत्तामें किसीको सन्देहके लिये कोई अवसर ही नहीं है। सभी लोग इनका प्रत्यक्ष (साक्षात्कार) प्राप्त करते हैं। 'सृ गतौ' अथवा 'षू प्रेरणे' से क्यप् प्रत्यय होनेपर 'सूर्य' शब्द निष्पन्न होता है। 'सरति आकाशे— इति सूर्यः'—जो आकाशमें निराधार भ्रमण करता है अथवा 'सुवति कर्मणि लोकं प्रेरयति'—जो (उदयमात्रसे) अखिल विश्वको अपने-अपने कर्ममें प्रवृत्त कराता है, वह सूर्य है। व्याकरण-शास्त्रमें इसी अर्थमें—'राजसूयसूर्यमृषोद्यरुच्यकुप्यकृष्टपच्या- व्यथ्याः' (पा० सू० ३।१।११४) इस पाणिनि- सूत्रसे निपातन होकर भी सूर्य शब्द बनता है। अखिल विश्वमें प्रकाश देनेवाला, अनन्त तेजका भण्डार-मण्डल ही सूर्य शब्दका वाच्यार्थ है और इसका लक्ष्यार्थ है—मण्डलाभिमानी पुरुष—चेतन- आत्मा तथा उसका अन्तर्यामी। ऋग्वेदसंहिता कहती है— 'सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च' (१।११५।१) अर्थात्—'भगवान् सूर्य सभी स्थावर-जंगमात्मक विश्वके अन्तरात्मा हैं।' 'कालात्मा पुरुष भी सूर्य ही हैं।' ऋग्वेदसंहिताका वचन है— सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्र- मेको अश्वो वहति सप्तनामा। त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वा भुवनाधि तस्थुः ॥ (१।१६४।२) अर्थात् इस कालात्मा पुरुषका रथ बहुत ही विलक्षण है। रंहणस्वभाव (गमनशील) होनेके कारण उसे रथ कहा जाता है। वह अनवरत (सतत) गमन किया करता है। उस रथमें संवत्सरात्मा एक ही चक्र है। अहोरात्रके निर्वाहके लिये (अहोरात्रके स्वरूप- निर्माणके लिये) उसमें सात अश्व जोड़े जाते हैं— 'रथस्यैकं चक्रं भुजगयमिताः सप्त तुरगाः।' ये सात अश्व ही सात दिन हैं। वस्तुतः अश्व एक ही